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बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

काश इंदिरा गाँधी को भी लड़की होती..


आज भारत की लौह-महिला कही जाने वाली इंदिरा गाँधी जी की पुण्य तिथि है. हम उनकी नीतियों से सहमत-असहमत हो सकते हैं, पर भारतीय राजनीति में उनके व्यक्तित्व को नज़र अंदाज़ करना संभव नहीं. वे नारी-सशक्तिकरण की प्रतीक थीं, जिनकी खुद की चाहत थी कि काश उनके यहाँ बेटी पैदा होती. उन्होंने अपनी इस भावना से अपने कई राजनैतिक सहयोगियों को अवगत कराया था कि उनकी एक पुत्री भी हो। इस बात का उल्लेख पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक 'योवर्स सिंसीयरली' में भी किया है। इसमें उन्होंने जिक्र किया है कि जब उन्हें पुत्री हुई तो उन्हें बधाई देते हुए इंदिरा गाँधी ने पत्र में लिखा था कि उनकी तमन्ना थी कि उन्हें भी एक लड़की होती।
आज इंदिरा गाँधी जी कि पुण्यतिथि है. वे एक ऐसी महिला थीं, जिनका लोहा भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया मानती है. आज हम महिला आरक्षण की बात कर रहे हैं, पर वे उस दौर में भारतीय राजनीति के शिखर पर थीं, जब दुनिया में महिलाओं का संसदीय प्रतिनिधित्व विरले ही मिलता था. काश, इंदिरा जी की कोई बेटी होती तो आज भारतीय राजनीति का चेहरा ही कुछ और होता !
 
पुण्य तिथि पर सादर नमन !!

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

'चाँद पर पानी' : श्रेष्ठतम लेखन की दिशा में गतिमान हैं कवयित्री आकांक्षा

समीक्ष्य बाल काव्य-कृति ’चाँद पर पानी’ की रचनाकार आकांक्षा यादव की यह प्रथम बाल कृति बड़े मनोयोग से प्रस्तुत की गयी है। उद्योग नगर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस कृति में तीस बालोपयोगी कवितायें आद्यन्त तक प्रसारित हैं । ये बालमन की रुचि वाली हैं ही, इनके माध्यम से अल्पवयी पाठकों को पर्यावरण, पर्व, परिवेश, खेल, देशभक्ति, पशु-पक्षियों जैसे मानवेतर प्राणियों को तकनीकी के अतिरिक्त इलेक्ट्रानिक विषयों की भी जानकारी दी गई है।
 
  कृति की संज्ञा इसकी प्रथम रचना ’चाँद पर पानी’ पर ही आधारित है। इस लघु रचना में बाल मनोविज्ञान का संस्पर्श अपने चरम पर है। बड़ी सरलता से बालिका कहती है कि-
 
चाँद पे निकला पानी,
सुनकर हुई हैरानी।
बड़ी होकर जाऊँगी,
पीने चाँद पर पानी। (चाँद पर पानी, पृ.सं. 7)
 
इस कमोवेष अविश्वसनीय कल्पना से ही ऊर्जान्वित होकर वह महत्वाकांक्षायें गढ़ने लगती है, सांकेतिक रूप से कहती है-असंभव शब्द को हमें अब कोई नया अर्थ देना होगा। 'मैं भी बनूंगा सैनिक’ की प्रारंभिक पंक्तियों में दशकों पूर्व की बहुश्रृत कवि 'मां मुझे सैनिक बना दो/चाहता रणभूमि में जाना मुझे तलवार ला दो’ की अनुगँज पाठकों और श्रोताओं को पसंद आयेगी। रचना की आगे की पंक्तियों की रंजकता तथा मासूमियत कम हदयग्राही नहीं-
 
चुस्त वर्दी और लम्बे बूट,
उस पर पहनूं आर्मी सूट।
मेरी तुम नजर उतारना,
तुम्हें करूँगा मैं सैल्यूट। (मैं भी बनूंगा सैनिक, पृ.सं. 8)
 
’नटखट बंदर’ (पृ.सं. 13) तथा ’सूरज का संदेश’ रचनायें जीवन में परिश्रम, परोपकार की उपादेयता को रेखांकित करने के साथ-साथ सभी से सूर्य मानसिकता ग्रहण करने का आह्वान भी करती हैं। यथा-
 
जीवन में तुम सदा सभी के,
ज्ञान की ज्योति फैलाओ।
दूसरों के काम आकर,
परोपकारी कहलाओ। (सूरज का संदेश पृ.सं. 10)
 
आजकल के बच्चे बचपन से ही लैपटाप पर खेलने लगे है। ऐसे में लैपटाप के प्रति बाल आसक्ति उत्पन्न करने वाली कतिपय काव्य पंक्तियों का आस्वाद भी पाठक पसंद करेंगें-
 
लैपटाप पापा जी लाए,
हम सबके यह दिल को भाए।
खेल खिलाए, ज्ञान बढ़ाए,
नई-नई ये बात बताए।
 
‘की बोर्ड‘ से हो गई यारी,
‘माउस‘ की मैं करूँ सवारी।
‘मानीटर‘ पर सब है दिखता,
कितना प्यारा है यह रिश्ता। (लैपटाप, पृ.सं. 12)
 
कविता ’राखी का त्यौहार’, भाई और बहन के बीच दीर्घजीवी प्यार का वार्षिक पुनर्स्मरण है तो ’नव वर्ष का प्रथम प्रभात’ रचना में भी नववर्ष की पहली सुबह से लोक कल्याण की कामना की गई है-
 
नैतिकता के मूल्य गढ़ें,
अच्छी-अच्छी बातें पढें।
कोई भूखा पेट न सोए,
संपन्नता के बीज बोए।
ऐ नव वर्ष के प्रथम प्रभात,
 दो सबको अच्छी सौगात। (’नव वर्ष का प्रथम प्रभात’ पृ.सं. 20)
 
तीस बाल गीतों से सुसज्जित इस कृति इस कृति की लगभग सभी रचनायें सार्थकता की दृष्टि से उत्तमतर हैं। प्रत्येक को रुचिकर रेखाचित्रों से संबंलित करने के कारण किसी का भी मन उसे पढ़ना चाहेगा। मुझे विश्वास है कि यह कृति बच्चों और प्रौढ़ों के द्वारा समान रुचि से पढ़ी जायेगी।
 
कृति: चाँद पर पानी
 
कवयित्री: आकांक्षा यादव, टाइप 5 निदेशक बंगला, जी0पी0ओ0 कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.) - 211001
 
प्रकाशन वर्ष: 2012
 
मूल्य: रु. 35/-    पृष्ठ: 36
 
प्रकाशक : उद्योग नगर प्रकाशन, 695, न्यू कोट गांव, जी0टी0रोड, गाजियाबाद (उ.प्र.)
 
