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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

मानव ही बन गया है खतरा...


अस्तित्व की लड़ाई का सिद्धांत इस जग में बहुत पुराना है. एक तरफ प्रकृति का प्रकोप, वहीँ दूसरी तरफ सभ्यता का प्रकोप. वनमानुष, जिन्हें मानवों का पूर्वज मन जाता है अब मानव के चलते ही भय महसूस कर रहे हैं. एक तरफ मानव बेटियों को गर्भ में ख़त्म कर रहा हैं, वहीँ मानवी लालच के चलते अब पशु-पक्षी भी तंग हो चुके हैं. कोई अपना घोंसला उजड़े जाने से त्रस्त है तो कोई जंगल में सभ्यता की आड में फैलते दोहन से.

मेघालय के गारो हिल्स में हूलाॅक गिब्बन (वनमानुष) तो मन की इन्हीं करतूतों के चलते अपनी ममता का गला तक घोंट दे रहे  हैं। नए सदस्य के जन्म लेते ही पिता दिल पर पत्थर रख उसे जमीन पर पटक देता है। आखिर, दिनों-ब-दिन सिमटते जंगल और घटते भोजन पर नई पीढ़ी कैसे जिंदा रहेगी ? वनमानुषों ने इसी सवाल का यह निर्मम हल निकाला है। याद कीजिये कंस द्वारा कृष्ण की खोज में की गई हत्याएं, पर यहाँ तो अपने अस्तित्व पर ही खतरा महसूस हो रहा है. साल दर साल अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे वनमानुषों की संख्या पिछले 25 वर्ष में 90 फीसदी कम हो गई है। औलाद से अजीज कुछ नहीं, इंसान हो या जानवर संतान सुख का भाव सबमें एक है। परन्तु सभ्यता के नाम पर  मची विकास की अंधी होड़ से विनाश की कगार पर पहुंच चुके वनमानुष शायद जिंदगी की आस ही छोड़ चुके हैं। ऐसे में इस असुरक्षा के भाव ने ही उन्हें अपनी ही संतान की जान का दुश्मन बना दिया है.

देहरादून स्थित प्राणि विज्ञान सर्वेक्षण विभाग की टीम हूलाॅक गिब्बन पर अब तो बाकायदा शोध कर रही है। शोध के नतीजे बताते हैं कि वनमानुषों के व्यवहार में आए इस परिवर्तन का असर उनकी प्रजनन दर पर भी पड़ा है। मेघालय के जंगलों में किए जा रहे अध्ययन के निष्कर्ष से साफ है कि तेजी से कट रहे जंगलों से वनमानुषों का रहन-सहन भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।हूलाॅक गिब्बन की प्रजनन की रफ्तार घटने से उनके अस्तित्व पर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां तक कि वे अपने बच्चों के कातिल बन बैठे हैं। जन्म लेते ही नर नवजात की पटक कर हत्या कर देता है। वर्ष 1990 में असम में इनकी संख्या लगभग 130 थी, जबकी आज यह घटकर 80 हो गई है। पिछले आंकड़ों पर गौर करें तो मेघालय सहित पूर्वोत्तर भारत के अन्य राज्यों में 25 साल पहले करीब 70 हजार के आसपास वनमानुष थे, जो आज सिर्फ तकरीबन 600 रह गए हैं।

ऐसे में जरुरत है कि सभ्यता की  आड में प्रकृति का अन्धादोहन करने से बचा जाय. आंगन की गौरैया, फूलों पर मंडराती तितलियाँ, पशु-लाशों पर इतराते गिद्ध से लेकर राष्ट्रीय पशु बाघ तक खतरे में हैं. हर रोज इनके कम होने या विलुप्त होने की ख़बरें आ रही हैं, पर हम हाथ पर हाथ धरे रहकर बैठे हैं. प्रकृति और पर्यावरण से मानव का अभिन्न नाता है. यदि प्रकृति का विकास चक्र यूँ ही गड़बड़ होता रहा तो न सिर्फ हम अपनी जैव-विविधता खो देंगें, बल्कि सुनामी, कटरीना के झंझावातों से भी रोज लड़ते रहेंगें. कंक्रीट के घरों में बैठकर चाँद को छूने की ख्वाहिश रखने वाला मानव यह क्यों भूल जाता है कि उसे अपने साथ ही पशु-पक्षियों-पेड़-पौधों के लिए भी सोचना चाहिए. इस जहान में प्रकृति ने उनके लिए भी जगह मयस्सर की है, और यदि ऐसे ही हम उनका हक़ छीनकर उन्हें मौत के मुंह में धकेलते रहेंगें तो मानवता को भी मौत में मुंह में जाने से कोई नहीं रोक सकता !! 

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

किरण बेदी को क्यों छोड़ दिया अन्ना जी ??

पुण्य की गंगा बह रही है, लगे हाथ सभी लोग हाथ धोकर पुण्यात्मा बन गए. इससे पहले किये गए उनके सारे पाप धुल गए...कुछ ऐसे ही लगा अपनी पिछली पोस्ट 'कौन सी क्रांति ला रहे हैं अन्ना ?' पर लिखे कुछ कमेंटों को पढ़कर. कितनों ने तो बिना पढ़े ही ख़ारिज कर दिया और किसी ने नकारात्मक मानसिकता का आरोप जड़ दिया.

एक सज्जन ने कहा कि देशवासी परिवर्तन चाहते हैं और इसीलिये भारत से भ्रष्टाचार मिटाने की बात करने वाले सभी के साथ हैं।....शायद इन सज्जन को पता नहीं कि हर राजनैतिक दल नारों में भ्रष्टाचार मिटाने की बात करता है, पर मात्र बात करने से भ्रष्टाचार नहीं मिटता, उसके लिए वैसे कर्मों की भी जरुरत होती है.

एक सज्जन ने कहा कि, देश की स्वाधीनता के लिए भी लोग अपने पूर्व नेताओं को छोड़कर महात्मा गाँधी के पीछे लग गये थे--हुआ न चमत्कार!..एक अन्य सज्जन ने जोड़ा कि -'' पर ये मत भूलिये कि एक बार फ़िर एक बूढ़ा शरीर जीने की राह दे रहा है, उसने बता दिया किया कि बदलाव के लिये गाँधी कितने ज़रूरी थे हैं और रहेंगे !''.....शायद अपनी स्मरण शक्ति पर जोर दें तो पता चलेगा कि जो लोग 'गाँधी के पीछे लग गये थे' वे उन्हें ही पीछे छोड़कर आज तक उनके नाम पर राजनीति कर रहे हैं और उनके नाम की रोटी खा रहे हैं. गाँधी जी का बदलाव आज कहीं नहीं दिख रहा है. यही हाल तो जे.पी. के साथ भी हुआ था. अपनों ने ही वैचारिक रूप से पीठ में छुरा घोंप दिया.

एक सज्जन ने हुंकार भरी है कि-'' तथ्य यह है कि आम जनता नेता/आइ.ए.ऐस/आइ.पी.ऐस के निकम्मे, भ्रष्ट और प्रशासनहीनतंत्र से त्रस्त है और परिवर्तन चाहती है। रिश्वत से लेकर आतंकवाद तक, देश की अधिकांश समस्याओं की जड में सत्ता पर काबिज़ यही निकम्मा/भ्रष्ट वर्ग है।''...मानो ये नेता, अधिकारी आसमान से टपकते हैं या दूसरे देश से आयातित होकर आए हैं. किरण बेदी के बारे में क्या कहेंगें. जाति-धर्म-क्षेत्र-पैसा के नाम पर वोट देनी वाली जनता के बारे में इन सज्जन का मौन अखरता है. आखिर जब जड़ में ही दीमक लगे हुए हैं तो वृक्ष कहाँ से मजबूत होगा ? एक देशभक्त ने क्रांतिकारी लहजों में लिखा है कि- ''अगर हम सिर्फ सोचते ही रहे तो ये भ्रष्टाचार का दानाव इतना बड़ा हो जाएगा कि आने वाले कल हमारे ही बच्चों को निगल जाएगा .''...हम भी तो वही कह रहे हैं कि सोचिये नहीं कि कोई मसीहा आयेगा, खुद कदम उठाइए.

