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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सिंधु और साक्षी के बाद समाज में बेटियाँ



बेटियों को मौका मिले तो वो तारे भी जमीं पर लाने का हौसला रखती हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर कैरियर तक उन्हें जहाँ भी मौका मिला, डॉक्टर-इंजीनियर-आई.ए.एस की परीक्षाओं से लेकर अंतरिक्ष की कल्पना तक...... हर जगह उन्होंने नए मुकाम गढ़े। पर इस सबके बावजूद पितृसत्तात्मक समाज सदैव से बेटियों के साथ दोयम व्यवहार करता रहा है। भ्रूण-हत्या से लेकर धरा पर आने तक हर कदम पर उसकी आवाज़ और जज्बे को कुचलने का प्रयास किया गया। उनकी शारीरिक संरचना को ही उनकी कमजोरी बना दिया गया।  रक्षाबंधन जैसे त्यौहार को भाई द्वारा बहन की रक्षा से जोड़कर, बहनों को और कमजोर बना दिया गया। ऐसे में रियो ओलम्पिक में जब लाव-लश्कर के साथ गई भारतीय टीम को अंतिम समय पर दो बेटियों ने मेडल लाकर उबारा तो एक बार फिर से समाज में बीटा बनाम बेटी की बहस तेज हो गई।  बदलते वक़्त के साथ समाज की दकियानूसी सोच को अब बदलने की जरुरत है। जिस देश में 125 करोड़ लोग मिल कर एक बेटी की इज्जत नहीं बचा पाते, उस देश की दो बेटियों पी. वी. सिंधु और साक्षी मलिक ने रियो ओलम्पिक में 125 करोड़ देशवासियों की इज्जत बचा ली। यह भी संयोग था कि उस दिन रक्षाबंधन का पर्व था। जिस समाज में दहेज़ के नाम पर बहुओं से सोना लाने की आशा की जाती है, वह देश आज बेटियों  से गोल्ड की उम्मीद लगाये है ! इन सबको लेकर प्रिंट मिडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया व वाट्सएप पर नारी-सशक्तिकरण और बेटियों के पक्ष में बड़ी अच्छी-अच्छी बातें सुनने को मिलीं, उनमें से कुछेक यहाँ शेयर कर रही हूँ -

सिंधु, साक्षी तुमने मेडल जीता
देश झूम कर नाचा है
तुमने भ्रूण हत्यारों के
चेहरे पे जड़ा तमाचा है
आज ख़ुशी से नाच रहे 
साक्षी-सिंधु चिल्लाते हो
अपने घर में बेटी जन्मे
फिर क्यों मुँह लटकाते हो?
रियो ओलम्पिक में भारत ने
दो मेडल ही पाया है
और ये दोनों मेडल भी
बेटियों ने ही लाया है
आज इन्हीं बेटियों के आगे
जनमानस नतमस्तक है
आज इन्हीं के कारण ही 
भारत का ऊँचा मस्तक है
आज ख़ुशी से झूम रहे हो
अच्छी बात है झूमो-गाओ
लेकिन घर में बेटी जन्मे 
तब भी इतनी खुशी मनाओ
बेटियाँ कम नहीं किसी से
शक्ति का अवतार हैं
इनको जो सम्मान न दे
उसका जीना धिक्कार है !!