समीक्षक: डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय, 130, मारुतीपुरम्, लखनऊ मो0: 09236227999
 
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डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय : एक परिचय-
 
जन्म: 28 दिसंबर, 1937 .

शिक्षा : एम्. काम., एल.एल. बी. एवं विद्यावाचस्पति व विद्यासागर (मानद उपाधियाँ)

प्रकाशन : प्राय: सभी लब्धप्रतिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का अनवरत प्रकाशन.
कृतियाँ : 7 कहानी एवं 5 काव्य-संग्रह सहित कुल 18 पुस्तकें प्रकाशित.

सम्मान : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'साहित्य भूषण' सहित विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विभिन्न सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त.

सम्प्रति : स्वतंत्र अध्ययन व लेखन.

संपर्क : डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय, 130, मारुतीपुरम्, लखनऊ (उ.प्र.). मो.: 09236227999
 
( साभार : डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय जी द्वारा लिखित उपरोक्त समीक्षा हिंदी मीडिया इन और परिकल्पना ब्लागोत्सव पर भी पढ़ी जा सकती है. इसके अलावा यह यू. एस. एम्. पत्रिका () एवं डेली न्यूज एक्टिविस्ट (27 अक्तूबर, 2012) में भी प्रकाशित है. )

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

अपूर्वा का ’बर्थ-डे’ है आया

आज 27 अक्तूबर, 2012 है. आज का दिन हमारे लिए खास मायने रखता है. आज ही के दिन हमारी प्यारी सी बिटिया अपूर्वा का जन्म हुआ था.

अपूर्वा का ’बर्थ-डे’ है आया,
सब बच्चे मिल करो धमाल।
जमके खूब खाओ तुम सारे,
हो जाओ फिर लाल-लाल।
हैप्पी ’बर्थ-डे’ मिलकर गाओ,
मस्ती करो और मौज मनाओ।
पाखी, तन्वी, खुशी, अपूर्वा,
सब मिलकर बैलून फुलाओ।
आईसक्रीम और केक भी खाओ,
कोई भी ना मुँह लटकाओ।

कितना प्यारा बर्थ-डे केक
हैप्पी बर्थ-डे मिलकर गाओ।

अपूर्वा तुम जियो हजारों साल,
साल के दिन हों पचास हजार ! 

आज अपूर्वा दो साल की हो गईं. अपूर्वा के जन्मदिन पर ढेरों बधाई, आशीर्वाद, स्नेह और प्यार. आपके आशीर्वाद और स्नेह की आकांक्षा बनी रहेगी !!
 

बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन है दशहरा


दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप मंे राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है।
 
दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में मां दुर्गा की लगातार नौ दिनांे तक पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और मांँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती हेै।
 
दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।
 
 
आप सभी को विजयदशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !!

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

300 पोस्ट के बाद प्रिंट-मीडिया में 'शब्द-शिखर' की 30वीं पोस्ट


नवरात्र पर 16 अक्तूबर, 2002 को 'शब्द-शिखर' पर लिखी गई मेरी पोस्ट 'आदिशक्ति' की पूजा, पर असली 'नारी' शक्ति मंजूर नही' को 19 अक्तूबर, 2012 को जनसत्ता के नियमित स्तम्भ 'समांतर' में 'देवी बनाम बेटी' शीर्षक से स्थान दिया है...आभार. पिछले दिनों अपने ब्लॉग 'शब्द-शिखर' पर मैंने 300 वीं पोस्ट लिखी और अब समग्र रूप में प्रिंट-मीडिया में 30वीं बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है.. आभार !!
 
इससे पहले शब्द-शिखर और अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित मेरी पोस्ट की चर्चा दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका, आज समाज, गजरौला टाईम्स, जन सन्देश, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!
 

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

'आदिशक्ति' की पूजा, पर असली 'नारी' शक्ति मंजूर नहीं...

आज से नवरात्र के दिन आरंभ हो रहे हैं. नवरात्र मातृ-शक्ति का प्रतीक है। आदिशक्ति को पूजने वाले भारत में नारी को शक्तिपुंज के रूप में माना जाता है. नारी सृजन की प्रतीक है. हमारे यहाँ साहित्य और कला में नारी के 'कोमल' रूप की कल्पना की गई है. कभी उसे 'कनक-कामिनी' तो कभी 'अबला' कहकर उसके रूपों को प्रकट किया गया है. पर आज की नारी इससे आगे है. वह न तो सिर्फ 'कनक-कामिनी' है और न ही 'अबला', इससे परे वह दुष्टों की संहारिणी भी बनकर उभरी है. यह अलग बात है कि समाज उसके इस रूप को नहीं पचा पता. वह उसे घर की छुई-मुई के रूप में ही देखना चाहता है. बेटियाँ कितनी भी प्रगति कर लें, पुरुषवादी समाज को संतोष नहीं होता. उसकी हर सफलता और ख़ुशी बेटों की सफलता और सम्मान पर ही टिकी होती है. तभी तो आज भी गर्भवती स्त्रियों को ' बेटा हो' का ही आशीर्वाद दिया जाता है. पता नहीं यह स्त्री-शक्ति के प्रति पुरुष-सत्तात्मक समाज का भय है या दकियानूसी सोच.

नवरात्र पर देवियों की पूजा करने वाले समाज में यह अक्सर सुनने को मिलता है कि 'बेटा' न होने पर बहू की प्रताड़ना की गई. विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि बेटा-बेटी का पैदा होना पुरुष-शुक्राणु पर निर्भर करता है, न कि स्त्री के अन्दर कोई ऐसी शक्ति है जो बेटा या बेटी क़ी पैदाइश करती है. पर पुरुष-सत्तात्मक समाज अपनी कमजोरी छुपाने के लिए हमेशा सारा दोष स्त्रियों पर ही मढ़ देता है. ऐसे में सवाल उठाना वाजिब है क़ी आखिर आज भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से क्यों ग्रस्त है पुरुष मानसिकता ? कभी लड़कियों के जल्दी ब्याह क़ी बात, कभी उन्हें जींस-टॉप से दूर रहने क़ी सलाह, कभी रात्रि में बाहर न निकलने क़ी हिदायत, कभी सह-शिक्षा को दोष तो कभी मोबाईल या फेसबुक से दूर रहने क़ी सलाह....ऐसी एक नहीं हजार बिन-मांगी सलाहें हैं, जो समाज के आलमबरदार रोज सुनाते हैं. उन्हें दोष महिलाओं क़ी जीवन-शैली में दिखता है, वे यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं कि दोष समाज की मानसिकता में है.