''अन्ना को व्यक्ति नहीं एक विचारधारा मानिए तो आपके आलेख का नजरिया बदल जायेगा...'' एक सलाह यह भी दी गई है, पर सवाल मानने का नहीं कुछ करने का है. दुर्भाग्यवश इस देश में हम सिर्फ मानते, जानते, चर्चा करते और लोगों की हाँ में हाँ मिलते हैं. एक सज्जन ने तर्क दिया है कि-'' लेकिन क्या ये पहली बार नहीं हुआ सरकार को जनता की आवाज़ के सामने घुटने टेकने पड़े.''...जनाब! हर पाँच साल बाद ये नेता हमारे सामने घुटने टेकते हैं, पर तब हम अपनी जाती-धर्म-स्वार्थ देखते हैं. उसी समय क्यों नहीं चेत जाते ?

एक आलोचक ने लिखा कि -''जिन्हें कोई काम करना नहीं आता वे आलोचक बन जाते हैं। समस्या का पता सबको है। समाधान खोजने की जहमत उठाना कम लोग चाहते हैं।''...आप भी तो मेरी ही बात दुहरा रहे हैं. समाधान खोजने की बजाय हम मसीहों की तलाश करते हैं कि एक दिन वो आयेगा और हमको मुक्ति दिला जायेगा.

..ऐसी ही ढेर सारी प्रतिक्रियाएं मेरी पोस्ट पर आईं, पर सबमें हुजूम की हाँ में हाँ मिलाने वाला देशभक्त, अन्यथा देशद्रोही जैसी भावना ही चमकी. बिना बात को समझे किसी ने नकारात्मकवादी तो किसी ने सहमति जताने वालों की ही उथले सोच का दर्शाकर अपना गंभीर परिचय दे दिया. सवाल अभी भी है की हम अन्ना की व्यक्ति पूजा कर रहे हैं या विचारधारा पर जोर दे रहे हैं. अपने बारे में सुनने में इतने अ-सहिष्णु तो गाँधी जी भी नहीं थे, फिर ये अन्ना के समर्थक ??

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बाबा रामदेव ने कहा कि सिविल सोसाईटी के नाम पर जिन पाँच नामों को रखा गया है, उनमें पिता-पुत्र को रखना अनुचित है तो हंगामा मच गया..आखिर क्या गलत कहा बाबा रामदेव ने ? जिस समिति को 'समावेशी' की संज्ञा दी जा रही है उसमें किरण बेदी को रखने पर भला क्या आपत्ति थी. इस पूरी समिति में एक भी महिला का ना होना अखरता है. किरण बेदी को शामिल कर जहाँ इसे वास्तविक रूप में समावेशी बनाया जा सकता था, वहीँ ब्यूरोक्रेट के रूप में उन्हें अन्य सदस्यों से ज्यादा व्यावहारिक अनुभव भी है. अन्ना हजारे जी का यह कहना कि -''भ्रष्टाचार विरोधी कानून का प्रारूप तैयार करने के लिए अनुभवी और क़ानूनी विशेषज्ञ कि आवश्यकता थी'', तो क्या किरण बेदी के अनुभवों पर बाप-बेटे का अनुभव भरी पड़ गया. दुर्भाग्यवश, अन्ना हजारे अपनी पहली ही कोशिश में विवादों में आ गए. एक महिला और अनुभवी व्यक्तित्व किरण बेदी की उपेक्षा कर और बाप-बेटे की जोड़ी को तरजीह देकर अन्ना किस भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से लड़ने जा रहे हैं. वह किस आधार पर दूसरों पर अंगुली उठायेंगें ? यह जरुर बहस का विषय बन गया है. उन्होंने बाप-बेटे कि जोड़ी को तरजीह देकर सोनिया गाँधी और तमाम नेताओं के के लिए इतनी तो सहूलियत पैदा कर दी कि उनके वंशवाद पर अन्ना द्वारा भविष्य में कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगने जा रहा ? दूसरे समिति का अध्यक्ष नागरिक समाज से होने कि बात अस्वीकार कर सरकार ने अपने संकट मोचक प्रणव मुखर्जी को अध्यक्ष बना दिया. वैसे भी प्रणब दा विवादों को सम्मानजनक ढंग से सुलझाने के लिए ही तो जाने जाते हैं.

एक सवाल उन लोगों से जिन्होंने मेरी इस बात पर आपत्ति दर्ज की की- 'आज अन्ना हट जाएँ तो हर कोई अपने बैनर और कैंडल उठाकर अपनी खोल में सिमट जायेगा. हम भीड़ का हिस्सा बनकर नारा लगाना जानते हैं, पर खुद क्यों कोई पहल क्यों नहीं करते ?'...आखिर क्यों अन्ना के अनशन ख़त्म करते ही वे हट गए. क्यों नहीं अपने-अपने क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ने बैठ गए. अन्ना ने यदि अलख जगाई तो उस आन्दोलन का प्रभाव तब दिखता जब हर क्षेत्र -जनपद -राज्य में भ्रष्टाचार के विरोधी अन्ना के बिना भी इस मुहिम को आगे बढ़ाते. पर यहाँ तो राजनैतिक दलों की रैली की तरह अन्ना के उठते ही भीड़ अपना बोरिया-बिस्तर लेकर घर चले गए. यदि वाकई इस भीड़ में जन चेतना पैदा करने की ताकत होती तो वह रूकती नहीं बल्कि अन्ना की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज के निचले स्तर तक जाकर कार्य करती और जन-जागरूकता फैलाती. आन्दोलन के लिए निरंतरता चाहिए, न की तात्कालिकता.

वैसे भी इस देश में तमाम नियम-कानून हैं, एक कानून और सही ? कानूनों से यदि भ्रष्टाचार मिटता तो हमें यह दिन देखने को नहीं मिलता. अधिसूचना पर खुश होने वाले यह क्यों भूल रहे हैं कि हमारे यहाँ जब किसी प्रकरण को ख़त्म करना होता है तो समिति बना दी जाती है. अभी तक तो उन्हीं समितियों का नहीं पता जो पिछले सालों में गठित हुई थीं, फिर यह नई समिति, जिसकी रिपोर्ट शायद बाध्यकारी भी नहीं होगी. इस खुशफहमी में रहने की कोई जरुरत नहीं कि लोकपाल के पास ऐसी कोई जादुई छड़ी होगी कि वह उसे घुमायेगा और देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जायेगा. कानूनों से भ्रष्टाचार नहीं ख़त्म होता, बल्कि इसके लिए इच्छा शक्ति की जरुरत होती है. जरुरी है कि लोग स्वत: स्फूर्त प्रेरित हों और वास्तविक व्यवहार में भी वैसा ही आचरण करें.

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

कौन सी क्रांति ला रहे हैं अन्ना ??

