आपका समर्थन, हमारी शक्ति

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

अहसास तुम्हारा...


एक अहसास
किसी के साथ का
किसी के प्यार का
अपनेपन का

एक अनकहा विश्वास
जो कराता है अहसास
तुम्हारे साथ का
हर पल, हर क्षण

इस क्षणिक जीवन की
क्षणभंगुरता को झुठलाता
ये अहसास
शब्दों से परे
भावनाओं के आगोश में
प्रतिपल लाता है
तुम्हें नजदीक मेरे

लौकिकता की
सीमा से परे
अलौकिक है
अहसास तुम्हारा !!


तुम मिले तो जिंदगी में रंग भर गए।
तुम मिले तो जिंदगी के संग हो लिए।
 




फेसबुक पर भी मिलें - 

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

रिश्ता जन्मों-जन्मों का : वसंत, वेलेंटाइन और 'वर्ल्ड मैरिज डे'

हर दिन अपने में खास होता है।  रिश्तों को सेलिब्रेट करने का  चाहिए। यह सही है कि किसी रिश्ते या भावना को एक दिन विशेष में नहीं बाँधा जा सकता, पर किसी दिन विशेष पर मौका मिले तो सेलिब्रेट करने में हर्ज भी क्या ? जीवन की इस आपाधापी और दौड़भाग में रिश्तों की अहमियत किसी सी नहीं छुपी है।  ऐसे में आज एक खूबसूरत रिश्ते को सेलिब्रेट करने का एक और सु-अवसर है । आज 9 फरवरी को  'वर्ल्ड मैरिज डे' है । 'हैपिली मैरिड' का कॉन्सेप्ट भी इसी थीम पर टिका है, जहां आप दूसरे को इस हद तक स्वीकार करें कि उसकी कमियों के साथ चलने में  कोई समस्या न हो। तभी तो कहते हैं, ये रिश्ता जन्मों-जन्मों का। तेरा साथ है तो, फिर क्या कमी ......!  

फरवरी के हर द्वितीय रविवार को 'वर्ल्ड मैरिज डे' मनाया जाता है। यह भी अजीब संयोग है कि यह समय होता है वसंत की रुमानियत का, जिसे पश्चिमी देशों में वेलेंटाइन उत्सव के रूप में मनाया जाता  है। इस दौरान खूब शादियां होती हैं, मुहूर्त का भी कोई झंझट नहीं। यूँ ही नहीं कहा गया है कि यौवन हमारे जीवन का वसंत है तो वसंत इस सृष्टि का यौवन है। चरक संहिता में कहा गया है कि वसंत के दौरान कामिनी और कानन में अपने आप यौवन फूट पड़ता है। यही कारण है कि वसंत पंचमी का उत्सव मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है और तदनुसार  वसंत के सहचर कामदेव तथा रति की भी पूजा होती है। इस अवसर पर ब्रजभूमि में भगवान्‌ श्रीकृष्ण और राधा के आनंद-विनोद का उत्सव मुख्य रूप से मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता हैं।  'वर्ल्ड मैरिज डे' का कांसेप्ट भले ही पाश्चात्य देशों से आया है, पर वसंत पर्व में इसकी परंपरा अपने भारत देश में बहुत पुरानी रही है। 

वर्ल्ड मैरिज डे को पति-पत्नी के मधुर सम्बन्धों के लिए मनाया जाता है। विवाह का रिश्ता हमारे समाज का सशक्त आधार है। इसकी थीम है 'लव वन-अनदर' यानी एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करके अपने जीवन साथी  को प्यार करना। समाज में तमाम बदलावों के साथ रिश्तों की कसौटियां भी परिवर्तित हुई हैं। जाहिर है कि विवाह को भी हम इससे बचाकर नहीं चल सकते। तनाव, कमिटमेंट से घबराहट, करियर में आगे बढ़ने की चाह जैसे तमाम कारण हैं, जो लोगों को शादी में व्यवस्थित होने नहीं दे रहे हैं।  ऐसे में 'वर्ल्ड मैरिज डे' का कॉन्सेप्ट अपनी एक विशिष्ट  जगह रखता है, ताकि लोग प्यार की अगली कड़ी यानी शादी को भी सफल बना सकें। 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

'वसंत' की रुमानियत के बीच 'वेलेण्टाइन'

वसंत का मौसम आ गया है। मौसम में रूमानियत छाने लगी है। हर कोई चाहता है कि अपने प्यार के इजहार के लिए उसे अगले वसंत का इंतजार न करना पड़े। सारी तैयारियां आरम्भ हो गई हैं। प्यार में खलल डालने वाले भी डंडा लेकर तैयार बैठे हैं। भारतीय संस्कृति में ऋतुराज वसंत की अपनी महिमा है। वेदों में भी प्रेम की महिमा गाई गई है। यह अलग बात है कि हम जब तक किसी चीज पर पश्चिमी सभ्यता का ओढ़ावा नहीं ओढ़ा लेते, उसे मानने को तैयार ही नहीं होते। ‘योग‘ की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘योगा‘ होकर आयातित हुआ। ऋतुराज वसंत और इनकी मादकता की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘वेलेण्टाइन‘ के पंखों पर सवार होकर अपनी खुमारी फैलाने लगे। 

प्रेम एक बेहद मासूम अभिव्यक्ति है। मशहूर दार्शनिक ख़लील जिब्रान एक जगह लिखते हैं-‘‘जब पहली बार प्रेम ने अपनी जादुई किरणों से मेरी आंखें खोली थीं और अपनी जोशीली अंगुलियों से मेरी रूह को छुआ था, तब दिन सपनों की तरह और रातें विवाह के उत्सव की तरह बीतीं।‘‘ अथर्ववेद में समाहित प्रेम गीत भला किसको न बांध पायेंगे। जो लोग प्रेम को पश्चिमी चश्मे से देखने का प्रयास करते हैं, वे इन प्रेम गीतों को महसूस करें और फिर सोचें कि भारतीय प्रेम और पाश्चात्य प्रेम का फर्क क्या है? 

फिलहाल वेलेण्टाइन-डे का खुमार युवाओं पर चढ़कर बोल रहा है। कोई इसी दिन पण्डित से कहकर अपना विवाह-मुहूर्त निकलवा रहा है तो कोई इसे अपने जीवन का यादगार लम्हा बनाने का दूसरा बहाना ढूंढ रहा है। एक तरफ नैतिकता की झंडाबरदार सेनायें वेलेण्टाइन-डे का विरोध करने और इसी बहाने चर्चा में आने का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं-‘करोगे डेटिंग तो करायेंगे वेडिंग।‘ यही नहीं इस सेना के लोग अपने साथ पण्डितों को लेकर भी चलेंगे, जिनके पास ‘मंगलसूत्र‘ और ‘हल्दी‘ होगी। तो अब वेलेण्टाइन डे के बहाने पण्डित जी की भी बल्ले-बल्ले है। जब सबकी बल्ले-बल्ले हो तो भला बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कैसे पीछे रह सकती हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में ‘प्रेम‘ रूपी बाजार को भुनाने के लिए उन्होंने ‘वेलेण्टाइन-उत्सव‘ को बकायदा हफ्ते भर  तक मनाने की घोषणा कर दी है। हर दिन को अलग-अलग नाम दिया है और उसी अनुरूप लोगों की जेब के अनुरूप गिफ्ट  भी तय कर लिये हैं। यह उत्सव 7  फरवरी को ‘रोज  डे‘ से आरम्भ होकर 14  फरवरी को ‘वैलेण्टाइन डे'  पर खत्म होगा। यह भी अजूबा ही लगता है कि शाश्वत प्रेम को हमने दिनों की चहरदीवारी में कैद कर दिया है। खैर इस वर्ष ज्वैलरी पसंद लड़कियों के लिये बुरी खबर है कि मंहगाई के इस दौर में पिछले वर्षों में शामिल रहे   ‘ज्वैलरी डे‘ और ‘लविंग हार्टस डे‘ को इस बार हटा दिया गया है। वेलेण्टाइन-डे के बहाने वसंत की मदमदाती फिजा में अभी से ‘फगुआ‘ खेलने की तैयारियां आरम्भ हो चुकी हैं।