'नवरात्र' के दौरान अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा रही है. लोग उन्हें ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छानते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ?
समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल के दिनों में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहाँ महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....???
-आकांक्षा यादव

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

'शब्द-शिखर' पर 300 पोस्ट...

20 नवम्बर, 2008 का वो दिन अभी भी याद है...जब मैंने ब्लागिंग-जगत में कदम रखा था. देश भर की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही थी. साहित्य की दुनिया में अपना एक मुकाम बनाने की कोशिश कर रही थी, एक अच्छा-खासा पाठक-वर्ग और शुभ-चिंतकों का वर्ग था, जो न सिर्फ रचनाओं को पसंद करता था बल्कि प्रेरित भी करता था. ऐसे में जब हिंदी-ब्लागिंग के क्षेत्र में कदम रखा तो अंतर्जाल की दुनिया पर एक व्यापक स्पेस मिला. न संपादकों की स्वीकृति-अस्वीकृति का झंझट, प्रतिक्रियाओं के माध्यम से तत्काल ही गुण-दोष का विश्लेषण, कभी भी पढ़े जाने की सुविधा, 'कलम' की बजाय 'अँगुलियों' का कमाल और उस पर से एक नया पाठक-वर्ग. कृष्ण कुमार जी पहले से ही ब्लागिंग में सक्रिय थे, अत: तकनीकी पहलुओं को समझने-जानने में देर नहीं लगी. मुझे ब्लागिंग में सक्रिय करने में उनका संपूर्ण योगदान रहा, और उसके बाद मिली प्रतिक्रियाओं ने तो हौसला-आफजाई ही की. तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्ट को साभार प्रकाशित किया या उधृत किया. 'शब्द-शिखर' ब्लॉग की चर्चा डा. जाकिर अली रजनीश ने 12 अक्टूबर 2011 को 'जनसंदेश टाइम्स' में अपने साप्ताहिक स्तम्भ 'ब्लॉग वाणी' के तहत 'शब्द शिखर पर विराजने की आकांक्षा' शीर्षक के तहत विस्तारपूर्वक की. इस बीच कानपुर से लेकर अंडमान और अब इलाहाबाद तक के सफ़र में बहुत कुछ चीजें जुडती गई..नए-नए अनुभव, वक़्त के साथ परिष्कृत होती लेखनी, नए लोगों के साथ संवाद...!
 
मेरे लिए ब्लॉग सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं बल्कि संवाद, प्रतिसंवाद, सूचना, विचार और अभिव्यक्ति के सशक्त ग्लोबल मंच के साथ-साथ सामाजिक जनचेतना को भी ब्लागिंग से जोड़ना है. 'शब्द-शिखर' ब्लॉग पर मैंने अपनी साहित्यिक-रचनाधर्मिता के साथ-साथ समय-समय पर विभिन्न विषयों और सरोकारों पर बेबाकी से अपने विचार भी अभिव्यक्त किये. इस बीच ब्लागिंग पर तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं और उनमें मैंने अपने आलेखों/चर्चा द्वारा सहभागिता सुनिश्चित की. इसके अलावा भी तमाम पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में हिंदी ब्लागिंग को लेकर मैंने लेखनी चलाई, ताकि अन्य लोग भी इस विधा से जुड़ सकें.
 
ब्लागिंग में मैं ही नहीं बल्कि पूरा परिवार ही सक्रिय है. कृष्ण कुमार जी, बेटी अक्षिता (पाखी)...अक्षिता को परिकल्पना समूह द्वारा 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर-2010' एवं आर्ट और ब्लागिंग के लिए भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार-2011' से भी सम्मानित किया जा चूका है. हाल ही में ”परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान” के तहत हमें 27 अगस्त 2012 को लखनऊ में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन में “दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपत्ति (2003-2012)“ के ख़िताब से भी नवाजा गया. ये सम्मान जीवन में सुखद अहसास देते हैं, और कुछ नया करने की प्रेरणा भी.
 
'शब्द-शिखर' को आप सबका भरपूर स्नेह और समर्थन मिला और यही कारण है की अगले माह 4 वर्ष पूरे करने जा रहा यह ब्लॉग 300 पोस्टों का सफ़र पूरा कर चूका है. लगभग 68 देशों में देखे-पढ़े जाने वाले इस ब्लॉग का 272 जन अनुसरण कर रहे हैं. 30 सितम्बर, 2012 को इस ब्लॉग की 300वीं पोस्ट ''आकांक्षा यादव को 'हिंदी भाषा-भूषण' की मानद उपाधि'' शीर्षक से प्रकाशित हुई और 301वीं पोस्ट के रूप में ''हिंदी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं" नामक आलेख प्रकाशित किया गया.
 
तीन शतक (300) के पोस्ट के क्रम में आप सभी का जो भरपूर प्रोत्साहन और स्नेह मिला..उस सबके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार !!

-आकांक्षा यादव

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं : आकांक्षा यादव


वर्तमान साहित्य में नारी पर पर्याप्त मात्रा में लेखन कार्य हो रहा है, पर कई बार यह लेखन एकांगी होता है। यथार्थ के धरातल पर आज भी नारी-जीवन संघर्ष की दास्तान है। नारी बहुत कुछ कहना चाहती है पर मर्यादाएं उसे रोकती हैं। कई बार ये अनकही भावनाएं डायरी के पन्नों पर उतरती हैं या साहित्य-सृजन के रूप में। पर न्यू मीडिया के रूप में उभरी ब्लागिंग ने नारी-मन की आकांक्षाओं को मानो मुक्ताकाश दे दिया हो। वर्ष 2003 में यूनीकोड हिंदी में आया और तदनुसार तमाम महिलाओं ने हिंदी ब्लागिंग में सहजता महसूस करते हुए उसे अपनाना आरंभ किया। आज 50,000 से भी ज्यादा हिंदी ब्लाग हैं और इनमें लगभग एक चौथाई ब्लाग महिलाओं द्वारा संचालित हैं। ये महिलाएं अपने अंदाज में न सिर्फ ब्लागों पर सहित्य-सृजन कर रही हैं बल्कि तमाम राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक मुददों से लेकर घरेलू समस्याओं, नारियों की प्रताड़ना से लेकर अपनी अलग पहचान बनाती नारियों को समेटते विमर्श, पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से लेकर पुरूष समाज की नारी के प्रति दृष्टि, जैसे तमाम विषय ब्लागों पर चर्चा का विषय बनते हैं।