आजकल अन्ना हजारे चर्चा में हैं और साथ ही भ्रष्टाचार और जन लोकपाल को लेकर उनका अभियान भी. चारों तरफ अन्ना के गुणगान हो रहे हैं, कोई उन्हें गाँधी बता रहा है तो कोई जे.पी. कोई कैंडल-मार्च निकाल रहा है तो कोई उनके पक्ष में धरने पर बैठा है. राजनेता से लेकर अभिनेता तक, मीडिया से लेकर युवा वर्ग तक हर कोई अन्ना के साथ खड़ा नजर आना चाहता है.

लेकिन क्या वाकई अन्ना के इस अभियान का कोई सार्थक अर्थ है ? इस मुहिम का कोई सकारात्मक अर्थ निकलने जा रहा है. इस देश में भ्रष्टाचार ही एक मुद्दा नहीं है, बल्कि कई और भी ज्वलंत मुद्दे हैं. क्या एक जन लोकपाल आ जाने से सारी समस्याएं छू-मंतर हो जायेंगीं, मानो इसके पास जादू की कोई छड़ी हो और छड़ी घुमाते ही सब रोग दूर हो जाय.

अन्य देशों में हुए आंदोलनों को देखकर इस भ्रम में रहने वाले कि अन्ना के इस आन्दोलन के बाद भारत में भी क्रांति आ जाएगी, क्या अपनी अंतरात्मा पर हाथ रखकर बता सकेंगें कि वो जब मतदान करते हैं, तो किन आधारों पर करते हैं. चंद लोगों को छोड़ दें तो अधिकतर लोग अपनी जाति-धर्म-परिचय-राजनैतिक दल जैसे आधारों पर ही मतदान करते हैं. उनके लिए एक सीधा-साधा ईमानदार व्यक्ति किसी काम का नहीं होता, आखिरकार वह उनके लिए थाने-कोर्ट में पैरवी नहीं कर सकता, किसी दबंग से लोहा नहीं ले सकता या उन्हें किसी भी रूप में उपकृत नहीं कर सकता. जिस मीडिया के लोग आज अन्ना के आन्दोलन को धार दे रहे हैं, यही लोग उन्हीं लोगों के लिए पेड-न्यूज छापते हैं और उन्हें विभिन्न समितियों के सदस्य और मंत्री बनाने के लिए लाबिंग करते हैं, जिनके विरुद्ध अन्ना आन्दोलन कर रहे हैं. फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों का वैसे भी यह शगल है कि जहाँ चैरिटी दिखे, फोटो खिंचाने पहुँच जाओ.

कहते हैं साहित्य समाज को रास्ता दिखाता है, पर हमारे साहित्यजीवी तो खुद ही सत्ता से निर्देशित होते हैं. कोई किसी सम्मान-पुरस्कार के लिए, कोई संसद में बैठने के लिए तो कोई किसी विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए या किसी अकादमी का अध्यक्ष-सदस्य बनने के लिए सत्ता की चारणी करते हैं. पर किसी के पक्ष में वक्तव्य देने में भी सबसे माहिर होते हैं ये कलमजीवी. अन्ना के इस आन्दोलन में भी उनकी भूमिका इससे ज्यादा नहीं है. दो-चार लेख लिखने और पत्र-पत्रिकाओं के एकाध पन्ने भरकर ये अपने काम की इतिवृत्ति समझ लेते हैं. अदालत में सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने वाले वकील भले ही अपने पेशेगत प्रतिबद्धतता की आड लें, पर पब्लिक सब जानती है. कितने लोग इस आन्दोलन के समर्थन में अपनी बैरिस्टरी छोड़ने को तैयार हैं ?

फेसबुक-ट्विटर-आर्कुट पर अन्ना के पक्ष में लिखने वाले कित्ते गंभीर हैं, यह अभी से दिखने लगा है. अभी कुछ दिनों पहले लोग बाबा रामदेव का गुणगान कर रहे थे, अब अन्ना का, फिर कोई और आयेगा, पर हम नहीं बदलेंगें. हम भीड़ का हिस्सा बनकर चिल्लाते रहेंगें कि गद्दी छोडो, जनता आती है (दिनकर) और लोग हमारे ही घरों पर कब्ज़ा कर बेदखल कर देंगें. एक शेषन जी भी आए थे. कहा करते थे राष्ट्रपति तो चोंगे वाला साधू मात्र है, उसे कोई भी शक्ति नहीं प्राप्त है, पर रिटायर्ड होते ही राष्ट्रपति का चुनाव लड़ बैठे.

गाँधी और जे.पी तो इस देश में मुहावरा बन गए हैं. हमारी छोडिये, जो उनकी बदौलत सत्ता की चाँदी काट रहे हैं वे भी उन्हें जयंती और पुण्यतिथि में ही निपटा देते हैं. अन्ना के बहाने अपने को चर्चा में लाने की हर कोई कोशिश कर रहा है, पर सवाल है कि अन्ना के बिना इस आन्दोलन का क्या वजूद है...शायद कुछ नहीं. आज अन्ना हट जाएँ तो हर कोई अपने बैनर और कैंडल उठाकर अपनी खोल में सिमट जायेगा. हम भीड़ का हिस्सा बनकर नारा लगाना जानते हैं, पर खुद क्यों कोई पहल क्यों नहीं करते. हम कभी मुन्नाभाई से प्रेरित होकर गांधीगिरी करते हैं, कभी दूसरे से. याद रखिये दूसरों की हाँ में हाँ मिलाकर और मौका देखकर भीड़ का हिस्सा बन जाने से न कोई क्रांति आती है और न कोई जनांदोलन खड़ा होता है. इसके लिए जरुरी है कि लोग स्वत: स्फूर्त प्रेरित हों और वास्तविक व्यवहार में वैसा ही आचरण करें. जिस दिन हम अपनी अंतरात्मा से ऐसा सोच लेंगें उस दिन हमें किसी बाहरी रौशनी (कैंडल) की जरुरत नहीं पड़ेगी.

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

नव संवत्सर से जुडी हैं कई महत्वपूर्ण घटनाएँ

भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। भारत में नव वर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है।

असम में नववर्ष बीहू के रुप में मनाया जाता है, केरल में पूरम विशु के रुप में, तमिलनाडु में पुत्थंाडु के रुप में, आन्ध्र प्रदेश में उगादी के रुप में, महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा के रुप में तो बांग्ला नववर्ष का शुभारंभ वैशाख की प्रथम तिथि से होता है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लगभग सभी जगह नववर्ष मार्च या अप्रैल माह अर्थात चैत्र या बैसाख के महीनों में मनाये जाते हैं। पंजाब में नव वर्ष बैशाखी नाम से 13 अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलेण्डर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिल नव वर्ष भी आता है। तेलगू नव वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्र प्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग$आदि का अपभ्रंश) के रूप मंे मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नव वर्ष विशु 13 या 14 अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल 15 जनवरी को नव वर्ष के रुप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेण्डर नवरेह 19 मार्च को आरम्भ होता है। महाराष्ट्र में गुडी पड़वा के रुप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड़ नव वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुडी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरुविजा नव वर्ष के रुप में मनाया जाता है। मारवाड़ी और गुजराती नव वर्ष दीपावली के दिन होता है, जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नव वर्ष पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नव वर्ष होता है।

वस्तुतः भारत वर्ष में वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब मेघमालाओं की विदाई होती है और तालाब व नदियाँ जल से लबालब भर उठते हैं तब ग्रामीणों और किसानों में उम्मीद और उल्लास तरंगित हो उठता है। फिर सारा देश उत्सवों की फुलवारी पर नववर्ष की बाट देखता है। इसके अलावा भारत में विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलगु संवत भी प्रचलित हैं, इनमें हर एक का अपना नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत हैं। विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था।