7  फरवरी - रोज  डे
8  फरवरी - प्रपोज डे
9 फरवरी -  चॉकलेट डे
10  फरवरी - टेडी  डे
11 फरवरी - प्रामिस डे 
12 फरवरी - हग  डे
13 फरवरी - किस  डे
14 फरवरी - वैलेण्टाइन डे

प्रेम कभी दो दिलों की धड़कन सुनता था, पर बाज़ारवाद की अंधी दौड़ ने इन दिलों में अहसास की बजाय गिफ्ट, ग्रीटिंग कार्ड, चाकलेट, फूलों का गुलदस्ता भर दिया और प्यार मासूमियत की जगह हैसियत मापने वाली वस्तु हो गई। ‘प्रेम‘ रूपी बाज़ार को भुनाने के लिए वेलेण्टाइन-डे को बकायदा कई दिनों तक चलने वाले ‘वेलेण्टाइन-उत्सव’ में तब्दील कर दिया गया है और हर दिन को कार्पोरेट जगत से लेकर मॉल कल्चर और होटलों की रंगीनी से लेकर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स और मीडिया की फ्लैश में चकाचौंध कर दिया जाता है और जब तक प्यार का ख़ुमार उतरता है, करोड़ों के वारे-न्यारे हो चुके होते हैं। टेक्नॉलाजी ने जहाँ प्यार की राहें आसान बनाई, वहीं इस प्रेम की आड़ में डेटिंग और लिव-इन-रिलेशनशिप इतने गड्डमगड्ड हो गए कि प्रेम का ’शरीर’ तो बचा पर उसका ’मन’ भटकने लगा। प्रेम के नाम पर बचा रह गया ‘देह विमर्श’ और फिर एक प्रकार का उबाउपन। काश वसंत के मौसम में प्रेम का वह अहसास लौट आता-



वसंत
वही आदर्श मौसम
और मन में कुछ टूटता सा
अनुभव से जानता हूँ
कि यह वसंत है (रघुवीर सहाय)


मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

'फेसबुक' का दशक

कहते हैं दुनिया में दो तरह के लोग हैं।  एक, वो जो फेसबुक पर हैं और दूसरे, वो जो फेसबुक पर नहीं हैं। यह अतिरंजना  हो सकती है, पर दुनिया भर में फेसबुक ने जितनी तेजी से लोगों को अपना दीवाना और स्टेटस सिम्बल का प्रतीक बनाया है, वह एक शोध का विषय हो सकता है। आखिर यूँ ही इसने अपने मुकाम के दशक वर्ष में प्रवेश नहीं कर लिया है। 

जब से सोशल मीडिया का आरंभ हुआ है, तब से फेसबुक ही दुनिया भर में छाया हुआ है। संदेशों के लेन-देन के और भी विकल्प मौजूद हैं, पर फेसबुक सबका अगुआ बन चुका है। लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने के अलावा, बिछड़े हुए को मिलाने और त्‍वरित संदेश भेजने के अलावा अपने संदेशों के आदान-प्रदान के लिए इसे सबसे सही और जबरदस्‍त माध्‍यम माना जाता है। किसी समालोचक ने ठीक ही लिखा कि फेसबुक हमारे लिए अपनों से जुड़ने, उनसे संवाद करने का एक जरिया है। इस प्रक्रिया में एक मानसिक संतोष है कि जो हमसे दूर हैं, वे बहुत दूर भी नहीं हैं। फेसबुक का न होना इस संतोष से वंचित होना है। 

बकौल हरजिंदर, सीनियर एसोशिएट एडिटर, हिन्दुस्तान फेसबुक पर सक्रिय किसी उत्साही शख्स के दोस्तों की सूची खंगालिए। इसमें उसके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, दफ्तर या कामकाज के सहयोगी और कुछ अड़ोसी-पड़ोसी तो होंगे ही, साथ ही वे लोग भी होंगे, जिनके साथ उसने स्कूल में पढ़ाई की थी, जिनके साथ वह कॉलेज गया था, जिनके साथ गली-मुहल्ले में तरह-तरह के खेल खेले थे, गप्पें लड़ाई थीं, या आवारागर्दी की थी, जिनके साथ वह कई मसलों पर इत्तेफाक रखता है और वे लोग भी, जिनके साथ आगे चलकर कार्य-व्यापार वगैरह में कुछ संभावनाएं बनती हों। एक बार इस सूची को फिर से देखें। इसमें दुनिया भर में रह रहे वे लोग हैं, जो दरअसल उसका अतीत हैं। वे लोग हैं, जो उसके वर्तमान से जुड़े हैं। और वे भी लोग हैं, जिनसे वह भविष्य की कोई उम्मीद बांधता है। यही फेसबुक की ताकत है कि उसमें आप अपने अतीत से लेकर भविष्य तक के तमाम लम्हों को एक साथ जी सकते हैं। बिल्कुल अभी, किसी भी क्षण।  पर जो भी हो फेसबुक यह असल जिंदगी के सोशल नेटवर्क का विकल्प नहीं है, उस सोशल नेटवर्क का, जिसमें पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के काम आते थे।

 4 फरवरी 2004 को अमेरिका में मार्क जकरबर्ग द्वारा स्थापित किए गए इस ऑनलाइन संदेशवाहक से आज करोड़ों लोग जुड़े हुए हैं और लगभग हर दिन मीडिया में इससे संबंधित सुर्खियां जरूर रहती हैं। यहां तक कि कई मीडिया संस्‍थान भी खबरों के प्रचार-प्रसार के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं। दुनियाभर में फैले अपने 1 . 2 अरब चाहने वालों के बीच सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक अपना दसवां जन्मदिन मना रहा है.  यह अलग बात है कि दस साल के फेसबुक को इस समय अपने युवा इस्तेमालकर्ताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए विभिन्न प्रकार के नए प्रयोग करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 

मार्क जुकरबर्ग ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से चार फरवरी 2004 को फेसबुक की शुरुआत की थी. इस साइट का प्रारुप इस प्रकार डिजाइन किया गया था कि यह छात्रों को एक दूसरे से जोड़े और उन्हें आनलाइन अपनी एक पहचान कायम करने में मदद करे. फेसबुक का प्रभाव ऐसा था जिसने दोस्त की नई परिभाषा गढ़ी, यानी फेसबुक पर किसी व्यक्ति का मित्र। इसके जरिए कोई भी व्यक्ति किसी को भी फॉलो कर उसका मित्र बन सकता है। साल 2013 में फेसबुक ने 7.87 अरब डॉलर की कमाई थी, जिसमें 1.5 अरब डॉलर शुद्ध मुनाफा शामिल था।

मई में 30 साल के होने जा रहे जुकरबर्ग ने पिछले सप्ताह सिलिकान वैली में एक औद्योगिक सम्मेलन में कंपनी के दस साल पूरे होने पर विशेष भाषण दिया था. जुकरबर्ग ने कहा था कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि फेसबुक उन्हें दुनिया के सबसे धनी लोगों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर देगी.  फेसबुक को अब कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. सोशल नेटवर्किंग साइट पिनट्रेस्ट, ट्विटर और स्नैप चैट जैसी साइटों ने फेसबुक के लिए मुकाबला कड़ा कर दिया है और उसे अपने मूल युवा इस्तेमालकर्ताओं को बनाए रखने के लिए नए नए उपाय सोचने पड़ रहे हैं. आईस्ट्रेटेजीलैब्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2011 से जनवरी 2014 के बीच 13 से 17 साल की उम्र के 30 लाख से अधिक उपयोगकर्ता ने अपना अकांउट बंद कर दिया है। यही हाल 18 से 24 साल के बीच के युवाओं का भी रहा है।