हिंदी ब्लागिंग ने महिलाओं को खुलकर अपनी बात रखने का व्यापक मंच दिया है। तभी तो ब्लाॅगिंग का दायरा परदे की ओट से बाहर निकल रहा है। इनमें प्रशासक, डाक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, विद्यार्थी, पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, समाजसेवी, साहित्यकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी, रेडियो जाकी से लेकर सरकारी व कारपोरेट जगत तक की महिलाएं शामिल हैं। कामकाजी महिलाओं के साथ-साथ गृहिणियां भी इसमें खूब हाथ आजमा रही हैं। महिलाओं में हिन्दी ब्लागिंग आरम्भ करने का श्रेय इन्दौर की पद्मजा को है, जिन्होंने वर्ष 2003 में ‘कही अनकही‘ ब्लाग के माध्यम से इसकी शुरूआत की। पद्मजा उस समय ‘वेब दुनिया‘ में कार्यरत थीं। फिलहाल पद्मजा का यह ब्लाग अन्तर्जाल पर उपलब्ध नहीं है और उसे उन्होंने हटा दिया है। फिर भी इसे इंटरनेट आर्काइव पर देखा जा सकता है-http://web.archive.org/web/*/http://padmaja.blogspot.com/ आरंभिक हिंदी महिला ब्लागरों में पूर्णिमा वर्मन, प्रत्यक्षा सिन्हा, रचना बजाज, सारिका सक्सेना, सुजाता, नीलिमा, रत्ना, दीना मेहता, निधि श्रीवास्तव, मानोषी चटर्जी, रचना, डा. कविता वाचक्नवी इत्यादि का नाम लिया जा सकता है।
 
ब्लागिंग में हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं अपनी अभिव्यक्तियों को विस्तार दे रही हैं, अतः इनका दायरा भी व्यापक है। ये ब्लॉग सिर्फ साहित्यिक गतिविधियों- कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, आप-बीती, निबंध इत्यादि को ही प्राण वायु नहीं दे रहे हैं, बल्कि महिला ब्लागर्स समसामयिक मुद्दों से लेकर राजनैतिक-सामाजिक परिप्रेक्ष्य, भ्रष्टाचार, मंहगाई, पर्यावरण, धार्मिक विश्वास, खान-पान, संगीत, ज्योतिषी इत्यादि तक पर प्रखरता से लिख रही हैं। कभी अस्तित्ववादी विचारों की पोषक सीमोन डी बुआ ने ‘सेकेण्ड सेक्स’ में स्त्रियों के विरूद्ध होने वाले अत्याचारों और अन्यायों का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि-“पुरूष ने स्वयं को विशुद्ध चित्त (Being-for- itself : स्वयं में सत्) के रूप में परिभाषित किया है और स्त्रियों की स्थिति का अवमूल्यन करते हुए उन्हें “अन्य” के रूप में परिभाषित किया है व इस प्रकार स्त्रियों को “वस्तु” रूप में निरूपित किया गया है।’’ कहीं-न-कहीं आधुनिक समाज में भी यह प्रवृत्ति मौजूद है और ऐसे में ब्लॉग स्त्री आन्दोलन, स्त्री विमर्श, महिला सशक्तिकरण और नारी स्वातंत्र्य के हथियार के रूप में भी उभरकर सामने आया है। यहाँ महिला की उपलब्धि भी है, कमजोरी भी और बदलते दौर में उसकी बदलती भूमिका भी।
 
हर महिला-ब्लागर का अपना अनूठा अंदाज है, अपनी विशिष्ट प्रस्तुति है। यहाँ भिन्न-भिन्न रूपों में पाएंगें- कुछ अनुभव, कुछ अहसास, कुछ शब्द, कुछ चित्र। वर्तमान में ‘चोखेर बाली‘ एवं ‘नारी‘ जैसे सामुदायिक ब्लागों पर नारियों से जुड़े मुद्दों पर जमकर बहस हो रही है। यहाँ समाज में व्याप्त स्त्री के प्रति भेदभाव से लेकर लैंगिक हिंसा और पुरुषवादी दर्प को चुनौती तक शामिल है। स्त्री प्रश्नों पर केन्द्रित हिन्दी का पहला सामुदायिक ब्लॉग ‘चोखेर बाली‘ को माना जाता है, जिसे 4 फरवरी 2008 को सुजाता तेवतिया और रचना ने आरंभ किया। इसके शीर्षक पर लिखे शब्दों पर गौर करें, जो कि इस ब्लॉग के आरंभ होने की कहानी खुद ही बयां करता है- ”धूल तब तक स्तुत्य है जब तक पैरों तले दबी है, उड़ने लगे, आंधी बन जाए..तो आंख की किरकिरी है, चोखेर बाली है।” नारीवादी विमर्श को प्रखरता से उठाने के चलते चंद समय में ही इस ब्लाग से तमाम ब्लागर व लेखक जुड़ते गए। इस ब्लाग की एक खासियत यह भी है कि इस पर महिला व पुरुष समान रूप से लिख सकते हैं। वर्तमान में इससे 43 से ज्यादा ब्लागर्स जुड़े हुए हैं एवं इस पर लगभग 515 पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं, जो कि इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। ‘चोखेर बाली‘ कई बार पीडि़त महिलाओं की व्यथा को जस का तस देने के लिए भी चर्चा में रहा। 5 अप्रैल 2008 को रचना ने एक अन्य सामुदायिक ब्लाग ‘नारी‘ का आरम्भ किया।
 