************************************
हुआ कुम्भ खेलों का आधा, हाथ अभी तक खाली थे।
औरों की ही जीत देख हम, पीट रहे क्यों ताली थे।
सवा अरब की भीड़ यहाँ पर, गर्दन नीचे डाले थी।
टूटी फूटी आशा अपनी, मानो भाग्य हवाले थी।
मक्खी तक जो मार न सकते, वे उपदेश सुनाते थे।
जूझ रहे थे उधर खिलाड़ी, लोग मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता था भारत ने, नाम डुबाया खेलों में।
कोई कहता धन मत फूंको, ऐसे किसी झमेलों में।
कोई कहता मात्र घूमने, गए खिलाड़ी देखो तो।
कोई कहता भारत की है, पंचर गाड़ी देखो तो।
बस क्रिकेट के सिवा न जिनको, नाम पता होगा दूजा।
और वर्ष भर करते हैं जो, बस क्रिकेट की ही पूजा।
चार साल के बाद उन्हें फिर नाक कटी सी लगती है।
पदक तालिका देख देख कर, शान घटी सी लगती है।
आज देश की बालाओं ने, ताला जड़ा सवालों पर।
कस के थप्पड़ मार दिया है, उन लोगों के गालों पर।
बता दिया है जब तक बेटी, इस भारत की जिंदा हैं।
यह मत कहना भारत वालो, हम खुद पर शर्मिंदा हैं।
शीश नहीं झुकने हम देंगी, हम भारत की बेटी हैं।
आन बान की खातिर तो हम, अंगारों पर लेटी हैं।
भूल गए यह कैसे रक्षा-बंधन आने वाला है।
बहिनों के मन में पावन, उत्साह जगाने वाला है।
भैया रहें उदास भला फिर, कैसे राखी भाती ये।
पदकों के सूखे में पावस, कैसे भला सुहाती ये।
दो-दो पदकों की यह राखी, बाँधी, देश कलाई पर।
इतना तो अहसान सदा ही, करती बहिना भाई पर।
आज साक्षी के भुजदंडों, ने सबको ललकारा है।
अगर हौसला दिल में है तो, पूरा विश्व हमारा है।
पीवी संधू के तेवर हैं,  जैसे लक्ष्मीबाई हो।
अपनी भाई की खातिर ज्यों, बहिन युद्ध में आई हो।
जिनको अबला कहा वही तो, सबला बन छा जातीं हैं।
अपने मन में ठान लिया वह, पूरा कर दिखलाती हैं !!

*******************************************
ऋणी रहेगा देश सिंधु, साक्षी, इस राखी के उपहार का
बहनों के सर जिम्मा हैं अब राष्ट्र के विस्तार का
मांस-मीट की ताकत फिर से दूध-दही से हारी हैं
हिन्दुस्तान में  साबित हो गया बेटी बेटों पर भारी हैं
करते रहे गुनाह हम, केवल बेटे के शौक में
कितने मेडल मार दिए, जीते जी ही कोख में
चमक रहीं है बेटियाँ, बन माथे का बिंदु 
बढ़ा रहीं सम्मान देश का, साक्षी और सिंधु !!

******************************************
एक बानगी यह भी..... 

Days are really changing fast in India. 
Earlier women used to win beauty contests and men used to be wrestling champions.
Now the roles have reversed. 
Rohit Khandelwal was Mr World 2016
While Sakshi is wrestling champion in 2016 Olympics
Food for thought....
Sindhu won silver !!
Sakshi won bronze !!

इस तरह के विचारों और भावों को सुनना बहुत सुकूनदायी लगता है।  पर, दुर्भाग्यवश इस तरह की बातों का ज्वार बेहद अल्प होता है।  कुछेक समय बाद, फिर से वही पुराना ढर्रा आरम्भ हो जाता है। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसी चीजें नारों तक ही सीमित रह जाती हैं। जरूरत है कि आज के दौर की सच्चाई को स्वीकार किया जाये और बेटियों को सशक्त करके राष्ट्र को भी सशक्त किया जाये !!

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

हमारे घर आँगन आज सावन आया है...




चना ज़ोर गरम और पकौड़े  प्याज़ के ...
चार दिन मे सूखेंगे कपड़े ये आज के ...

आलस और खुमारी बिना किसी काज के ...
टर्राएँगे मेंढक फिर बिना किसी साज़ के ...

बिजली की कटौती का ये मौसम आया है ...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...

भीगे बदन और गरम चाय की प्याली ...
धमकी सी गरजती बदली वो काली ...

नदियों सी उफनती मुहल्ले की नाली ...
नयी सी लगती वो खिड़की की जाली ...

छतरी और थैलियों का मौसम आया है ...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...

निहत्थे से पौधों  पे बूँदो का वार ...
हफ्ते मे आएँगे अब दो-तीन इतवार ...

पानी के मोतियों से लदा वो मकड़ी का तार...
मिट्टी की खुश्बू से सौंधी वो फुहार ...

मोमबत्तियाँ जलाने का मौसम आया है...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...!