फेसबुक की इंडिया चीफ 42 वर्षीया कृतिगा रेड्डी का कहना है कि वर्ष 2014 एफबी इंडिया के लिए अहम होगा. रेड्डी चाहती हैं कि भारतीय कंपनियां फेसबुक को सोशल मीडिया नहीं, बल्कि मास मीडिया प्लैटफॉर्म के रूप में देखें. गौरतलब है कि भारत में एफबी के करीब 9 करोड़ 30 लाख यूजर्स हैं. दिसंबर 2013 तक के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से 7 करोड़ 50 लाख यूजर्स मोबाइल के जरिए एफबी पर थे. अमेरिका के बाद भारत इसका दूसरा सबसे बड़ा यूजर बेस है. मोबाइल प्लैटफॉर्म को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की एफबी की योजना को देखते हुए लग रहा है कि भारत में इसे सही मंच मिल गया है. चार साल पहले जब रेड्डी ने कंपनी का ज्‍वॉडन किया था उस समय भारत में इसके यूजर 80 लाख थे. भारत में हर महीने एफबी से करीब 20 लाख लोग जुड़ रहे हैं. यह 9 भाषाओं में अपनी सेवा दे रही है. रेड्डी के सामने अगला लक्ष्‍य इसके यूजर बेस को 10 करोड़ तक पहुंचाना है. रेड्डी ने कहा कि मुझे पता है कि अब से 18 महीने बाद मीडिया लैंडस्केप अलग होगा और इस बदलाव को रफ्तार देने में फेसबुक की अहम भूमिका होगी. उन्होंने कहा कि तमाम कंपनियां और ब्रैंड्स इस प्लैटफॉर्म को अपनाएंगे.

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

एक बार फिर, गाँधी जी ख़ामोश थे


एक बार फिर
गाँधी जी ख़ामोश थे

सत्य और अहिंसा के प्रणेता 
की जन्मस्थली ही
सांप्रदायिकता की हिंसा में
धू-धू जल रही थी
क्या इसी दिन के लिए
हिन्दुस्तान व पाक के बँटवारे को
जी पर पत्थर रखकर स्वीकारा था!

अचानक उन्हें लगा
किसी ने उनकी आत्मा
को ही छलनी कर दिया
उन्होंने ‘हे राम’ कहना चाहा
पर तभी उन्मादियों की एक भीड़
उन्हें रौंदती चली गई ।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

'सुचित्रा सेन' से लेकर 'सुनंदा पुष्कर' तक की तन्हाई

ग्लैमर की चकाचौंध भी बड़ी अजीब होती है। आज दो महिलाएं इस दुनिया को अलविदा कह गईं - पहली, लम्बे समय से गुमनामी की चादर ओढ़े सुचित्रा सेन।  वे  बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। बंगाली सिनेमा की ग्रेटा गर्बो मानी जाने वाली सुचित्रा ने बांग्ला और हिंदी की तमाम चर्चित फिल्मों में यादगार अभिनय किया।

दूसरी, केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर, जिन्होंने कि कथित रूप से आत्महत्या कर ली।

फर्क यही है कि एक ने ग्लैमर की  दुनिया छोड़कर  'तन्हाई' की राह पकड़ ली थी और दूसरी अपनों के ही चलते 'तन्हा' महसूस कर रही थी।

…ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !!

******************************************************************************
कोलकाता। अस्पताल में भर्ती मशहूर एक्ट्रेस सुचित्रा सेन का निधन हो गया है। वह 26 दिन से अस्पताल में भर्ती थीं। उनकी हालत गुरुवार रात को ज्यादा बिगड़ गई थी। और आज दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। सुचित्रा के निधन पर फिल्म जगत से जुड़े कलाकारों ने गहरा शोक जताया है।

इससे पहले दिन के वक्त डॉक्टरों ने कहा था कि उनकी हालत स्थिर है और घर पर इलाज के लिए अगले दो तीन दिन में उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी जा सकती है। लेकिन देर शाम 82 साल की सुचित्रा को सांस लेने में तकलीफ बढ़ गई। सूत्रों ने बताया कि सुचित्रा के परिवार के लोगों मुनमुन सेन, रिया और राइमा सेन ने उनका इलाज घर में कराने की इच्छा जताई थी।

गुजरे जमाने की मशहूर अदाकारा सुचित्रा सेन को सांस में तकलीफ के चलते 23 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें कोलकाता के बैली वी क्लीनिक में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें लगातार ऑक्सीजन दी जा रही है और उनके दिल की धड़कन भी बहुत तेज चल रही थी।



1970 में फिल्मी दुनिया से विदा लेने के बाद सेन लंबे समय से एकाकी जीवन व्यतीत कर रही थीं। इससे पहले उन्होंने करीब ढाई दशकों तक बंगला सिनेमा की महारानी के रूप में एकछत्र राज किया था। बंगला फिल्मों के आइकॉन अभिनेता उत्तम कुमार के साथ सुचित्रा की जोड़ी सुपरहिट रही। दोनों ने करीब 50 फिल्मों में एक साथ काम किया था। सुचित्रा ने बंबई का बाबू सहित कुछ हिंदी फिल्मों में भी काम किया है। सुचित्रा की फिल्म अभिनीत ‘आंधी’ अपने समय में काफी चर्चित रही थी।
Courtesy : http://khabar.ibnlive.in.com/news/114873/6

*****************************************************************************

केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का शव दिल्ली के एक होटल में मिला है। कहा जा रहा है कि सुनंदा ने आत्महत्या कर ली है। फिलहाल मौत के सही कारणों का पता नहीं चल पाया है। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली पुलिस को स्वयं शशि थरूर ने सूचित किया था।

केंद्रीय मंत्री के पीएस अभिनव कुमार ने बताया कि दिन में केंद्रीय मंत्री शशि थरूर कांग्रेस की बैठक में व्यस्त थे, लेकिन शाम को जब करीब 8.30 बजे वह होटल के कमरे में पहुंचे तब उन्होंने सुनंदा को मृत पाया और पुलिस को सूचित किया। कुमार का कहना है कि थरूर के घर पर रंगाई का काम चल रहा है जिसकी वजह से दंपती होटल में गए थे।

कहा जा रहा है कि दक्षिण दिल्ली के एक इलाके में स्थित होटल लीला में सुनंदा पुष्कर का शव मिला है। कहा जा रहा है कि सुनंदा को अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी मौत की पुष्टि की गई है। कहा जा रहा है कि गुरुवार को ही सुनंदा ने होटल लीला में कमरा बुक कराया था।

दिल्ली पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर जांच आरंभ कर दी है और शव को एम्स में पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। शुरुआती जांच में पुलिस आत्महत्या की बात को स्वीकार नहीं रही है और यह भी कह रही है कि स्वाभाविक मौत भी हो सकती है।

गौरतलब है कि कल ही ट्वीटर पर एक विवाद के चलते शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर का नाम खबरों में था। शशि थरूर ने फेसबुक पेज पर दिखे साझा बयान में कहा था कि, ''हमारे ट्विटर खातों से कुछ अनधिकृत टवीट्स के कारण उपजे अशोभनीय विवाद से हम व्यथित हैं...'' यह विवाद तब शुरू हुआ था, जब कथित रूप से एक पाकिस्तानी महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए अंतरंग संदेशों को थरूर के ट्विटर खाते पर पोस्ट कर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि ट्विटर पर शशि थरूर के फॉलोअर्स बड़ी संख्या में हैं।

इसके बाद शशि थरूर की पत्नी सुनंदा ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर दावा किया कि कथित रूप से लाहौर की पत्रकार मेहर तरार द्वारा थरूर को भेजे गए अंतरंग संदेश उन्होंने ही अपने पति के खाते से पोस्ट किए थे, ताकि दुनिया को दिखा सकें कि 'वह किस तरह मेरे पति के पीछे पड़ी हैं...'

