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बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

'शब्द शिखर' पर विराजने की 'आकांक्षा' : जनसंदेश टाइम्स में चर्चा


('शब्द-शिखर' ब्लॉग की चर्चा डा. जाकिर अली रजनीश जी ने जनसंदेश टाइम्स में अपने साप्ताहिक स्तम्भ 'ब्लॉग वाणी' के तहत 'शब्द शिखर पर विराजने की आकांक्षा' शीर्षक के तहत 12 अक्टूबर 2011 को विस्तारपूर्वक की है.रजनीश जी को धन्यवाद. बेहद खूबसूरती से उन्होंने इसे प्रस्तुत किया है.इसे आप भी पढ़ सकते हैं)
धरती पर पाए जाने वाले सभी जीवों में मनुष्‍य ही वह प्राणी है, जिसके पास सोच-विचार करने और उसे अभिव्‍यक्‍त करने की शक्ति पाई जाती है। यही कारण है कि विचारशील व्‍यक्ति सिर्फ अपनी क्षुधापूर्ति पर ध्‍यान नहीं देता, वह अपनी रोजी-रोटी के साथ-साथ समाज के बारे में भी चिंतन करता है। विद्वानों ने इस वैचारिक प्रस्‍फुटन को स्‍वत: स्‍फूर्त माना है। लेकिन इसके साथ ही साथ यह भी तय है कि परिस्थितियाँ और माहौल भी इस भाव के प्रकटीकरण में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही
कारण है कि जबसे वैचारिक आदान-प्रदान के रूप में ब्‍लॉग का माध्‍यम सामने आया है, ऐसे विचारकों की संख्‍या में अ‍भूतपूर्व वृद्धि हुई है। इस वृद्धि को अगर वैचारिक विस्‍फोट का नाम दिया जाए, तो शायद अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। कारण जहाँ इस माध्‍यम ने लेखकों की एक ऐसी जमात को सामने लाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो किसी संकोच की वजह से कभी अपनी रचनाओं को लोगों के सामने नहीं ला सके, वहीं इसने उन रचनाकारों की झिझक को भी तोड़ने में सफलता अर्जित की है, जो बार-बार के रचना-प्रेषण और सम्‍पादकीय दया दृष्टि को लेकर सहज नहीं रह पाते थे।

रचनाकारों की इन दो श्रेणियों के के अतिरिक्‍त ब्‍लॉग जगत में लेखकों की एक तीसरी श्रेणी भी सक्रिय है, जो ब्‍लॉग जगत से इतर भी अपनी लेखनी के लिए जानी जाती है और ब्‍लॉग जगत में भी अपनी अपनी साहित्यिक प्रतिभा के कारण पहचानी जाती है। आकाँक्षा यादव इसी श्रेणी की एक प्रतिभा सम्‍पन्‍न रचनाकार हैं। वे जिस तरह देश-विदेश की सभी चर्चित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, उसी तरह से ब्‍लॉग जगत में भी अपनी सक्रियता के नए आयाम स्‍थापित करती नजर आती हैं। उनके इस वैचारिक और साहित्यिक चिंतन को उनके ब्‍लॉग ‘शब्द-शिखर’ (http://shabdshikhar.blogspot.com) पर सहज रूप में देखा-परखा जा सकता है।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में जन्‍मीं आकाँक्षा वर्तमान में पोर्टब्‍लेयर शहर में अवस्थित हैं। पेशे से वे कॉलेज में प्रवक्‍ता हैं, पर मुख्‍य रूप से वे एक रचनाधर्मी के रूप में जानी जाती हैं और अपनी रचनाओं में जीवंतता के साथ-साथ सामाजिक संस्कार के रंग भरने के लिए पहचानी जाती हैं। उनका मानना है कि लेखनी में बिना लाग-लपेट के सुलभ भाव-भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य भी उभरने चाहिए। यही उसकी सार्थकता है। यही कारण है कि उनकी लेखनी किसी एक क्षेत्र अथवा सीमा में बंध कर नहीं रहती। वे मानव-मात्र को छूने वाले सभी सहज विषयों पर चिंतन करती पाई जाती हैं और शायद यही कारण है कि वे अपनी इस साहित्यिक सक्रियता के लिए दजर्नाधिक साहित्यिक संस्‍थाओं से पुरस्‍कृत एवं सम्‍मानित होने का गौरव भी प्राप्‍त कर चुकी हैं।