भारतीय नव वर्ष नव संवत्सर का आरंभ आज हो रहा है. ऐसी मान्यता है कि जगत की सृष्टि की घड़ी (समय) यही है। इस दिन भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना हुई तथा युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारंभ हुआ। ‘चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि। शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।।‘ अर्थात ब्रह्मा पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के प्रथम दिन, प्रथम सूर्योदय होने पर की। इस तथ्य की पुष्टि सुप्रसिद्ध भास्कराचार्य रचित ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि‘ से भी होती है, जिसके श्लोक में उल्लेख है कि लंका नगर में सूर्योदय के क्षण के साथ ही, चैत्र मास, शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस से मास, वर्ष तथा युग आरंभ हुए। अतः नव वर्ष का प्रारंभ इसी दिन से होता है, और इस समय से ही नए विक्रम संवत्सर का भी आरंभ होता है, जब सूर्य भूमध्य रेखा को पार कर उत्तरायण होते हैं। इस समय से ऋतु परिवर्तन होनी शुरू हो जाती है। वातावरण समशीतोष्ण होने लगता है। ठंडक के कारण जो जड़-चेतन सभी सुप्तावस्था में पड़े होते हैं, वे सब जाग उठते हैं, गतिमान हो जाते हैं। पत्तियों, पुष्पों को नई ऊर्जा मिलती है। समस्त पेड़-पौधे, पल्लव रंग-विरंगे फूलों के साथ खिल उठते हैं। ऋतुओं के एक पूरे चक्र को संवत्सर कहते हैं।

इस वर्ष नया विक्रम संवत 2068, अप्रैल 4, 2011 को प्रारंभ हो रहा है। संवत्सर, सृष्टि के प्रारंभ होने के दिवस के अतिरिक्त, अन्य पावन तिथियों, गौरवपूर्ण राष्ट्रीय, सांस्कृतिक घटनाओं के साथ भी जुड़ा है। रामचन्द्र का राज्यारोहण, धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म, आर्य समाज की स्थापना तथा चैत्र नवरात्र का प्रारंभ आदि जयंतियां इस दिन से संलग्न हैं। इसी दिन से मां दुर्गा की उपासना, आराधना, पूजा भी प्रारंभ होती है। यह वह दिन है, जब भगवान राम ने रावण को संहार कर, जन-जन की दैहिक-दैविक-भौतिक, सभी प्रकार के तापों से मुक्त कर, आदर्श रामराज्य की स्थापना की। सम्राट विक्रमादित्य ने अपने अभूतपूर्व पराक्रम द्वारा शकों को पराजित कर, उन्हें भगाया, और इस दिन उनका गौरवशाली राज्याभिषेक किया गया। आप सभी को भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2068 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. आप सभी के लिए यह नववर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी हो, नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो !!

रविवार, 3 अप्रैल 2011

आखिर भारत ने दे ही दिया घुमा के...

यह जीत भी खूब रही. आखिर 28 साल बाद आया क्रिकेट में विश्व विजयी होने का सुनहरा पल. पहले आस्ट्रेलिया, फिर पाकिस्तान और अंतत: श्रीलंका...भारत ने दे ही दिया घुमा के. लीजिये इस ख़ुशी में मुंह मीठा कीजिये...!!

गुरुवार, 31 मार्च 2011

चक दे इण्डिया...अब दम दिखा दे और फ़ाइनल में दे घुमा के..!!

!!...चक दे इण्डिया...अब दम दिखा दे और फ़ाइनल में दे घुमा के..!!

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

बिटिया पाखी के जन्मदिन पर...


आज हमारी प्यारी बिटिया अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिन है. अंडमान में हम दूसरी बार पाखी का जन्मदिन मना रहे हैं. अब तो पाखी की बहना तन्वी भी उसका जन्मदिन सेलिब्रेट करने के लिए आ गई हैं. पाखी के जन्मदिन पर उसके लिए एक प्यारी सी कविता लिखी है. पाखी यह कविता सुनकर बहुत खुश है, आप भी इसका आनंद उठायें और बिटिया पाखी को जन्मदिन पर अपना स्नेहिल आशीर्वाद दें-


आँखों में भविष्य के सपने
चेहरे पर मधुर मुस्कान है
अक्षिता को देखकर लगता है
दिल में छुपाये कई अरमान है।

अक्षिता के मन में इतनी उमंगें
नन्हीं सी यह जान है
प्यारी-प्यारी ड्राइंग बनाती
देखकर सब हैरान हैं।

ज्ञान पथ पर है तत्पर
गुणों की यह खान है
भोली सी सूरत इसकी
हमें इस पर अभिमान है।


(चित्र में : तन्वी के आगमन पर आयोजित पार्टी में केक काटकर ख़ुशी का इजहार करती पाखी संग ममा-पापा और तन्वी)

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

बैंगन जी की होली


टेढे़-मेढे़ बैंगन जी
होली पर ससुराल चले
लुढ़क-लुढ़क जाते हर पल
एक मुसीबत पाल चले.

उनकी पत्नी भिण्डी जी
बनी-ठनी तैयार मिलीं
हाथ पकड़ करके उनका
स्वागत में घर पार चलीं.

ससुरा कद्दू देख उन्हें
रेड लाइट को लांघ चले
टेढे़-मेढे़ बैंगन जी
होली पर ससुराल चले.

उछल पड़ीं बल्लियों तभी
लौकी सास निहाल हुईं
तब तक मिर्ची साली जी
मिलने को फिलहाल चलीं.

रंग भरी पिचकारी ले
जीजा जी पर झपट पड़ीं
बैंगन जी भी थाली में
इधर-उधर बदहाल चले।
टेढ़े-मेढ़े.......!!


कृष्ण कुमार यादव
!! होली पर्व पर आप सभी को रंग भरी शुभकामनायें !!

शनिवार, 12 मार्च 2011

जनसत्ता में 'शब्द-शिखर' की पोस्ट


'शब्द शिखर' पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च, 2010) को प्रस्तुत पोस्ट 'महिला होने पर गर्व' को प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक अख़बार जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में 12 मार्च, 2011 को 'किसका समाज' शीर्षक से स्थान दिया गया है. जनसत्ता में दूसरी बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है और इससे पूर्व 'शब्द शिखर' पर 21 अक्तूबर, 2010 को प्रस्तुत पोस्ट 'कहाँ गईं वो तितलियाँ' को जनसत्ता के ‘समांतर’ स्तम्भ में 7 दिसंबर, 2010 को 'गुम होती तितली' शीर्षक से स्थान दिया गया था. समग्र रूप में प्रिंट-मीडिया में 24वीं बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है.. आभार !!

इससे पहले शब्द-शिखर और अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित मेरी पोस्ट की चर्चा दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका, आज समाज, गजरौला टाईम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!