सावन में पेड़ों पर पड़ने वाले झूले तो अब गुजरे ज़माने की बातें हो गई। नई पीढ़ी अब झूलों का आनंद या तो घर में लेती है या पार्कों में। 

(चित्र में : बिटिया अपूर्वा झूले का आनंद लेती हुई) 




गुरुवार, 28 जुलाई 2016

राजस्थानी पत्रिका 'माणक' में अनूदित हिन्दी कविताएँ



अब हमारी कविताएँ राजस्थानी भाषा में भी। राजस्थानी मासिक पत्रिका ''माणक'' (जुलाई-2016) में प्रकाशित हमारी कुछेक कविताएँ ( मैं अजन्मी, अस्तित्व और एस.एम.एस) जिनका हिंदी से राजस्थानी में अनुवाद जुगल परिहार ने किया है।  आभार !!


 राजस्थानी पत्रिका ''माणक'' (मई 2016) में प्रकाशित पतिदेव कृष्ण कुमार यादव जी की कुछेक कविताएँ, जिन्हें त्रुटिवश हमारे नाम से प्रकाशित कर दिया गया था। जुलाई, 2016 में त्रुटि-सुधार के साथ संपादक ने हमारी कविताएँ प्रकाशित कीं......आभार !!

संपर्क -
माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) :  संपादक - पदम मेहता
माणक प्रकाशन, जालोरी गेट, जोधपुर (राजस्थान) -342003  

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

एक पत्नी का रोजनामचा

बेवक़ूफ़
वो
रोज़ाना की तरह
आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी.
किचिन में आई
और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया.
फिर
बच्चों को जगाया
ताकि वो स्कूल के लिए तैयार हो सकें.
फिर
उसने किचिन में
जाकर चाय निकाली
अपने सास ससुर को देकर आयी,
फिर
उसने बच्चों का
नाश्ता तैयार किया
और बीच-बीच में बच्चों को ड्रेस पहनाई,
और
फिर बच्चों को
नाश्ता कराकर उनके
स्कूल का लंच तैयार करने लगी.
इस बीच
बच्चों के स्कूल का
रिक्शा आ गया..
वो
बच्चों को
रिक्शा तक छोड़ कर आई.
वापस आकर
मेज़ से बर्तन इकठ्ठा किये.
इसी बीच
पतिदेव की आवाज़ आई कि मेरे कपङे निकाल दो.

उनको
ऑफिस जाने लिए
कपड़े निकाल कर दिए,
और
वापस आकर
फिर पति के लिए
नाश्ता तैयार करने लगी.
अभी
पति के लिए
उनकी पसन्द का
नाश्ता अण्डा और पराठे तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था,
कि
छोटी ननद आई
और ये कहकर कि भाभी मुझे आज कॉलेज जल्दी जाना है,
नाश्ता उठा कर ले गयी.
वो
फिर एक
हल्की सी मुस्कराहट के साथ वापस किचिन में आई.
इतने में
देवर की आवाज़ आई
भाभी नाश्ते तैयार हो गया क्या..?
"जी भाई अभी लायी..!"
ये कहकर
उसने फिर से
अपने पति और देवर के लिए अॉमलेट और पराठे तैयार करने शुरू किये.
"लीजिये नाश्ता तैयार है..!"
पति और देवर ने
नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने-अपने ऑफिस के लिए निकल चले.
उसने
मेज़ पर से
खाली बर्तन समेटे
और सास-ससुर के लिए
उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी..
दोनों को
नाश्ता कराने के बाद
फिर बर्तन इकट्ठे किये
और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी..
इसबीच
सफाई वाली भी आ गयी.
उसने
बर्तन का काम
सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगैरह इकट्ठा करने पहुँच गयी.
और फिर
सफाई वाली के साथ
मिलकर सफाई में जुट गयी.
अब तक 11 बज चुके थे.
अभी
वो पूरी तरह
काम समेट भी ना पायी थी कि कॉलबेल बजी.

दरवाज़ा खोला
तो सामने बड़ी ननद
और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे.
उसने
ख़ुशी-ख़ुशी
सभी को आदर के साथ घर में बुलाया,
और
उनसे बातों में
उनके आने की ख़ुशी का इज़हार करती रही.
ननद की
फ़रमाइश के मुताबिक़
नाश्ता तैयार करने के बाद
अभी वो ननद के पास बैठी ही थी...
कि
सास की आवाज़ आई
"बहू खाने का क्या प्रोग्राम है..?"
उसने घडी पर
नज़र डाली तो 12 बज रहे थे.

