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गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

नारी सशक्तिकरण की पर्याय : फूलबासन यादव

कहते हैं प्रतिभा के लिए कोई उपमान नहीं होता. वह अपना आसरा खुद ही ढूंढ़ लेती है. ऐसे ही एक शख्शियत हैं- छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव जनपद के सुकुलदैहान गाँव की श्रीमती फूलबासन यादव, जिन्हें उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है। नारी सशक्तिकरण की साक्षात् उदाहरण फूलबासन यादव आज कईयों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं. उनके अन्दर व्याप्त संवेदना, जज्बा प्रतिदिन उन्हें आगे बढ़ने को न सिर्फ प्रेरित करता है, बल्कि कईयों को साथ लेकर आगे बढ़ने के लिए प्रवृत्त भी करता है.

राजनांदगांव जिले के एक छोटे से गांव सुकुलदैहान के गरीब परिवार की श्रीमती फूलबासन यादव राजनांदगांव ही नहीं वरन् छत्तीसगढ़ राय में महिला सशक्तिकरण की रोल मॉडल के रूप में जानी जाती है। राजनांदगांव जिले में महिलाओं को संगठित एवं जागरूक बनाने के साथ ही उन्हें सामाजिक एवं आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में भी श्रीमती फूलबासन यादव ने अग्रणी भूमिका निभाई है। माँ बम्लेश्वरी महिला स्व.सहायता समूह के बैनर तले जिले की लगभग डेढ़ लाख महिलाओं को संगठित एवं एकजुट करने में श्रीमती फूलबासन यादव ने सूत्रधार की भूमिका अदा की है। महिलाओं के सशक्तिकरण एवं उनके उत्थान के लिए उनके द्वारा किए गए सार्थक प्रयासों के चलते ही पूर्व में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 2004-05 में मिनी माता अलंकरण से सम्मानित किया गया था। और अब श्रीमती फूलबासन यादव के महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक जागरूकता के कार्यों को देखते हुए भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किए जाने की घोषणा उनके कार्यों को और भी संबल देती है.

वर्ष 1971 में राजनांदगांव जिले के ग्राम छुरिया में श्री झडीराम यादव एवं श्रीमती सुमित्रा बाई कि पुत्री रूप में फूलबासन यादव का जन्म हुआ, तब किसने सोचा था कि एक दिन अपने नायब कार्यों से फूलबासन वाकई फूल की तरह अपनी सुगंध बिखेरंगीं. घर की पारिवारिक स्थिति आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद बड़ी मुश्किल से उन्होंने कक्षा 7वीं तक शिक्षा हासिल की। मात्र 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह ग्राम सुकुलदैहान के चंदूलाल यादव से हुआ। भूमिहीन चंदूलाल यादव का मुख्य पेशा चरवाहा का है। गांव के लोगों के पशुओं की चरवाही और बकरीपालन उनके परिवार की जीविका का आज भी आधार है।वर्ष 2001 में तत्कालीन जिलाधिकारी दिनेश श्रीवास्तव की पहल पर राजनांदगांव जिले में महिलाओं को एकजुट करने एवं उन्हें जागरूक बनाने के उद्देश्य से गांव-गांव में मां बम्लेश्वरी स्व.-सहायता समूह का गठन प्रशासन द्वारा शुरू किया गया। 2001 में इस अभियान से प्रेरित एवं कलेक्टर श्री श्रीवास्तव के प्रोत्साहन पर श्रीमती फूलबासन यादव ने अपने गांव सुकुलदैहान में 10 गरीब महिलाओं को जोड़कर प्रज्ञा मां बम्लेश्वरी स्व-सहायता समूह का गठन किया। महिलाओं को आगे बढ़ाने एवं उनकी भलाई के लिए निरंतर जद्दोजहद करने वाली फूलबासन यादव ने इस अभियान में सच्चे मन से बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। अभियान के दौरान उन्हें गांव-गांव में जाकर महिलाओं को जागरूक और संगठित करने का मौका मिला। अपनी नेक नियति और हिम्मत की बदौलत श्रीमती यादव ने इस कार्य में जबरदस्त भूमिका अदा की। देखते ही देखते राजनांदगांव जिले में मात्र एक साल की अवधि में 10 हजार महिला स्व-सहायता समूह गठित हुए और इससे डेढ़ लाख महिलाएं जुड़ गई। श्रीमती यादव ने ग्रामीण महिलाओं के बीच सामाजिक चेतना जाग्रत कर उनके आर्थिक विकास के लिए पहल की और लगभग ग्रामीण महिलाओं को जोड़ते हुए मात्र दस हजार की लागत से मां बम्लेश्वरी जनहितकारी समिति बनाई. कम पढ़ी लिखी महिलाओं की मदद से जल्द ही समिति ने बम्लेश्वरी ब्रांड नाम से आम और नींबू के अचार तैयार किए और छत्तीसगढ़ के तीन सौ से अधिक स्कूलों में उन्हें बेचा जाने लगा जहां बच्चों को गर्मागर्म मध्यान्ह भोजन के साथ घर जैसा स्वादिष्ट अचार मिलने लगा. इसके अलावा उनकी संस्था अगरबत्ती, वाशिंग पावडर, मोमबत्ती, बड़ी-पापड़ आदि बना रही है जिससे दो लाख महिलाओं को स्वावलम्बन की राह मिली है. श्रीमती यादव के मुताबिक अचार बनाने के इस घरेलू उद्योग में लगभग सौ महिला सदस्यों को अतिरिक्त आमदनी का एक बेहतर जरिया मिला और दो से तीन हजार रूपये प्रतिमाह तक कमा रही हैं. समिति ने अब तक करीब दो लाख रूपए का अचार बेचा है. इन सबका नतीजा यह हुआ कि महिलाओं ने एक दूसरे की मदद का संकल्प लेने के साथ ही थोड़ी-थोड़ी बचत शुरू की। देखते ही देखते बचत की स्व-सहायता समूह की बचत राशि करोड़ों में पहुंच गई। इस बचत राशि से आपसी में लेने करने की वजह से सूदखोरों के चंगुल से छुटकारा मिला। बचत राशि से स्व-सहायता समूह ने सामाजिक सरोकार के भी कई अनुकरणीय कार्य शुरू कर दिए, जिसमें अनाथ बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, बेसहारा बच्चियों की शादी, गरीब परिवार के बच्चों का इलाज आदि शामिल है। श्रीमती यादव ने सूदखोरों के चंगुल में फंसी कई गरीब परिवारों की भूमि को भी समूह की मदद से वापस कराने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।