बता दें कि आज रात करीब आठ बजे शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा था कि वह जयपुर नहीं जाएंगे क्योंकि उनकी पत्नी बीमार हैं और वह ऐसे में अपनी पत्नी के साथ ही रहेंगे।

गौरतलब है कि दोनों की शादी को अभी सात साल नहीं हुआ था इसलिए पुलिस ने एसडीएम से अपनी कार्यवाही के लिए आग्रह किया है।

खबर सुनने के बाद पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया में दुख व्यक्त किया है।

Courtesy : http://khabar.ndtv.com/news/india/union-minister-shashi-tharoors-wife-sunanda-found-dead-377997?update=1389981866

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

आम 'आदमी' चाहिए, पर आम 'औरत' नहीं

अंतत: 1 जनवरी से 'लोकपाल' कानून बन गया।  जो कभी लोकपाल से डरते थे या विरोध करते थे, वे भी इसके पक्ष में हो गए। पर क्या यही फार्मूला विधायिका में महिला आरक्षण विधेयक पर नहीं लागू हो सकता। क्या महिलाओं से लोग इतने डरते हैं कि 'लोकपाल' ला सकते हैं, पर संसद और विधानसभाओं में 'महिलाओं' को नहीं ? क्या महिलाओं से लोगों को ज्यादा खतरा महसूस होता है कि कहीं वे संसद में कानून बनाने बैठ गईं तो पुरुषों की सत्ता का क्या होगा ? 'आम आदमी पार्टी' ने भी एक ही महिला को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया, आखिर केजरीवाल जी ने भी पहले 'आदमी' की ही सोची, 'औरत' की नहीं। लगता है इस देश को अब एक 'आम औरत पार्टी' की भी जरुरत है, तभी  महिला आरक्षण विधेयक पर गम्भीरता से विचार होगा। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी करीब है, देखते हैं इस बार इस मुद्दे को लेकर क्या जुमला उछाला जाता है …!! 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

ऐ नव वर्ष के प्रथम प्रभात

नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है,
खुशियों की बस इक चाहत है।

नया जोश, नया उल्लास,
खुशियाँ फैले, करे उजास।

नैतिकता के मूल्य गढ़ें,
अच्छी-अच्छी बातें पढें।

कोई भूखा पेट न सोए,
संपन्नता के बीज बोए।

ऐ नव वर्ष के प्रथम प्रभात,
दो सबको अच्छी सौगात।




शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा आकांक्षा यादव को 'भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013'

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं अग्रणी महिला  ब्लागर आकांक्षा यादव को दिल्ली में 12-13 दिसम्बर, 2013 को आयोजित 29वें राष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन में सामाजिक समरसता सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना और सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान हेतु ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013‘‘ से सम्मानित किया। आकांक्षा यादव को इससे पूर्व विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु दर्जनाधिक  सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं। 

गौरतलब है कि नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव साहित्य, लेखन, ब्लागिंग व सोशल मीडिया के क्षेत्र में एक लम्बे समय से सक्रिय हैं। देश-विदेश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर आकांक्षा यादव की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित होती रहती है। आकांक्षा यादव की 2 कृतियाँ ”चाँद पर पानी” (बालगीत संग्रह) एवं ”क्रांतियज्ञ: 1857-1947 की गाथा” प्रकाशित हैं।

भारतीय दलित साहित्य अकादमी की स्थापनावर्ष 1984 में बाबू जगजीवन राम द्वारा दलित साहित्य के संवर्धन  और प्रोत्साहन हेतु  की गयी थी। 

साभार:



युवा कवयित्री, साहित्यकार  आकांक्षा यादव  सम्मानित।
(पंजाब केसरी, 22 दिसंबर, 2013 )

आकांक्षा यादव को मिला ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान‘‘
(दैनिक जागरण,16  दिसंबर, 2013-वाराणसी संस्करण )


''भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013'' से नवाजी गई आकांक्षा यादव 
( अमर उजाला, 17  दिसंबर, 2013-वाराणसी संस्करण )


आकांक्षा यादव क़ो मिला भारतीय दलित साहित्य अकादमी का सम्मान।
(जनसंदेश टाइम्स, 16 दिसंबर, 2013-वाराणसी संस्करण )


युवा कवयित्री  आकांक्षा यादव ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान‘‘ से सम्मानित।
(दैनिक आज, 16  दिसंबर, 2013-वाराणसी संस्करण )

दलित साहित्य अकादमी ने आकांक्षा यादव क़ो किया सम्मानित 
(अमृत प्रभात, 21 दिसंबर, 2013-इलाहाबाद संस्करण )
आकांक्षा यादव सम्मानित 
(अमर उजाला, 21 दिसंबर, 2013-इलाहाबाद संस्करण )


युवा कवयित्री आकांक्षा यादव को सम्मान 
(दैनिक जागरण, 21 दिसंबर, 2013-इलाहाबाद संस्करण )

आकांक्षा यादव क़ो मिला दलित साहित्य अकादमी  पुरस्कार 
(हिन्दुस्तान, 21 दिसंबर, 2013-इलाहाबाद संस्करण )

आकांक्षा यादव सम्मानित 
(जनसंदेश टाइम्स, 21 दिसंबर, 2013-इलाहाबाद संस्करण )

Bhartiya Dalit Sahitya Akademi felicitates Akanksha Yadav
(Northern India Patrika, 22 Dec. 2013)



Dalit Akademi felicitates blogger Akanksha Yadav
(Times of India, 22 Dec. 2013)




सोमवार, 16 दिसंबर 2013

'निर्भया' के एक साल बाद, एक सवाल

चाहे उसे निर्भया कहिये या दामिनी या चाहे जो भी नाम रख लीजिए। या फिर भंवरी देवी,  प्रिदर्शिनी मट्टू या  नैना साहनी। या ऐसे ही वो तमाम अनगिनत नाम जो देश के कोने-कोने में रोज किसी न किसी रूप में यौनिक हिंसा या विभत्सतता की शिकार होती हैं … यह एक लम्बी सूची  हो सकती है। पर सवाल अभी भी वहीँ है कि क्या आज समाज में नारी पूर्णतया सुरक्षित है ?  क्या तमाम राजनैतिक एवं प्रशासनिक व पुलिस सिस्टम के आश्वासनों, न्यायिक सक्रियता, एनजीओ और  सामाजिक संगठनों के प्रदर्शन, प्रिंट मीडिया के रँगे गए पूरे पन्ने,  न्यूज चैनल्स की  ब्रेकिंग न्यूज एवम कैंडल मार्च  जैसी कवायदें भारत देश और यहाँ आने वाली अन्य देश कि महिलाओं को यह आश्वस्त कर सकते हैं कि महिलाएँ अब इस देश में सुरक्षित हैं ? क्या वाकई 'मानसिकता' सिस्टम पर हावी है या यह हमारा दोहरा चरित्र है कि हम कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं.… निर्भया की  मौत के एक साल बाद भी यह सवाल अभी भी वहीँ खड़ा है।  अभी भी निर्भया और उन  जैसी तमाम आत्माएँ हमसे यही सवाल पूछ रही हैं कि क्या हम  फिर से मानव योनि में जन्म लें या यूँ ही हमारी आत्मा भटकती रहे ? उन्हें अभी भी इंतजार है उस दिन का जब कोई लड़की घर में, सड़क पर या खेतों में  यूँ ही  रेप का शिकार नहीं होगी और कह सकेगी कि यह मेरा देश है, यहाँ मेरे लोग हैं और मैं यहाँ पर पूर्णतया सुरक्षित हूँ .....!!  

- आकांक्षा यादव 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

11-12-13

11-12-13  यह तारीख तो बड़ी अनूठी और रोचक है। ऐसे अनूठे दिन विरले ही आते हैं। तमाम लोग इस दिन को अपने जीवन से जोड़ने के लिए प्लान कर रहे हैं। कोई इस दिन विवाह के बंधन में बंधकर इस दिन को ता-जिंदगी याद रखना चाहता है तो कोई इस दिन अपने बच्चे को संसार में आना देखना चाहता है ....ऐसी ही तमाम अनूठी योजनाएं कइयों के मन में चल रही हैं। कोई इस दिन को रोचक बनाना चाहता है, कोई यादों में संजोना चाहता है, कोई ऐतिहासिक बनाना चाहता है। आप भी कुछ सोच रहे हैं क्या ...!!