उसकी
फ़िक्र बढ़ गयी
वो जल्दी से फ्रिज़ की तरफ लपकी
और
सब्ज़ी निकाली
फिर से दोपहर के
खाने की तैयारी में जुट गयी.
खाना
बनाते-बनाते
अब दोपहर का एक बज चुका था.
बच्चे
स्कूल से आने वाले थे.
लो बच्चे आ गये...
उसने
जल्दी-जल्दी
बच्चों की ड्रेस उतारी
और उनका मुँह-हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया.
इसी बीच
छोटी ननद भी
कॉलेज से आ गयी
और देवर भी आ चुके थे.
उसने
सभी के लिए
मेज़ पर खाना लगाया
और खुद रोटी बनाने में लग गयी.
खाना खाकर
सब लोग फ्री हुए
तो उसने मेज़ से फिर
बर्तन जमा करने शुरू कर दिये.
इस वक़्त तीन बज रहे थे.
अब
उसको
खुद को भी
भूख का एहसास होने लगा था.
उसने
हॉट-पॉट देखा
तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी.
उसने
फिर से
किचिन की ओर रुख किया .
तभी
पतिदेव घर में
दाखिल होते हुये बोले कि
आज
देर हो गयी
भूख बहुत लगी है
जल्दी से खाना लगा दो.
उसने
जल्दी-जल्दी
पति के लिए खाना बनाया
और
मेज़ पर
खाना लगा कर
पति को किचिन से गर्मागर्म रोटियाँ बनाकर
ला-ला कर देने लगी.
अब तक चार बज चुके थे..
अभी वो
खाना खिला ही रही थी
कि पतिदेव ने कहा कि आ जाओ तुम भी खालो.
उसने
हैरत से
पति की तरफ देखा
तो उसे ख्याल आया कि
आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं.
इस ख्याल के
आते ही वो पति के
साथ खाना खाने बैठ गयी.
अभी
पहला निवाला
उसने मुँह में डाला ही था की आँख से आँसू निकल आये.
पतिदेव ने
उसके आँसू देखे
तो फ़ौरन पूछा कि
तुम क्यों रो रही हो...?
वो खामोश रही
और सोचने लगी कि
इन्हें
कैसे बताऊँ कि
ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता है
और लोग
इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं.
पति के
बार बार पूछने पर
उसने सिर्फ इतना कहा
कि
कुछ नहीं
बस ऐसे ही आँसू आ गये.
पति
मुस्कुराये और बोले
तुम
औरतें भी
बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो.
बिना वजह
रोना शुरू करदेती हो.
........... 
क्या वो 
वाकई बेवक़ूफ़ होती हैं..?

ज़रा सोचिये..
उन्हें 
ज्यादा कुछ नहीं
सहानुभूति और स्नेह 
के बस दो मीठे बोल चाहिये.

अपनी पत्नी को सम्मान दीजिए.... 

(यह सन्देश रूपी रचना वाट्सएप पर मिली।  किसने लिखा, इसका जिक्र नहीं ... पर जिसने भी लिखा दिल्लगी से लिखा.....साधुवाद ।  अच्छा लगा, अत: आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)

- आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 
Akanksha Yadav @ http://shabdshikhar.blogspot.in/

बुधवार, 23 मार्च 2016

हर रंग में प्यार अपार..

रंग - गुलाल से रंग दे तन - मन !
ऐसी होली हो मन - भावन !!


हर रंग में प्यार अपार।
रंगो का त्यौहार है होली
इसमें रंग हजार।
प्रेम का रंग है सबसे पक्का
कैसे भी न छूटे।
एक बार रंग जाय संग फिर
जीवन भर न टूटे।
तुम्हे मुबारक प्रेम रंग की
छैल छबीली होली।
खेलो रंग पिया से अपने
जी भर के करो ठिठोली।
हम सब की ओर से
मुबारक आप सभी को होली !!





