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बुधवार, 11 सितंबर 2013

'दामिनी' का न्याय बनाम 'आधी-आबादी'

आज फैसले की घड़ी है। दामिनी रेप केस के अभियुक्तों को न्यायालय द्वारा सजा सुनाये जाने का महत्वपूर्ण दिन है। पर क्या वाकई यह फैसला एक मील का पत्थर साबित होगा। क्या इस फैसले के बाद आधी आबादी का 'दामिनी' जैसा हश्र नहीं होगा। भारत में एक नहीं कई दामिनियाँ हैं, जिनके दामन को रोज कलंकित किया जाता है। दिल्ली, मुंबई और राजधानियों की घटनाएँ तो खबर बनकर लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं, पर दूरदराज इलाकों में भी स्थिति बहुत अच्छी  नहीं है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो भारत में हर वर्ष बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज हो  रही है। वर्ष 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए, जबकि 2010 में 5,484 मामले ही दर्ज हुए थे। आंकड़ों के हिसाब से एक वर्ष में बलात्कार के मामलों में 29.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राजधानी दिल्ली का तो बेहद बुरा हाल है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ही आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। 2007 से 2011 की अवधि के दौरान अर्थात चार साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस मामले में दिल्ली नंबर वन रही। एनसीबी के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी लगातार चौथे साल बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में साल 2011 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए, जबकि मुंबई में 218 मामले दर्ज हुए।

राज्यों की बात करें तो मध्यप्रदेश इस मामले में सबसे ऊपर है। मप्र में रेप के सबसे अधिक 15,275 मामले दर्ज किए गए। पश्चिम बंगाल में 11,427, यूपी में 8834 और असम में 8060 मामले दर्ज किये गए। 7703 रेप केस के साथ महाराष्ट्र इस सूची में पांचवें नंबर पर है यानी कुल 51 हजार 299 बलात्कार हुए। हल ही में मुंबई में दिनदहाड़े हुए महिला पत्रकार का बलात्कार इसका ज्वलंत उदाहरण है।

मात्र दर्ज मामलों के आधार पर  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। इस प्रकार भारतभर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी अस्मत गंवा देती हैं। ‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, 'भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ वहीं महिलाओं के विकास के लिए केंद (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) अनुसार, ‘भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ट्रस्ट लॉ वोमेन द्वारा किए गए हालिया सर्वेक्षण के अनुसार भारत स्त्रियों के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश है।

बलात्कार की घटनाएँ जिस तरह बढ़ रही हैं, वह हमारे संस्कार, पारिवारिक मूल्यों, परिवेश और स्कूली शिक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। 'आधी आबादी' का सर्वप्रथम शोषण घर से ही शुरू होता है। आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर बलात्कार जान-पहचान वाले लोग ही करते हैं। इसी आधार पर ‘रेप क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर’ ने दिल्ली में 2010 के शुरु से जुलाई 2011 में हुए बलात्कारों पर दर्ज एफ.आइ.आर. का गहन अध्ययन किया तो चौंकाने  नतीजे सामने आए। इसमें यह पाया गया कि 66%  बलात्कार-पीड़ित लड़कियां बीस साल की उम्र के नीचे की हैं जिनमें 22% की उम्र तो  दस साल के भी नीचे है। दूसरी ओर 67% बलात्कारी की उम्र बीस साल के ऊपर है। अधिकतर मामलों में पाया गया कि बलात्कारी मूलतः पीड़ित लड़की के जाने-पहचाने होते हैं जिनमें रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त, शिक्षक और अन्य निकट संबंधी होते हैं। अपरिचितों द्वारा बलात्कार के मामले उतने ज्यादा नहीं हैं।मसलन् 58 पीड़ितों में 51 जान-पहचान के और बाकी 7 अपरिचित होते हैं। ऐसे में बलात्कार  के मामलों की जांच में जुटे पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अधिकतर मामलों में आरोपी को पीड़िता के बारे में जानकारी होती है। ऐसे में कई बार यह एक क़ानूनी से ज्यादा सामाजिक समस्या बन जाती है है और ऐसे अपराधों पर नकेल कसने के लिए सिर्फ क़ानूनी ही नहीं, सामाजिक रूप से भी सशक्त पहल करनी होगी। अधिकारियों की मानें तो इनमें से अधिकांश मामले बेहद तकनीकी होते हैं। अक्सर ऐसे अपराध दोस्तों या रिश्तेदारों द्वारा किए जाते हैं, जो पीड़िता को झूठे वादे कर बहलाते हैं, फिर गलत काम करते हैं। कई बार ऐसे अपराध अज्ञात लोग करते हैं और पुलिस की पहुंच से आसानी से बच निकलते हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि इसमें पीड़िता की रजामंदी होती है, उसे इस बात के लिए रजामंद कर लिया जाता है। पर बाद में कुछ कारणों से इसे दूसरा रूप दे दिया जाता है।

 बलात्कार सिर्फ एक शारीरिक दुष्कृत्य नहीं है, बल्कि यह समग्र नारी अस्मिता से जुड़ा  सवाल है। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया। 

...ऐसे में सवाल  उठना लाजिमी है कि क्या 'दामिनी' केस में सुनाया गया फैसला सिर्फ एक फैसला होगा या यह आधी आबादी की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।

- आकांक्षा यादव : शब्द-शिखर @ www.shabdshikhar.blogspot.com/ 
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