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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

किरण बेदी को क्यों छोड़ दिया अन्ना जी ??

पुण्य की गंगा बह रही है, लगे हाथ सभी लोग हाथ धोकर पुण्यात्मा बन गए. इससे पहले किये गए उनके सारे पाप धुल गए...कुछ ऐसे ही लगा अपनी पिछली पोस्ट 'कौन सी क्रांति ला रहे हैं अन्ना ?' पर लिखे कुछ कमेंटों को पढ़कर. कितनों ने तो बिना पढ़े ही ख़ारिज कर दिया और किसी ने नकारात्मक मानसिकता का आरोप जड़ दिया.

एक सज्जन ने कहा कि देशवासी परिवर्तन चाहते हैं और इसीलिये भारत से भ्रष्टाचार मिटाने की बात करने वाले सभी के साथ हैं।....शायद इन सज्जन को पता नहीं कि हर राजनैतिक दल नारों में भ्रष्टाचार मिटाने की बात करता है, पर मात्र बात करने से भ्रष्टाचार नहीं मिटता, उसके लिए वैसे कर्मों की भी जरुरत होती है.

एक सज्जन ने कहा कि, देश की स्वाधीनता के लिए भी लोग अपने पूर्व नेताओं को छोड़कर महात्मा गाँधी के पीछे लग गये थे--हुआ न चमत्कार!..एक अन्य सज्जन ने जोड़ा कि -'' पर ये मत भूलिये कि एक बार फ़िर एक बूढ़ा शरीर जीने की राह दे रहा है, उसने बता दिया किया कि बदलाव के लिये गाँधी कितने ज़रूरी थे हैं और रहेंगे !''.....शायद अपनी स्मरण शक्ति पर जोर दें तो पता चलेगा कि जो लोग 'गाँधी के पीछे लग गये थे' वे उन्हें ही पीछे छोड़कर आज तक उनके नाम पर राजनीति कर रहे हैं और उनके नाम की रोटी खा रहे हैं. गाँधी जी का बदलाव आज कहीं नहीं दिख रहा है. यही हाल तो जे.पी. के साथ भी हुआ था. अपनों ने ही वैचारिक रूप से पीठ में छुरा घोंप दिया.

एक सज्जन ने हुंकार भरी है कि-'' तथ्य यह है कि आम जनता नेता/आइ.ए.ऐस/आइ.पी.ऐस के निकम्मे, भ्रष्ट और प्रशासनहीनतंत्र से त्रस्त है और परिवर्तन चाहती है। रिश्वत से लेकर आतंकवाद तक, देश की अधिकांश समस्याओं की जड में सत्ता पर काबिज़ यही निकम्मा/भ्रष्ट वर्ग है।''...मानो ये नेता, अधिकारी आसमान से टपकते हैं या दूसरे देश से आयातित होकर आए हैं. किरण बेदी के बारे में क्या कहेंगें. जाति-धर्म-क्षेत्र-पैसा के नाम पर वोट देनी वाली जनता के बारे में इन सज्जन का मौन अखरता है. आखिर जब जड़ में ही दीमक लगे हुए हैं तो वृक्ष कहाँ से मजबूत होगा ? एक देशभक्त ने क्रांतिकारी लहजों में लिखा है कि- ''अगर हम सिर्फ सोचते ही रहे तो ये भ्रष्टाचार का दानाव इतना बड़ा हो जाएगा कि आने वाले कल हमारे ही बच्चों को निगल जाएगा .''...हम भी तो वही कह रहे हैं कि सोचिये नहीं कि कोई मसीहा आयेगा, खुद कदम उठाइए.

''अन्ना को व्यक्ति नहीं एक विचारधारा मानिए तो आपके आलेख का नजरिया बदल जायेगा...'' एक सलाह यह भी दी गई है, पर सवाल मानने का नहीं कुछ करने का है. दुर्भाग्यवश इस देश में हम सिर्फ मानते, जानते, चर्चा करते और लोगों की हाँ में हाँ मिलते हैं. एक सज्जन ने तर्क दिया है कि-'' लेकिन क्या ये पहली बार नहीं हुआ सरकार को जनता की आवाज़ के सामने घुटने टेकने पड़े.''...जनाब! हर पाँच साल बाद ये नेता हमारे सामने घुटने टेकते हैं, पर तब हम अपनी जाती-धर्म-स्वार्थ देखते हैं. उसी समय क्यों नहीं चेत जाते ?

एक आलोचक ने लिखा कि -''जिन्हें कोई काम करना नहीं आता वे आलोचक बन जाते हैं। समस्या का पता सबको है। समाधान खोजने की जहमत उठाना कम लोग चाहते हैं।''...आप भी तो मेरी ही बात दुहरा रहे हैं. समाधान खोजने की बजाय हम मसीहों की तलाश करते हैं कि एक दिन वो आयेगा और हमको मुक्ति दिला जायेगा.