रंग रंग राधा हुई, कान्हा हुए गुलाल
वृंदावन होली हुआ सखियाँ रचें धमाल
होली राधा श्याम की और न होली कोय
जो मन रांचे श्याम रंग, रंग चढ़े ना कोय
नंदग्राम की भीड़ में गुमे नंद के लाल
सारी माया एक है क्या मोहन क्या ग्वाल
आसमान टेसू हुआ धरती सब पुखराज
मन सारा केसर हुआ तन सारा ऋतुराज
बार बार का टोंकना बार बार मनुहार
धूम धुलेंडी गाँव भर आँगन भर त्योहार
फागुन बैठा देहरी कोठे चढ़ा गुलाल
होली टप्पा दादरा चैती सब चौपाल
सरसों पीली चूनरी उड़ी़ हवा के संग
नई धूप में खुल रहे मन के बाजूबंद
महानगर की व्यस्तता मौसम घोले भंग
इक दिन की आवारगी छुट्टी होली रंग
अंजुरी में भरपूर हों सदा रूप रस गंध
जीवन में अठखेलियाँ करता रहे बसंत।।।
...होली के पावन अवसर पर शुभकामनाएँ !!


होली वही जो  परिवार  को पास लाए,
होली  वही  जो  दोस्त  को साथ  लाए, 
होली  वही  जो  शत्रु को  मित्र  बनाए, 
होली  वही  जो  बुरी  आदतों  को  जलाए,
 होली  वही  जो सकारात्मक  विचार  लाए, 
होली  वही  जो  रंग  भी लगाए,  
होली वही  जो  पानी  भी  बचाए,
 होली  वही  जो  शिक्षा  का प्रकाश  फैलाए, 
होली  वही  जो  संकल्पों  की  याद  दिलाए, 
होली  वही  जो  मस्ती  में  रहकर  भी  
अपने  कर्तव्यों  का एहसास  दिलाए।
होली के पावन पर्व पर रंग भरी शुभकामनाये।

(ये सन्देश  वाट्सअप पर प्राप्त हुये, अच्छा लगा सो आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)

रंगों के पर्व होली के शुभ अवसर पर आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएँ !! 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

यही प्यार है......



दो अजनबी निगाहों का मिलना 
मन ही मन में गुलों का खिलना 
हाँ, यही प्यार है............ !! 

आँखों ने आपस में ही कुछ इजहार किया 
हरेक मोड़ पर एक दूसरे का इंतजार किया 
हाँ, यही प्यार है............ !! 

आँखों की बातें दिलों में उतरती गई 
रातों की करवटें और लम्बी होती गई 
हाँ, यही प्यार है............ !! 

सूनी आँखों में किसी का चेहरा चमकने लगा 
हर पल उनसे मिलने को दिल मचलने लगा 
हाँ, यही प्यार है............ !! 

चाँद व तारे रात के साथी बन गये 
न जाने कब वो मेरी जिन्दगी के बाती बन गये 
हाँ, यही प्यार है............ !!


(डायरी के पुराने पन्नों को पलटिये तो बहुत कुछ सामने आकर घूमने लगता है. ऐसे ही इलाहाबाद विश्विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्यार को लेकर यह कविता जीवन साथी कृष्ण कुमार यादव जी ने लिखी थी. यहाँ पर आप सभी के साथ शेयर कर रही  हूँ)



शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

बम या रेशम

 वे कैसे लोग होते हैं, 
जो बम बनाते हैं,
उनसे बेहतर तो,
वो कीड़े होते हैं, 
जो रेशम बनाते हैं !!



शनिवार, 28 नवंबर 2015

पहला प्यार

पहली बार
इन आँखों ने महसूस किया
हसरत भरी निगाहों को

ऐसा लगा
जैसे किसी ने देखा हो
इस नाजुक दिल को
प्यार भरी आँखों से

न जाने कितनी
कोमल और अनकही भावनायें
उमड़ने लगीं दिल में

एक अनछुये अहसास के
आगोश में समाते हुए
महसूस किया प्यार को

कितना अनमोल था
वह अहसास
मेरा पहला प्यार !!









वक्त बदला, तारीखें बदली
ना बदला वो एहसास व प्यार !!
...... बस 11 साल ही तो हुए उस दिन को, जब हम बँधे थे इक बंधन में।  




फेसबुक पर रत्नेश कुमार मौर्य जी ने कुछ इस तरह से दुआएँ दीं -

इस सफर में आप दोनों के लिए बस एक ही दुआ। 
आगे के सफर में भी यूँ ही प्रीति बनाये रहना सदा। 
...... खूबसूरत जोड़ी को किसी की नजर न लगे !!