11-12-13 तब और भी रोचक हो जायेगा, जब इस दिन समय होगा 14 :15 :16.




शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

महिलाओं से इतना डर क्यों


महिलाओं से इतना डर क्यों लगने लगा है इस देश के सम्प्रभुओं को?  फारुख अब्दुल्ला साहब अपना दुःख बयां कर रहे हैं, कि महिलाओं से इतना डर लगने लगा है कि उन्हें पीए बनाने से पहले भी सोचें ?  जस्टिस गांगुली से जुड़ा सवाल पूछे जाने पर जवाब देते हुए फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि अब लड़कियों से बात करने में भी डर लगता है, और हालत ये हो गई है कि अब हम लोग महिला पीए भी नहीं रखेंगे। क्या पता कब जेल जाना पड़ जाए। फारुख जी तो सिर्फ किसी के बहाने बयान दे रहे हैं, पर शायद यही आवाज़ राजनेताओं से लेकर संत, पत्रकार, जज, अधिकारी तक अपने मन में दबा कर बैठे हैं.…सवाल है कि आखिर क्यों ? 

लड़कियाँ/महिलाएं खुलकर विरोध करने लगीं कि कैसे उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, कैसे उनके सीनियर्स ने  उनका फायदा उठाया तो कुछेक लोग जेल की  सलाखों के पीछे पहुँच गए और कुछ लोग कभी भी जेल जाने का इंतज़ार कर रहे हैं.…। आखिर ये सम्प्रभु लोग यह क्यों नहीं सोचते कि महिलाओं का अपना भी स्वतंत्र अस्तित्व है, सम्मान है, निजता है, आप उसके साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। 

महिलाएं कोई गूंगी गुड़िया नहीं हैं, जिसे जहाँ चाहें फिट कर दें. उनमें भी स्पंदन होता है, चीजों का विरोध होता है, उन्हें आप लम्बे समय तक दबा कर नहीं रख सकते। आखिर, अपनी मानसिकता बदलने की  बजाय यह कहना कि हम महिलाओं के साथ काम नहीं कर सकते, उनसे डर लगता है .... कभी इसे महिलाओं के भी एंगल से सोचिए ?? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किन विपरीत परिस्थितियों में महिलाओं ने समाज और व्यवस्था में अपना स्थान बनाया है और आज यदि उसी महिला से लोग डरने की  बात कर रहे हैं तो यह महिलाओं से नहीं बल्कि खुद से डरना है, क्योंकि शायद आपका अपने ऊपर नियंत्रण ही नहीं है. 

आखिर, सम्प्रभु लोग यह क्यों सोचते हैं कि महिलाएं उनकी पीए बनें, बॉस नहीं। कहीं न कहीं यह दोहरापन भी  इन सबकी जड़ में है. यदि लोग यह  सोचते हैं कि महिलाओं के साथ रेप होता रहे, छेड़छाड़ होती रहे और आप कैंडल जलाकर सदभावना और श्रद्धांजलि अर्पित करते रहेंगे तो इस ग़लतफ़हमी को निकाल डालिए। महिलाओं की सौम्यता को उनकी कमजोरी नहीं समझिये, नहीं तो रणचंडी बनने में कितनी देरी लगती है. फिर बड़ा से बड़ा अपने को भगवान समझने वाला संत और बड़े से बड़े लोगों की तहलका मचाकर बखिया उघेड़ने वाले भी अर्श से फर्श पर आ जाते हैं !!

- आकांक्षा यादव @ www.shabdshikhar.blogspot.com/ 

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

आज ही तो इक बंधन में बंधे थे हम

28 नवम्बर का दिन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है. आखिर इसी दिन हमारी शादी जो हुई थी.  28 नवम्बर, 2004 (रविवार) को हम कृष्ण कुमार जी के साथ जीवन के इस अनमोल पवित्र बंधन में बंधे थे. आज हमारी शादी के नौ साल पूरे हो गए। वक़्त कितनी तेजी से करवटें बदलता रहा, पता ही नहीं चला। कहते हैं समायोजन निश्चय ही सुखी वैवाहिक जीवन का आधार होता है और हमारे जीवन में भी यही पारस्परिक भाव है. फेसबुक और  पर तमाम मित्रों ने इस शुभ दिन पर हमें बधाइयाँ और शुभकामनायें दी हैं, उन सभी का इस स्नेह के लिए आभार। चलते-चलते डा लाल रत्नाकर जी की  कुछेक पंक्तियाँ और चित्र :



आपके सुखद, सौभाग्यशाली, सुरुचि संपन्न एवं साहित्य समृद्ध जोड़ी के नव वर्ष के पूर्ण होने पर मेरी बहुतेरी हार्दिक शुभ कामनाएं स्वीकारें, आपका यही माधुर्य हमेशा प्रवाहित होता रहे, "न जाने कितने सिविल सर्विसेज  के लोग अवाम से अलग अपनी दुनिया बना लेते हैं'' लेकिन जो अवाम के मध्य अपना माधुर्य बिखेरते हैं उससे उन्हें तो ख़ुशी मिलती ही है साथ ही साथ जन सामान्य भी गौरवान्वित और प्रसन्न होता है. एक कलाकार के नाते हमेशा आपकी भावनाएं हमें उत्साहित करती हैं, उम्र में आधिक होने के बावजूद हमने हमेशा कई बातें सीखने, वरतने आदि का प्रयास किया है. आज मुझे और प्रसन्नता है कि 'आकांक्षा' विगत नव वर्षों से आपकी 'संगती' में निरंतर आपके साहित्यिक सहयात्री के रूप में खड़ी रही हैं. मैं अपनी कुछ रेखाएं आपको इस अवसर पर 'भेंट' करता हूँ.


रविवार, 24 नवंबर 2013

वहीदा रहमान को फ़िल्म जगत का पहला शताब्दी पुरस्कार

प्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान को पुणे में  भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव :आईएफएफआई: के उद्घाटन समारोह में 20  नवम्बर को  ‘साल के भारतीय फिल्म शख्सयित’ के पहले शताब्दी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सम्मान दिए जाते समय दर्शक दीर्घा में मौजूद लोगों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने 77 वर्षीय अभिनेत्री को भारतीय सिनेमा को दिए गए उनके अद्वितीय योगदान के लिए मंच पर सम्मानित किया.77 वर्षीय अभिनेत्री वहीदा रहमान को ‘गाइड’ और ‘साहब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्मों में शानदार अभिनय के लिए जाना जाता है. वहीदा रहमान को वर्ष 1972 में पदमश्री और वर्ष 2011 में पदम भूषण से अलंकृत किया गया था. वहीदा रहमान को यह पुरस्कार सिनेमा में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जा रहा है. पांच सदस्यीय ज्यूरी ने इस पुरस्कार हेतु सर्वसम्मति से वहीदा रहमान के नाम का चयन किया. 

गौरतलब है कि भारत सरकार ने भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में इस पुरस्कार का गठन किया है. इस सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र, एक प्रमाण पत्र, एक पदक, एक शाल और 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाता है. वर्ष 2013 से यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए फिल्मी दुनिया की हस्तियों को प्रत्येक वर्ष दिया जाना है. विदित हो कि भारतीय सिनेमा ने अपने स्थापना के 100 वर्ष 3 मई 2013 को पूरे किए, इसी दिन वर्ष 1913 में दादा साहेब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र को रिलीज किया था. 

