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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' में शब्द-शिखर की चर्चा

'शब्द शिखर' पर 22 अप्रैल, 2010 को विश्व पृथ्वी दिवस के उपलक्ष्य में प्रस्तुत पोस्ट पृथ्वी दिवस पर भाये ई-पार्क को हिन्दी दैनिक पत्र 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग राग' में 23 अप्रैल, 2010 को स्थान दिया गया है.'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' में दूसरी बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है और समग्र रूप में प्रिंट-मीडिया में 17वीं बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है.. आभार !!

इससे पहले शब्द-शिखर और अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित मेरी पोस्ट की चर्चा अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका,गजरौला टाईम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!

(चित्र साभार : प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा)

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

पृथ्वी दिवस पर भाये ई-पार्क


आज विश्व पृथ्वी दिवस है. वैसे आजकल हर दिन का फैशन है, पर पृथ्वी दिवस की महत्ता इसलिए बढ़ जाती है कि यह पृथ्वी और पर्यावरण के बारे में लोगों को जागरूक करता है. यदि पृथ्वी ही नहीं रहेगी तो फिर जीवन का अस्तित्व ही नहीं रहेगा. हम कितना भी विकास कर लें, पर पर्यावरण की सुरक्षा को ललकार किया गया कोई भी कार्य समूची मानवता को खतरे में डाल सकता है. सर्वप्रथम पृथ्वी दिवस का विचार अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में पर्यावरण शिक्षा के अभियान रूप में की गयी, पर धीरे-धीरे यह पूरे विश्व में प्रचारित हो गया. आज हम अपने आसपास प्रकृति को न सिर्फ नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि भावी पीढ़ियों से प्रकृति को दूर भी कर रहे हैं. ऐसे परिवेश में कल वास्तविक पार्क की बजाय हमें ई-पार्क देखने को मिले, तो कोई बड़ी बात नहीं. इक निगाह कृष्ण कुमार यादव जी की इस कविता पर भी दौड़ाइए और सोचिये-


बचपन में पढ़ते थे
ई फॉर एलीफैण्ट
अभी भी ई अक्षर देख
भारी-भरकम हाथी का शरीर
सामने घूम जाता है
पर अब तो ई
हर सवाल का जवाब बन गया है
ई-मेल, ई-शॉप, ई-गवर्नेंस
हर जगह ई का कमाल
एक दिन अखबार में पढ़ा
शहर में ई-पार्क की स्थापना
यानी प्रकृति भी ई के दायरे में
पहुँच ही गया एक दिन
ई-पार्क का नजारा लेने
कम्प्यूटर-स्क्रीन पर बैठे सज्जन ने
माउस क्लिक किया और
स्क्रीन पर तरह-तरह के देशी-विदेशी
पेड़-पौधे और फूल लहराने लगे
बैकग्राउण्ड में किसी फिल्म का संगीत
बज रहा था और
नीचे एक कंपनी का विज्ञापन
लहरा रहा था
अमुक कोड नंबर के फूल की खरीद हेतु
अमुक नम्बर डायल करें
वैलेण्टाइन डे के लिए
फूलों की खरीद पर
आकर्षक गिटों का नजारा भी था
पता ही नहीं चला
कब एक घंटा गुजर गया
ई-पार्क का मजा ले
ज्यों ही चलने को हुआ
उन जनाब ने एक कम्प्यूटराइज्ड रसीद
हाथ में थमा दी
आखिर मैंने पूछ ही लिया
भाई! न तो पार्क में मैने
परिवार के सदस्यों के साथ दौड़ लगायी
न ही अपने टॉमी कुत्ते को घुमाया
और न ही मेरी पत्नी ने पूजा की खातिर
कोई फूल या पत्ती तोड़ी
फिर काहे की रसीद ?
वो हँसते हुये बोला
साहब! यही तो ई-पार्क का कमाल है
न दौड़ने का झंझट
न कुत्ता सभालने का झंझट
और न ही पार्क के चौकीदार द्वारा
फूल पत्तियाँ तोड़ते हुए पकड़े जाने पर
सफाई देने का झंझट
यहाँ तो आप अच्छे-अच्छे
मनभावन फूलों व पेड़-पौधें का नजारा लीजिये
और आँखों को ताजगी देते हुये
आराम से घर लौट जाईये !!