आप सभी की शुभकामनाओं और स्नेह के लिए आभार !!


मंगलवार, 10 नवंबर 2015

पावन पर्व दीवाली का



पावन पर्व दीवाली का,
दीपों की बारात लाए।
तारों सी टिमटिमाती रोशनी,  
खुशियों की सौगात लाए।

तोरण द्वार पर सजे अल्पना,
ज्योति का पुंज-हार लाए।
खील-लड्डू का चढ़े प्रसाद,
दिलों में सबके प्यार लाए।

है शुभ मंगलकारी पर्व यह,
इस दिन अयोध्या राम आए।
जल उठी दीपों की बाती,
पुलकित मन पैगाम लाए।

अमावस्या का तिमिर चीरकर,
रोशनी का उपहार लाए।
चारों तरफ सजे रंगोली,
लक्ष्मी-गणेश भी द्वार आए।



दीपावली पर एक सन्देश बिटिया पाखी की तरफ से भी -
ऐसे मनाएं दीवाली : गरीबी और अशिक्षा का अँधियारा मिटायें 

दीपावली रोशनी का त्यौहार है, न कि पटाखों का। इस मौके पर हम खूब दीये जलाएंगे और परिवार के साथ इसका आनंद उठाएंगे। पटाखों से तो बिलकुल दूर रहूँगी। पटाखों से निकली चिंगारी से तो कई बार लोगों की आँखों की रोशनी भी चली जाती है। इससे प्रदूषण भी बहुत फैलता है। ऐसे में मैंने संकल्प लिया है कि इस दीपावली पर पटाखों से दूर रहूँगी। जो पैसे हम पटाखों पर खर्च करते हैं, उनसे किसी गरीब या जरूरतमंद की सहायता कर उनके जीवन में रोशनी फैलाएंगे। 

- अक्षिता (पाखी)
(राष्ट्रीय बाल पुरस्कार विजेता)

प्रकाश का पर्व दीपावली आप सभी के जीवन में ढेर सारी खुशियाँ लाये। 
अँधेरे से अँधेरे माहौल में भी दिल में आशा की एक लौ जलती रहे।
 दीपोत्सव पर्व की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं !!

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

करवा चौथ के बहाने...

करवाचौथ तो बहाना है,
असली मकसद तो पति को याद दिलाना है...

कि कोई है,
जो उसके इंतजार में दरवाजे पर
टकटकी लगाए रहती है,
पति के इंतज़ार में.
सदा आँखें बिछाए रहती है...

वैलेंटाईन ड़े, रोज़ ड़े
इन सब को वो समझ नहीं पाती है....
प्यार करती है दिल की गहराईयों से,
पर कह नहीं पाती है....

सुबह से भूखी है,
उसका गला भी सूखा जाता है....
इस पर उसका कोई ज़ोर नहीं,
उसे प्यार जताने का
बस यही तरीका आता है....

खुलेआम किस करना हमारी संस्कृति में नहीं,
'आई लव यू' कहने में वो शर्माती है....
वो चाहती है बहुत कुछ कहना,
पर 'जल्दी घर आ जाना'
बस यही कह पाती है....

फेसबुक, ट्वीटर से मतलब नहीं उसे,
ना फोन पे वाट्सैप चलाना आता है....
यूँ तो कोई जिद नहीं करती,
पर प्यार से रूठ जाना आता है...

उसका समर्पण,
और हमारे परिवार पर लुटाया हुआ प्यार....
ऐसी प्रिया को,
है सम्मान का, प्यार का अधिकार !!

-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर : Akanksha Yadav @ www.shabdshikhar.blogspot.com/

शनिवार, 15 अगस्त 2015

हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा


आजादी के पर्व का जश्न आते ही यह गीत अनायास ही होठों पर आ जाता है।  स्कूली दिनों से ही यह राष्ट्र भक्ति गीत सुनते, सुनाते और गुनगुनाते आ रहे हैं। यह तो नहीं पता कि यह खूबसूरत गीत किसने लिखा, पर जिन्होंने भी लिखा लाजवाब।  आज एक बार फिर से इस गीत को आप सभी के साथ शेयर करते हुए प्रसन्नता हो रही है। इसके रचयिता का नाम पता हो तो जरूर लिखियेगा !!

