आपका समर्थन, हमारी शक्ति

शनिवार, 29 अगस्त 2015

रक्षाबंधन पर्व को नए परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत

रक्षाबंधन त्यौहार की परम्परा बहुत पुरानी है। भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। इसका आरम्भ पत्नी इन्द्राणी द्वारा पति इंद्र को रक्षा सूत्र बाँधने से हुआ। इस त्यौहार का दायरा काफी विस्तृत रहा है। आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। कृष्ण-द्रौपदी, हुमांयू-कर्मवती या सिकंदर-पोरस की कहानी तो सभी ने सुनी होगी, पर आजादी के आन्दोलन में भी कुछ ऐसे उद्धरण आए हैं, जहाँ राखी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में जन जागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया।

राखी का सर्वप्रथम उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है जिसके अनुसार असुरों के हाथ देवताओं की पराजय पश्चात अपनी रक्षा के निमित्त सभी देवता इंद्र के नेतृत्व में गुरू वृहस्पति के पास पहुँचे तो इन्द्र ने दुखी होकर कहा- ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुनकर गुरू वृहस्पति के दिशा-निर्देश पर रक्षा-विधान हेतु इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित समस्त देवताओं की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और अंतत: इंद्र ने युद्ध में विजय पाई। इस प्रकार कहा जा सकता है कि रक्षाबंधन की शुरुआत पत्नी द्वारा पति को राखी बाँधने से हुई। 

एक अन्य कथानुसार राजा बलि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बलि के राज्य की रक्षा के लिये चले गय। तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो बलि ने देवी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बलि ने भगवान विष्णु से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की। 

त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुँची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बाँध दिया और कहा कि- ‘‘भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे, तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटनेवालों से तुम बदला ले सकोगे।’’ 

इसी प्रकार महाभारत काल में भगवान कृष्ण के हाथ में एक बार चोट लगने व फिर खून की धारा फूट पड़ने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी कंचुकी का किनारा फाड़कर भगवान कृष्ण के घाव पर बाँध दिया। कालांतर में दु:शासन द्वारा द्रौपदी-चीर-हरण के प्रयास को विफल कर उन्होंने इस रक्षा-सूत्र की लाज बचायी। द्वापर युग में ही एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘‘राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा।’’

ऐतिहासिक युग में भी सिंकदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

 मुगल काल के दौर में जब मुगल सम्राट हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया। इसी प्रकार न जाने कितनी मान्यतायें रक्षा बन्धन से जुड़ी हुयी हैं।

लोक परम्परा में रक्षाबन्धन के दिन परिवार के पुरोहित द्वारा राजाओं और अपने यजमानों के घर जाकर सभी सदस्यों की कलाई पर मौली बाँधकर तिलक लगाने की परम्परा रही है। पुरोहित द्वारा दरवाजों, खिड़कियों, तथा नये बर्तनों पर भी पवित्र धागा बाँधा जाता है और तिलक लगाया जाता है। यही नहीं बहन-भानजों द्वारा एवं गुरूओं द्वारा स्त्रियों को रक्षा सूत्र बाँधने की भी परम्परा रही है। 

राखी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। कई बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधकर देश की लाज रखने का वचन लिया। 1905 में बंग-भंग आंदोलन की शुरूआत लोगों द्वारा एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधकर हुयी। 









आज रक्षाबंधन पर्व को नए परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इसे भाई-बहन के संबंधों तक सीमित करके देखना और बहन को अशक्त मानते हुए भाई द्वारा रक्षा जैसी दकियानूसी बातों से जोड़ने का कोई औचित्य नहीं रहा। जो समाज बेटियों-बहनों को माँ की कोख में ही खत्म कर देता है, क्या वाकई वहाँ बहनों की रक्षा  का कोई अर्थ है ? आज जिस तरह से समाज में छेड़खानी और महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएँ बढ़ रही हैं, वह यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या ऐसा करने वालों की अपनी बहनें नहीं हैं। रक्षाबंधन के दिन बहन की रक्षा का संकल्प उठाना और घर से बाहर निकलते ही बेटियों-बहनों को छेड़ना और उनके साथ बद्तमीजी करना .... यह दोहरापन रुकना चाहिए। अन्यथा हर बहन अपने भाई से यही कहेगी कि- "मुझ जैसा कोई रो रहा है।  क्योंकि, तुम जैसा कोई उसको छेड़ रहा है।  भैया ! क्या तुम ऐसा कर सकते हो कि हर नारी सुरक्षित रहे।  क्या हर नारी को सम्मान दे सकते हो ताकि वो बिना भय के खुली हवा में साँस ले सके।  तभी सही अर्थों में राखी की शान बढ़ेगी।"  

