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बुधवार, 25 जुलाई 2012

हमेशा जीवंत रहेंगी कैप्टन लक्ष्मी सहगल

पीढ़ियों का अन्तराल महत्वपूर्ण नहीं होता, यदि पुरातन पीढ़ी वर्तमान परिवेश में भी अपनी प्रासंगिकता बनाये रहें. ऐसे ही पीढ़ी की एक जिंदादिल महिला कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल थीं. उन्हें किताबों में पढ़ा, चित्रों में देखा, पोर्टब्लेयर गया तो वहां सेलुलर जेल की दीवारों पर देखा और कानपुर में रहने के दौरान एक साक्षात्कार के लिए उनसे रू-ब-रू भी हुआ. उनके बारे में इतना कुछ सुन रखा था कि कहीं-न-कहीं उनके व्यक्तित्व से आतंकित भी महसूस करता. पर जब पहली बार मिला तो इतना निश्छल और ममत्व भरा आत्मीय व्यवहार देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि यह आजाद हिन्द फौज की वही कर्नल हैं, जिन्होंने अपने साहस और बुद्धिमता के बल पर न सिर्फ आजादी को परवान पर चढ़ाया बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को आजादी की जंग में नारी-शक्ति में अटूट विश्वास करने पर बाध्य भी कर दिया. देश की आजादी के बाद हर किसी ने उसे भुनाया और सत्ता की चांदी की होड़ में दिल्ली में बसकर अपनी पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना सुनिश्चित किया, पर 98 वर्षीया यह डाक्टर जीवन के अंतिम समय तक (24 जुलाई, 2012) लोगों का इलाज करती रहीं. देश-सेवा को भुनाने की बजाय उन्होंने जीवन के ठाटबाट को त्याग कर दलितों, शोषितों, मेहनतकशों, उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए और मानव-सेवा के पीछे अपना पूरा जीवन ही लगा दिया. उन्होंने लाखों लोगों को स्वास्थ्य, सुरक्षा, साहस व आत्मविश्वास की नेमत दी । कानपुर शहर में उन्होंने दंगों के दौरान दोनों संप्रदायों के बीच जांबाजी से जाकर उन्हें समझाने के साथ घायलों का इलाज करके मानवता की सेवा की जो मिसाल रखी वह हमेशा आने वाले पीढि़यों को प्रेरित करती रहेगी। वयोवृद्ध कैप्टन डॉ.लक्ष्मी सहगल को गरीब मरीजों का इतना ध्यान रहता था कि दिल का दौरा पड़ने से करीब 15 घंटे पहले तक अपने शहर में स्थित आर्य नगर के क्लीनिक में बैठकर मरीजों को देख रही थीं। मजदूर आदोलनों में सड़क पर सोने से लेकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने तक डा. लक्ष्मी सहगल का पूरा जीवन संघर्ष, त्याग व देश भक्ति की अप्रतिम गाथा है।

डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 24 अक्तूबर 1914 को एक परंपरावादी तमिल परिवार में मद्रास उच्च न्यायालय के सफल वकील डॉ. एस. स्वामिनाथन और समाज सेविका व स्वाधीनता सेनानी अम्मुकुट्टी के घर हुआ था. घर पर बेटी के रूप में लक्ष्मी का आगमन हुआ तो माता-पिता ने उसका नाम ही रख दिया- लक्ष्मी स्वामिनाथन। बचपन से ही कुशाग्र लक्ष्मी ने 1930 में पिता के देहावसान का साहसपूर्वक सामना करते हुए 1932 में विज्ञान में स्नातक परीक्षा पास की। 1938 में उन्होने मद्रास मेडिकल कालेज से एम्.बी.बी.एस. किया और अगले वर्ष 1939 में जच्चा-बच्चा रोग विशेषज्ञ बनीं। कुछ दिन भारत में काम करके 1940 में वे सिंगापुर चली गयीं।