हिन्द देश का प्यारा झंडा ऊँचा सदा रहेगा
तूफान और बादलों से भी नहीं झुकेगा
नहीं झुकेगा, नहीं झुकेगा, झंडा नहीं झुकेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

केसरिया बल भरने वाला सदा है सच्चाई
हरा रंग है हरी हमारी धरती है अँगड़ाई
कहता है यह चक्र हमारा कदम कभी नहीं रुकेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

शान नहीं ये झंडा है ये अरमान हमारा
ये बल पौरुष है सदियों का ये बलिदान हमारा
आसमान में फहराए या सागर में लहराए
जहाँ-जहाँ ये झंडा जाए यह सन्देश सुनाए
है आज़ाद हिन्द ये दुनिया को आज़ाद करेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

नहीं चाहते हम दुनिया को अपना दास बनाना
नहीं चाहते हम औरों के मुँह की रोटी खा जाना
सत्य न्याय के लिए हमारा लहू सदा बहेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

हम कितने सुख सपने लेकर इसको फहराते हैं
इस झंडे पर मर मिटने की कसम सभी खाते हैं
हिन्द देश का यह झंडा घर-घर में लहराएगा
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

- आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 






Sand artist Sudarsan Pattnaik creates a sand sculpture on Independence Day at Puri beach of Odisha on Thursday. (PTI Photo)

रविवार, 8 मार्च 2015

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हाइकु रचनाएँ

जाग उठी है
आज शिक्षित नारी
हक लेने को।

अबला नहीं
संवेदना की स्रोत
जानिए इसे।

रिश्तों की डोर
सहेजती ये नारी
रुप विभिन्न।

नारी की शक्ति
पहचानिए इसे
दुर्गा-भवानी।

हर क्षेत्र में
रचे नया संसार
आज की नारी।

बाधाएँ तोड़
आसमां के सितारे
छू रही नारी।

नारी सशक्त
समाज बने सुखी
समृद्ध राष्ट्र।





रविवार, 27 अप्रैल 2014

चिड़िया प्यासी





चिड़िया प्यासी 
रखिये पानी रोज 
छत-छज्जे पे। 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

क्या है मेरे नाम का ??


देह मेरी ,
हल्दी तुम्हारे नाम की ।

हथेली मेरी ,
मेहंदी तुम्हारे नाम की ।

सिर मेरा ,
चुनरी तुम्हारे नाम की ।

मांग मेरी ,
सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।

माथा मेरा ,
बिंदिया तुम्हारे नाम की ।

नाक मेरी ,
नथनी तुम्हारे नाम की ।

गला मेरा ,
मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।

कलाई मेरी ,
चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।

पाँव मेरे ,
महावर तुम्हारे नाम की ।

उंगलियाँ मेरी ,
बिछुए तुम्हारे नाम के ।

बड़ों की चरण-वंदना
मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष
तुम्हारे नाम का ।

और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।

यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।

घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।

और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।

सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का...

नम्रता से पूछती हूँ -

आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?

(आज ही यह कविता मेल पर प्राप्त हुई।  रचनाकार का नाम नहीं पता, पर रचना अच्छी और जीवंत लगी, अत : शेयर कर रही हूँ।)

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

दिखायें मतदान का अधिकार


चुनाव की आ गई बहार
लोकतंत्र का  ये त्यौहार
नेता घूमें घर-घर गाँव
राजा और रंक एक समान।

मुद्दे अभी वही  हैं बारम्बार
गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार
महँगाई आसमान को छुये
अपराधी रोज रहे ललकार।

पाँच साल बाद आई यह बेला
घोषणाओं का फैला रेलम-रेला
जनता अब गई है जाग
नहीं चलेगा कोई खेला।

जाति-धर्म से ऊपर उठकर
दिखायें मतदान का अधिकार
लोकतंत्र के बनेँगेँ  पहरुए
जनता ने भरी है हुंकार। 



आकांक्षा यादव, (लेखिका और न्यू मीडिया एक्टिविस्ट)
सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.)- 211001