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शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

ब्लॉग पर एक दस्तक "दस्तक" की

ब्लागिंग का जमाना है. यहाँ तक की प्रिंट-मीडिया भी अब ब्लागर्स को महत्व देने लगा है. कई अख़बारों ने तो पाठकों के पत्र की जगह ब्लाग-कोना की ही शुरुआत कर दी है. नि:संदेह इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. व्यंग्यकार सूर्य कुमार पाण्डेय की लिखी पंक्तियाँ उधृत कर रही हूँ-"अब तो हालत यह है कि अखबारों तक ने अपने पाठकों के पन्नों वाली स्पेस को इन ब्लागर्स के नाम आवंटित कर दिया है। दिनोदिन ब्लागियों की फिगर में इजाफा हो रहा है। बिना डाक टिकट, लेटरबाक्स के ही चिट्ठे लिखे जा रहे हैं। जवाब आ रहे हैं। जिनके पास एक अदद कंप्यूटर और नेट की सुविधा उपलब्ध है, वे इस चिट्ठाकारिता में अपना योगदान करने को स्वतंत्र हैं। कर भी रहे हैं। अब अंकल एसएमएस के बिग ब्रदर बाबू ब्लागानंद प्रकट हो चुके हैं। उनकी कृपा से बबुआ लव लेटरलाल, चाचा चिट्ठाचंद और पापा पोथाप्रसाद समेत फैमिली के टोटल मेंबर्स की लाइफ सुरक्षित है। सो चिट्ठी बिटिया की भी।" तो आप भी इंतजार कीजिये की कब कौन अख़बार-पत्रिका आपकी पोस्ट को रचनाओं के रूप में प्रकाशित करती है. फ़िलहाल लखनऊ से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका "दस्तक टाईम्स" (संपादक-राम कुमार सिंह, 215-रूपायन, नेहरू एन्क्लेव, गोमती नगर, लखनऊ)ने 15 जुलाई, 2009 के अंक में ब्लॉग-भारत स्तम्भ के तहत "चोखेर बाली" तथा "शब्द शिखर" पर प्रकाशित लेख "ईव-टीजिंग और ड्रेस कोड" को स्थान दिया है..आभार !!
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