गुरुवार, 10 मार्च 2011

105 साल का हो गया सेलुलर जेल


यह तीर्थ महातीर्थों का है.
मत कहो इसे काला-पानी.
तुम सुनो, यहाँ की धरती के
कण-कण से गाथा बलिदानी (गणेश दामोदर सावरकर)

आजकल अंडमान-निकोबार दीप समूह में हूँ. वही अंडमान, जो काला पानी के लिए प्रसिद्द है. आप भी सोचते होंगे कि भला काला-पानी का क्या रहस्य है. तो आइये आज आपको उसी काला पानी की सैर कराते हैं-

भारत का सबसे बड़ा केंद्रशासित प्रदेश अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह सुंदरता का प्रतिमान है और सुंदर दृश्यावली के साथ सभी को आकर्षित करता है। बंगाल कि खाड़ी के मध्य प्रकृति के खूबसूरत आगोश में 8249 वर्ग कि0मी0 में विस्तृत 572 द्वीपों (अंडमान-550, निकोबार-22) के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भले ही मात्र 38 द्वीपों (अंडमान-28, निकोबार-10) पर जन-जीवन है, पर इसका यही अनछुआपन ही आज इसे 'प्रकृति के स्वर्ग' रूप में परिभाषित करता है। निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप में ही भारत का सबसे दक्षिणी छोर 'इंदिरा प्वाइंट' भी अवस्थित है, जो कि इंडोनेशिया से लगभग 150 कि0मी0 दूर है। यहीं अंडमान में ही ऐतिहासिक सेलुलर जेल है. सेलुलर जेल का निर्माण कार्य 1896 में आरम्भ हुआ तथा 10 साल बाद 10 मार्च 1906 को पूरा हुआ. सेलुलर जेल के नाम से प्रसिद्ध इस कारागार में 698 बैरक (सेल) तथा 7 खण्ड थे, जो सात दिशाओं में फैल कर पंखुडीदार फूल की आकृति का एहसास कराते थे। इसके मध्य में बुर्जयुक्त मीनार थी, और हर खण्ड में तीन मंजिलें थीं।

(इस दृश्य के माध्यम से इसे समझा जा सकता है) अंडमान को काला पानी कहा जाता रहा है तो इसके पीछे बंगाल की खाड़ी और जेल की ही भूमिका है. अंग्रेजों के दमन का यह एक काला अध्याय था, जिसके बारे में सोचकर अभी भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. कहते हैं कि अंडमान का नाम हनुमान जी के नाम पर पड़ा. पहले भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई इधर से ही करने की सोची पर बाद में यह विचार त्याग दिया. अंडमान शब्द की उत्पत्ति मलय भाषा के 'हांदुमन' शब्द से हुई है जो भगवान हनुमान शब्द का ही परिवर्तित रुप है। निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है नग्न लोगों की भूमि। (वीर सावरकर को इसी काल-कोठरी में बंदी रखा गया. यह काल-कोठरी सबसे किनारे और अन्य कोठरियों से ज्यादा सुरक्षित बने गई है. गौरतलब है कि सावरकर जी के एक भाई भी काला-पानी की यहाँ सजा काट रहे थे, पर तीन सालों तक उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता तक नहीं चला. इससे समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने यहाँ क्रांतिकारियों को कितना एकाकी बनाकर रखा था.)

वीर सावरकर और अन्य क्रांतिकारियों को यहीं सेलुलर जेल की काल-कोठरियों में कैद रखा गया और यातनाएं दी गईं. सेलुलर जेल अपनी शताब्दी मना चुका है पर इसके प्रांगन में रोज शाम को लाइट-साउंड प्रोग्राम उन दिनों की यादों को ताजा करता है, जब हमारे वीरों ने काला पानी की सजा काटते हुए भी देश-भक्ति का जज्बा नहीं छोड़ा. गन्दगी और सीलन के बीच समुद्री हवाएं और उस पर से अंग्रेजों के दनादन बरसते कोड़े मानव-शरीर को काट डालती थीं. पर इन सबके बीच से ही हमारी आजादी का जज्बा निकला. दूर दिल्ली या मेट्रो शहरों में वातानुकूलित कमरों में बैठकर हम आजादी के नाम पर कितने भी व्याख्यान दे डालें, पर बिना इस क्रांतिकारी धरती के दर्शन और यहाँ रहकर उन क्रांतिवीरों के दर्द को महसूस किये बिना हम आजादी का अर्थ नहीं समझ सकते.

सेलुलर जेल में अंग्रेजी शासन ने देशभक्त क्रांतिकारियों को प्रताड़ित करने का कोई उपाय न छोड़ा. यातना भरा काम और पूरा न करने पर कठोर दंड दिया जाता था. पशुतुल्य भोजन व्यवस्था, जंग या काई लगे टूटे-फूटे लोहे के बर्तनों में गन्दा भोजन, जिसमें कीड़े-मकोड़े होते, पीने के लिए बस दिन भर दो डिब्बा गन्दा पानी, पेशाब-शौच तक पर बंदिशें कि एक बर्तन से ज्यादा नहीं हो सकती. ऐसे में किन परिस्थितियों में इन देश-भक्त क्रांतिकारियों ने यातनाएं सहकर आजादी की अलख जगाई, वह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सेलुलर जेल में बंदियों को प्रतिदिन कोल्हू (घानी) में बैल की भाँति घूम-घूम कर 20 पौंड नारियल का तेल निकालना पड़ता था. इसके अलावा प्रतिदिन 30 पौंड नारियल की जटा कूटने का भी कार्य करना होता. काम पूरा न होने पर बेंतों की मार पड़ती और टाट का घुटन्ना और बनियान पहनने को दिए जाते, जिससे पूरा बदन रगड़ खाकर और भी चोटिल हो जाता. अंग्रेजों की जबरदस्ती नाराजगी पर नंगे बदन पर कोड़े बरसाए जाते. जब भी किसी को फांसी दी जाती तो क्रांतिकारी बंदियों में दहशत पैदा करने के लिए तीसरी मंजिल पर बने गुम्बद से घंटा बजाया जाता, जिसकी आवाज़ 8 मील की परिधि तक सुनाई देती थी.
भय पैदा करने के लिए क्रांतिकारी बंदियों को फांसी के लिए ले जाते हुए व्यक्ति को और फांसी पर लटकते देखने के लिए विवश किया जाता था।वीर सावरकर को तो जान-बूझकर फांसी-घर के सामने वाले कमरे में ही रखा गया था.फांसी के बाद मृत शरीर को समुद्र में फेंक दिया जाता था.
अब आप समझ सकते हैं कि इस जगह को काला-पानी क्यों कहा जाता था. एक तरफ हमारे धर्म समुद्र पार यात्रा की मनाही करते थे, वहीँ यहाँ मुख्यभूमि से हजार से भी ज्यादा किलोमीटर दूर लाकर देशभक्तों को प्रताड़ित किया जाता था. आजादी का अर्थ सिर्फ अच्छा खाना, घूमना य मौज-मस्ती ही परिचायक नहीं है, बल्कि इसके लिए हमें उन मूल्यों की भी रक्षा करनी होगी जिसके लिए देशभक्तों ने अपनी कुर्बानियां दे दी !!
सेलुलर जेल की 105 वीं वर्षगाँठ पर उन सभी नाम-अनाम शहीदों और कैद में रहकर आजादी का बिगुल बजाने वालों को नमन !!