लक्ष्मी बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित थीं और जब गाँधी जी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो उन्होंने उसमें सक्रियता के साथ भाग लिया. उनका यह देश-प्रेम सिंगापुर जाने के बाद भी ख़त्म नहीं हुआ. सिंगापुर में उन्होने न केवल भारत से आये आप्रवासी मज़दूरों के लिये निशुल्क चिकित्सालय खोला बल्कि भारत स्वतंत्रता संघ की सक्रिय सदस्या भी बनीं। इतिहास गवाह है कि 1941 में जब युद्ध के बादल छा रहे थे, डा. लक्ष्मी सिंगापुर में मलाया के जंगलों में मजदूरों का इलाज कर रहीं थीं। युद्ध की आशंका से लोग अपने देश लौटने लगे परंतु लक्ष्मी नहीं लौटीं और युद्ध के दौरान वहीं भूमिगत रह कर घायल सैनिकों की सेवा करती रहीं। युद्ध की विभीषिका से रूबरू हुईं डा. लक्ष्मी को अनुभव हुआ कि अंग्रेजों के मुकाबले जापानियों का भारतीयों के प्रति व्यवहार ज्यादा सहानुभूति पूर्ण था। वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अंग्रेज़ों ने सिंगापुर को जापानियों को समर्पित कर दिया तब उन्होंने आहत युद्धबन्दियों के लिये काफी काम किया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ही जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो उसी समय ब्रिटिश सेना के बहुत से भारतीय सैनिकों के मन में अपने देश की स्वतंत्रता के लिये काम करने का विचार उठ रहा था।19 फरवरी 1942 को नेता सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन किया।ऐसे ही माहौल में 2 जुलाई 1943 को सिंगापुर की धरा पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का ऐतिहासिक पदार्पण हुआ. नेता जी के विचारों से लक्ष्मी काफी प्रभावित हुईं और अंतत: उन्होंने इस पवित्र अभियान में नेताजी से अपने को भी शामिल करने की इच्छा जाहिर की. पहले तो नेताजी कुछ हिचकिचाए पर लक्ष्मी के बुलंद इरादों को देखकर उन्हें हामी भरनी ही पड़ी. उन्होंने 20 महिलाओं को तैयार करके 303 बोर की राइफलों के साथ नेताजी का गार्ड आफ आनर किया तो नेताजी ने उन्हें महिला रेजीमेंट की बागडोर सौंप दी। फिर क्या था, आज़ाद हिन्द फौज़ की पहली महिला रेजिमेंट के विचार ने मूर्तरूप लिया जिसका नाम वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में रानी झाँसी रेजिमेंट रखा गया। 22 अक्तूबर 1943 को डॉ0 लक्ष्मी ने बतौर कैप्टन रानी झाँसी रेजिमेंट में कैप्टेन पद पर कार्यभार संभाला. उनकी सक्रियता से धीरे धीरे रेजींमेंट में महिलाओं की संख्या 150 हो गई। यही नहीं अपने साहस और अद्भुत कार्य की बदौलत बाद में उन्हें कर्नल का पद भी मिला और उन्हें एशिया की प्रथम महिला कर्नल बनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ, लेकिन जुबान पर चढ़ जाने के कार न लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा. डा. लक्ष्मी 1943में सुभाषचन्द्र बोस की ‘‘आरजी हुकूमते आजाद हिन्द सरकार’’ में महिला विभाग की कैबिनेट मंत्री भी बनीं. वह नेता जी के साथ छाया बनकर रहीं. सुभाष चन्द्र बोस के साथ उन्होंने बैंकाक की यात्रा की और वहां थाईलैंड की महारानी से मिलीं। बैंकाक से वह रंगून पहुंचीं। वहां भारतीयों की संख्या अधिक होने से उन्हें भारत में होने का अहसास हुआ। यहीं पर उनकी भेंट मानवती आर्या से हुई, जो की बाद में उनके साथ ही रानी झाँसी रेजिमेंट में कैप्टन के रूप में सक्रिय रहीं. 15 जनवरी, 1944 को उन्होंने रंगून में ही एक नई महिला रेजीमेंट शुरू की। उनके जुझारूपन, निर्भीकता, राष्ट्रभक्ति व नेतृत्व क्षमता को देख कर उन्हें 30 मार्च-1944 को रेजीमेंट में कमीशड अफसर का पद मिला। इस रेजीमेंट ने अंग्रेजों से दो दो हाथ किए।