वहीदा ने कहा कि वह यह प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाली पहली व्यक्ति बनकर बहुत खुश हैं. पुरस्कार पाने के बाद भावुक हुई वहीदा ने कहा, ‘‘मुझे इतना बड़ा सम्मान पाकर बहुत अच्छा लग रहा है. मैं निर्णायक मंडल का अभार व्यक्त करना चाहूंगी जिन्होंने मेरा नाम दिया. मैं उन सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहूंगी जिनके साथ अब तक मैंने काम किया है. मेरे निर्देशक, निर्माता, मेकअप आर्टिस्ट, टेक्नीशियन. मेरी अदभुत यात्रा के लिए आपका शुक्रिया.’’ वहीदा ने ‘प्यासा’, ‘गाइड’, ‘कागज के फूल’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ जैसी कई चर्चित फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभायी हैं. उन्हें एक प्रशस्ति पत्र, एक प्रमाण पत्र, एक पदक :रजत मयूर:, शॉल और 10 लाख रपए नकद देकर सम्मानित किया गया.

एक बैंक महिलाओं का ...

महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकारें तमाम कदम उठाती रही हैं। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 19 नवम्बर को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गाँधी के  96वें जन्मदिन पर  मुम्बई में देश के प्रथम महिला बैंक 'भारतीय महिला बैंक' का उद्घाटन किया। बैंक का उद्घाटन मुंबई के नरीमन पॉइंट पर एयर इंडिया के भवन में हुआ। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मौके पर कहा कि इससे महिला सशक्तिकरण के अलावा उनके सामाजिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। मुंबई, लखनऊ समेत सात शहरों में भारतीय महिला बैंक [बीएमबी] की शाखाओं ने मंगलवार से ही कामकाज शुरू कर दिया। वैसे, इस बैंक में पुरुष भी खाता खुलवा सकेंगे मगर कर्ज वितरण सहित सभी सुविधाओं और योजनाओं में महिलाओं को ही प्राथमिकता दी जाएगी। इसमें महिला व पुरुष दोनों ही खाताधारी होंगे, लेकिन बैंक से सभी तरह के लोन लेने की सुविधा सिर्फ महिलाओं को मिलेगी। इसके अलावा उन्हें खासतौर पर फिक्सड डिपॉजिट व लोन स्कीम उपलब्ध कराई जाएंगी।

महिला सशक्तिकरण, भारत का सशक्तिकरण पंच लाइन के साथ शुरू हुआ  भारतीय महिला बैंक  न सिर्फ शहरी क्षेत्र में महिला उद्यमिता को बढ़ावा देगा, बल्कि समाज के कमजोर वर्ग की महिलाओं को कम ब्याज दर पर कर्ज देकर उन्हें आर्थिक रूप से स्वाबलंबी बनाने पर ध्यान देगा। इस सरकारी बैंक की खासियत यह भी है कि इसके आठ सदस्यीय निदेशक मंडल में महिलाओं को ही जगह दी गई है। पंजाब नेशनल बैंक की कार्यकारी निदेशक रह चुकी ऊषा अनंतसुब्रमण्यम को बैंक का अध्यक्ष बनाया गया है। बैंक के बोर्ड में चेयरपर्सन के अलावा  राजस्थान के एक गांव की सरपंच छवि राजावत, नुपुर मित्रा, प्रिया कुमार, रेणुका रामनाथ और गोदरेज की तान्या दुबाश को शामिल किया गया है। भारतीय महिला बैंक विदेशों में भी ब्रांच खोली जाएगी। अभी विभिन्न पीएसयू बैंक की महिलाकर्मी है स्टाफ मेंबर।जिन अन्य शहरों में इसकी शाखाएं खुली हैं उनमें कोलकाता, गुवाहाटी, अहमदाबाद, चेन्नई और बेंगलूर भी शामिल हैं।

वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुताबिक यह पहला सरकारी बैंक है जिसके बोर्ड में सिर्फ महिलाएं होंगी। कर्मचारियों में भी 70 फीसद महिलाएं ही होंगी। चिदंबरम ने चालू वित्त वर्ष का बजट पेश करते हुए महिला बैंक शुरू करने की घोषणा की थी। इसका पूंजी आधार 1,000 करोड़ रुपये का रखा गया है। अगले साल मार्च तक बैंक के शाखाओं की संख्या बढ़कर 25 कर दी जाएगी।
 ****************************************************************************


इस अवसर पर भारतीय महिला बैंक की अध्यक्ष  उषा अनंतसुब्रमण्यम ने भारतीय महिला बैंक को लेकर उठ रहे  तमाम सवालों के जवाब भी दिए। 

-लगभग सभी बैंक महिलाओं के लिए विशेष शाखा से लेकर स्पेशल प्रॉडक्ट महिलाओं के लिए पहले ही लेकर आ चुके हैं। ऐसे में महिला बैंक उनसे अलग कैसे दिखाई देगा?

हम पेन इंडिया से ऑपरेशन स्टार्ट कर रहे हैं। हम शुरू से ही लोन देना व डिपॉजिट स्वीकार करना शुरू कर रहे हैं और वो भी कई फायदों के साथ।

-अगर लोन की बात करें तो कौन से प्रॉडक्ट महिलाओं के लिए सुटेबल हैं?

बैंक हाई-नेटवर्थ से लेकर मीडिल क्लास व लो-इनकम ग्रुप की महिलाओं के साथ काम कर रहा है। हमारा जोर उस इस स्किल डिवेलपमेंट को फंड करने का है जो इकॉनमिक एक्टिविटी को हेल्प करे। हम ऐसे डे-केयर सेंटर को सेट-अप करने के लिए क्रेडिट देंगे और संगठित कैटरिंग सर्विसेज के लिए भी।-

-आपको अन्य बैंकों से काफी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में आप बिजनेस को कैसे आगे लेकर जाएंगी?

हमारा सेट-अप ही सबसे अलग है। यहां आपको पैसा जमा करवाना है या लोन लेना है तो सीधा ब्रांच में जाकर बहुत ही सिंपल तरह से अपना काम कर सकते हैं। ऑपरेट करने में इतना सरल है कि महिलाएं अपनी बैंकिंग जरूरतों के लिए इसे ही प्राथमिकता देगीं। हमारी आधी आबादी महिलाएं हैं और उनके फायदे के लिए खोला गया बैंक ग्रोथ की तरफ ही जाएगा। समय पर क्रेडिट व सही प्रॉडक्ट हमें लीड दिलाएगा।

-आपने शुरूआत मेट्रो से क्यों की? जबकि फाइनैंशल इन्कलूजन की ज्यादा जरूरत गांवों में है?

हम मेट्रो व अर्बन सेंटर में भी हैं। मार्च 2014 तक हम रूरल एरिया में भी एंटर होंगे। 25 पर्सेंट बैंक ऐसे एरिया में ही होंगे।


सेविंग अकाउंट पर इंटरेस्ट रेट:

एक लाख रुपये पर 4.5 पर्सेंट इंटरेस्ट रेट

एक लाख रुपये से ज्यादा पर 5 पर्सेंट का इटरेस्ट रेट

स्पेशल लोन प्रॉडक्ट:

हाइजनिक क्लास 1
डे-केयर सेंटर
एफिसिएंट किचन
केटरिंग सर्विस

बैंक की कुछ और खासियतें:

स्टाफ होगा प्रीडोमिनेंटली महिलाओं का।
सिक्यूरिटी स्टाफ व अन्य कुछ सेवाओं के अलावा पूरा स्टाफ महिलाओं का होगा।
यहां पुरुष भी बैंकिंग जरूरतों की लिए सेवाएं ले सकेंगे।
तीन साल के लिए 125 कर्मचारी

-जेंडर समानता के लिए कैसे अलग है यह बैंक:

लोन सस्ती दरों पर उपलब्ध होंगे। महिलाओं को छोटे-छोटे लोन अमाउंट बिना कोलेट्रल के ही मिलेगा। महिलाओं के लिए स्पेशल प्रोडक्ट तो हैं ही। महिलाओं के लिए जॉब के अवसर पैदा कर उन्हें एम्पॉवर करना, महिलाओं की फाइनैंशल नीड्स को डील करने के लिए स्पेशल सुविधाएं दी जा रही हैं।


सोमवार, 18 नवंबर 2013

व्रिदोहियों में एकमात्र मर्द रानी लक्ष्मीबाई

बुंदेले हरबोलों  के मुँह हमने सुनी कहानी थी. 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