श्रीमती फूलबासन यादव को 2004-05 में उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मिनीमाता अलंकरण से विभूषित किया गया। 2004-05 में ही महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से बचत बैंक में खाते खोलने और बड़ी धनराशि बचत खाते में जमा कराने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए श्रीमती फूलबासन बाई को नाबार्ड की ओर से राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। वर्ष 2006-07 में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया। 2008 में जमनालाल बजाज अवार्ड के साथ ही जी-अस्तित्व अवार्ड तथा 2010 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील के हाथों स्त्री शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। श्रीमती यादव को सद्गुरू ज्ञानानंद एवं अमोदिनी अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। उक्त पुरस्कार के तहत मिलने वाली राशि को उन्होंने महिलाओं एवं महिला समूहों को आगे बढ़ाने में लगा दिया है। श्रीमती यादव के परिवार का जीवन-यापन आज भी बकरीपालन व्यवसाय के जरिए हो रहा है।

श्रीमती यादव ने अपने 12 साल के सामाजिक जीवन में कई उल्लेखनीय कार्यों को महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से अंजाम दिया है। महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से गांव की नियमित रूप से साफ-सफाई, वृक्षारोपण, जलसंरक्षण के लिए सोख्ता गढ्ढा का निर्माण, सिलाई-कढ़ाई सेन्टर का संचालन, बाल भोज, रक्तदान, सूदखोरों के खिलाफ जन-जागरूकता का अभियान, शराबखोरी एवं शराब के अवैध विक्रय का विरोध, बाल विवाह एवं दहेज प्रथा के खिलाफ वातावरण का निर्माण, गरीब एवं अनाथ बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के साथ ही महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में भी श्रीमती यादव ने प्रमुख भूमिका अदा किया है।

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सशक्त सूत्रधार के रूप में अपना स्थान बनाने वालीं श्रीमती फूलबासन यादव का पद्मश्री के लिए चयन तो पड़ाव मात्र है. इससे जहाँ फूलबासन यादव की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं, वहीँ सरकार को भी ऐसे लोगों की खोज में निरंतर लगे रहना चाहिए जो बिना किसी लाग-लपेट के दूर-दराज गांवों में रहकर समृद्धि के गीत लिख रहे हैं..!!

- आकांक्षा यादव
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