..ऐसी ही ढेर सारी प्रतिक्रियाएं मेरी पोस्ट पर आईं, पर सबमें हुजूम की हाँ में हाँ मिलाने वाला देशभक्त, अन्यथा देशद्रोही जैसी भावना ही चमकी. बिना बात को समझे किसी ने नकारात्मकवादी तो किसी ने सहमति जताने वालों की ही उथले सोच का दर्शाकर अपना गंभीर परिचय दे दिया. सवाल अभी भी है की हम अन्ना की व्यक्ति पूजा कर रहे हैं या विचारधारा पर जोर दे रहे हैं. अपने बारे में सुनने में इतने अ-सहिष्णु तो गाँधी जी भी नहीं थे, फिर ये अन्ना के समर्थक ??

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बाबा रामदेव ने कहा कि सिविल सोसाईटी के नाम पर जिन पाँच नामों को रखा गया है, उनमें पिता-पुत्र को रखना अनुचित है तो हंगामा मच गया..आखिर क्या गलत कहा बाबा रामदेव ने ? जिस समिति को 'समावेशी' की संज्ञा दी जा रही है उसमें किरण बेदी को रखने पर भला क्या आपत्ति थी. इस पूरी समिति में एक भी महिला का ना होना अखरता है. किरण बेदी को शामिल कर जहाँ इसे वास्तविक रूप में समावेशी बनाया जा सकता था, वहीँ ब्यूरोक्रेट के रूप में उन्हें अन्य सदस्यों से ज्यादा व्यावहारिक अनुभव भी है. अन्ना हजारे जी का यह कहना कि -''भ्रष्टाचार विरोधी कानून का प्रारूप तैयार करने के लिए अनुभवी और क़ानूनी विशेषज्ञ कि आवश्यकता थी'', तो क्या किरण बेदी के अनुभवों पर बाप-बेटे का अनुभव भरी पड़ गया. दुर्भाग्यवश, अन्ना हजारे अपनी पहली ही कोशिश में विवादों में आ गए. एक महिला और अनुभवी व्यक्तित्व किरण बेदी की उपेक्षा कर और बाप-बेटे की जोड़ी को तरजीह देकर अन्ना किस भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से लड़ने जा रहे हैं. वह किस आधार पर दूसरों पर अंगुली उठायेंगें ? यह जरुर बहस का विषय बन गया है. उन्होंने बाप-बेटे कि जोड़ी को तरजीह देकर सोनिया गाँधी और तमाम नेताओं के के लिए इतनी तो सहूलियत पैदा कर दी कि उनके वंशवाद पर अन्ना द्वारा भविष्य में कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगने जा रहा ? दूसरे समिति का अध्यक्ष नागरिक समाज से होने कि बात अस्वीकार कर सरकार ने अपने संकट मोचक प्रणव मुखर्जी को अध्यक्ष बना दिया. वैसे भी प्रणब दा विवादों को सम्मानजनक ढंग से सुलझाने के लिए ही तो जाने जाते हैं.

एक सवाल उन लोगों से जिन्होंने मेरी इस बात पर आपत्ति दर्ज की की- 'आज अन्ना हट जाएँ तो हर कोई अपने बैनर और कैंडल उठाकर अपनी खोल में सिमट जायेगा. हम भीड़ का हिस्सा बनकर नारा लगाना जानते हैं, पर खुद क्यों कोई पहल क्यों नहीं करते ?'...आखिर क्यों अन्ना के अनशन ख़त्म करते ही वे हट गए. क्यों नहीं अपने-अपने क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ने बैठ गए. अन्ना ने यदि अलख जगाई तो उस आन्दोलन का प्रभाव तब दिखता जब हर क्षेत्र -जनपद -राज्य में भ्रष्टाचार के विरोधी अन्ना के बिना भी इस मुहिम को आगे बढ़ाते. पर यहाँ तो राजनैतिक दलों की रैली की तरह अन्ना के उठते ही भीड़ अपना बोरिया-बिस्तर लेकर घर चले गए. यदि वाकई इस भीड़ में जन चेतना पैदा करने की ताकत होती तो वह रूकती नहीं बल्कि अन्ना की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज के निचले स्तर तक जाकर कार्य करती और जन-जागरूकता फैलाती. आन्दोलन के लिए निरंतरता चाहिए, न की तात्कालिकता.

वैसे भी इस देश में तमाम नियम-कानून हैं, एक कानून और सही ? कानूनों से यदि भ्रष्टाचार मिटता तो हमें यह दिन देखने को नहीं मिलता. अधिसूचना पर खुश होने वाले यह क्यों भूल रहे हैं कि हमारे यहाँ जब किसी प्रकरण को ख़त्म करना होता है तो समिति बना दी जाती है. अभी तक तो उन्हीं समितियों का नहीं पता जो पिछले सालों में गठित हुई थीं, फिर यह नई समिति, जिसकी रिपोर्ट शायद बाध्यकारी भी नहीं होगी. इस खुशफहमी में रहने की कोई जरुरत नहीं कि लोकपाल के पास ऐसी कोई जादुई छड़ी होगी कि वह उसे घुमायेगा और देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जायेगा. कानूनों से भ्रष्टाचार नहीं ख़त्म होता, बल्कि इसके लिए इच्छा शक्ति की जरुरत होती है. जरुरी है कि लोग स्वत: स्फूर्त प्रेरित हों और वास्तविक व्यवहार में भी वैसा ही आचरण करें.
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