(चित्र में :  बदलते दौर में राखी का त्यौहार- प्यारी बेटियाँ अक्षिता और अपूर्वा एक दूसरे को राखी बाँधकर रक्षाबंधन पर्व सेलिब्रेट करती हुई। बहनों अक्षिता (पाखी) और अपूर्वा की शानदार राखी)






शनिवार, 22 अगस्त 2015

#100महिलाएं पहल : अब सोशल मीडिया पर बताएं भारत की सबसे प्रभावशाली महिलाओं के बारे में

हमारे जीवन में ऐसी महिलाएं आती रही हैं, जिन्‍होंने कुछ अलग हटकर किया है, जिन्‍होंने हमारा जीवन बदला है, जिन्‍होंने पूरे समाज में अपनी छाप छोड़ी है और बेहतरी के लिए इसमें बदलाव किया है, उनके लिए सिर्फ धन्‍यवाद शब्‍द ही काफी नहीं हैं, अब ऐसी महिलाओं को सम्‍मानित करने की आपकी बारी है, जिन्‍होंने समाज में कुछ अलग किया है। इसी सोच को लेकर केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय ने फेसबुक के साथ '#100महिलाएं पहल' शुरू की है, जिसका उद्देश्‍य देश की उन महिलाओं को पहचान और स्‍वीकृति देना है, जिन्‍होंने समाज में अपनी अलग पहचान बनाई है। इसके लिए लोग 15 जुलाई से 30 सितंबर 2015 के बीच महिला और बाल विकास मंत्रालय के फेसबुक पन्‍ने पर जाकर अपने नामांकन दे सकते हैं और नामांकन फार्म पूरा कर सकते हैं, उन्‍हें अपनी नामित महिला की एक फोटो या वीडियो जमा कराना होगा, जिसमें वह समुदाय के लिए कार्य करती हुई दिखाई देती हो। विजेताओं की घोषणा दिसंबर 2015 में की जाएगी।

 '#100महिलाएं पहल' के अंतर्गत सोशल मीडिया के माध्‍यम से सार्वजनिक मनोनयन के जरिए 100 सफल महिलाओं का चयन करने के लिए एक प्रतियोगिता होगी। इसके लिए  महिला और बाल विकास मंत्रालय के फेसबुक पेज पर लॉग ऑन करना होगा और वीडियो शेयर करके बताना होगा कि जिस महिला को आपने चुना है, उसे भारत की 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं के रूप में क्‍यों सम्‍मानित किया जाना चाहिए। 15 जुलाई 2015 से 30 सितंबर 2015 तक लोग मंत्रालय के फेसबुक पृष्‍ठ http://www.facebook.com/ministryWCD पर जाकर  किसी ऐसी महिला को मनोनीत कर सकते हैं, जिसने समाज पर गहरा असर डाला हो और समाज को बेहतर बनाया हो। शीर्ष 200 प्रविष्टियों पर 7 नवंबर 2015 से वोटिंग शुरू होगी, जिस पर एक प्रतिष्ठित ज्‍यूरी निर्णय लेगी, विजेताओं को गणतंत्र दिवस के आस-पास मंत्रालय के स्‍वागत समारोह में आमंत्रित किया जाएगा।

 वाकई लोग रोजाना फेसबुक पर उन मुद्दों की चर्चा करते हैं, जो उनके लिए बेहद महत्‍व रखते हैं, ऐसे में यह एक अवसर है कि समाज में कुछ अलग करने वाली महिलाओं की प्रशंसा की जाए। इस पहल को  भारत में महिलाओं को पहचान दिलाने के अवसर रूप में भी देखा जाना चाहिए !!

शनिवार, 15 अगस्त 2015

हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा


आजादी के पर्व का जश्न आते ही यह गीत अनायास ही होठों पर आ जाता है।  स्कूली दिनों से ही यह राष्ट्र भक्ति गीत सुनते, सुनाते और गुनगुनाते आ रहे हैं। यह तो नहीं पता कि यह खूबसूरत गीत किसने लिखा, पर जिन्होंने भी लिखा लाजवाब।  आज एक बार फिर से इस गीत को आप सभी के साथ शेयर करते हुए प्रसन्नता हो रही है। इसके रचयिता का नाम पता हो तो जरूर लिखियेगा !!

हिन्द देश का प्यारा झंडा ऊँचा सदा रहेगा
तूफान और बादलों से भी नहीं झुकेगा
नहीं झुकेगा, नहीं झुकेगा, झंडा नहीं झुकेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

केसरिया बल भरने वाला सदा है सच्चाई
हरा रंग है हरी हमारी धरती है अँगड़ाई
कहता है यह चक्र हमारा कदम कभी नहीं रुकेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

शान नहीं ये झंडा है ये अरमान हमारा
ये बल पौरुष है सदियों का ये बलिदान हमारा
आसमान में फहराए या सागर में लहराए
जहाँ-जहाँ ये झंडा जाए यह सन्देश सुनाए
है आज़ाद हिन्द ये दुनिया को आज़ाद करेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

