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रविवार, 11 अप्रैल 2010

आजादी के आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं कस्तूरबा गाँधी (जयंती पर)

कहते हैं हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है. एक तरफ वह घर की जिम्मेदारियां उठाकर पुरुष को छोटी-छोटी बातों से सेफ करती है, वहीँ वह एक निष्पक्ष सलाहकार के साथ-साथ हर गतिविधि को संबल देती है. महात्मा गाँधी के नाम से भला कौन अपरिचित होगा. उनकी जयंती से लेकर पुण्यतिथि तक बड़े धूम धाम से मनाई जाती है, पर जिस महिला ने उन्हें जीवन भर संबल दिया, उन्हें कोई नहीं याद करता. तो आज बात करते हैं गाँधी जी की धर्म पत्नी कस्तूरबा गाँधी की, जिनकी आज जयंती है.

गुजरात में 11 अप्रैल, 1869 को जन्मीं कस्तूरबा का 14 साल की आयु में ही मोहनदास करमचंद गाँधी जी के साथ बाल विवाह हो गया था. वे आयु में गांधी जी से 6 मास बड़ी थीं. वास्तव में 7 साल की अवस्था में 6 साल के मोहनदास के साथ उनकी सगाई कर दी गई और 13 साल की आयु में उन दोनों का विवाह हो गया। जिस उम्र में बच्चे शरारतें करते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं, उस उम्र में कस्तूरबा ने पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन आरंभ कर दिया. वह गाँधी जी के धार्मिक एवं देशसेवा के महाव्रतों में सदैव उनके साथ रहीं। यही उनके सारे जीवन का सार है। गाँधी जी के अनेक उपवासों में बा प्राय: उनके साथ रहीं और उनकी जिम्मेदारियों का निर्वाह करती रहीं। आजादी की जंग में जब भी गाँधी जी गिरफ्तार हुए, सारा दारोमदार कस्तूरबा बा के कन्धों पर ही पड़ा. यदि इतने सब के बीच गाँधी जी स्वस्थ रहे और नियमित दिनचर्या का पालन करते रहे तो इसके पीछे कस्तूरबा बा थीं, जो उनकी हर छोटी-छोटी बात का ध्यान रखतीं और हर तकलीफ अपने ऊपर लेतीं. तभी तो गाँधी जी ने कस्तूरबा बा को अपनी माँ समान बताया था, जो उनका बच्चों जैसा ख्याल रखतीं.

विवाह के बाद कस्तूरबा और मोहनदास 1888 ई. तक लगभग साथ-साथ ही रहे किंतु गाँधी जी के इंग्लैंड प्रवास के बाद से लगभग अगले 12 वर्ष तक दोनों प्राय: अलग-अलग से रहे। इंग्लैंड प्रवास से लौटने के बाद शीघ्र ही गाँधी जी को अफ्रीका चला जाना पड़ा। जब 1896 में वे भारत आए तब कस्तूरबा बा को अपने साथ ले गए। तब से बा गाँधी जी के पद का अनुगमन करती रहीं। उन्होंने उनकी तरह ही अपने जीवन को सादा बना लिया था। 1904-1911 तक वह डरबन स्थित गाँधी जी के फिनिक्स आश्रम में काफी सक्रिय रहीं.

