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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सिंधु और साक्षी के बाद समाज में बेटियाँ



बेटियों को मौका मिले तो वो तारे भी जमीं पर लाने का हौसला रखती हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर कैरियर तक उन्हें जहाँ भी मौका मिला, डॉक्टर-इंजीनियर-आई.ए.एस की परीक्षाओं से लेकर अंतरिक्ष की कल्पना तक...... हर जगह उन्होंने नए मुकाम गढ़े। पर इस सबके बावजूद पितृसत्तात्मक समाज सदैव से बेटियों के साथ दोयम व्यवहार करता रहा है। भ्रूण-हत्या से लेकर धरा पर आने तक हर कदम पर उसकी आवाज़ और जज्बे को कुचलने का प्रयास किया गया। उनकी शारीरिक संरचना को ही उनकी कमजोरी बना दिया गया।  रक्षाबंधन जैसे त्यौहार को भाई द्वारा बहन की रक्षा से जोड़कर, बहनों को और कमजोर बना दिया गया। ऐसे में रियो ओलम्पिक में जब लाव-लश्कर के साथ गई भारतीय टीम को अंतिम समय पर दो बेटियों ने मेडल लाकर उबारा तो एक बार फिर से समाज में बीटा बनाम बेटी की बहस तेज हो गई।  बदलते वक़्त के साथ समाज की दकियानूसी सोच को अब बदलने की जरुरत है। जिस देश में 125 करोड़ लोग मिल कर एक बेटी की इज्जत नहीं बचा पाते, उस देश की दो बेटियों पी. वी. सिंधु और साक्षी मलिक ने रियो ओलम्पिक में 125 करोड़ देशवासियों की इज्जत बचा ली। यह भी संयोग था कि उस दिन रक्षाबंधन का पर्व था। जिस समाज में दहेज़ के नाम पर बहुओं से सोना लाने की आशा की जाती है, वह देश आज बेटियों  से गोल्ड की उम्मीद लगाये है ! इन सबको लेकर प्रिंट मिडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया व वाट्सएप पर नारी-सशक्तिकरण और बेटियों के पक्ष में बड़ी अच्छी-अच्छी बातें सुनने को मिलीं, उनमें से कुछेक यहाँ शेयर कर रही हूँ -

सिंधु, साक्षी तुमने मेडल जीता
देश झूम कर नाचा है
तुमने भ्रूण हत्यारों के
चेहरे पे जड़ा तमाचा है
आज ख़ुशी से नाच रहे 
साक्षी-सिंधु चिल्लाते हो
अपने घर में बेटी जन्मे
फिर क्यों मुँह लटकाते हो?
रियो ओलम्पिक में भारत ने
दो मेडल ही पाया है
और ये दोनों मेडल भी
बेटियों ने ही लाया है
आज इन्हीं बेटियों के आगे
जनमानस नतमस्तक है
आज इन्हीं के कारण ही 
भारत का ऊँचा मस्तक है
आज ख़ुशी से झूम रहे हो
अच्छी बात है झूमो-गाओ
लेकिन घर में बेटी जन्मे 
तब भी इतनी खुशी मनाओ
बेटियाँ कम नहीं किसी से
शक्ति का अवतार हैं
इनको जो सम्मान न दे
उसका जीना धिक्कार है !!

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हुआ कुम्भ खेलों का आधा, हाथ अभी तक खाली थे।
औरों की ही जीत देख हम, पीट रहे क्यों ताली थे।
सवा अरब की भीड़ यहाँ पर, गर्दन नीचे डाले थी।
टूटी फूटी आशा अपनी, मानो भाग्य हवाले थी।
मक्खी तक जो मार न सकते, वे उपदेश सुनाते थे।
जूझ रहे थे उधर खिलाड़ी, लोग मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता था भारत ने, नाम डुबाया खेलों में।
कोई कहता धन मत फूंको, ऐसे किसी झमेलों में।
कोई कहता मात्र घूमने, गए खिलाड़ी देखो तो।
कोई कहता भारत की है, पंचर गाड़ी देखो तो।
बस क्रिकेट के सिवा न जिनको, नाम पता होगा दूजा।
और वर्ष भर करते हैं जो, बस क्रिकेट की ही पूजा।
चार साल के बाद उन्हें फिर नाक कटी सी लगती है।
पदक तालिका देख देख कर, शान घटी सी लगती है।
आज देश की बालाओं ने, ताला जड़ा सवालों पर।
कस के थप्पड़ मार दिया है, उन लोगों के गालों पर।
बता दिया है जब तक बेटी, इस भारत की जिंदा हैं।
यह मत कहना भारत वालो, हम खुद पर शर्मिंदा हैं।
शीश नहीं झुकने हम देंगी, हम भारत की बेटी हैं।
आन बान की खातिर तो हम, अंगारों पर लेटी हैं।
भूल गए यह कैसे रक्षा-बंधन आने वाला है।
बहिनों के मन में पावन, उत्साह जगाने वाला है।
भैया रहें उदास भला फिर, कैसे राखी भाती ये।
पदकों के सूखे में पावस, कैसे भला सुहाती ये।
दो-दो पदकों की यह राखी, बाँधी, देश कलाई पर।
इतना तो अहसान सदा ही, करती बहिना भाई पर।
आज साक्षी के भुजदंडों, ने सबको ललकारा है।
अगर हौसला दिल में है तो, पूरा विश्व हमारा है।
पीवी संधू के तेवर हैं,  जैसे लक्ष्मीबाई हो।
अपनी भाई की खातिर ज्यों, बहिन युद्ध में आई हो।
जिनको अबला कहा वही तो, सबला बन छा जातीं हैं।
अपने मन में ठान लिया वह, पूरा कर दिखलाती हैं !!

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ऋणी रहेगा देश सिंधु, साक्षी, इस राखी के उपहार का
बहनों के सर जिम्मा हैं अब राष्ट्र के विस्तार का
मांस-मीट की ताकत फिर से दूध-दही से हारी हैं
हिन्दुस्तान में  साबित हो गया बेटी बेटों पर भारी हैं
करते रहे गुनाह हम, केवल बेटे के शौक में
कितने मेडल मार दिए, जीते जी ही कोख में
चमक रहीं है बेटियाँ, बन माथे का बिंदु 
बढ़ा रहीं सम्मान देश का, साक्षी और सिंधु !!

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एक बानगी यह भी..... 

Days are really changing fast in India. 
Earlier women used to win beauty contests and men used to be wrestling champions.
Now the roles have reversed. 
Rohit Khandelwal was Mr World 2016
While Sakshi is wrestling champion in 2016 Olympics
Food for thought....
Sindhu won silver !!
Sakshi won bronze !!

इस तरह के विचारों और भावों को सुनना बहुत सुकूनदायी लगता है।  पर, दुर्भाग्यवश इस तरह की बातों का ज्वार बेहद अल्प होता है।  कुछेक समय बाद, फिर से वही पुराना ढर्रा आरम्भ हो जाता है। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसी चीजें नारों तक ही सीमित रह जाती हैं। जरूरत है कि आज के दौर की सच्चाई को स्वीकार किया जाये और बेटियों को सशक्त करके राष्ट्र को भी सशक्त किया जाये !!
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