नहीं चाहते हम दुनिया को अपना दास बनाना
नहीं चाहते हम औरों के मुँह की रोटी खा जाना
सत्य न्याय के लिए हमारा लहू सदा बहेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

हम कितने सुख सपने लेकर इसको फहराते हैं
इस झंडे पर मर मिटने की कसम सभी खाते हैं
हिन्द देश का यह झंडा घर-घर में लहराएगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

- आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 






Sand artist Sudarsan Pattnaik creates a sand sculpture on Independence Day at Puri beach of Odisha on Thursday. (PTI Photo)

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

नारी शक्ति ने पहुँचाया नासा के 'न्यू हॉरिजन' को प्लूटो के पास

महिलाएं समुद्र से लेकर अंतरिक्ष तक सफलता की नई इबारतें लिख रही हैं।  यह सिर्फ जुमला भर नहीं है बल्कि ठोस हकीकत है। पिछले जुलाई माह में अमेरिकी एजेंसी नासा के  न्यू हॉरिजन ने सौर मंडल के आखिरी ज्ञात बौने ग्रह के नजदीक से गुजर कर इतिहास रच दिया। यह घटना जुलाई माह में हुई लेकिन एक इतिहास जमीं पर भी रचा गया। यह पहला अंतरिक्ष मिशन था जिसमें सबसे अधिक महिलाओं की भागीदारी थी और उनकी वैज्ञानिक क्षमता से यह सफलता हाथ लगी। 

इस समय न्यू हॉरिजन की टीम में करीब 200 वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। लेकिन विगत एक दशक में हजारों की संख्या में इंजीनियर, अंतिरिक्ष वैज्ञानिकों ने काम किया। लेकिन यान को प्लूटो के नजदीक ले जाने और ग्रह के साथ उसके पांच चंद्रमाओं को खंगालने का काम जो फ्लाईबाई टीम देख रही थी, उसकी एक चौथाई सदस्य महिलाएं थीं। एस्ट्रोफिजिस्ट किबर्ले इनिको जिन्होंने न्यू हॉरिजन मिशन के लिए कई उपकरणों को बनाया व संचालित किया कहती हैं कि लोग मानते हैं कि महिलाएं केवल सहयोगी की भूमिका में होंगी। लेकिन सच्चाई है कि कई बार नियंत्रण कक्ष में वह अकेली होती थी और मिशन से जुड़ी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वाह करती थी।

मिशन से जुड़ी महिला वैज्ञानिकों को भरोसा है कि एक दिन वह इस तरह के मिशनों को अंजाम देने के मामले में बहुमत में होंगी। इनिको कहती है कि वह अब तक चार मिशनों का हिस्सा बन चुकी हैं। अपने अनुभव से कह सकती हैं कि महिलाओं की संख्या बढ़ रही है और इससे उनमें और आत्मविश्वास आएगा। उन्होंने कहा वह बेहतर स्थिति होगी जब पुरुषों से अधिक नहीं तो कम से कम बराबर महिलाएं नियंत्रण कक्ष में हो, क्योंकि एक या दो की संख्या में होने से वे खुद को सहज महसूस नहीं करती हैं। 

भेदभाव हकीकत 
इनिको ने स्वीकार किया है कि महिला वैज्ञानिकों को लेकर पूर्वाग्रह है। उन्होंने बताया कई बार उनसे सचिव जैसा व्यवहार करते हुए नोट तैयार करने को कहा गया। लेकिन इनिको ने पूरे आत्मविश्वास से इसका प्रतिकार करते हुए कहा कि वह अपने लिए नोट बना रही हैं ना कि उनके लिए। गौरतलब है कि वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित येल यूनिवर्सिटी ने भी अपने शोध में पाया था कि महिला वैज्ञानिकों के साथ भेदभाव होता है और उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम तनख्वाह दी जाती है। 

इनके हाथों में नेतृत्व 
- फ्रान बेगनल: पार्टिकल एवं प्लाजमा विज्ञान टीम की प्रमुख, वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक होने के साथ यूनिवर्सिटी ऑफ कोलरेडो की सेवानिवृत्त प्रोफेसर 
- एलिस बाउमैन: मिशन संचालन प्रबंधन, न्यू हॉरिजन के सबसे जटिल समय में मिशन संचालन केंद्र की संभाली, पल-पल के आंकड़ों पर रखी नजर 
- टिफने फिनले: विज्ञान संचालन टीम की प्रबंधन, इस टीम की जिम्मेदारी यान द्वारा किए जाने वाले वैज्ञानिक शोधों की प्राथमिकता तैय करनी थी 
- यानपिंग ग्यू: मिशन डिजाइन की नेता, यान के रास्ते को तैय करना खासतौर पर बृहस्पति ग्रह के गुरुत्वाकर्षण से बचाकर यान को आगे भेजना बड़ी चुनौती 