जहाँ ‘चोखेर बाली‘ नारी-पुरुष दोनों को लिखने का मौका देती है, वहीं ‘नारी‘ ब्लाग पर सिर्फ महिलाएं ही लिख सकती हैं। स्पष्ट है कि यह पहला ऐसा सामुदायिक हिन्दी ब्लाग है जिस पर सिर्फ नारियाँ ही लिख सकती हैं। नारी ब्लॉग के ऊपर लिखा वाक्य इसकी भूमिका को स्पष्ट करता है- ”जिसने घुटन से अपनी आजादी खुद अर्जित की एक कोशिश नारी को ’जगाने की’, एक आवाहन कि नारी और नर को समान अधिकार है और लिंगभेद/जेंडर के आधार पर किया हुआ अधिकारों का बंटवारा गलत है और अब गैर कानूनी और असंवैधानिक भी। बंटवारा केवल क्षमता आधारित सही होता है।” इस ब्लाग के सम्बंध में एक अन्य बात गौरतलब है कि यहाँ सिर्फ गद्य पोस्ट ही प्रकाशित हो सकती हैं, पद्य रचनाओं के लिए ”नारी का कविता ब्लॉग” है। ‘नारी‘ ब्लाग में जहाँ नारी सशक्तीकरण के तमाम आयामों को प्रस्तुत किया गया, वहीं कई गंभीर बहसों को भी जन्म दिया। इस पर लगभग 1040 से ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं, जो कि इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। रचना को ब्लागिंग जगत में अपनी धारदार टिप्पणियों के लिए भी जाना जाता है। हालाँकि 15 अगस्त, 2011 से नारी ब्लॉग का सामुदायिक रूप खत्म कर इसे व्यक्तिगत ब्लॉग बना दिया गया था, पर 15 अगस्त, 2012 से इसने पुन: सामुदायिक रूप धारण कर लिया है। वर्तमान में इससे 22 से ज्यादा महिला ब्लागर्स जुडी हुई हैं.

आज की महिला यदि संस्कारों और परिवार की बात करती है तो अपने हक के लिए लड़ना भी जानती है। ऐसे में नारियों के ब्लॉग पर स्त्री की कोमल भावनाएं हैं तो दहेज, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, आनर किलिंग, सार्वजनिक जगहों पर यौन उत्पीड़न, लिव-इन-रिलेशनशिप, महिला आरक्षण, सेना में महिलाओं के लिए कमीशन, न्यायपालिका में महिला न्यायधीशों की अनदेखी, फिल्मों-विज्ञापनों इत्यादि में स़्त्री को एक ‘आबजेक्ट‘ के रूप में पेश करना, साहित्य में नारी विमर्श के नाम पर देह-विमर्श का बढ़ता षडयंत्र, नारी द्वारा रुढि़यों की जकड़बदी को तोड़ आगे बढ़ना....जैसे तमाम विषयों के बहाने स्त्री के ‘स्व‘ और ‘अस्मिता‘ को तलाशता व्यापक स्पेस भी है। साहित्य की विभिन्न विधाओं से लेकर प्रायः हर विषय पर सशक्त लेखन और संवाद स्थापित करती महिला हिंदी ब्लागर, ब्लागिंग जगत में काफी प्रभावी हैं। चर्चित जाल-पत्रिका ’अभिव्यक्ति’ और ’अनुभूति’ का संपादन करने वाली पूर्णिमा वर्मन का नाम वेब पर हिंदी की स्थापना करने वालों में सर्वोपरि है। वर्ष 2004 में ’अभिव्यक्ति‘ पत्रिका में चर्चित हिंदी ब्लागर रवि रतलामी द्वारा लिखित हिन्दी में ब्लागिंग पर प्रथम आलेख ”अभिव्यक्ति का नया माध्यम: ब्लाग” प्रकाशित कर उन्होंने तमाम लोगों को ब्लागिंग से जुड़ने में मदद की। सम्प्रति संयुक्त अरब अमीरात में रह रहीं एवं विकिपीडिया के प्रमुख प्रबंधकों में से एक पूर्णिमा वर्मन ने प्रवासी और विदेशी हिंदी लेखकों और लेखिकाओं को प्रकाशित करने तथा हिंदी के साथ उनका सेतु-सम्बन्ध जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई है। इसी प्रकार रश्मिप्रभा ने आनलाइन कवि सम्मेलन को लोकप्रिय बनाया तो संगीता पुरी ’गत्यात्मक ज्योतिष’, ’फलित ज्योतिष: सच या झूठ’ के बारे में बता रही हैं।
 
आकांक्षा यादव ‘उत्सव के रंग‘ बिखेर रही हैं तो ‘खाना खजाना‘ (गरिमा तिवारी), ‘खान-पकवान’, ‘खाना मसाला‘ (उर्मि चक्रवर्ती) को समेटते ब्लाग अपने जायकों से किसी के भी मुँह में पानी ला सकते हैं। रंजना भाटिया ‘अमृता प्रीतम की याद में‘ लिख रही हैं तो डा० हरदीप संधु ‘हिंदी हाइकु‘ को ब्लाग-जगत में समृद्ध कर रही हैं। विदेश में बैठकर रानी पात्रिका ‘आओ सीखें हिन्दी‘ का आहवान कर रही हैं, वहीं डा० कविता वाचक्नवी ‘हिंदी भारत‘ एवं ‘वेब प्रौद्योगिकी (हिंदी)‘ को बढ़ावा दे रही हैं। पूर्वोत्तर व कश्मीर में आतंकवाद के विरूद्ध लड़ने वालों हेतु प्रतीकात्मक रूप में ‘हमारी बहन शर्मीला‘ (मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला जो पिछले 9 सालों से धरनारत हैं) ब्लाग भी दिखेगा। किन्नर भी ब्लागिंग के क्षेत्र में हैं और बाकायदा हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा (अर्धसत्य) इस क्षेत्र में प्रथम नाम है। ’शेयर बाजार और ऊर्जा चिकित्सा’ में भला कया संबध हो सकता है, गरिमा तिवारी मनोयोग से बताती हैं। अलका मिश्रा ’मेरा समस्त’ के माध्यम से बता रही हैं कि जडी बूटियाँ हमारा खजाना हैं, न विश्वास हो तो आजमा कर देखें। लबली गोस्वामी वेब निर्माण संबंधित प्रोग्रामिंग भाषाओं एवं वेब से जुडे़ तकनीकी पहलुओं को ‘संचिका‘ में समेट रही हैं।
 
नारीवादी सिद्धान्तों की साधारण शब्दों में व्याख्या और नारी की कुछ समस्याओं के कारणों की खोज और समाधान ढ़ूँढ़ने का प्रयास ’नारीवादी-बहस’ में है। इसकी संचालिका आराधना चतुर्वेदी ‘मुक्ति‘ कितनी साफगोई से लिखती हैं -”कुछ खास नहीं, बस नारी होने के नाते जो झेला और महसूस किया, उसे शब्दों में ढालने का प्रयास कर रही हूँ। चाह है, दुनिया औरतों के लिए बेहतर और सुरक्षित बने।” ऐसे ही तमाम विषय हैं, जिन पर महिला ब्लागर्स प्रखरता से लिख रही हैं।