एक वाकया कस्तूरबा बा की जीवटता और संस्कारों का परिचायक है जब दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की दयनीय स्थिति के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 3 महीने कैद की सजा सुनाई गई. वस्तुत: दक्षिण अफ्रीका में 1913 में एक ऐसा कानून पास हुआ जिसके अनुसार ईसाई मत के अनुसार किए गए और विवाह विभाग के अधिकारी के यहाँ दर्ज किए गए विवाह के अतिरिक्त अन्य विवाहों की मान्यता अग्राह्य की गई थी। गाँधी जी ने इस कानून को रद कराने का बहुत प्रयास किया पर जब वे सफल न हुए तब उन्होंने सत्याग्रह करने का निश्चय किया और उसमें सम्मिलित होने के लिये स्त्रियों का भी आह्वान किया। पर इस बात की चर्चा उन्होंने अन्य स्त्रियों से तो की किंतु बा से नहीं की। वे नहीं चाहते थे कि बा उनके कहने से सत्याग्रहियों में जायँ और फिर बाद में कठिनाइयों में पड़कर विषम परिस्थिति उपस्थित करें। जब कस्तूरबा बा ने देखा कि गाँधी जी ने उनसे सत्याग्रह में भाग लेने की कोई चर्चा नहीं की तो बड़ी दु:खी हुई और फिर स्वेच्छया सत्याग्रह में सम्मिलित हुई और तीन अन्य महिलाओं के साथ जेल गर्इं। जेल में जो भोजन मिला वह अखाद्य था अत: उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया। किंतु जब उनके इस अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तो उन्होंने उपवास करना आरंभ कर दिया। अंतत: पाँचवें दिन अधिकारियों को झुकना पड़ा। किंतु जो फल दिए गए वह पूरे भोजन के लिये पर्याप्त न थे। अत: कस्तूरबा बा को तीन महीने जेल में आधे पेट भोजन पर रहना पड़ा। जब वे जेल से छूटीं तो उनका शरीर ढांचा मात्र रह गया था, पर उनके हौसले में कोई कमी नहीं थी.

भारत लौटने के बाद भी वे गाँधी जी के साथ काफी सक्रिय रहीं. चंपारन के सत्याग्रह के समय बा तिहरवा ग्राम में रहकर गाँवों में घूमती और दवा वितरण करती रहीं। उनके इस काम में निलहे गोरों को राजनीति की बू आई। उन्होंने बा की अनुपस्थिति में उनकी झोपड़ी जलवा दी। बा की उस झोपड़ी में बच्चे पढ़ते थे। अपनी यह पाठशाला एक दिन के लिए भी बंद करना उन्हें पसंद न था अत: उन्होंने सारी रात जागकर घास का एक दूसरा झोपड़ा खड़ा किया। इसी प्रकार खेड़ा सत्याग्रह के समय बा स्त्रियों में घूम घूमकर उन्हें उत्साहित करती रहीं।जब 1932 में हरिजनों के प्रश्न को लेकर बापू ने यरवदा जेल में आमरण उपवास आरंभ किया उस समय बा साबरमती जेल में थीं। उस समय वे बहुत बेचैन हो उठीं और उन्हें तभी चैन मिला जब वे यरवदा जेल भेजी गर्इं।

गाँधी जी के अंग्रेजों भारत छोडो आन्दोलन के दौरान 9 अगस्त, 1942 को गाँधी जी के गिरफ्तार हो जाने पर बा ने, शिवाजी पार्क (बंबई) में, जहाँ स्वयं गाँधी जी भाषण देने वाले थे, सभा में भाषण करने का निश्चय किया किंतु पार्क के द्वार पर ही अंग्रेजी सर्कार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. दो दिन बाद वे पूना के आगा खाँ महल में भेज दी गर्इं, जहाँ गाँधी जी पहले से गिरफ्तार कर भेजे चुके थे। उस समय वे अस्वस्थ थीं। 15 अगस्त को जब यकायक गाँधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई ने महाप्रयाण किया तो वे बार बार यही कहती रहीं महादेव क्यों गया; मैं क्यों नहीं? बाद में महादेव देसाई का चितास्थान उनके लिए शंकर-महादेव का मंदिर सा बन गया। वे नित्य वहाँ जाती, समाधि की प्रदक्षिणा कर उसे नमस्कार करतीं। वे उसपर दीप भी जलवातीं। यह उनके लिए सिर्फ दिया नहीं था, बल्कि इसमें वह आने वाली आजादी की लौ भी देख रही थीं. कस्तूरबा बा की दिली तमन्ना देश को आजाद देखने की थी, पर उनका गिरफ्तारी के बाद उनका जो स्वास्थ्य बिगड़ा वह फिर अंतत: उन्हें मौत की तरफ ले गया और 22 फरवरी, 1944 को वे सदा के लिए सो गयीं.