‘स्त्रियों की दुनिया घर के भीतर है, शासन-सूत्र का सहज स्वामी तो पुरूष ही है‘ अथवा ‘शासन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं‘ जैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करती रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं के बिना स्वाधीनता की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिया। कुल बाईस वर्ष से कुछ कम ही उम्र में रानी ने वीरगति पायी थी | इस अल्प जीवन में रानी का अदम्य साहस उन्हें भारतीयों के दिलों पर युगों के लिए अमर कर गया | यह सत्य है कि तत्कालीन रजवाडों ने उनका साथ नहीं दिया, पर उनके बिना भी उन्होंने अंग्रेजी तेवरों को चुनौती देते हुए कहा कि ‘‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।” रानी ने अपने अधिकार के लिए संघर्ष किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं | तभी तो उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा- ‘‘यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो व्रिदोहियों में एकमात्र मर्द थी।” 


झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह दुर्लभ फोटो वर्ष 1850 में कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन ने खींचा था। इस फोटो को 19 अगस्त, 2009 को भोपाल में आयोजित विश्व फोटोग्राफी प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था। यह चित्र अहमदाबाद के एक पुरातत्व महत्व की वस्तुओं के संग्रहकर्ता अमित अम्बालाल ने भेजा था। माना जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई का यही एकमात्र फोटोग्राफ उपलब्ध है.

रानी लक्ष्मीबाई को जयंती (19 नवम्बर) पर शत-शत नमन !! 


रविवार, 3 नवंबर 2013

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना



जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

दीपावली पर  (पद्मभूषण) गोपालदास नीरज जी का एक गीत साभार।

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं। झिलमिलाते दीपों की आभा से प्रकाशित ये दीपोत्सव आपके जीवन में धन, धान्‍य, सुख और सम़द्वि  लेकर आये। दीप मल्लिका दीपावली हर व्यक्ति, प्राणी, परिवार, समाज, राष्ट्र और समग्र विश्व के लिए सुख, शांति, सम़द्वि व धन वैभव दायक हो। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

दीपावली पर्व पर आप सभी को शुभकामनाएँ। दीपावली दीये का त्यौहार है न कि पटाखों का। अत: दीपावली पर दीये जलाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखें, न कि पटाखों और आतिशबाजी द्वारा इसे प्रदूषित करें।

 -आकांक्षा यादव 

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

एलीनोर कैटन : सबसे युवा बुकर पुरस्कार विजेता

प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। यह बात न्यूजीलैंड की 28 वर्षीय लेखिका एलिनोर कैटन पर पूरी तरह लागू  होती है, जिन्होंने अपने उपन्यास 'द लूमिनरीज़' के लिए सबसे कम उम्र में मैन बुकर पुरस्कार जीतकर एक इतिहास रच दिया है।

एलिनोर कैटन को उनके उपन्यास द लुमिनरीज के लिए वर्ष 2013 का मैन बुकर पुरस्कार दिया गया है। कैटन बुकर पुरस्कारों के 45 साल के इतिहास में पुरस्कार पाने वाली सबसे कम उम्र की लेखिका हैं। कनाडा में जन्मी कैटन न्यूज़ीलैंड में पली-बढ़ी हैं और वे मैन बुकर पुरस्कार जीतने वाली न्यूज़ीलैंड की दूसरी लेखक हैं.

यही नहीं, एलिनोर कैटन के खाते में एक और भी उपलब्धि जुड़ गई है। दरअसल बुकर पुरस्कारों के 45 साल के इतिहास में कैटन का 832 पेज का उपन्यास ये पुरस्कार जीतने वाली सबसे लंबी कृति भी बन गया है। उन्होंने ये उपन्यास उन्नीसवीं सदी की सोने की खानों पर लिखा है। कैटन ने यह उपन्यास 25 साल की उम्र में लिखना शुरू किया था। गौरतलब है कि बुकर  पुरस्कार के साथ पचास हज़ार पाउंड की इनामी राशि भी दी जाती है.

बकौल जूरी के मुखिया रॉबर्ट मैकफार्लेन- ''द लुमिनरीज एक शानदार उपन्यास है, इसकी संरचना अद्भुत रूप से जटिल है, कथा शैली आपको बांधे रखती है और लालच और सोना का वर्णन जादुई है।'' रॉबर्ट मैकफ़ारलेन ने कहा, "यह एक चमकदार कार्य है जो लंबा हुए बिना विशाल काम है....आप इसे पढ़ना शुरू करते हैं और आपको लगने लगता है कि आप एक दैत्य की पकड़ में हैं. इसका हर हिस्सा पिछले हिस्से की तुलना में ठीक आधा लंबा है."

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

"लघुकथाओं की मल्लिका" एलीस मुनरो

महिलाएँ आज जीवन की हर ऊंचाई को छू रही है। दुनिया भर में महिलाएं अपनी श्रेष्ठता का परचम फहरा रही हैं। तभी तो  दुनिया भर के तमाम सम्मान नारी के आँचल में समाये हैं, इन्हीं में से नोबेल सम्मान भी है। अभी तक 44  महिलाओं को नोबेल पुरस्कार मिला है और उनमें से 13 साहित्य के क्षेत्र में। 

 इस बार वर्ष 2013 के साहित्य के प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार के लिए "लघुकथाओं की मल्लिका" के नाम से विख्यात कनाडा की लेखिका एलिस मुनरो को चुना गया है। मुनरो साहित्य का नोबेल जीतने वाली 13 वीं महिला हैं, जबकि किसी भी क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाली 44वीं महिला हैं। अनूठी कथाकार और मानवीय संवेदनाओं की मर्मज्ञ कलमकार एलीस मुनरो को यह पुरस्कार मानवीय परिस्थितियों की कमजोरियों पर आधारित लघु कथाओं  के लिए प्राप्त हुआ. वर्ष 1901 में शुरु हुए नोबेल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाली एलिस पहली कनाडाई नागरिक हैं. स्वीडिश अकादमी ने एलिस (82वर्ष) को समकालीन लघु कहानी का मास्टर बताकर सम्मानित किया. अकादमी ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी कहानियों की पृष्ठभूमि छोटे शहरों के माहौल में होती है जहां सामाजिक स्वीकार्य अस्तित्व के लिए संघर्ष के कारण अक्सर रिश्तों में तनाव और नैतिक विवाद होता है.

कनाडा के विंघम में 10 जुलाई 1931 में जन्मी मुनरो ने 1950 में पत्रिकाओं में लिखना शरू किया था। साढ़े बारह लाख अमेरिकी डालर के पुरस्कार की घोषणा करते हुए स्वीडिश अकादमी ने मुनरो के लिए कहा, "कुछ आलोचक उन्हें कनाडाई चेखव भी मानते हैं।'' अंग्रेजी के अलावा मुनरो फ्रेंच, स्वीडिश, स्पेनिश और जर्मन में भी लिखती रही हैं। ग्लैमर और मीडिया से दूरी पसंद मुनरो ने 2009 में बताया था कि उनके दिल की बाईपास सर्जरी भी हुई है और वह कैंसर से भी पीडित रही हैं। लेकिन इस क्रांतिकारी लेखिका ने इन सब मुसीबतों का डट कर मुकाबला किया और आज भी अपने कलम की धार कुंद नहीं होने दी है। 