यहाँ एक बात और गौर करने लायक है कि हिंदी में ब्लागिंग करने वाली महिलाएं सिर्फ हिंदी-बेल्ट तक ही नहीं सीमित हैं, बल्कि इनमें जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत एवं दक्षिण भारत तक की महिलाएं शामिल हैं। भारत से चर्चित महिला ब्लागरों में निर्मला कपिला (वीर बहूटी), Mired Mireg (घूघूती बासूती), रचना (नारी, बिना लाग लपेट के जो कहा जाए वही सच है), आकांक्षा यादव (शब्द शिखर, सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग, बाल दुनिया), हरकीरत हीर (हरकीरत ‘हीर‘), आर0 अनुराधा (इंद्रधनुष, समवेत), रचना सिंह (बस ऐसे ही, बस यूं ही, शब्द, नारी का कविता ब्लॉग, ब्लॉगर रचना का ब्लॉग बिना लाग लपेट के जो कहा जाए वही सच है, नारी NAARI), कविता रावत (kavita Rawat), रश्मि प्रभा (मेरी भावनाएं, क्षणिकाएं, नज्मों की सौगात, वट वृक्ष), रश्मि रविजा (मन का पाखी), रश्मि स्वरूप (नन्हीं लेखिका), शेफाली पांडे (कुमाऊंनी चेली), रेखा श्रीवास्तव (यथार्थ, मेरा सरोकार, कथा-सागर, मेरी सोच), रेखा (राहें जो अनजानी सी थी, मैंने पढ़ी है), रेखा रोहतगी (Rekha Rohatgi), शोभना चैरे (मेरी कविताओं का संग्रह, अभिव्यक्ति), लता ‘हया‘ (हया), फिरदौस खान (मेरी डायरी, The Pardise), संगीता पुरी (गत्यात्मक ज्योतिष, फलित ज्योतिष: सच या झूठ), संगीता स्वरूप (बिखरे मोती, गीत...मेरी अनुभूतियाँ), सुमन मीत (अर्पित सुमन, बावरा मन), मनीषा कुलश्रेष्ठ (बोलो जी), वीणा श्रीवास्तव (वीणा के सुर), वाणी गीत (गीत मेरे, ज्ञानवाणी), अजित गुप्ता (अजित गुप्ता का कोना), संध्या गुप्ता (संध्या गुप्ता), प्रतिभा कटियार (प्रतिभा की दुनिया), नमिता राकेश (नमिता राकेश), डा0 स्वाति तिवारी (शब्दों के अक्षत), प्रत्यक्षा सिन्हा (प्रत्यक्षा), अलका मिश्र (साहित्य हिन्दुस्तानी, मेरा समस्त), वंदना अवस्थी दुबे (अपनी बात, जो लिखा नहीं गया, किस्सा-कहानी), रजनी नैयर मल्होत्रा (मेरे मन की उलझन), मीनू खरे (उल्लास), पुनीता (हमारा बचपन, नारी जगत), रंजना सिंह (संवेदना संसार), रंजना (रंजू) भाटिया (साया, अमृता प्रीतम की याद में, कुछ मेरी कलम से), आराधना चतुर्वेदी ‘मुक्ति‘ (aradhana-आराधना का ब्लॉग, नारीवादी-बहस, Feminist Poems), डा0 मीना अग्रवाल (टमाटर-2), किरण राज पुरोहित नितिला (भोर की पहली किरण, मेरी कृति), गरिमा तिवारी (खाना खजाना, शेयर बाजार और ऊर्जा चिकित्सा, मैं और कुछ नहीं), पारुल पुखराज (सरगम, चांद पुखराज का), सीमा गुप्ता (My Passion, kuchlamhe), सीमा रानी (काहे नैना लागे, कुछ कवितायें कुछ हैं गीत), सीमा सचदेव (खट्टी-मीठी यादें, सञ्जीवनी, मानस की पीड़ा, मेरी आवाज, नन्हा मन), डा0 मोनिका शर्मा (परवाज....शब्दों के पंख), स्वाति ऋषि चड्ढा (मेरे एहसास भाव), ज्योत्सना पांडेय (ज्योत्सना मैं), पूनम श्रीवास्तव (झरोखा), अपर्णा मनोज भटनागर (मौलश्री), अनामिका ‘सुनीता‘( अनामिका की सदायें, अभिव्यक्तियाँ), सुशीला पुरी (सुशीला पुरी), नीलम पुरी (Ahsas), मृदुला प्रधान (Mridula's blog), विनीता यशस्वी (यशस्वी), वंदना गुप्ता (जिन्दगी एक खामोश सफर, जख्म जो फूलों ने दिये, एक प्रयास), शारदा अरोरा (गीत-गजल, जिन्दगी के रंग दोस्तों के संग, जीवन यात्रा, एक दृष्टिकोण, सफर के सजदे में), रचना त्रिपाठी (टूटी-फूटी), प्रिया (एक नीड़ ख्वाबों,ख्यालों और ख्वाहिशों का, जीवन के रंग मेरी तूलिका के संग), डा0 निधि टंडन (जिंदगीनामा), फौजिया रियाज (अल्फाज), सीमा सिंघल (सदा), डॉ. जेन्नी शबनम (लम्हों का सफर), मुदिता (एहसास अंतर्मन के), सुषमा ’आहुति’ (आहुति), साधना वैद (Sudhinamaa), प्रवीणा जोशी (रेत पर बनते निशान), शेफाली श्रीवास्तव (मेरे शब्द), दर्शन कौर धनोय (मेरे अरमान.. मेरे सपने), इस्मत जैदी (शेफा कजगाँवी), ऋचा (Lamhon ke jharokhe se), स्तुति पांडेय (शान की सवारी), कंचन सिंह चौहान (ह्नदय गवाक्ष), पल्लवी त्रिवेदी (कुछ एहसास), हर्ष छाया (जींस गुरू), विभा रानी (छम्मकछल्लो कहिस), लवली कुमारी (संचिका), शमा (सिमटे लम्हें), मीनाक्षी पन्त (एक नजर इधर भी, सुविचार), अपर्णा त्रिपाठी (Palash पलाश), सुमन जिंदल (Kshitij), शहरोज अनवरी (साझी संस्कृति), सुषमा सिंह (चिट्ठी जगत), प्रियदर्शिनी तिवारी (प्रियदर्शिनी), सोनल रस्तोगी (कुछ कहानियाँ, कुछ नज्में), महेश्वरी कनेरी (अभिव्यंजना), असीमा भट्ट (असीमा), डा. किरण मिश्रा (किरण की दुनिया), आशा (Akanksha), पवित्रा अग्रवाल (लघु कथा, बाल किशोर), प्रीति महेता (Antrang - The InnerSoul), सुधाकल्प (तूलिका सदन, बचपन के गलियारे, बाल कुंज), (ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड), रुचि झा (Aagaaz), शबनम खान (क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती), स्वप्न मंजूषा अदा (काव्य मंजूषा), नीलम (पाखी- मेरी उम्मीद, क्या अमरों का लोक मिलेगा तेरी करुणा का उपहार), रमा दिवेदी (अनुभूति कलश), मीनू खरे (उल्लास, Science is interesting), गायत्री शर्मा (मीठी मालवी), बेजी जैसन ( दृष्टिकोण, अवलोकन, मेरी कठपुतलियाँ), दीप्ति गुप्ता (दीप्ति गुप्ता), मीनाक्षी अरोड़ा (सुजलाम- इधर- उधर से), पूजा उपाध्याय (लहरें), प्रियंका राठौड़ (विचार प्रवाह), संध्या शर्मा (मैं और मेरी कविताएँ), विश्व महिला परिवार इत्यादि एक लम्बी सूची है, जो अनवरत अपनी रचनात्मक पहल से हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध कर रही हैं। हिंदी में ब्लागिंग करने वाली महिलाओं के बारे में Woman Who Blog In Hindi ब्लॉग, http://hindibloggerwoman.blogspot.com/ और ’महिलावाणी’ एग्रीगेटर पर भी विस्तार से देखा जा सकता है।