बुधवार, 29 जुलाई 2015

जन्मदिन की ख़ुशी

 आखिर फिर से हमारा जन्मदिन आ गया.… 30 जुलाई।  साल में एक ही बार तो आता है, पर मजबूर कर जाता है एक गहन विश्लेषण के लिए कि क्या खोया-क्या पाया इस एक साल में...और फिर दुगुने उत्साह के साथ लग जाती हूँ आने वाले दिनों के लिए. न जाने कितनी जगहों पर अपना जन्मदिन सेलिब्रेट करने का सौभाग्य मिलेगा। जीवन साथी कृष्ण कुमार यादव जी, बेटियाँ अक्षिता (पाखी) और अपूर्वा मेरे हर जन्मदिन को यादगार बनाते हैं।  इनके बिना तो सब कुछ सूना है। 

गाजीपुर (उप्र) से आरम्भ हुआ यह सफर विवाह पश्चात लखनऊ, कानपुर, पोर्टब्लेयर, इलाहाबाद के बाद अब सपरिवार जोधपुर में। कभी समुद्र का किनारा, तो कभी गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती का अद्भुत संगम और अब मरू स्थली कहे जाने वाले जोधपुर में। अब लगता है कि पहाड़ों पर भी जन्मदिन मना लेना चाहिए। ख़ैर, इसी बहाने पर्यटन के साथ-साथ विभिन्न जगहों की संस्कृति, लोकाचार और वहां के लोगों से भी रूबरू होने का मौका मिलता है।  हर पल हम कुछ सीखते हैं और कहीं-न-कहीं लोगों को सीखते भी हैं। 



ब्लागिंग जगत में आप सभी के स्नेह से सदैव अभिभूत रही हूँ. जीवन के हर पड़ाव पर आप सभी की शुभकामनाओं और स्नेह की धार बनी रहेगी, इसी विश्वास के साथ.... !!

प्रेरणा पुंज बने रहेंगे डॉ. कलाम

देश के महान वैज्ञानिक एवं वास्तविक अर्थों में एक महान पुरुष व जनता के राष्ट्रपति कहे जाने वाले डॉ. कलाम के निधन से पूरा देश स्तब्ध है| डॉ. कलाम भले ही दूसरे लोक में चले गए पर उनके दिखाए रास्ते सदियों तक लोगों के लिए प्रेरणा पुंज बने रहेंगे। उनके कुछ प्रसिद्ध कथन सदैव प्रासंगिक और जीवन्त रहेंगे-

1. सपने सच हों इसके लिए सपने देखना जरूरी है.

2. छात्रों को प्रश्न जरूर पूछना चाहिए. यह छात्र का सर्वोत्तम गुण है.

3. युवाओं के लिए कलाम का विशेष संदेशः अलग ढंग से सोचने का साहस करो, आविष्कार का साहस करो, अज्ञात पथ पर चलने का साहस करो, असंभव को खोजने का साहस करो और समस्याओं को जीतो और सफल बनो. ये वो महान गुण हैं जिनकी दिशा में तुम अवश्य काम करो.

4. अगर एक देश को भ्रष्टाचार मुक्त होना है तो मैं यह महसूस करता हूं कि हमारे समाज में तीन ऐसे लोग हैं जो ऐसा कर सकते हैं. ये हैं पिता, माता और शिक्षक.

5. मनुष्य को मुश्किलों का सामना करना जरूरी है क्योंकि सफलता के लिए यह जरूरी है.

6. महान सपने देखने वालों के सपने हमेशा श्रेष्ठ होते हैं.

7. जब हम बाधाओं का सामना करते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे भीतर साहस और लचीलापन मौजूद है जिसकी हमें स्वयं जानकारी नहीं थी. और यह तभी सामने आता है जब हम असफल होते हैं. जरूरत हैं कि हम इन्हें तलाशें और जीवन में सफल बनें.

8. भगवान उसी की मदद करता है जो कड़ी मेहनत करते हैं. यह सिद्धान्त स्पष्ट होना चाहिए.

9. हमें हार नहीं माननी चाहिए और समस्याओं को हम पर हावी नहीं होने देना चाहिए.

10. चलो हम अपना आज कुर्बान करते हैं जिससे हमारे बच्चों को बेहतर कल मिले.