[ चित्रों में : कृष्ण कुमार, आकांक्षा एवं अक्षिता (पाखी) ]

मंगलवार, 8 मार्च 2011

महिला होने पर गर्व (महिला दिवस पर विशेष)

महिला-दिवस सुनकर बड़ा अजीब लगता है. क्या हर दिन सिर्फ पुरुषों का है, महिलाओं का नहीं ? पर हर दिन कुछ कहता है, सो इस महिला दिवस के मनाने की भी अपनी कहानी है. कभी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई से आरंभ हुआ यह दिवस बहुत दूर तक चला आया है, पर इक सवाल सदैव उठता है कि क्या महिलाएं आज हर क्षेत्र में बखूबी निर्णय ले रही हैं. मात्र कुर्सियों पर नारी को बिठाने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें शक्ति व अधिकार चाहिए ताकि वे स्व-विवेक से निर्णय ले सकें. आज नारी राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है, यहाँ तक कि आज महिला आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में नित नई नजीर स्थापित कर रही हैं। यही नहीं शमशान में जाकर आग देने से लेकर पुरोहिती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं. रुढियों को धता बताकर महिलाएं हर क्षेत्र में परचम फैलाना चाहती हैं।
वर्तमान दौर में नारी का चेहरा बदला है। नारी पूज्या नहीं समानता के स्तर पर व्यवहार चाहती है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी आज कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, पी0टी0 उषा, किरण बेदी, कंचन चैधरी भट्टाचार्य, इंदिरा नूई, शिखा शर्मा, किरण मजूमदार शाॅ, वंदना शिवा, चंदा कोचर, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, फ्लाइंग आॅफिसर सुषमा मुखोपाध्याय, कैप्टन दुर्गा बैनर्जी, ले0 जनरल पुनीता अरोड़ा, सायना नेहवाल, संतोष यादव, निरुपमा राव, कृष्णा पूनिया, कुंजारानी देवी, इरोम शर्मिला, मेघा पाटेकर, अरुणा राय, जैसी शक्ति बनकर समाज को नई राह दिखा रही है और वैश्विक स्तर पर नाम रोशन कर रही हैं। नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं। कभी अरस्तू ने कहा कि -“स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ हैं” तो संत थाॅमस ने स्त्रियों को “अपूर्ण पुरूष” की संज्ञा दी थी, पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसे तमाम सतही सिद्वान्तों का कोई अर्थ नहीं रह गया एवं नारी अपनी जीवटता के दम पर स्वयं को विशुद्ध चित्त (Being-for- itself : स्वयं में सत् ) के रूप में देख रही है। आज यदि नारी आगे बढ़ना चाहती है तो उसके स्वाभाविक अधिकारों का दमन क्यों ?

पर इन सबके बावजूद आज भी समाज में बेटी के पैदा होने पर नाक-भौंह सिकोड़ी जाती है, कुछ ही माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं...आखिर क्यों ? क्या सिर्फ उसे यह अहसास करने के लिए कि वह नारी है. वही नारी जिसे अबला से लेकर ताड़ना का अधिकारी तक बताया गया है. सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई, द्रौपदी की इज्जत को सरेआम तार-तार किया गया तो आधुनिक समाज में ऐसी घटनाएँ रोज घटित होती हैं. तो क्या बेटी के रूप में जन्म लेना ही अपराध है. मुझे लगता है कि जब तक समाज इस दोहरे चरित्र से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक नारी की स्वतंत्रता अधूरी है. सही मायने में महिला दिवस की सार्थकता तभी पूरी होगी जब महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, वैचारिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ दहेज के लोभ में नारी को सरेआम जिन्दा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नज़रिए को समझा जाएगा और क्रियान्वित भी किया जायेगा. जरुरत समाज में वह जज्बा पैदा करने का है जहाँ सिर उठा कर हर महिला अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं लड़का के रूप में पैदा होती !!

बुधवार, 2 मार्च 2011

कहाँ गया फाउण्टेन पेन..

पिछले दिनों आलमारी में रखा पुराना सामान उलट-पुलट रही थी कि नजर एक फाउण्टेन पेन पर पड़ी। वही फाउण्टेन पेन जो कभी अच्छी व स्टाइलिश राइटिंग का मानदण्ड थी। अब हम लोग भले ही डाॅट पेन या जेल पेन से लिखने लगे हों पर स्कूली दिनों में फाउण्टेन पेन ही हमारी राइटिंग की शान थी। परीक्षा में पेपर देते समय यदि पेपर या कापी में इंक गिर जाती थी तो मानते थे कि पेपर अच्छा होगा। होली का त्यौहार आते ही फाउण्टेन पेन का महत्व और भी बढ़ जाता था। एक-दूसरे की शर्ट पर इंक छिड़ककर होली मनाने का आनन्द ही कुछ और था। तब बाजार में उत्पादों की इतनी भरमार नहीं थी। जीनियस, किंगसन और इण्टर कम्पनी के पेन सर्वाधिक लोकप्रिय थे। जीनियस पेन का प्रयोग करने वाला इसके नाम के अनुरूप खुद को क्लास में सबसे जीनियस समझता था।

बीतते वक्त के साथ फाउण्टेन पेन अतीत की चीज बन गये पर अभी भी सरकारी सेवा से रिटायर्ड बुजुर्ग या बुजुर्ग बिजनेसमैन इसके प्रति काफी क्रेज रखते हैं। हमारे एक रिश्तेदार तो अपने पुराने फाउण्टेन पेन की निब के लिए पूरे शहर की दुकानें छान मारते हैं। आज मार्केट में चाइनीज फाउण्टेन पेन से लेकर महगे सिलवर और गोल्ड प्लेटेड फाउण्टेन पेन तक उपलब्ध हैं पर न तो उनकी डिमाण्ड रही और न ही वो क्रेज रहा। याद आती है स्कूल के दिनों में सुनी वो बात कि जब जज कोई कठोर फैसला लिखते तो फाउण्टेन पेन की निब तोड़ देते थे...पर अब तो सब किस्सों में ही रह गया।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

शाहों के शाह, हमारे नौकरशाह! (कवि-मन कपिल सिब्बल जी की व्यथा)

(कहते हैं जब अपनी व्यथा किसी से न कह पायें तो कविता में उतार दें. यही कारण है कि आज तमाम नामचीन लोग कवितायेँ लिखते हैं, कोई चोरी-छुपे डायरी में तो कोई सभी के सामने अभिव्यक्त करता है. इन कवियों में अब मानव संसाधन मंत्री और संचार मंत्री कपिल सिब्बल जी का नाम भी शामिल हो गया है. उनकी इस कविता को पढ़ें, उनका दर्द समझें और कवि-मन से लुत्फ़ उठायें )

शाहों के शाह,
हमारे नौकरशाह!
पता नहीं इन्होंने
कहां से कौन सा ज्ञान
उधार लिया है,
कि न्यूटन के
प्रसिद्ध गति के नियम को भी
सुधार लिया है।
पाॅजिटिव कामों का
जरूर होना चाहिए विरोध,
ताकतवर निगेटिव प्रतिक्रिया से
बनाते हैं नए-नए अवरोध।
हर समस्या के लिए
सरकार के पास नीति है,
मंत्री के पास भी ज्ञान है
नीति को समझाने की रीति है।
जब उन्हें साफ-साफ अल्पफाज में
रास्ता बताया जाता है,
तो कुछ न कुछ
ऐसा लाया जाता है
जिससे दिखती है
उस कार्रवाई की सीमा,
और इस तरह
वे फाइलों की गति को
कर देते हैं धीमा।
शायद पड़ जाते हैं
गुरुत्वाकर्षण के
सिद्धांत के फेर में,
जिन फाइलों पर
तुरंत कार्रवाई की जरूरत हो
उन्हें सबसे नीचे जगह मिलती है
ढेर में।

(कपिल सिब्बल जी की पुस्तक ‘किस-किस की जय हो’से साभार)

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

तुम्हारी ख़ामोशी


तुम हो
मैं हूँ
और एक खामोशी
तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं
तुम्हारे एक-एक शब्द
मेरे वजूद का
अहसास कराते हैं
तुम्हारी पलकों का
उठना व गिरना
तुम्हारा होठों में ही
मंद-मंद मुस्कुराना
तुम्हारा बेकाबू होती
साँसों की धड़कनें
तुम्हारे शरीर की खुशबू
तुम्हारी छुअन का अहसास
सब कुछ
इस खामोशी को
झुठलाता है।

कृष्ण कुमार यादव

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

प्रिया आ...


