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सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

"लघुकथाओं की मल्लिका" एलीस मुनरो

महिलाएँ आज जीवन की हर ऊंचाई को छू रही है। दुनिया भर में महिलाएं अपनी श्रेष्ठता का परचम फहरा रही हैं। तभी तो  दुनिया भर के तमाम सम्मान नारी के आँचल में समाये हैं, इन्हीं में से नोबेल सम्मान भी है। अभी तक 44  महिलाओं को नोबेल पुरस्कार मिला है और उनमें से 13 साहित्य के क्षेत्र में। 

 इस बार वर्ष 2013 के साहित्य के प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार के लिए "लघुकथाओं की मल्लिका" के नाम से विख्यात कनाडा की लेखिका एलिस मुनरो को चुना गया है। मुनरो साहित्य का नोबेल जीतने वाली 13 वीं महिला हैं, जबकि किसी भी क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाली 44वीं महिला हैं। अनूठी कथाकार और मानवीय संवेदनाओं की मर्मज्ञ कलमकार एलीस मुनरो को यह पुरस्कार मानवीय परिस्थितियों की कमजोरियों पर आधारित लघु कथाओं  के लिए प्राप्त हुआ. वर्ष 1901 में शुरु हुए नोबेल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाली एलिस पहली कनाडाई नागरिक हैं. स्वीडिश अकादमी ने एलिस (82वर्ष) को समकालीन लघु कहानी का मास्टर बताकर सम्मानित किया. अकादमी ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी कहानियों की पृष्ठभूमि छोटे शहरों के माहौल में होती है जहां सामाजिक स्वीकार्य अस्तित्व के लिए संघर्ष के कारण अक्सर रिश्तों में तनाव और नैतिक विवाद होता है.

कनाडा के विंघम में 10 जुलाई 1931 में जन्मी मुनरो ने 1950 में पत्रिकाओं में लिखना शरू किया था। साढ़े बारह लाख अमेरिकी डालर के पुरस्कार की घोषणा करते हुए स्वीडिश अकादमी ने मुनरो के लिए कहा, "कुछ आलोचक उन्हें कनाडाई चेखव भी मानते हैं।'' अंग्रेजी के अलावा मुनरो फ्रेंच, स्वीडिश, स्पेनिश और जर्मन में भी लिखती रही हैं। ग्लैमर और मीडिया से दूरी पसंद मुनरो ने 2009 में बताया था कि उनके दिल की बाईपास सर्जरी भी हुई है और वह कैंसर से भी पीडित रही हैं। लेकिन इस क्रांतिकारी लेखिका ने इन सब मुसीबतों का डट कर मुकाबला किया और आज भी अपने कलम की धार कुंद नहीं होने दी है। 

एलिस मुनरो यूँ ही इस मुकाम तक नहीं पहुंचीं बल्कि इसके पीछे एक लम्बी साहित्य यात्रा है। मुनरो का पहला कहानी संग्रह "डांस आफ हैप्पी शेड्स" 1968 मे प्रकाशित हुआ, जबकि उनका ताजा कहानी संग्रह "डीयर लाइफ" पिछले साल वर्ष 2012 में   प्रकाशित हुआ। उनके अन्य कहानी संग्रहों में लाइव्स आफ गल्र्स एंडवीमिन्स (1971) हू डू यू थिंक यू आर (1978), द मून्स आफ जुपिटर (1982), रनअवे (2004), द वियू फ्राम कैसल राक (2006) और टू मच हैप्पीनेस (2009) उल्लेखनीय हैं। उनके कहानी संग्रह हेटशिप, फ्रेंडशिप, कोर्टशिप, लवशिप, मैरिज (2001) पर वर्ष 2006 में "अवे फ्राम हर" नाम से फिल्म भी बनी थी। एलिस मुनरो की कहानियां अक्सर छोटे शहरों के माहौल पर आधारित होती हैं, जहां अस्तित्व की सामाजिक स्वीकार्यता का संघर्ष तनावपूर्ण संबंधों और नैतिक उहापोह को जन्म देता है। ऎसी समस्याएं जो पीढियों के अतंर और महत्वाकांक्षा के टकराव से पैदा होती हैं। 

 वर्ष 2009 में मुनरो को प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार भी मिला था, जबकि तीन बार उन्हें कनाडा के "गवर्नर जनरल अवार्ड" से नवाजा गया है। यह भी अजीब इत्तफाक है कि  मुनरो स्वयं कहानीकार के बदले उपन्यासकार बनना चाहती थीं, पर भाग्य कि नियति उन्हें कहानीकार बना गया।  इसी साल जुलाई में न्यूयार्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "अपनी पहली पांच किताबें लिखते समय मैं प्रार्थना कर रही थी कि काश मैं उपन्यास लिखती। मैं सोचती थी कि जब तक आप उपन्यास नहीं लिखते, लोग आपको लेखक के रूप में गंभीरता से नहीं लेते। यह सोच कर मैं काफी परेशान रहती थी, लेकिन अब कोई भी बात मुझे परेशान नहीं करती। मैं समझती हूं कि अब लोग लघुकथाओं को पहले के मुकाबले अधिक गंभीरता से लेते हैं।

एलिस मुनरो को 10 दिसंबर, 2013  को स्टाकहोम में एक औपचारिक समारोह में 12 . 4 लाख डालर की राशि और पुरस्कार दिया जायेगा. कनाडाई लेखिका एलिस मुनरो ने कहा कि वह यह जानकार काफी आश्चर्यचकित और प्रसन्न हैं कि उन्होंने साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीता है.एलीस ने  कहा, हां मुझे पता था कि मैं दौड़ में हूं लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं जीतूंगी.   लेखिका ने कहा कि उनकी बेटी ने उन्हें जगाते हुए खबर दी कि स्वीडन की नोबेल समिति ने साहित्य पुरस्कार के लिए उन्हें चुना है.
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