आपका समर्थन, हमारी शक्ति

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

सिमटता आदमी

सिमट रहा है आदमी
हर रोज अपने में
भूल जाता है भावनाओं की कद्र
हर नयी सुविधा और तकनीक
घर में सजाने के चक्कर में
देखता है दुनिया को
टी0 वी0 चैनलों की निगाह से
महसूस करता है फूलों की खुशबू
कागजी फूलों में
पर नहीं देखता
पास-पड़ोस का समाज
कैद कर दिया है
बेटे को भी चहरदीवारियों में
भागने लगा है समाज से
चौंक उठता है
कालबेल की हर आवाज पर
मानो खड़ी हो गयी हो
कोई अवांछित वस्तु
दरवाजे पर आकर !!
एक टिप्पणी भेजें