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

ऐसे बनीं आज़मगढ़ की अंजुम आरा, देश की दूसरी मुस्लिम महिला आईपीएस

सिविल सेवाओं में महिलाएं नित्य नए मुकाम गढ़ रही हैं।  समाज के हर वर्ग की महिलाओं का प्रतिनिधित्व आईएएस, आईपीएस और अलाइड सेवाओं में बढ़ रहा है। निश्चितत: इंसान मन में कुछ करने की ठान ले तो दूसरों के लिए मिसाल कायम कर सकता है। ऐसी ही एक मिसाल हैं देश की दूसरी मुस्लिम आईपीएस महिला अंजुम आरा, जिन्होनें तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए ये मुकाम हासिल किया। इससे पहले मुंबई की गुजरात कैडर की सारा रिकावी ने पहली मुस्लिम महिला आईपीएस बनने का गौरव हासिल किया था। मुस्लिम समाज में जहां लड़कियों को बुर्के में रहने के लिए बाध्य किया जाता रहा है, वहीं पुराने रीति रिवाजों से उठकर देश की दूसरी मुस्लिम आईपीएस बनकर अंजुम आरा ने देश में एक नया मुकाम हासिल किया है। 

 उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गांव कम्हरिया में जन्मी अंजुम हालांकि शहर में पढ़ी नहीं लेकिन उनके पिता अयूब शेख की शिक्षा-दीक्षा इसी गांव में हुई।  पिता अयूब शेख अभियंत्रण सेवा में हैं, मां गृहिणी है। 
वर्ष 1985 में पिता अयूब को ग्रामीण अभियंत्रण सेवा में अवर अभियंता की नौकरी मिली। पहली तैनाती सहारनपुर हुई तो वह वहीं बस गए। अंजुम अपने भाइयों-बहनों में दूसरे नम्बर की है। अंजुम की प्राथमिक शिक्षा गंगोह, सहारनपुर  स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में हुई। सहारनपुर से हाईस्कूल एचआर इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक की प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल करने के बाद  वह प्रशासनिक सेवा की तैयारियों में जुट गयी। कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने आइपीएस-2011 बैच की परीक्षा उत्तीर्ण कर अपना मुकाम हासिल किया। 

यह सफर इतना आसान भी नहीं था।  अंजुम ने जब नौकरी की इच्छा अपने परिवार वालों के सामने रखी तो संगे संबंधियों रिश्तेदारों ने इस पर आपत्तियां जतानी शुरू कर दी। संबंधियों को उसका घर से निकलना तक गंवारा नहीं था। परिवार में भी बुर्का प्रथा को महत्व दिया जाता था। लहरों से डर के नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती को आत्मसात करते हुए अंजुम अपनी राह पर चलती रहीं और रिश्तेदारों के तमाम विरोधों के बीच उनके पिता ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। अंतत: कड़ी मेहनत और लगन से 2011 में उनका चयन आईपीएस में हुआ।  ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उन्हें मणिपुर कैडर मिला। कुछ समय वहां नौकरी करने के बाद उनकी तैनाती हिमाचल की राजधानी शिमला में बतौर एएसपी हुई। अंजुम के पति युनूस भी आईएएस अधिकारी हैं।  यह वही आईएएस हैं जिन पर सोलन के नालागढ़ में कुछ खनन माफिया ने ट्रैक्टर चलाने की कोशिश की थी। 

 अंजुम अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपने पिताजी  को देती हैं। अंजुम का कहना है कि पेरेंट्स को पुरानी प्रथाओं को छोड़कर लड़कियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देनी चाहिए। वे तमाम रूढ़ियों को पीछे छोड़ते हुए नित नए मुकाम के लिए तत्पर हैं और अब कइयों के लिए प्रेरणास्रोत भी !! 

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए संदीप कौर की अनूठी पहल : गर्भ में आते ही ले लेती हैं बेटियों को गोद

बेटियाँ भले ही समाज में अपनी प्रतिभा से रोशनी फैला रही हों, पर उनकी उपलब्धियों को सामाजिक मान्यता मिलने में अभी भी देरी है। बेटियाँ लाख सफलता के नए मुकाम रचें, पर समाज की मानसिकता अभी भी उन्हें परिवार में दोयम स्थान ही देती है। ऐसी स्थिति में,   जिस घरमें पहले से दो बेटियां हों वहां तीसरे गर्भ का मतलब एक बेटा ही होता है। अगर यही गर्भ बेटी बनकर सामने आए तो उसे बदकिस्मत कहते हैं। पर इस बदकिस्मती को किस्मत में बदलने का कार्य करती हैं  संदीप कौर। 

संयोगवश, अगमजोत भी ऐसे ही परिवार की तीसरी बेटी बनने जा रही थी, जहां उसे दुनिया में न आने देने के रास्ते खोजे जा रहे थे। लेकिन जैसे ही संदीप कौर को पता चला, वो परिवार से मिलीं और गर्भ में बेटी को खत्म न करने को कहा। बोलीं- उसे इस दुनिया में आने दो, मैं बनूंगी उसकी मां, मैं पालूंगी उसे।  अगमजोत आज पौने दो साल की है। हरदीप कौर, सिमरदीप कौर की कहानियां भी ऐसी ही हैं, जिन्हें संदीप ने गोद लेकर उन अजन्मी बेटियों को दुनिया में आने की राह खोल दी, जो कोख में ही मार दी जाती हैं। संदीप कौर ऐसी 80 बेटियों को गोद ले चुकी हैं। भ्रूण हत्या के खिलाफ इस अनोखी पहल की शुरूआत करते हुए संदीप 260 बेटियां अपना चुकी हैं। इनमें बेसहारा और अनाथ बच्चियां भी शामिल हैं। 