वेलेण्टाइन डे का असर अभी से दिखने लगा है. चारों तरफ प्यार की धूम मची है. अब तो यह पूरा व्यवसाय हो गया है. हर कोई इसे अपने ढंग से यादगार बनाना चाह रहा है. फ़िलहाल प्यार की इस फिजा में वसंत के अहसास के बीच वेलेण्टाइन डे पर अथर्ववेद में समाहित दो प्रेम गीतों का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है-


प्रिया आमत दूर जा
लिपट मेरी देह से
लता लतरती ज्यों पेड़ से
मेरे तन के तने पर
तू आ टिक जा
अंक लगा मुझे
कभी न दूर जा
पंछी के पंख कतर
ज़मीं पर उतार लाते ज्यों
छेदन करता मैं तेरे दिल का
प्रिया आ, मत दूर जा।
धरती और अंबर को
सूरज ढक लेता ज्यों
तुझे अपनी बीज भूमि बना
आच्छादित कर लूंगा तुरंत
प्रिया आ, मन में छा
कभी न दूर जा
आ प्रिया!


हे अश्विन!
ज्यों घोड़ा दौड़ता आता
प्रिया-चित्त आए मेरी
ओर
ज्यों घुड़सवार कस
लगाम
रखता अश्व वश में
रहे तेरा मन
मेरे वश में
करे अनुकरण सर्वदा
मैं खींचता तेरा चित्त
ज्यों राजअश्व खींचता
घुड़सवार
अथित करूं तेरा हृदय
आंधी में भ्रमित तिनके जैसा
कोमल स्पर्श से कर
उबटन तन पर
मधुर औषधियों से
जो बना
थाम लूं मैं हाथ
भाग्य का कस के।

- आकांक्षा यादव

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

सखि वसंत आया...

''सखि वसंत आया
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया.'' (निराला)


वसंत पंचमी का आगमन हो चुका है. एक तरफ वसंत का सुहाना आगमन, वहीँ निराला जी की जयंती..सब कुछ कितना सुहाना लग रहा है. वसंत पंचमी एक ओर जहां ऋतुराज के आगमन का दिन है, वहीं यह विद्या की देवी और वीणावादिनी सरस्वती की पूजा का भी दिन है। इस ऋतु में मन में उल्लास और मस्ती छा जाती है और उमंग भर देने वाले कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं।

इससे शरद ऋतु की विदाई के साथ ही पेड़-पौधों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होता है। प्रकृति नख से शिख तक सजी नजर आती है और तितलियां तथा भंवरे फूलों पर मंडराकर मस्ती का गुंजन गान करते दिखाई देते हैं। हर ओर मादकता का आलम रहता है। आयुर्वेद में वसंत को स्वास्थ्य के लिए हितकर माना गया है। हालांकि इस दौरान हवा में उड़ते पराग कणों से एलर्जी खासकर आंखों की एलर्जी से पीड़ित लोगों की समस्या बढ़ भी जाती है।

वसंत पंचमी को त्योहार के रूप में मनाए जाने के पीछे कई तरह की मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसीलिए इस दिन विद्या तथा संगीत की देवी की पूजा की जाती है। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने का चलन है, क्योंकि वसंत में सरसों पर आने वाले पीले फूलों से समूची धरती पीली नजर आती है।

वसंत पंचमी के पीछे एक मान्यता यह भी है कि इसी दिन भागीरथ की तपस्या के चलते गंगा का अवतरण हुआ था, जिससे समूची धरती खुशहाल हो गई। माघ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पंचमी पर गंगा स्नान का काफी महत्व है। पुराणों के अनुसार एक मान्यता यह भी है कि वसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार सरस्वती की पूजा की थी और तब से वसंत पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा करने का विधान हो गया।

प्राचीन काल में वसंत पंचमी का दिन मदनोत्सव और वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन स्त्रियां अपने पति की पूजा कामदेव के रूप में करती थीं। वसंत पंचमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम एवं आकर्षण का संचार किया था और तभी से यह दिन वसंतोत्सव तथा मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। वसंत पंचमी इस बात का संकेत देती है कि धरती से अब शरद की विदाई हो चुकी है और ऐसी ऋतु आ चुकी है जो जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधों में नवजीवन का संचार कर देगी।

वसंत में मादकता और कामुकता संबंधी कई तरह के शारीरिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं जिसका आयुर्वेद में व्यापक वर्णन है। महर्षियों और मनीषियों ने कहा है कि वसंत पंचमी को पूरी श्रद्धा से सरस्वती की पूजा करनी चाहिए। बच्चों को इस दिन अक्षर ज्ञान कराना और बोलना सिखाना शुभ माना जाता है। वसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है जो सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने का परिचायक है। इस दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा है जो मनुष्य के मन में भरे उल्लास को प्रकट करने का माध्यम है।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

क्या आप जानते हैं..

क्या आप जानते है इंडिया का वह स्थान जहाँ सबसे सस्ता भोजन उपलब्ध है ? ............
चाय = 1 रूपया प्रति चाय
सूप = 5.50 रुपये
दाल = 1.50 रूपया
शाकाहारी थाली (जिसमे दाल, सब्जी 4 चपाती चावल/पुलाव, दही, सलाद ) = 12.50 रुपये
मांसाहारी थाली = 22 रुपये
दही चावल = 11 रुपये
शाकाहारी पुलाव = 8 रुपये
चिकेन बिरयानी = 34 रुपये
फिश कर्री और चावल = 13 रुपये
राजमा चावल = 7 रुपये
टमाटर चावल = 7 रुपये
फिश करी = 17 रुपये
चिकन करी = 20 .50 रुपये
चिकन मसाला = 24 .50 रुपये
बटर चिकन = 27 रुपये
चपाती = 1 रूपया प्रति चपाती
एक पलते चावल = 2 रुपये
डोसा = 4 रुपये
खीर = 5.50 रुपये प्रति कटोरी
फ्रूट केक = 9 .50 रुपये
फ्रूट सलाद = 7 रुपये
यह वास्तविक मूल्य सूची है
ऊपर बताई गई सारी मदें " गरीब लोगों "केवल और केवल के लिए है जो कि भारत के संसद की केन्टीन में ही उपलब्ध है. ............. और इन गरीब लोगों की तनख्वाह 80,000 रुपये प्रति माह है . ......................... इसके अलावा इन्हें बोनस के रूप में भारी से भारी घोटाले करके अरबों - खरबों रुपये हडपने की खुल्ली छूट है .
.............. और ये सारा का सारा पैसा पब्लिक की जेब से जाता है जिसे हम और आप टैक्स के रूप में चुकाते है.....................................
जागो (जनता) ग्राहक जागो !!

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

बिटिया रानी तीन माह की..

वक़्त कितनी तेजी से बीतता है, पता ही नहीं चलता है. देखते ही देखते हमारी दूसरी बिटिया रानी तन्वी कल तीन माह की हो गईं. इनका ख्याल रखने के चक्कर में ही आजकल ब्लागिंग से भी थोडा कटी हुई हूँ. जीवन में व्यस्तताएं बढती जा रही हैं..खैर यह सब जीवन के अभिन्न पहलू हैं. ये देखिये हमारी प्यारी तन्वी को और अपना आशीष भी दीजिये-

बुधवार, 26 जनवरी 2011

गणतंत्र दिवस की बधाईयाँ

!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाईयाँ !!

सोमवार, 24 जनवरी 2011

मैं अजन्मी...


मेरी यह कविता 'इण्डिया टुडे' पत्रिका के परिशिष्ट 'इण्डिया टुडे स्त्री' (3 मार्च, 2010) में प्रकाशित हुई थी। आज 'राष्ट्रीय बालिका दिवस' (24 जनवरी) पर उसे ही यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ-

मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो

मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं
दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ
भावों के पुंज से रची
नित्य रचती सृजन कहानी हूँ

लड़की होना किसी पाप की
निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़कों से कमतर नहीं
माद्दा रखती हूँ
श्मशान घाट में भी अग्नि देने का

बस विनती मेरी है
मुझे दुनिया में आने तो दो !!!

