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मंगलवार, 21 अगस्त 2012

वेब-पत्रिकाओं और ब्लॉग से चोरी हो रही हैं रचनाएँ : मुंबई से प्रकाशित 'संस्कार' पत्रिका का कारनामा









यदि आप इंटरनेट पर विभिन्न वेब-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं और ब्लॉग पर अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर रहे हैं तो बेहद सावधान और सतर्क रहने रहने की जरुरत है. क्योंकि यहाँ से आपकी रचनाओं की चोरी करना बहुत आसान है. कुछेक पत्र-पत्रिकाएं गूगल पर सर्च करती हैं, वांछित सामग्री तलाशती हैं और फिर बड़े गर्व के साथ दूसरों की रचनाएँ और आलेख अपनों के नाम से प्रकाशित कर देती हैं. ऐसे हादसे तमाम ब्लागर्स के साथ हुए हैं और हो रहे हैं. जब उन पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से पूछिये तो एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है कि हमारे पास किसी भी रचना कि मौलिकता जाँचने का कोई माध्यम नहीं है. पर जब यही हरकत खुद किसी पत्रिका के संपादक-मंडल के लोग ही करने लगें तो फिर उन्हें कोई जवाब नहीं सूझता. पिछले दिनों मुझे भी एक ऐसे ही अजीबोगरीब वाकये से रु-ब-रु होना पड़ा.

मुंबई से एक महिला- पाठक ने 'संस्कार' (अगस्त-2012 नामक एक पत्रिका मेरे पास भेजी और बताया कि आजादी की वीरांगनाओं पर आपका आलेख इस पत्रिका में किसी अन्य ने अपने नाम से प्रकाशित कराया है, जो कि सरासर चोरी है. जब मैंने इस आलेख को पढ़ा तो मैं भी हतप्रभ रह गई. हमारे द्वारा वर्ष 2007 में सम्पादित पुस्तक 'क्रांति-यज्ञ : 1857 -1947 की गाथा" पुस्तक में प्रकाशित मेरा आलेख ''वीरांगनाओं ने भी जगाई स्वाधीनता की अलख", जो कि वेब-पत्रिका 'साहित्य शिल्पी' ( http://www.sahityashilpi.com/2009/03/blog-post_9638.html) में 7 मार्च, 2009 को ''आजादी के आन्दोलन में भी अग्रणी रही नारी [आलेख] - आकांक्षा यादव'' शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है और मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग 'शब्द-शिखर' पर भी उपलब्ध है, को इस पत्रिका ने किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से शब्दों में थोडा फेर-बदल के साथ प्रकाशित किया था.

मुंबई से प्रकाशित इस 'संस्कार' नामक पत्रिका ने अपने अगस्त 2012 अंक में पृष्ठ संख्या 38 -40 पर नारी संस्कार के तहत 'ग़दर की नायिकाएं" शीर्षक से मेरा उपरोक्त आलेख कापी (चोरी) कर किसी कमलेश श्रीवास्तव के नाम से प्रकाशित किया है. जब इस पत्रिका के संपादक-मंडल को जानना चाहा तो पता चला कि ये तथाकथित लेखक ''कमलेश श्रीवास्तव'' स्वयं इसी पत्रिका के सहायक संपादक हैं. बड़ा अचरज हुआ कि पत्रिका के संपादक-मंडल का एक सदस्य खुद इंटरनेट से आलेख चोरी कर अपने नाम से प्रकाशित करवा रहा है. एक व्यावसयिक समूह ''संस्कार इन्फो टी. वी. प्रा. लि.'' द्वारा संचालित इस पत्रिका ने अपने संपादन मंडल में अच्छी खासी नामों की सूची दे रखी है. आप भी गौर कीजिये- समूह संपादक- कृष्ण कुमार पित्ती/ संपादक - सर्वेश अस्थाना/ सहायक संपादक- राजवीर रतन सिंह, कमलेश श्रीवास्तव/ परामर्शदाता-शैलेश लोढा/ अन्तराष्ट्रीय समन्वयन - डा. सुधा ओम धींगरा/ अमेरिका - डा. अनीता कपूर.

बड़े खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि कुछ तथाकथित लेखक जो खुद तो सृजन नहीं कर सकते, दूसरों के सृजन को कापी-पेस्ट और चोरी कर अपने नाम से प्रकाशित कर लेखन होने का दंभ पल रहे हैं. पत्रिका का नाम पढ़कर अहसास होता है कि यह 'संस्कार' को बढ़ावा देती होगी पर यह तो रचनाधर्मिता के स्तर पर चौर्य-प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर कुसंस्कारों को बढ़ावा दे रही है. ऐसी पत्रिकाएं किसी व्यावसायिक समूह द्वारा आरंभ भले ही हो गई हैं, पर सृजन से उनका कोई सरोकार नहीं लगता. दूसरों की रचनाओं को चुराकर यदि स्वयं संपादक-मंडल के सदस्य ही अपने नाम से प्रकाशित करवाने लगें तो यह तो 'बाड़ द्वारा खेत खाने की कहावत' को चरितार्थ करता है.बड़े शर्म की बात है कि 'नारी-संस्कार' के नाम पर एक व्यक्ति एक नारी का आलेख चुराकर अपने नाम से प्रकाशित करवा रहा है. दुर्भाग्यवश हिंदी-साहित्य का नाम बदनाम करने में ऐसे लोगों की प्रखर भूमिका है. ऐसे लोगों के लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है कि -''ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दें, कुछ लिखने का हुनर दें ताकि वे दूसरों के आलेखों को चुराकर अपने नाम से न प्रकाशित करवाएं !!'' पता नहीं कृष्ण कुमार पित्ती जी को इस बात का अहसास भी है कि नहीं की उन्होंने जिन्हें 'संस्कार' के संपादन की जिम्मेदारी दे रखी है, वे 'संस्कार' की आड़ में क्या कु-संस्कार खिला रहे हैं.

यह तो एक बानगी मात्र थी, जो मेरे संज्ञान में आई और आप सभी के साथ शेयर किया. तमाम पत्र-पत्रिकाएं ऐसे कार्यों में लिप्त होंगीं..सो सावधान रहिये, कहीं कोई आपकी रचना को अपने नाम से प्रकाशित करवाके तो रचनाकार नहीं बन बैठा है !!

अपनी जानकारी हेतु इस पत्रिका का पता भी नोट कर लीजिये, ताकि रचनाएँ भेजने में सतर्क रहें-

संपादक-संस्कार पत्रिका, पित्ती ग्रुप, वैभव चैंबर, बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स, बांद्रा (पूर्व), मुंबई-400051,
ई-मेल : editor@sanskartv@gmail.com
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