बेटियों के प्रति इतनी सुंदर मानवीय भावना रखने वाली संदीप कौर के बारे में यह सुनना अजीब सा लगता है कि आतंकवाद के दौर में वे खालिस्तान लहर का हिस्सा रहीं। उनके पति धर्म सिंह काश्तीवाल बब्बर खालसा के सक्रिय सदस्य थे, जो पुलिस एनकाउंटर में मारे गए। संदीप कौर को हथियार सप्लाई करने के आरोप में टाडा के तहत जेल जाना पड़ा था। 1996 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने सेवा का रास्ता चुना और ट्रस्ट की स्थापना की। 

गुरुसाहिब के सिद्धांत ‘सो क्यों मंदा आखिए, जित जम्मे राजान’ को लेकर चलने वाली संदीप कौर अमृतसर के सुल्तानविंड गांव में ‘भाई धर्म सिंह खालसा ट्रस्ट’ चला रही हैं। वे कहती हैं कि मुझे जहां भी ऐसा सुनाई पड़ता है कि अबॉर्शन होने वाला है, मैं तुरंत वहां पहुंच जाती हूं। संदीप कौर कन्याभ्रूण हत्या के खिलाफ कई परिवारों से मिलीं  अौर उन्हें समझाया और उनका यह अभियान निरंतर जारी है। उनके समझाने  का आलम यह हुआ क़ि  कई बार तो बेटी पैदा होने के बाद ज्यादातर परिवारों के मन में मोह जाग जाता है और वह उसे अपना लेते हैं। कुछेक परिवार ऐसे होते हैं जो बच्ची के ट्रस्ट में जाने के बाद वापस ले जाते हैं। फ़िलहाल, ट्रस्ट में पली-बढ़ी बच्चियां आज हॉस्टल में पढ़ाई कर ही हैं। इनमें कई लड़कियां बेसहारा हैं तो कई के मां-बाप मर चुके हैं। पर संदीप कौर के अंदर का मातृत्व अभी भी जिन्दा है और उनके इस हौसले पर ही टिकी है तमाम उन बेटियों की आँखों का सपना, जिसे उनके माँ-पिता गर्भ में ही ख़त्म कर देना चाहते थे !!

सोमवार, 20 जुलाई 2015

डॉयचे वेले की बेस्ट ऑफ एक्टिविज्म प्रतियोगिता में 'पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड' श्रेणी के तहत 'शब्द-शिखर' बना हिंदी का सबसे लोकप्रिय ब्लॉग


डॉयचे वेले की बॉब्स - बेस्ट ऑफ ऑनलाईन एक्टिविज्म प्रतियोगिता-2015  में इंटरनेट यूजरों ने पिछले दिनों 'पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड' श्रेणी में  'शब्द-शिखर' (www.shabdshikhar.blogspot.in/) ब्लॉग  को हिंदी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में चुना। हिंदी सहित 14 भाषाओं में पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड के तहत एक-एक सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग चुना गया, जिसमे कुल मिला कर करीब 30,000 वोट डाले गए। ज्यूरी ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि, ''आकांक्षा यादव साहित्य, लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं।  उन्हें हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाली शुरुआती महिलाओं में गिना जाता है।  आकांक्षा महिला अधिकारों पर लिखना पसंद करती हैं।  अपने ब्लॉग में वह अपने निजी अनुभव और कविताएं भी शामिल करती हैं।''  


 गौरतलब है कि द बॉब्स – बेस्ट ऑफ आनलाइन एक्टिविज्म के जरिए डॉयचे वेले 2004 से एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है जो ऐसे ब्लॉगरों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को सम्मानित करती है जो इंटरनेट से जुड़ कर अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। प्रतियोगिता के लिए 14 सदस्यों वाली अंतरराष्ट्रीय जूरी ने विभिन्न वर्गों में 112 वेबसाइटों को नामांकित किया। इस साल 4,800 से ज्यादा वेबसाइटों और ऑनलाइन प्रोजेक्टों के सुझाव बॉब्स की टीम तक पहुंचे। विजेताओं को 23 जून को जर्मनी के बॉन शहर में होने वाले ग्लोबल मीडिया फोरम के दौरान पुरस्कृत किया गया।  इस अवसर पर कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाने पर हमारा प्रमाण-पत्र डॉयचे वेले द्वारा डाक से भेजा गया, जिसे आप सभी के साथ साझा करते हुए प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है !!

THE BOBS : Best of Online Activism


Winner Certificate
Best of Online Activism 2015

Category
People's Choice for Hindi

Awarded to
Shabd Shikhar
Represented by Akanksha Yadav

Deutsche Welle would like to recognize
Shabd Shikhar for outstanding achievements
in online activism as a winner of The Bobs 2015.