हिन्दी ब्लागिंग में महिलाओं की सक्रियता सिर्फ भारत तक ही नहीं बल्कि विदेशों तक विस्तारित है। इनमें शारजाह, संयुक्त अरब अमीरात से पूर्णिमा वर्मन (चर्चित जाल-पत्रिका अभिव्यक्ति और अनुभूति की सम्पादिका, चोंच में आकाश, अभिव्यक्ति मंच, एक आंगन धूप, साहित्य समाचार, शुक्रवार चैपाल), आबूधाबी, संयुक्त अरब अमीरात से अल्पना वर्मा (व्योम के पार, भारत दर्शन), दुबई, संयुक्त अरब अमीरात से मीनाक्षी धन्वन्तरी (प्रेम ही सत्य है), कनाडा से स्वप्न मंजूषा शैल ‘अदा‘ (काव्य मंजूषा, संतोष शैल, ब्लाग रेडियो), पर्थ, आस्ट्रेलिया से उर्मि चक्रवर्ती (गुलदस्ते-ए-शायरी, कवितायें), डा० हरदीप संधू (शब्दों का उजाला, हिंदी हाइकु), डॉ० भावना कुँअर (दिल के दरमियाँ, शाख के पत्ते - लीलावती बंसल), सिंगापुर से श्रद्धा जैन (भीगी गजल), लंदन से शिखा वाष्र्णेय (स्पंदन), यू0के0 से डा0 कविता वाचक्नवी (हिन्दी भारत, वागर्थ, पीढि़याँ, वेब-प्रोद्यौगिकी (हिन्दी),Beyond the second Sex (स्त्री विमर्श), पल्लवी (मेरे अनुभव), अमेरिका से लावण्या शाह (लावण्यम - अंतर्मन), आशा जोगलेकर (स्वप्न रंजिता, श्रीमद्भागवत व्यंजनम्), डा0 सुषमा नैथानी (स्वप्नदर्शी), गिरिबाला जोशी (द ग्रिस्ट मिल: आटा चक्की), रानी विशाल (काव्य तरंग), वंदना सिंह (कागज मेरा मीत है कलम मेरी सहेली), पोर्टलैंड से रानी पात्रिक (आओ सीखें हिन्दी), थाईलैंड से डा0 दिव्या श्रीवास्तव (Zeal), स्वीडन से अनुपमा पाठक (अनुपम यात्रा...की शुरूआत), क्वालालंपुर, मलेशिया से अनुपमा त्रिपाठी (anupama's sukrity) इत्यादि नाम लिये जा सकते हैं।

कहते हैं बच्चों की प्रथम शिक्षक माँ होती है। माँ की लोरियाँ, लाड-दुलार व खेल-खेल में बताई गई बातें ही बच्चों का परिवेश तैयार करते हैं और उन्हें अपने संस्कारों से परिचित कराते हैं। ऐसे में तमाम महिलाएं नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए भी तमाम ब्लाग संचालित कर रही हैं। इनमें बाल-मन से जुडे तमाम सवाल हैं, बालोपयोगी साहित्य है, प्रेरक प्रसंग हैं, बच्चों से जुड़ी तमाम रचनाएं व बातें हैं। इन ब्लागों में प्रमुख हैं- बाल दुनिया (आकांक्षा यादव), बाल संसार (किरण गुप्ता), बाल सभा (डा० कविता वाचक्नवी), बाल कुंज, बचपन के गलियारे (सुधा कल्प), बाल वृंद (अपराजिता), नन्हा मन (सीमा सचदेव), बच्चों की दुनिया (शन्नू), लाडली (बेटियों का ब्लाग: सदा), खिलौने वाला घर (रश्मि प्रभा), मेरा आपका प्यारा ब्लॉग, नन्हे फरिश्तों के लिए हम तो हर पल जिए (शिखा कौशिक), पाखी-मेरी उम्मीद (नीलम),Baby Notes (मोनिका शर्मा), पार्थवी (इंदु अरोड़ा), बाल किशोर (पवित्रा अग्रवाल), मन के रंग (कार्तिका सिंह)। ऐसे ही तमाम ब्लाग अपनी पोस्ट से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझा रहे हैं ।