सोमवार, 17 जनवरी 2011

मत ढूंढो कविता इसमें : वंदना गुप्ता

आज शब्द-शिखर पर प्रस्तुत है वंदना गुप्ता जी की एक कविता. वंदना अंतर्जाल पर जिंदगी एक खामोश सफ़र के माध्यम से सक्रिय हैं।



दिल से निकले उदगारों का नाम कविता है

मत बंधो इसे गद्य या पद्य में

मत ढूंढो इसमें छंदों को

जो भी दिल की हो आवाज़

उसी का नाम कविता है

क्यूँ ढूंढें हम छंदों को

जब छंद बसे हों दिल में

क्यूँ जाने हम गद्य को

जब हर लफ्ज़ में हों भाव भरे

मत रोको इन हवाओं को

जो किसी के मन में बह रही हैं

चाहे हों कविता रूपी

चाहे हों ग़ज़लों रूपी

या न भी हों मगर

साँस साँस की आवाज़ को

मत बांधो तुम पद्यों में

मत ढूंढो साहित्य इसमें

मत ढूंढो काव्य इसमें

ये तो दिलों की धड़कन हैं

जो भाव रूप में उभरी हैं

भावों में जीने वाले

क्या जाने काव्यात्मकता को

वो तो भावों को ही पीते हैं

और भावों में ही जीते हैं

बस भावाव्यक्ति के सहारे ही

दिल के दर्द को लिखते हैं

कभी पास जाओ उनके

तो जानोगे उनके दर्द को

कभी कुछ पल ठहरो

तो जानोगे उनकी गहराई को

वो तो इस महासमुद्र की

तलहटी में दबे वो रत्न हैं

जिन्हें न किसी ने देखा है

जिन्हें न किसी ने जाना है

अभी तुम क्या जानो

सागर की गहराई को

एक बार उतरो तो सही

फिर जानोगे इस आशनाई को

किसी के दिल के भावों को

मत तोड़ो व्यंग्य बाणों से

ये तो दिल की बातें हैं

दिलवाले ही समझते हैं

तुम मत ढूंढो कविता इसमें

तुम मत ढूंढो कविता इसमें !!



वंदना गुप्ता

बुधवार, 12 जनवरी 2011

काश कि युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानंद से कुछ सीखती...

आज 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जी की जयंती है. इस शुभ दिन पर उनका पुनीत स्मरण. स्वामी जी के बारे में हम सभी बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं. स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव से अनुकरणीय रहा है और आदर्शों की स्थापना करता है. यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद जी की जयंती राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है..काश कि आज की युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानंद जी के जीवन से कुछ सीखती...हमारे राजनेता नेतृत्व का कोई पाठ स्वामी जी से भी सीखने की प्रेरणा लेते तो वाकई सुखद लगता.... स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर पुनीत स्मरण और नमन !!

सोमवार, 10 जनवरी 2011

प्रेम गीत : यशोधरा यादव ‘यशो‘

आपके दामन से मेरा, जन्म का नाता रहा है ,
प्यार की गहराइयों का, राज बतलाता रहा है।

मौन मत बैठो कहो कुछ, आज मौसम है सुहाना,
कलखी धुन ने बजाया, प्यार का मीठा तराना।
एक सम्मोहन धरा की, मूक भाषा बोलती है,
और नभ दे दुंदुभी, नवरागिनी गाता रहा है।
आपके दामन......................।

प्यार का मकरन्द भरकर, बादलों का टोल आया,
आम की अमराइयों में, हरित ने आँचल बिछाया।
सूर्य का लुक-छुप निकलना, मुस्कराना देखकर,
मन मयूरी नृत्य कर, कर मान इतराता रहा है।
आपके दमन......................।

भाव का कोई शब्द ही तो, मेरे उर को भेदता है,
गीत की हर पंक्ति बनकर, नव सुगंध बिखेरता है।
बंसुरी की धुन बजाता है, कहीं कान्हा सुरीली,
और चितवन राधिका का, पाँव थिरकाता रहा है।
आपके दामन......................।

दीप तेरा प्यार बनकर, झिलमिलाते द्वार मेरे,
आज कोयल गीत प्रियवर, गा रही उपवन सवेरे।
मन समुंदर की हिलोरे, चूमती बेताब तट की,
रूख हवाओं का विहंस कर, गुनगुनाता जा रहा है।
आपके दामन......................।


यशोधरा यादव 'यशो'

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

‘अहसास’ हूँ मैं

आज 'शब्द-शिखर' पर प्रस्तुत है सुमन मीत जी की एक कविता. मीत, अंतर्जाल पर बावरा मन के माध्यम से सक्रिय हैं।










एक अबोध शिशु

माँ के आँचल में

लेता है जब

गहरी नींद

माँ उसको

अपलक निहारती

बलाऐं लेती

महसूस है करती

अपने ममत्व को

वो आगाज़ हूँ मैं .........


विरह में निष्प्राण तन

लौट है आता

चौराहे के छोर से

लिये साथ

अतीत की परछाई

भविष्य की रुसवाई

पथरीली आँखों में

सिवाय तड़प के

कुछ नहीं

वो टूटन हूँ मैं ...........


कोमल हृदय में

देते हैं जब दस्तक

अनकहे शब्द

उलझे विचार

मानसपटल पर

करके द्वन्द

जो उतरता है

लेखनी से पट पर

वो जज़्बात हूँ मैं .........


थकी बूढ़ी आँखें

जीवन की कड़वाहट का

बोझ लिए

सारी रात खंगालती हैं

निद्रा के आशियाने को

या फिर

बाट जोहती हैं

अपने अगले पड़ाव का

वो अभिप्राय हूँ मैं ...........


वो आगाज़ में पनपा

टूटन में बिखरा

जज़्बात में डूबा

अभिप्राय में जन्मा

‘अहसास’ हूँ मैं !!

सुमन ‘मीत’

सोमवार, 3 जनवरी 2011

मंथन

आज शब्द-शिखर पर प्रस्तुत है वंदना गुप्ता जी की एक कविता. वंदना अंतर्जाल पर जिंदगी एक खामोश सफ़र के माध्यम से सक्रिय हैं।

मंथन किसी का भी करो
मगर पहले तो
विष ही निकलता है
शुद्धिकरण के बाद ही
अमृत बरसता है
सागर के मंथन पर भी
विष ही पहले
निकला था
विष के बाद ही
अमृत बरसा था
विष को पीने वाला
महादेव कहलाया
अमृत को पीने वालों ने भी
देवता का पद पाया
आत्म मंथन करके देखो
लोभ , मोह , राग ,द्वेष
इर्ष्या , अंहकार रुपी
विष ही पहले निकलेगा
इस विष को पीना
किसी को आता नही
इसीलिए कोई
महादेव कहलाता नही
आत्म मंथन के बाद ही
सुधा बरसता है
इस गरल के निकलते ही
जीवन बदलता है
पूर्ण शुद्धता पाओगे जब
तब अमृत्व स्वयं मिल जाएगा
उसे खोजने कहाँ जाओगे
अन्दर ही पा जाओगे
आत्म मंथन के बाद ही
स्वयं को पाओगे
मंथन किसी का भी करो
पहले विष तो फिर
अमृत को भी
पाना ही होगा
लेकिन मंथन तो करना ही होगा !!

वंदना गुप्ता