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गुरुवार, 4 जून 2015

पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल बनकर मानोबी रचेंगी इतिहास

हौसला हो तो सब कुछ हासिल किया जा सकता है, बस जरूरत अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत रखकर संघर्ष करने की है। पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर वूमेंस कॉलेज में एसोशियट प्रोफ़ेसर मानोबी बंद्योपाध्याय एक नया इतिहास रचने को तैयार हैं।  भारत में पहली बार किसी ट्रांसजेंडर को प्रिंसिपल बनाया जा रहा है। 9 जून को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में एक वुमन्स कॉलेज में प्रिंसिपिल का चार्ज संभालने जा रहीं मानबी बनर्जी ने इसे लंबी लड़ाई के बाद मिली जीत करार दिया है।  मानबी फिलहाल विवेकानंद सतोवार्षिकी महाविद्यालय में बांग्ला की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। शायद भारत ही नहीं, विश्व में यह पहला मौका होगा जब किसी ट्रांसजेंडर को कॉलेज के प्रिंसिपल की जिम्मेदारी दी जा रही है। गौरतलब है कि  अप्रैल, 2014  में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर को तीसरे जेंडर के रूप में मान्यता दी थी। एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में 20 लाख से ज्यादा ट्रांसजेंडर हैं।

सोमनाथ से मानबी 
मानबी बनर्जी का पहले नाम सोमनाथ था। उनकी दो बहनें थीं और घर में केवल वह ही लड़के थे। एक इंटरव्यू में मानबी कहा था, ''बचपन में ही मुझे खुद में लड़की होने का अहसास हुआ। लेकिन मेरे पिता यह पसंद नहीं करते थे। मैं पढ़ने के साथ ही डांसिंग क्लास जाना पसंद करती थी। मेरे पिता हमेशा मुझे ताना मारा करते थे। हालांकि, मेरी बहनें हमेशा मेरे साथ रहती थीं। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, यह महसूस हुआ कि मुझे लड़कियों के मुकाबले लड़के अच्छे लगते हैं। जब कोई लड़का मुझे छूता था तो कुछ अलग फीलिंग होती थी, लेकिन मैं अपनी इच्छा किसी से कह नहीं पाती। जब मैं स्कूल में थी तो खुद साइकेट्रिस्ट के पास गई, लेकिन मेरे अंदर कोई बदलाव नहीं आया। डॉक्टर मुझे कहते थे कि मैं भूल जाऊं कि लड़की हूं। कुछ डॉक्टरों ने तो यहां तक कह दिया था कि यदि मैंने लड़की होने का अहसास नहीं छोड़ा तो आत्महत्या तक करनी पड़ सकती है। वे मुझे नींद की दवाइयां देते थे, लेकिन मैं उन्हें फेंक देती थी। मेरा जीवन इसी तरह चलता रहा। घर में मैं लड़कियों की तरह रहती थी, लेकिन जब घर से बाहर निकलती थी तो परिवार वालों के डर से मुझे ट्राउजर और शर्ट पहनना पड़ता था। मर्दों जैसा व्यवहार करना पड़ता था। यह मेरे लिए बहुत पीड़ा का वक्त था, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। इस सबके बावजूद मैंने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी। होमो होने के कारण मुझे स्कूल और कॉलेज में ताने मारे जाते थे, लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

2003 में ऑपरेशन द्वारा बन गई पूरी महिला
मानबी कहती हैं, "2003-2004 में मैंने हिम्मत जुटाई और सेक्स चेंज ऑपरेशन कराने का फैसला लिया। इस दौरान मुझे कई ऑपरेशन कराने पड़े। पांच लाख रुपए में मैंने यह ऑपरेशन कराया। सर्जरी के बाद मैं पूरी तरह से स्वतंत्र हो गई। अब मैं जो चाहती हूं, पहनती हूं। आराम से साड़ी पहनती हूं। ऑपरेशन के तुरंत बाद मैंने अपना नाम सोमनाथ से मानबी रख लिया, जिसका बांग्ला में मतलब महिला होता है।" मानबी नाम चुनने के पीछे भी वे तर्क देती हैं, "इसका अर्थ है कि हम सभी मनुष्य हैं. मनुष्य केवल पुरुष नहीं होता...बंगाली में मानबी का मतलब मानवता से है, इसलिए मैंने ये नाम चुना। "

साहित्यिक-सांस्कृतिक  अभिरुचि की हैं मानबी
मानबी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुडी हुई हैं। उनका  एक ग्रुप थिएटर है जिसमें वे अभिनय करती हैं।  वे  स्क्रिप्ट भी लिखती हैं। शास्त्रीय नृत्य में  पारंगत मानबी ने अपने जीवन के अनुभवों पर उपन्यास भी लिखा है। एंडलेस बॉन्डेज (Endless Bondage)। यह बेस्टसेलर रहा। 1995 में मानबी ने ट्रांसजेंडर्स के लिए पहली मैगजीन 'ओब-मानब' (उप-मानव) निकाली। मैगजीन भले ही नहीं बिकती हो, लेकिन इसका प्रकाशन आज भी होता है। उनका मानना है कि अध्यापन, नाटक, अभिनय लेखन सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और  ये सब हिम्मत औऱ रस देते हैं। 

पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल बनने के बाद आप मानबी चाहती हैं  कि वे  शिक्षा को ज़्यादा से ज़्यादा ट्रांसजेंडर लोगों तक पहुंचाएं  क्योंकि इस अधिकार से वो अक्सर वंचित रह जाते हैं और शिक्षा ही उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की अहम कड़ी है। 

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