Peter Limbourg
Director General of Deutsche Welle

June 23, 2015



शनिवार, 4 जुलाई 2015

आईएएस परीक्षा-2014 के रिजल्ट घोषित, टॉप फाइव में से चार लड़कियाँ


संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आज घोषित किए गए प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा के नतीजों में महिलाओं ने शीर्ष तीन स्थान हासिल किए हैं। यूपीएससी द्वारा घोषित नतीजों के अनुसार इरा सिंघल ने पहला, रेणु राज ने दूसरा और निधि गुप्ता ने तीसरा स्थान हासिल किया।


दिल्ली की रहने वाली ईरा और निधि दोनों ही भारतीय राजस्व सेवा (सीमा शुल्क और केंद्रीय आबकारी) अधिकारी हैं जबकि रेणु पेशे से डॉक्टर हैं और केरल की रहने वाली हैं। इरा ने कहा, ‘‘मैं सच में बहुत खुश हूं। मुझे विश्वास नहीं हो रहा। मैंने बस परीक्षा की तैयारी की थी। शारीरिक रूप से निशक्त होने के बावजूद इरा ने सामान्य श्रेणी में परीक्षा में पहला स्थान किया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आईएएस अधिकारी बनना चाहती थी। मैं शारीरिक रूप से निशक्त लोगों के लिए कुछ करना चाहती हूं।’’

अपने पहले ही प्रयास में परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल करने वाली रेणु राज ने तिरूवनंतपुरम से कहा, ‘‘मैं नतीजे के बारे में जानकार बहुत खुश हूं। मैं पिछले एक साल से परीक्षा की तैयारी कर रही थी।’’ केरल के कोल्लम जिले के एक अस्पताल में काम करनी वाली रेणु कोट्टयम की रहने वाली हैं।

तीसरा स्थान हासिल करने वाली निधि ने कहा कि यह उनके लिए एक गर्व का पल है। वर्तमान में सहायक सीमा शुल्क एवं केंद्रीय आबकारी आयुक्त के तौर पर काम कर रही निधि ने कहा, ‘‘यह सच में एक गर्व का पल है। मैंने कड़ी मेहनत की और आखिरकार उसका फल मिला।’’
यूपीएससी के अनुसार विभिन्न केंद्रीय सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के लिए कुल 1,236 उम्मीदवारों की सिफारिश की गयी है जिनमें 590 सामान्य श्रेणी, 354 अन्य पिछड़ा वर्ग, 194 अनुसूचित जाति और 98 अनुसूचित जनजाति के हैं। सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से कुल 1,364 पद भरे जाएंगे। 254 अन्य उम्मीदवार प्रतीक्षा सूची में हैं।

यूपीएससी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यूपीएएसी ने पहली बार व्यक्तित्व परीक्षण या साक्षात्कार के खत्म होने के चौथे दिन ही नतीजे घोषित कर दिए। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा तीन चरणों – प्रारंभिक, मुख्य एवं साक्षात्कार – में संपन्न होती है। इस प्रतिष्ठित परीक्षा के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) सहित कई अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है।

देश भर के 59 केंद्रों में 2,137 स्थानों पर पिछले साल 24 अगस्त को सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की गई थी। करीब 9.45 लाख उम्मीदवारों ने इसके लिए आवेदन किया था पर करीब 4.51 लाख उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए।

अधिकारी ने बताया कि इनमें से 16,933 उम्मीदवारों को मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया था। मुख्य परीक्षा का आयोजन पिछले साल दिसंबर में किया गया था जिसमें 16,933 में से 16,286 उम्मीदवार ही शामिल हुए।

उन्होंने बताया कि सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के नतीजे इस साल 13 मार्च को घोषित किए गए थे। 3,308 लोगों को साक्षात्कार में शामिल होने के योग्य घोषित किया गया। इनमें से 3,303 उम्मीदवार साक्षात्कार में शामिल हुए। साक्षात्कार का आयोजन 27 अप्रैल से 30 जून तक हुआ। अधिकारी ने कहा, ‘‘उम्मीदवारों और केंद्रों या उप केंद्रों की संख्या के लिहाज से यह यूपीएससी द्वारा आयोजित की गयी अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा थी।’’

शुक्रवार, 19 जून 2015

देश की पहली शत प्रतिशत नेत्रहीन महिला आईएफएस ऑफिसर बनी बेनो जेफाइन

मन में हौसला हो तो कुछ भी असंभव नहीं है।  इसे सच कर दिखाया है चेन्नई की  25 वर्षीय बेनो जेफाइन ने। बेनो जेफाइन 69 साल पुरानी भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) की परीक्षा पास करने वाली पहली शत प्रतिशत दृष्टिहीन छात्रा हैं।  उन्होंने 2013-14 सिविल सेवा परीक्षा में 343 रैंक प्राप्त किया है।