जब घर में मम्मी व अन्य ब्लागिंग कर रहे हों तो भला बेटियाँ इससे पीछे कैसे रह सकती हैं? आखिर ये 21वीं सदी की बेटियाँ हैं जो वक्त के माथे पर नई इबारत लिखने को तत्पर हैं । बेटियों के इन ब्लॉगों पर उनके हँसने-रोने, रूठने-मनाने, खेलने-कूदने, सीखने-सिखाने की बातें हैं तो उनकी बनाई ड्राइंग, उनकी दिनचर्या, उनका घूमना-फिरना, उनकी शरारतें, स्कूल की बातें, बर्थ-डे पार्टियाँ, उनकी प्यारी-प्यारी बातें सब कुछ यहाँ मिलेंगीं और इन बेटियों के लिए यह काम उनके मम्मी-पापा करते हैं। बेटियों से जुड़े प्रमुख ब्लाग हैं- पाखी की दुनिया (अक्षिता : पाखी), नन्हीं परी (इशिता जैन), चुलबुली (चुलबुल), लविजा | Laviza (लविज़ा), अक्षयांशी (अक्षयांशी सिंह सेंगर), अनुष्का (अनुष्का जोशी),kritika choudhary (कृतिका चैधरी), पंखुरी टाइम्स (पंखुरी), Angel(अनन्या साहू), परी कथा (मानसी), चुन चुन गाती चिडि़या (पाखी), नन्हीं कोपल (कोपल कोकास), कुहू का कोना (कुहू), Little Fingers(चिन्मयी) इत्यादि। बच्चों की मासूमियत और नटखटपन के गवाह बनते ये ब्लॉग काफी लोकप्रिय हैं। इनमें अक्षिता (पाखी) को तो हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित भव्य अन्तराष्ट्रीय ब्लागर्स सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर हेतु ”हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” दिया गया। यह सम्मान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ”निशंक” द्वारा चर्चित साहित्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे गणमान्य साहित्यकारों की गौरवमयी उपस्थिति में दिया गया।
 
अक्षिता (पाखी) का चित्र चर्चित बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘चूं-चूं‘ के कवर-पेज पर भी दिया। इतनी कम उम्र में अक्षिता के एक कलाकार एवं एक ब्लागर के रूप में असाधारण प्रदर्शन हेतु भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ ने ’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार, 2011’ भी प्रदान किया। इसके तहत अक्षिता को 10,000 रूपये नकद राशि, एक मेडल और प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। मात्र 4 साल 8 माह की आयु में ’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ प्राप्त कर नन्हीं ब्लागर अक्षिता ने एक अनूठा कीर्तिमान बनाया है। यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया। चुलबुल तो अपनी हर बात प्यारा सी चित्र बनाकर करती है। ऐसे ही बेटियों का हर ब्लाग अनूठा है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने इनकी इस क्रिएटिवटी को लेकर फीचर/लेख भी प्रकाशित किए हैं। वाकई बेटियों और उनसे जुड़े ब्लॉगों को देखकर अज्ञेय जी के शब्द याद आते हैं-‘‘भले ही बच्चा दुनिया का सर्वाधिक संवेदनशील यंत्र नहीं है पर वह चेतनशील प्राणी है और अपने परिवेश का समर्थ सर्जक भी। वह स्वयं स्वतन्त्र चेता है, क्रियाशील है एवं अपनी अंतःप्रेरणा से कार्य करने वाला है, जो कि अधिक स्थायी होता है।‘‘

वास्तव में देखा जाय तो ब्लॉगिंग के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति बड़ी मजबूत है और वे तमाम विषयों पर अपनी रुचि के हिसाब से खूब लिख रही हैं। अपने व्यक्तिगत ब्लॉगों के साथ तमाम सामुदायिक ब्लागों पर भी महिलाएं अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। अन्य ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाओं को महिलाएं खूब प्रोत्साहित कर रही हैं। अपनी लेखनी के जरिए जहाँ तमाम छुए-अनछुए मुद्दों को स्थान दे रही हैं, वहीं 21वीं सदी में तेजी से बढ़ते नारी के कदमों को भी रेखांकित कर रही हैं। कई बार तो कुछ पुरुष ब्लागर्स यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाते और अनाप-शनाप टिप्पणियां भी करते दिखते हैं। पर उन्हें उसी अंदाज में भरपूर जवाब भी मिल रहा है, आखिर यही तो सशक्तीकरण है। यही नहीं महिलाओं के लिए उलूल-जुलल लिखने एवं उन्हें परंपरागत रूढि़वादी बधनों में बाँधने के हिमायती पोस्टों पर अपना वैचारिक प्रतिरोध भी दर्ज कर रही हैं। प्रिंट मीडिया भी विभिन्न ब्लागों की चर्चा में नारियों द्वारा लिखी जा रही पोस्टों को अपने पन्नों पर बखूबी स्थान दे रहा है, ताकि वहाँ भी विमर्श का दायरा खुल सके।
 
दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दी ब्लागिंग द्वारा नारी सशक्तीकरण को नए आयाम मिले हैं। तमाम महिला-ब्लाॅगर्स सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स- फेसबुक, टिवटर, आरकुट, हाई 5, बिग अड्डा, गूगल प्लस इत्यादि पर भी उतनी ही सक्रिय हैं। कुछेक महिला ब्लागर्स तो इससे परे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी सक्रिय हैं। वस्तुतः ब्लाग का सबसे बड़ा फायदा है कि यहाँ कोई सेंसर नहीं है, ऐसे में जो चीज अपील करे उस पर स्वतंत्रता से विचार प्रकट किया जा सकता है। इस क्षेत्र में महिलाओं का भविष्य उज्जवल है, क्योंकि यहाँ कोई रूढि़गत बाधाएं नहीं हैं। जैसे-जैसे हिंदी ब्लागिंग का दायरा बढ़ता गया, वैसे-वैसे इस पर सम्मलेन, सेमिनार, शोध और पुस्तकों का उपक्रम भी आरंभ हो गया। इन सबमें महिला ब्लागर्स ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। मध्य प्रदेश स्थित विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से गायत्री शर्मा ”हिंदी ब्लागिंग के विविध आयाम” विषय पर शोधरत हैं तो पेशे से पत्रकार और ब्लागिंग में सक्रिय सुषमा सिंह भी हिंदी-ब्लाॅगिंग पर शोधरत हैं। स्पष्ट है कि महिलाएं हिन्दी ब्लागिंग को न सिर्फ अपना रही हैं बल्कि न्यू मीडिया के इस अन्तर्राष्ट्रीय विकल्प के माध्यम से अपनी वैश्विक पहचान भी बनाने में सफल रही हैं।

 
 
चित्र साभार : www.shabdsharrang.blogspot.com