दितीय विश्व युद्ध में जापान की हार पश्चात् अंतत: ब्रिटिश सेनाओं ने आज़ाद हिंद फ़ौज के स्वतंत्रता सैनिकों की भी धरपकड़ की. सिंगापुर में पकडे गये आज़ाद हिन्द सैनिकों में कर्नल डॉ लक्ष्मी भी थीं। 1 जून 1945 को उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया। तमाम दबावों के बावजूद लक्ष्मी झुकी नहीं। परिस्थितिया बदलीं, नेता जी की विमान दुघर्टना में मौत की खबर आई इससे उन्हें उन्हें दुख जरूर हुआ लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 4 जुलाई 1946 को भारत लाये जाने के बाद अंतत: उन्हें बरी कर दिया गया, पर इतिहास गवाह है की नेताजी के दायें हाथ मेजर जनरल शाहनवाज़ व कर्नल गुरबक्ष सिंह ढिल्लन और कर्नल प्रेमकुमार सहगल पर लाल किले में देशद्रोह के आरोप में मुकदमे चले जिसमें पण्डित जवाहर लाल नेहरू, भूलाभाई देसाई और कैलाशनाथ काटजू जैसे दिग्गज वकीलों की दलीलों के चलते तीनों जांबाजों को बरी करना पडा। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने लाहौर में मार्च 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह कर लिया और फिर कानपुर आकर बस गईं. पर उनका संघर्ष यहीं ख़त्म नहीं हुआ और वे वंचितों की सेवा में लग गईं. वे भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाईं और दंगों के बीच जाकर लोगों को जोडऩे की कोशिश की। 1948-49 के बाद उन्होंने गाँव-गाँव एवं शहर-शहर जाकर मजदूरों, दलितों, मरीजों व पीड़ितों की हर तरह से सेवा की। अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई का हमेशा विरोध करती रहीं. उन्होंने आदोलन में साम्प्रदायिकता, अंधविश्वास, जातिवाद को निशाना बनाया। इस आदोलन को तेज करने के लिए उन्होंने खुद को वामपंथी आदोलन से जोड़ लिया और 1971 में मर्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से राज्यसभा की सदस्य बनीं। वे मिल बंदी को लेकर मजदूरों के पक्ष में खड़ी हुईं तो गरीब महिलाओं की समस्याओं को अपनी समस्या समझ कर दूर किया। यह एक विडंबना ही है कि जिन वामपंथी पार्टियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का साथ देने के लिए सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की, उसी से अंतत: कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जुडाव हुआ. वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में रहीं .1998 में उन्हें भारत सरकार द्वारा उल्लेखनीय सेवाओं के लिए पद्म विभूषण से सम्मनित किया गया। वर्ष 2002 में 88 वर्ष की आयु में उन्होने वामपंथी दलों की ओर से श्री ए पी जे अब्दुल कलाम के विरुद्ध राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लडा था।

डॉक्टर लक्ष्मी सहगल जीवन के अंतिम समय तक मानवता के सेवा के लिए तत्पर रहीं.1952 से कानपुर में प्रैक्टिस कर रहीं कैप्टन डॉ.लक्ष्मी सहगल का पहला प्यार उनका अपना प्रोफेशन था। शरीर की स्वस्थता उम्र से नहीं वरन् सक्रियता से निर्धारित होती है, का अक्षरक्षः पालन करने वाली कैप्टन लक्ष्मी सहगल जीवन के अंतिम समय तक नियमित रूप से अपने क्लीनिक में मरीजों की देखभाल करती रहीं.वे सुबह 9.30 बजे अपने क्लीनिक के लिए निकल जाती एवम् 10 बजे से 2 बजे तक का समय मरीजों की तीमारदारी में बितातीं। डाक्टर लक्ष्मी सहगल किसी कर्मकांड में विश्वास नहीं रखतीं बल्कि मरीजों की देख भाल से वे अपने को ईश्वर के करीब पाती थीं. उनको मरीजों की सेवा करने का एक अजब-सा जुनून था, वे कभी इस बात का ख्याल नहीं करती थीं कि उनके मरीज के पास इलाज के लिए पैसा है या नहीं, बस वे इलाज शुरू कर देती थीं, तभी उन्हें एक बार दिखाने आने वाली महिला रोगी उनकी कायल हो जाती थीं और हमेशा उनसे ही अपना इलाज कराने आती थीं और वे भी अपने मरीजों को देखने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं। कैप्टन लक्ष्मी सहगल भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके सम्बन्ध में उनकी मित्र, नेताजी की सहयोगी एवं स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन मानवती आर्या के शब्द गौरतलब हैं- ''देश प्रेम और साहस का ऐसा अद्भुत समन्वय बिरले लोगों में होता है। सुभाष की सेना की इस महानायक ने युवावस्था को एक सैनिक की तरह प्रौढ़ावस्था को समाज सेविका नर्स की तरह और वृद्धावस्था को निराश्रितों की वत्सला माँ की तरह जिया। वह मानव के साथ साथ मानवता की भी चिकित्सक थीं। ऐसे व्यक्तित्व कभी मरते नहीं, वे हमारे बीच हमेशा जीवंत रहेंगी। ''

-कृष्ण कुमार यादव

(चित्र में : कैप्टन लक्ष्मी सहगल के साथ लेखक कृष्ण कुमार यादव)
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