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मंगलवार, 11 मई 2010

11 मई : एक अरबवीं बच्ची की 'आस्था' पर चोट

वर्ष 2011 की जनगणना इस समय जोर-शोर से चल रही है। इसे व्यापक और लोकप्रिय बनाने एवं लोगों से जोड़ने हेतु तमाम उपायों का सहारा लिया जा रहा है। माना जा रहा है कि इस जनगणना पर जितनी राशि और मानवीय संसाधन झोंके गए हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। यह जनगणना सिर्फ मानव जाति की गणना नहीं करती बल्कि मानव के समृद्ध होते परिवेश एवं भौतिक संसाधनों को भी कवर करती है। भारत दुनिया के उन देशों में से है, जहाँ सर्वाधिक तीव्र गति से जनसंख्या बढ़ रही है। फिलहाल चीन के बाद हम दुनिया में दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र हैं। यह जनसंख्या ही भारत को दुनिया के सबसे बड़े बाजार के रूप में भी प्रतिष्ठित करती है। यही कारण है कि इससे जुड़े मुद्दे भी खूब ध्यान आकर्षित करते हैं।

याद कीजिए भारत में एक अरबवीं बच्ची के जन्म को। राजधानी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 11 मई 2000 की सुबह 5 बजकर 5 मिनट पर इस बच्ची के जन्म से उत्साहित देश के नीति-नियंताओं ने वायदों और घोषणाओं की झड़ी लगा दी थी। इनमें देश की तत्कालीन स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री श्रीमती सुमित्रा महाजन, दिल्ली के सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री श्री साहिब सिंह वर्मा के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के वरिष्ठ अधिकारीगण तक शामिल थे। इनमें बच्ची की मुफ्त शिक्षा, मुफ्त रेल यात्रा, मुफ्त मेडिकल सेवा से लेकर बच्ची के पिता को सरकारी नौकरी तक के वायदे शामिल थे। पर वक्त के साथ ही जैसे खिलौने टूट जाते है, एक अरबवीं बच्ची के प्रति किए गए सभी वायदे टूट गए। माता-पिता ने समझा था कि बिटिया अपने साथ सौभाग्य लेकर आई है, तभी तो इतने लोग उसे देखने व उसके लिए कुछ करने को लालायित हैं। शायद इसीलिए उसका नाम भी आस्था रखा। पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की इस एक अरबवीं बच्ची आस्था की किलकारियों को न जाने किसकी नजर गई कि आज 10 साल की हो जाने के बावजूद उसे कुछ नहीं मिला, सिवाय संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा वायदानुसार दी गई दो लाख रूपये की रकम।

वाकई यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे नीति-नियंता बड़े-बड़े वायदे और घोषणाएं तो करते हैं, पर उन पर कभी अमल नहीं करते। 'आस्था' तो एक उदाहरण मात्र है जो आज दिल्ली के नजफगढ़ के हीरा पार्क स्थित अपने पैतृक आवास में माता-पिता और बड़े भाई के साथ रहती है। दुर्भाग्यवश इस गली में पानी व सीवर लाइन सहित तमाम सुविधाओं का अभाव है। इन सबके बीच माता-पिता इस गरीबी में कुछ पैसे जुटाकर खरीदी गई सेकण्ड हैण्ड साईकिल ही आस्था की खुशियों का संबल है। उसके माता-पिता भी उस दिन को एक दु:स्वप्न मानकर भूल जाना चाहते हैं, जब इस एक अरबवीं बच्ची के जन्म के साथ ही नेताओं-अधिकारियों-मीडिया की चकाचैंध के बीच दुनिया ने आस्था को सर आखों पर बिठा लिया था। आज 11 मई 2010 को आस्था पूरे 10 साल की हो जाएगी, पर उसकी सुध लेने की शायद ही किसी को फुर्सत हो !!