आकाँक्षा एक आधुनिक युग की महिला हैं। वे महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिये जाने की पक्षधर हैं और लड़कियों पर पक्षपात के कारण लगाए जाने वाली मानसिकता की सख्‍त आलोचक भी हैं। यही कारण है कि वे ईव-टीजिंग जैसे ज्‍वलंत विषय पर लड़कियों पर सारा दोष मढ़ने की मानसिकता को साहस के साथ बेपर्दा करती हैं और स्‍वस्‍थ समाज के लिए स्‍वस्‍थ मानसिकता की आवश्‍यकता पर बल देती हैं। वे एक ओर जहाँ समाज के विभिन्‍न वर्गों में पाई जाने वाले विकृतियों को अपनी रचनाओं में उकेरती हैं, वहीं ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की सीमा को तोड़ती हुई शिक्षक वर्ग की कमजोरियों को भी समान रूप से प्रदर्शित करने में झिझक महसूस नहीं करती हैं। उनका मानना है कि यदि शिक्षक अपनी भूमिका व कर्तव्यों पर पुनर्विचार कर सकें तो शायद वे बदलते प्रतिमानों के साथ अपनी भूमिका को ज्‍यादा सशक्त बना सकेंगे।

आकाँक्षा समाज में सिर्फ बुरा देखने वाली कोई अतिरेकी आलोचक नहीं हैं। वे लोक की परम्‍परा से निकली हुई एक ऐसी पारखी हैं, जो अपने चारों ओर पसरी जिंदगी में शुभ और सार्थक चीजों को बढ़ावा देना भी अपना फर्ज समझती हैं। यही कारण है कि चाहे हमारी संस्‍कृति में व्‍याप्‍त मानवीय मूल्‍य हों, अथवा हमारे समाज में चारों ओर फैले प्रेरक एवं सकारात्‍मक पहलू, वे एक जौहरी की तरह कदम-कदम पर उनकी पहचान करती चलती हैं और अपनी लेखनी के द्वारा उन्‍हें बड़ी कुशलता से अपने ब्‍लॉग पर परोसती जाती हैं। उनकी यह सजग दृष्टि जहाँ उनकी साँस्‍कृतिक समझ को व्‍याख्‍यायित करती है, वहीं उनके ब्‍लॉग में विविधता का ऐसा रंग भरती है, जो पाठकों को सहज रूप से आकर्षित करता है।

कविता, कहानी, नाटक, समीक्षा, संस्‍मरण जैसी विधाओं में अपने के सहज महसूस करने वाली आकाँक्षा वास्‍तव एक बहुआयामी रचनाकार हैं। एक ओर जहाँ वे आधुनिक युग की नारियों को समय की विद्रूपताओं के साथ चलने की राह दिखाती हैं, वहीं वे बाल साहित्‍य की सार्थक रचनाओं का प्रणयन कर बच्‍चों की भी सच्‍ची दोस्‍त बन जाती हैं। उनकी लेखनी की यह विविधता ‘शब्‍द-शिखर’ को पठनीय बनाती है और ब्‍लॉग जगत की भीड़ में उन्‍हें एक खास पहचान दिलाती है।


डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
(इसे Hindi BLogs in Media और 'मेरी दुनिया मेरे सपने' पर भी देखें)
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इससे पहले शब्द-शिखर और अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित मेरी पोस्ट की चर्चा दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका, आज समाज, गजरौला टाईम्स, जन सन्देश, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. समग्र रूप में प्रिंट-मीडिया में 28वीं बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है.आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!
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