 वर्तमान में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में प्रॉबेशनरी ऑफिसर (पीओ) के तौर पर कार्यरत  बीनो जेफाइन अपने पिता ल्यूक एंथनी चार्ल्स के साथ रहती है जो कि एक रेलवे अधिकारी हैं। उनकी माँ एक गृहिणी है। उनके भाई, ब्रूनो जेवियर, कनाडा में एक इंजीनियर के रूप में काम करता है। इस मुकाम तक पहुँचने के लिये बीनो ने ब्रेल पर अपनी निर्भरता छोड़कर जॉब एक्सेस विद स्पीच (JAWS) नाम के सॉफ्टवेयर की मदद ली। इस सॉफ्टवेयर की मदद से दृष्टिबाधित लोग कंप्यूटर स्क्रीन पढ़ सकते हैं। इस सॉफ्टवेयर को स्मार्टफोन से भी एक्सेस किया जा सकता है। बीनो को उनकी मां किताबें और अखबार पढ़कर सुनाया करती थीं। 

अपने नाम के पीछे छुपे हुए राज को वह कुछ यूँ खोलती हैं कि बेनो का मतलब होता है  भगवान की बेटी और जेफाइन मतलब होता है छिपा हुआ खजाना। वाकई उन्होंने अपने नाम को सच कर दिखाया। बेनो का बचपन सामान्य तरीके से बीता। उनके परिवार में किसी ने भी कभी उन्हें विकलांग होने का अहसास नहीं दिलाया।  लिटिल फ्लावर कॉन्वेंट स्कूल से उनकी आरम्भिक शिक्षा आरम्भ हुई तो अध्यापकों ने  हर मोड़ पर सहयोग किया।  बचपन में बहुत बोलने वाली बेनो ने अपनी पहली स्पीच यूकेजी में जवाहरलाल नेहरू के ऊपर दी थी और  प्रथम पुरस्कार हासिल किया था। शुरुआती दिनों में,  बेनो को जो भी बोलना होता था, वह उसे पहले से कॉपी में लिख देती थी फिर उसे याद करती थी।  छठीं कक्षा में आने के बाद उन्होंने एक्सटेम्पोर बोलना शुरू कर दिया।  पढ़ाई के साथ-साथ बेनो को सदैव से बहुत पसंद है।  स्कूल के बाद,  अंग्रेजी साहित्य में अपनी डिग्री प्राप्त करने के लिए बेनो ने स्टेला मैरिस कॉलेज में दाखिला  लिया और लोयोला कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। एक अंधे स्कूल से सामान्य कॉलेज जाने में बेनो को कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि घर पर या बाहर किसी ने भी उनके साथ अंधों के जैसा बर्ताव नहीं किया था। इससे उन्हें एक सामान्य जीवन जीने का अत्मविश्वास मिला।

पूर्व राजनायिकों ने नेत्रहीन कैंडिडेट्स को आईएफस में भर्ती देने का फैसला लिया, जिसका फायदा बीनो को मिला। पूर्व राजनायिक टी.पी. श्रीनिवासन कहते हैं, 'यह एक अच्छा और उदार फैसला है। बीनो को अपनी ड्यूटी निभाने में कुछ दिक्कतें जरूर होंगी लेकिन उसने अब तक बहुत अच्छा परफॉर्म किया है। मुझे यकीन है कि वह यहां भी शानदार प्रदर्शन करेगी। वैसे भी आईएएस अधिकारियों को जितना फील्ड वर्क करने की जरूरत होती है उतनी आईएफएस अधिकारियों को नहीं। आईएफएस अधिकारियों को स्टडी और अनैलेसिस करने में गाइडेंस देना होता है।'


बेनो  जेफाइन को केंद्र सरकार से नियुक्ति आदेश मिल चुका है। उन्हें 60 दिन के भीतर कामकाज संभालना है। जेफाइन ने कहा कि उन्हें बताया गया कि नरेंद्र मोदी सरकार की प्रोत्साहित करने वाली नीति से उन्हें उनकी नियुक्ति में आने वाले किसी संभावित प्रक्रियात्मक विलंब को पार पाने में मदद मिली। उन्होंने प्रधामंत्री को धन्यवाद देते हुए कहा, मुझे बताया गया कि मैं यद्यपि आईएफएस के लिए पात्र थी लेकिन पूरी तरह से दृष्टिहीन को इससे पहले यह पद नहीं दिये गए। फिलहाल इस उपलब्धि के बाद हर संस्थान जेफाइन को प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में बुला रहा है और अपने विद्यार्थियों को उनसे रूबरू करा रहा है, शायद बेनो  जेफाइन कईयों के लिये मिसाल साबित हों। हो सकता है उनकी आँखों में रोशनी न हो, पर यदि मन में जज्बा और आँखों में सपने देखने का साहस हो तो कोई भी मंजिल आसान जरूर बन जाती है !!