34 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

क्या कहा जाये...एक विचारणीय एवं सार्थक पोस्ट!

kunwarji's ने कहा…

सब अपने जंजालो में इस तरह उलझे हुए है इसकी किसी को याद भी नहीं होगी!आपने बहुत बढ़िया मुद्दा उठाया है!हमारे लिए नयी जानकारी भी रही!धन्यवाद है जी!

कुंवर जी

SANJEEV RANA ने कहा…

वाकई यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे नीति-नियंता बड़े-बड़े वायदे और घोषणाएं तो करते हैं, पर उन पर कभी अमल नहीं करते।

आपने ही कह दी जो बात में कहने वाला था
ये सब राजनीती से प्रेरित होकर ऐसे वादे करते हैं जिनको पूरा न किया जाये.
इस मुद्दे को सामने लाने के लिए आप धन्यवादी हो .

ढपो्रशंख ने कहा…

आज हिंदी ब्लागिंग का काला दिन है। ज्ञानदत्त पांडे ने आज एक एक पोस्ट लगाई है जिसमे उन्होने राजा भोज और गंगू तेली की तुलना की है यानि लोगों को लडवाओ और नाम कमाओ.

लगता है ज्ञानदत्त पांडे स्वयम चुक गये हैं इस तरह की ओछी और आपसी वैमनस्य बढाने वाली पोस्ट लगाते हैं. इस चार की पोस्ट की क्या तुक है? क्या खुद का जनाधार खोता जानकर यह प्रसिद्ध होने की कोशीश नही है?

सभी जानते हैं कि ज्ञानदत्त पांडे के खुद के पास लिखने को कभी कुछ नही रहा. कभी गंगा जी की फ़ोटो तो कभी कुत्ते के पिल्लों की फ़ोटूये लगा कर ब्लागरी करते रहे. अब जब वो भी खत्म होगये तो इन हरकतों पर उतर आये.

आप स्वयं फ़ैसला करें. आपसे निवेदन है कि ब्लाग जगत मे ऐसी कुत्सित कोशीशो का पुरजोर विरोध करें.

जानदत्त पांडे की यह ओछी हरकत है. मैं इसका विरोध करता हूं आप भी करें.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक पोस्ट....नेताओं के वादे केवल दिखाने भर के होते हैं....

संजय भास्‍कर ने कहा…

हमारे लिए नयी जानकारी भी रही!धन्यवाद है जी!

Shyama ने कहा…

आज 11 मई 2010 को आस्था पूरे 10 साल की हो जाएगी, पर उसकी सुध लेने की शायद ही किसी को फुर्सत हो.....यही तो दुर्भाग्य है.

Shyama ने कहा…

आज 11 मई 2010 को आस्था पूरे 10 साल की हो जाएगी, पर उसकी सुध लेने की शायद ही किसी को फुर्सत हो.....यही तो दुर्भाग्य है.

Unknown ने कहा…

आज के दिन बेहद प्रासंगिक व सोचनीय पोस्ट...

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

काश ये नेता सोचते कि उस नन्हीं बच्ची पर क्या गुजरेगी, जब उसे इन सब बातों का ज्ञान होगा.

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World ने कहा…

..एक तरफ बोलेंगे लड़की पैदा करो..फिर ये नौटंकी...शुद्ध दोहरा चरित्र. आकांक्षा जी आपने इस मुद्दे को हाईलाइट कर अच्छा कार्य किया है..साधुवाद.

Bhanwar Singh ने कहा…

अजी नेताओं की बात....भगवान बचाए.

बेनामी ने कहा…

आस्था की आस्था पर गहरी चोट...क्या होगा देश के कर्णधारों का. बेहतरीन मुद्दे के लिए आकांक्षा जी को बधाई.

KK Yadav ने कहा…

विचारणीय मुद्दा. पता नहीं कब नीति-नियंताओं की ऑंखें खुलेंगीं. हर बात चुनावी घोषणा सी लगती है.

S R Bharti ने कहा…

Bahut sahi aur samyik likha....apki jagrukta ka parichayak.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

हमेशा की तरह
आपका यह आलेख भी महत्त्वपूर्ण है!
--
जन्म-दिवस पर मिला : मुझे एक अनमोल उपहार!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सार्थक और सामयिक आलेख.

