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सोमवार, 18 मई 2015

जहाँ सोच, वहाँ शौचालय

वक़्त के साथ समाज में काफी कुछ परिवर्तित हो रहा है।  लोगों के रहन-सहन से लेकर सोचने के तरीके तक। जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ्ता अभियान की बात की है, इसको अपने भाषणों में सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है, लोगों में भी एक नई चेतना का संचार हुआ है। अपने देश में यह किसी से नहीं छुपा है कि आज भी गाँवों में अधिकतर महिलाएं और पुरुष दोनों ही खुले में शौच जाते हैं। जो लोग अपनी बहू-बेटियों को चौखट लांघने की इजाजत नहीं देते, वहाँ भी महिलाएं सुबह-सुबह सड़कों के किनारे और खेतों में शौच से निवृत्त होती दिखाई देती हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 53 फीसदी लोग खुले में शौच करते हैं। ग्रामीण महिलाएं शाम होने का इंतजार करती हैं और अंधेरा होने पर सड़क किनारे शौच करने जाती हैं। किसी गाड़ी की रोशनी पड़ते ही कुछ देर के लिए खड़ी हो जाती हैं। यह इक्कीसवीं सदी के भारत की एक शर्मसार करने वाली हकीकत है।

शौचालय एक ऐसा मामला है, जिसमें कई बार तो तथाकथित सभ्य समाज के लोग बात करना गंवारा भी नहीं समझते। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहते हुए जयराम रमेश ने जब  भारत में मंदिर और टॉयलेट दोनों की एक साथ चर्चा की तो उनके बयां पर कोहराम मच गया था। उन्होंने लोगों के बीच सफाई के लिए जागरूकता बढ़ाने को लेकर निर्मल भारत यात्रा को हरी झंडी दिखाते हुए कहा था कि हमारे देश में मंदिर से ज्यादा टॉयलेट महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि 64 फीसद भारतीय खुले में शौच करते हैं। अब यह साबित हो चुका है कि खुले में शौच भारत में कुपोषण की बड़ी वजह है। उन्होंने घोषणा की थी कि पिछले पांच वर्षो में ग्रामीण स्वच्छता पर सरकार ने 45 हजार करोड़ खर्च किए हैं और अगले पांच वर्षो में इस पर 1.08 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। 

शौचालय या टॉयलेट से सबसे ज्यादा प्रभावित तो बेटियाँ होती हैं।  ऐसे में तमाम ऐसी घटनाएँ अब खुलकर सामने आ रही हैं जहाँ घर में शौचालय न होने के कारण वे अपने पतियों को छोड़ गईं या भरे मंडप में विवाह से ही मना कर दिया। महाराष्ट्र में 30 साल की संगीता ने ससुराल में टॉयलेट बनवाने के लिए अपना मंगलसूत्र बेच दिया था, बाद में संगीता को राज्य की ग्रामीण विकास मंत्री पंकजा मुंडे ने सम्मानित किया और एक सोने का हार गिफ्ट में दिया था। 21 वीं सदी की ये बेटियाँ शिक्षा की बदौलत अब जागरूक हो रही हैं और नए आयाम  भी स्थापित कर रही हैं।


हाल ही में अकोला, महाराष्ट्र की एक बेटी चैताली को पता चला कि उसके नए घर (ससुराल) में कोई टॉयलेट नहीं हैं तो उसने अपनी शादी के दौरान घरवालों के सामने गहने और सामान की बजाय टॉयलेट की मांग करके उनको हक्काबक्का कर दिया।  बेटी की इस मांग को सुनकर सब हैरान रह गए।  खैर, पिता ने बेटी की बात मान ली और 18 हजार की लागत से एक रेडीमेट टॉयलेट बनवाकर बेटी को गिफ्ट कर दिया। शायद यह देश का पहला मामला है, जब लड़की के परिवालवालों ने गहने और अन्य गृहस्थी के सामान के बदले शादी में ऐसा गिफ्ट दिया है। यह पहल यहीं नहीं ख़त्म हुई, रेडीमेड टॉयलेट बनाने वाले अरविंद देथे को जब पता चला कि चैताली के पिता इसे शादी में गिफ्ट कर रहे हैं तो उन्होंने इसे सब्सिडी रेट पर देने का फैसला किया। अरविंद ने कहा कि चैताली की इस पहल से देश की उन लड़कियों को फायदा मिलेगा, जिनके ससुराल में टॉयलेट नहीं है। वहीं, चैताली के पति देवेंद्र ने घर में स्थाई टॉयलेट बनवाने की बात कही है। इस बीच भारत में स्वच्छता के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था सुलभ इंटरनेशनल को चैताली की स्थिति के बारे में जानकारी मिली और उसने दुल्हन को 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार देने की घोषणा की। 

वाकई आज भी अपने देश में तमाम रूढ़ियाँ और परम्पराएँ, प्रगतिशीलता के आड़े आती हैं। अभिनेत्री विद्या बालन का टीवी पर दिखने वाला विज्ञापन ''जहाँ सोच, वहाँ शौचालय'' अभी भी हमारे मर्म को छूता है। मोदी सरकार आने के बाद तमाम कार्पोरेट कम्पनियों ने अपनी सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी के तहत शौचालय बनवाने की घोषणा की है। पर आज जरूरत सिर्फ शौचालय बनवाने की ही नहीं, वहाँ समुचित पानी पहुँचाने और उसे भी स्वच्छ रखने की है, ताकि हम स्वच्छ भारत में स्वच्छ साँस ले सकें। 

- आकांक्षा यादव @ www.shabdshikhar.blogspot.com/  
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