दुर्भाग्यवश कस्तूरबा बा को आज कोई भी याद नहीं करता, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि वे गाँधी जी के पीछे खड़ी नहीं होती तो, आजादी हमसे दूर भी खिसक सकती थी. यदि गाँधी जी राष्ट्र-पिता हैं तो वाकई कस्तूरबा राष्ट्र-माता, जिन्होंने एक साथ अपने पति और देश दोनों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए इसी माटी में अपना नश्वर शरीर त्याग दिया. आज उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन !!

24 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बेहतर आलेख...हमारा भी नमन!

प्रज्ञा पांडेय ने कहा…

बा पर इतनी सारगर्भित सामग्री देखकर मन भाव से पूरित हों गया .. आपको बहुत बधाई .. आपने बा को शिद्दत से याद किया और हमें भी याद दिलाया.सच है इतना सुदृढ़ साथ ना होता तो गांधी जी इतने मजबूत नहीं होते . बा को शत शत नमन .

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

हमारा भी नमन,बेहतरीन जानकारी.

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World ने कहा…

कस्तूरबा बा को आपने याद किया और हमें भी याद दिलाया...अच्छा लगा. यही एक अच्छे blogar की पहचान है.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

बा को पुण्य नमन. आपने अच्छी याद दिलाई.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

बा को पुण्य नमन. आपने अच्छी याद दिलाई.

S R Bharti ने कहा…

बा पर पहली बार इतनी सारगर्भित सामग्री देखी. बा के बिना गाँधी जी वो कभी नहीं होते, जो थे. बा को शत-शत नमन.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

आपने बा को शिद्दत से याद किया और हमें भी याद दिलाया.सच है इतना सुदृढ़ साथ ना होता तो गांधी जी इतने मजबूत नहीं होते . बा को शत शत नमन .

Shyama ने कहा…

कस्तूरबा गाँधी जी की जयंती पर पुण्य स्मरण के लिए आभार. बा को हार्दिक प्रणाम व स्मरण.

बेनामी ने कहा…

चलिए किसी ने तो बा का पुनीत स्मरण किया..अन्यथा पुरुषवादी समाज में लोगों को गाँधी जी के गान से फुर्सत कहाँ..शत-शत नमन.

Amit Kumar Yadav ने कहा…

हमें तो कस्तूरबा जी के बारे में तमाम नई जानकारियां मिली...साधुवाद.

Amit Kumar Yadav ने कहा…

बा को शत-शत नमन .

Shahroz ने कहा…

आकांक्षा जी, आप तो शब्द-शिखर के माध्यम से कई ऐसी बातें बताती हैं, जिनके बारे में लोगों को बहुत कुछ नहीं पता होता. कस्तूरबा जी की इस वृहद् भूमिका से परिचय कराने के लिए धन्यवाद. बा को नमन.

Bhanwar Singh ने कहा…

सारगर्भित लेख. कस्तूरबा जी को नमन.

मन-मयूर ने कहा…

कस्तूरबा गाँधी जी के बिना गाँधी जी का मूल्यांकन कभी पूरा नहीं हो सकता. आपने अच्छा स्मरण दिलाया..शत-शत नमन.

raghav ने कहा…

बहुत बेहतर आलेख...हमारा भी नमन!

Urmi ने कहा…

आपने कस्तूरबा गाँधी जी की जयंती पर बहुत बढ़िया और शानदार आलेख प्रस्तुत किया है! बधाई!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

यह बहुत ही प्रेरक पोस्ट रही!

कस्तूरबा जी को नमन!

संजय भास्‍कर ने कहा…

कस्तूरबा बा को आपने याद किया और हमें भी याद दिलाया...अच्छा लगा.

संजय भास्‍कर ने कहा…

हमें तो कस्तूरबा जी के बारे में तमाम नई जानकारियां मिली

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सारगर्भित आलेख....कस्तूरबा गाँधी के विषय में अच्छी जानकारी मिली...आभार

BS Tripathi ने कहा…

Nice

BS Tripathi ने कहा…

बहुत अच्छा

Unknown ने कहा…

🙏🏻 पूज्य बा और बापू को प्रणाम 🙏🏻
🇮🇳 जयहिंद धन्यवाद् शब्द शिखर