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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

कांस्य युग में भी थी ’सोशल नेटवर्किंग’

आजकल सोशल नेटवर्किंग की सर्वत्र चर्चा है। न्यू मीडिया के विकल्प रूप में उभरी इन साइट्स ने एक साथ संवाद, क्रांति और कौतुहल तीनों को जन्म दिया है। फेसबुक तो एक अरब से ज्यादा लोगों के साथ एक ग्लोबल-विलेज ही बन गया है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर राजनीति, धर्म, अध्यात्म, कला, संस्कृति, साहित्य, सरोकार, विमर्श से लेकर रिश्तों का बनना-बिगड़ना तक जारी है।
 
ऐसे में यह जानना अचरज भरा होगा कि विश्व में फेसबुक, आरकुट, ट्विटर या इस तरह की सोशल नेटवर्किंग साइटस का आज से नहीं बल्कि करीब 3,000 साल पहले से इस्तेमाल हो रहा है। यदि वैज्ञानिकों की मानें तो कांस्य युग में यानी करीब 3,000 साल पहले भी लोग एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए फेसबुक सरीखे किसी सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर अपने मित्रों से जुड़े रहते थे। वैज्ञानिकों ने इसे वर्तमान फेसबुक का प्राचीन ऐतिहासिक संस्करण करार दिया है।
 
     यह दावा कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की एक टीम ने रूस और स्वीडन में दो विशालकाय ग्रेनाइट चट्टानों पर उकेरे गये  हजारों चित्रों के अध्ययन के बाद किया है। उनका कहना है कि ये स्थल एक तरह से सोशल नेटवर्क के पुरातन संस्करण हैं, जिनमें यूजर्स विचारों और भावनाओं का आदान-प्रदान करते थे और दूसरों के योगदान पर स्टैंप लगाकर उसकी सराहना करते थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे फेसबुक में हम ’लाइक’ को क्लिक करके किसी की बात को पसंद करते हैं।

 इस अध्ययन से जुड़े एक शोधकर्ता मार्क सैपवेल का मत है कि, ’इन खाली जगहों के बारे में जरूर कुछ खास बात है। मुझे लगता है कि लोग वहाँ इसलिए गए क्योंकि वे जानते थे कि उनसे पहले भी वहाँ बहुत से लोग जा चुके हैं. आज की तरह तब भी लोग एक-दूसरे से जुड़े रहना चाहते थे, एक लिखित भाषा का आविष्कार होने से पहले शुरूआती समाज में ये हजारों चित्र उनके लिए पहचान का इजहार करने के साधन थे।’’
 
 सैपवेल के मुताबिक, रूस के जालावरूगा और उत्तरी स्वीडन के नामफोरसेन में वह जिन स्थलों का अध्ययन कर रहे हैं, उनमें जानवरों, मनुष्यों, नौकाओं और शिकारी दलों की तस्वीरें शामिल हैं।

- आकांक्षा यादव
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