रामराम.

Amit Kumar Yadav ने कहा…

अब इसके आगे क्या कहें ):

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मन-मयूर ने कहा…

आकांक्षा जी, यह पोस्ट पढ़कर मन द्रवित हो गया और खिन्न भी..

raghav ने कहा…

इन सबके बीच माता-पिता इस गरीबी में कुछ पैसे जुटाकर खरीदी गई सेकण्ड हैण्ड साईकिल ही आस्था की खुशियों का संबल है। उसके माता-पिता भी उस दिन को एक दु:स्वप्न मानकर भूल जाना चाहते हैं, जब इस एक अरबवीं बच्ची के जन्म के साथ ही नेताओं-अधिकारियों-मीडिया की चकाचैंध के बीच दुनिया ने आस्था को सर आखों पर बिठा लिया था।
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सब समय का फेर है.

शरद कुमार ने कहा…

पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की इस एक अरबवीं बच्ची आस्था की किलकारियों को न जाने किसकी नजर गई कि आज 10 साल की हो जाने के बावजूद उसे कुछ नहीं मिला, सिवाय संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा वायदानुसार दी गई दो लाख रूपये की रकम।********साँप कटे तो उतर भी जाये पर नेता और नौकरशाह की विषबेल इतनी लम्बी है कि उनकी नजर भी कालिमा ला दे.

Shahroz ने कहा…

ये तो एक उदारहण मात्र है. न जाने ऐसी कितने आस्थाएं रोज अपने सपनों को बिखरती देखती हैं.

Shahroz ने कहा…

ये तो एक उदारहण मात्र है. न जाने ऐसी कितने आस्थाएं रोज अपने सपनों को बिखरती देखती हैं.

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

कित्ती गन्दी बात है. वादा करकर भी भूल गए.

Akanksha Yadav ने कहा…

आप सभी की टिप्पणियों एवं स्नेह के लिए आभार. आपका प्रोत्साहन ही हमें संबल देता है.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

बेहद दुखद व शर्मनाक...इस ओर ध्यान आकृष्ट होना ही चाहिए. आपका आभार.

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

इसे कहते हैं हाथी के दाँत, खाने के और, दिखाने के और।
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कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

Unknown ने कहा…

अफ़सोस की बात ......

राज भाटिय़ा ने कहा…

अरे अरे मिले तो है.... लेकिन बच्ची के पास आने से पहले ही नीच चील कोव्वे ही उसे खा गये

vandan gupta ने कहा…

badi door ki kaudi khoj kar laye hain........jise duniya bhula chuki use aapne yaad rakha ye hi sabse badi baat hai aur phir hum sabko bhi yaad dilaya ....aapke aabhri hain.......jahan tak netaon ki baat hai to unse to ummeed karie hi nahi..........yahan hathi ke daant khane ke aur hote hain aur dikhane ke aur.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपका आलेख चिन्तन करने को विवश करता है!

ढपो्रशंख ने कहा…

ज्ञानदत्त ने लडावो और राज करो के तहत कल बहुत ही घिनौनी हरकत की है. आप इस घिनौनी और ओछी हरकत का पुरजोर विरोध करें. हमारी पोस्ट "ज्ञानदत्त पांडे की घिनौनी और ओछी हरकत भाग - 2" पर आपके सहयोग की अपेक्षा है.

कृपया आशीर्वाद प्रदान कर मातृभाषा हिंदी के दुश्मनों को बेनकाब करने में सहयोग करें. एक तीन लाईन के वाक्य मे तीन अंगरेजी के शब्द जबरन घुसडने वाले हिंदी द्रोही है. इस विषय पर बिगुल पर "ज्ञानदत्त और संजयदत्त" का यह आलेख अवश्य पढें.

-ढपोरशंख

editor : guftgu ने कहा…

चिंतनीय विषय...