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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

एक बार फिर, गाँधी जी ख़ामोश थे


एक बार फिर
गाँधी जी ख़ामोश थे

सत्य और अहिंसा के प्रणेता 
की जन्मस्थली ही
सांप्रदायिकता की हिंसा में
धू-धू जल रही थी
क्या इसी दिन के लिए
हिन्दुस्तान व पाक के बँटवारे को
जी पर पत्थर रखकर स्वीकारा था!

अचानक उन्हें लगा
किसी ने उनकी आत्मा
को ही छलनी कर दिया
उन्होंने ‘हे राम’ कहना चाहा
पर तभी उन्मादियों की एक भीड़
उन्हें रौंदती चली गई ।

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