एलिस मुनरो यूँ ही इस मुकाम तक नहीं पहुंचीं बल्कि इसके पीछे एक लम्बी साहित्य यात्रा है। मुनरो का पहला कहानी संग्रह "डांस आफ हैप्पी शेड्स" 1968 मे प्रकाशित हुआ, जबकि उनका ताजा कहानी संग्रह "डीयर लाइफ" पिछले साल वर्ष 2012 में   प्रकाशित हुआ। उनके अन्य कहानी संग्रहों में लाइव्स आफ गल्र्स एंडवीमिन्स (1971) हू डू यू थिंक यू आर (1978), द मून्स आफ जुपिटर (1982), रनअवे (2004), द वियू फ्राम कैसल राक (2006) और टू मच हैप्पीनेस (2009) उल्लेखनीय हैं। उनके कहानी संग्रह हेटशिप, फ्रेंडशिप, कोर्टशिप, लवशिप, मैरिज (2001) पर वर्ष 2006 में "अवे फ्राम हर" नाम से फिल्म भी बनी थी। एलिस मुनरो की कहानियां अक्सर छोटे शहरों के माहौल पर आधारित होती हैं, जहां अस्तित्व की सामाजिक स्वीकार्यता का संघर्ष तनावपूर्ण संबंधों और नैतिक उहापोह को जन्म देता है। ऎसी समस्याएं जो पीढियों के अतंर और महत्वाकांक्षा के टकराव से पैदा होती हैं। 

 वर्ष 2009 में मुनरो को प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार भी मिला था, जबकि तीन बार उन्हें कनाडा के "गवर्नर जनरल अवार्ड" से नवाजा गया है। यह भी अजीब इत्तफाक है कि  मुनरो स्वयं कहानीकार के बदले उपन्यासकार बनना चाहती थीं, पर भाग्य कि नियति उन्हें कहानीकार बना गया।  इसी साल जुलाई में न्यूयार्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "अपनी पहली पांच किताबें लिखते समय मैं प्रार्थना कर रही थी कि काश मैं उपन्यास लिखती। मैं सोचती थी कि जब तक आप उपन्यास नहीं लिखते, लोग आपको लेखक के रूप में गंभीरता से नहीं लेते। यह सोच कर मैं काफी परेशान रहती थी, लेकिन अब कोई भी बात मुझे परेशान नहीं करती। मैं समझती हूं कि अब लोग लघुकथाओं को पहले के मुकाबले अधिक गंभीरता से लेते हैं।

एलिस मुनरो को 10 दिसंबर, 2013  को स्टाकहोम में एक औपचारिक समारोह में 12 . 4 लाख डालर की राशि और पुरस्कार दिया जायेगा. कनाडाई लेखिका एलिस मुनरो ने कहा कि वह यह जानकार काफी आश्चर्यचकित और प्रसन्न हैं कि उन्होंने साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीता है.एलीस ने  कहा, हां मुझे पता था कि मैं दौड़ में हूं लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं जीतूंगी.   लेखिका ने कहा कि उनकी बेटी ने उन्हें जगाते हुए खबर दी कि स्वीडन की नोबेल समिति ने साहित्य पुरस्कार के लिए उन्हें चुना है.

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

पंखे झलते देश के नौनिहाल

सोचिए, गर्मी में आप बैठे हों, फैन और एसी नहीं। कितना अजीब सा लगता है। कभी राजा-महाराजा चला करते थे तो उनके साथ पंखे झलने वालियों का हुजूम भी चला करता था। राजे-महराजे तो चले गए, पर उन जैसे सामंती मानसिकता वाले अधिकारी अभी भी उनकी यादों को जिन्दा किये हुए हैं। हमारे यहाँ सरकारी स्कूलों में अक्सर ऐसा देखने को मिलता था कि गर्मियों में मास्टर जी आराम से बैठकर बच्चों से पंखे झलवा रहे होते। घर में कोई मेहमान आता और लाइट  नहीं रहती तो फिर पंखे झलने के लिए बच्चों की ही ड्यूटी लगती ....खैर ये सब बातें पुरानी हैं। अभी उत्तर प्रदेश के शामली में दौरे पर  गए एक प्रमुख सचिव और जिलाधिकारी को बच्चों  से पंखा झलवाना महंगा पड़ा। मीडिया ने उनकी विकास के दावों की हवा के बीच पंखे झलवाते आकर्षक फोटुयें उतारी।आनन-फानन में राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अफसरों की सामंती मानसिकता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसे अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही भी की जाएगी। अफसरों का अंजाम क्या होगा, यह तो वक़्त बताएगा पर यह तो स्पष्ट है की अभी भी समाज में परम्पराओं और सामंती मानसिकता के नाम पर बहुत कुछ चल रहा है, जिसका संज्ञान लेने की जरुरत है ...!!  

पूरी खबर यहाँ पर देख-पढ़ सकते हैं-

अखिलेश यादव जहां सूबे में छात्रों को लेपटॉप, बेरोजगारों को भत्ता और कन्याओं को कन्या विधा धन बांट रहे हैं वहीं उनके अधिकारी कुछ ऐसा कर रहे हैं जिन्हें देखकर शायद वो भी शर्मशार हो जाए।

शामली के जिलाधिकारी प्रवीण कुमार, उनके ठीक बगल में बैठे हैं सुनील कुमार जो समाज-कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव है। इनके बगल में शामली की सीडीओ वी के सिंह बैठे हैं, इनका नाम है लोकेश कुमार जनाब शामली के सीएमओ हैं। दरअसल अखिलेश राज में अधिकारियों को जब गर्मी लगने लगती है तो वे ये भी भूल जाते हैं कि मासूम बच्चों से काम करवाना कितना बड़ा जुर्म है।

ये तस्वीरें उत्तरप्रदेश के शामली जनपद के लोहिया ग्राम हसनपुर की है और पंखों की हवा खा रहे ये हैं अखिलेश सरकार के अधिकारी जो पहुंचे हैं गांव में विकास कार्यों का निरीक्षण करने। पहले तो इन्होंने गांव के विकास कार्यों का निरीक्षण किया, फिर लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए बैठे उनके बीच मुख्यालय से गांव पहुंचे तो भाग-दौड़ भी थोड़ी ज्यादा हो गई। गांव की गलियों से भी गुजरना पड़ा। इसी वजह से उन्हें बैठते ही तेज गर्मी लगी लेकिन शामियाने में एससी तो चल नहीं सकते थे लिहाजा उनके लिए हाथ के पंखे के इंतजाम किए गए और इसके लिए छोटे बच्चों की ड्यूटी लगाई गई। गर्मी से तर-ब-तर भूखे-प्यासे बच्चे उन्हें पंखे झलते रहे लेकिन अधिकारियों को इन बच्चों पर तनिक भी दया नहीं आई।

अब सवाल ये है कि सूबे के समाज कल्याण के प्रमुख सचिव साहब क्या इसी तरीके से सूबे की जनता का कल्याण करते हैं या फिर ये उनके कार्यो का नमूना भर है। अब देखना ये है अखिलेश यादव अपने इन वरिष्ठ अधिकारियों को बाल श्रम कराने के लिए क्या क्या कोई सजा भी देते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने शामली में अधिकारियों की एक बैठक में बच्चों से कथित रूप से पंखे झलवाने की घटना पर गंभीरता से लेते हुए कहा है कि ‘सामंती’ मानसिकता वाले अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जायेगी.
शामली में अधिकारियों के पीछे खडे़ बच्चों को पंखा झलते दिखाये जाने की घटना पर प्रदेश के मंत्री राजेन्द्र चौधरी ने कहा, ‘मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बच्चों की भावनाओं के प्रति खासे संवेदनशील हैं. उन्हें इस घटना के बारे में बताया जायेगा और सरकार सामंती मानसिकता वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी.’

चौधरी ने कहा कि अधिकारियों की बैठक में बच्चों से पंखे झलवाना एक गंभीर घटना है. यह सरकारी सेवा नियमावली के खिलाफ तो है ही, अधिकारियों की सामंतवादी मानसिकता की भी परिचायक है.

गौरतलब है कि कुछ न्‍यूज चैनलों पर शामली में हुई समाज कल्याण विभाग की बैठक में प्रमुख सचिव सुनील कुमार, जिलाधिकारी तथा अन्य अधिकारियों की एक बैठक में बच्चों को उनके पीछे खडे़ होकर हाथ से पंखे झलते हुए दिखाया गया है.

Courtesy : http://aajtak.intoday.in/story/action-against-officers-who-made-children-fan-them-1-744729.html