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

गुणों की खान है नारियल

नारियल भला किसे नहीं भाता. फिर समुद्र के किनारे रहने वालों की तो बल्ले-बल्ले है. जब जी में आया नारियल का भोग लगा लिया.नारियल के कच्चे फल को डाभ कहते हैं जिसके अन्दर का पानी स्वास्थ्य और जायके की दृष्टि से अच्छा माना जाता है. किसी को नारियल का पानी अच्छा लगता है तो किसी को इसकी मलाई. यदि आपको इसकी मलाई अच्छी लगती है तो दुकानदार को विशेष रूप से बताना पड़ेगा कि मलाई वाला नारियल चाहिए. फिर नारियल के कवच का चम्मच और मजेदार मलाई. नारियल का गूदा, पानी और तेल इस्तेमाल में लाया जाता है। नारियल न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट होता है, इसे बेहद पौष्टिक भी माना गया है। इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, विटामिन और खनिज होता है। रसोई, स्वास्थ्य, खूबसूरती और धार्मिक चारों मामलों में इसका जवाब नहीं. बाहर से कड़ा पर अन्दर से मुलायम नारियल को यूँ ही श्रीफल नहीं कहा जाता है. नारियल को संस्कृत में नालिकेरः कहते हैं। "नल्यते केन वायुना ईर्यते इति नालिकेर:"। वर्णभ्रंश के कारण, सामान्य भाषा में यह नारिकेल तथा बाद में नारियल बन गया. आइये आज नारियल के पानी का मजा लेते हुए ये पोस्ट नारियल को ही समर्पित करते हैं और इसके भरपूर गुणों की चर्चा करते हैं.

-नारियल इंफ्लूएंजा, दाद, चेचक, हेपेटाइटिस सी, एड्स जैसे बीमारियों के लिए जिम्मेदार वायरस को खत्म कर देता है।
-नारियल उन बैक्टीरिया को भी खत्म करता है जो अल्सर, गले का संक्रमण, दांतों की बीमारी और निमोनिया पैदा करते हैं।
-नारियल शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है।
-नारियल इंसुलिन के स्राव को बेहतर करता है रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को संतुलित बनाए रखता है। यह डायबिटीज का खतरा भी घटाता है।
-नारियल के सेवन से शरीर द्वारा कैल्शियम और मैग्नीशियम के अवशोषण की प्रक्रिया बेहतर हो जाती है। यह हड्डियों और दांतों को भी मजबूत बनाता है।
-नारियल आस्टियोपोरोसिस [हड्डियों का कमजोर हो जाना] के खतरे से बचाता है।
-नारियल पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है। -नारियल बवासीर में होने वाले दर्द को घटाने में कारगर है।
-नारियल ब्रेस्ट, कोलन [बड़ी आंत] और लिवर कैंसर के खतरे से बचाता है।
-नारियल दिल के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद है। यह कोलेस्ट्राल के अनुपात को सुधारता है और दिल की बीमारी के खतरे को कम करता है।
-नारियल पित्ताशय से संबंधित बीमारी के लक्षणों से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।
-नारियल किडनी के स्टोन को गलाने में मदद करता है।
-नारियल में कैलोरी काफी मात्रा में पाई जाती हैं।
-नारियल मोटापे से बचाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क के भोजन में प्रतिदिन 15 मिग्रा जिंक होना जरूरी है जिससे मोटापे से बचा जा सके। ताजा नारियल में जिंक भरपूर मात्रा में होता है।
-नारियल सूर्य की पराबैगनी किरणों के दुष्प्रभाव से शरीर की रक्षा करता है।
-नारियल शरीर पर पड़ने वाली झुर्रियों और शिथिल पड़ती त्वचा के लिए उपयोगी होता है।
- नारियल से हैजे की उल्टियाँ भी बंद हो जाती हैं. हैजे में यदि उल्टियाँ बंद न हो पा रही हों तो रोगी को तुरंत नारियल पानी पिलाना चाहिए।-स्वस्थ सुंदर संतान प्राप्ति के लिए गर्भवती महिला को 3-4 टुकड़े नारियल प्रतिदिन चबा-चबाकर खाने चाहिए। इसके साथ एक चम्मच मक्खन, मिसरी तथा थोड़ी सी पिसी कालीमिर्च मिलाकर चाटें। बाद में थोड़ी सी सौंफ चबाएँ। इसके आधे घंटे बाद तक कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। पुराने सूजाक और मूत्रकृच्छ में भी इससे आश्चर्यजनक लाभ होता है।
-नारियल का तेल किसी दवा से कम नहीं। स्वास्थ्य के लिहाज से इसे सबसे अच्छा तेल माना गया है।सूखे नारियल से तेल निकाला जाता है। इस तेल की मालिश त्वचा तथा बालों के लिए बहुत अच्छी होती है। नारियल तेल की मालिश से मस्तिष्क भी ठंडा रहता है। गर्मी में लगने वाले दस्तों में एक कप नारियल पानी में पिसा जीरा मिलाकर पिलाने से दस्तों में तुरंत आराम मिलता है।
-नारियल से बर्फी, लड्डू, केक इत्यादि तमाम मिठाइयों सहित जायकेदार चटनी भी बनती है.

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

..फिर से बचपन के ख्यालों में

कई बार हमें छोटी-छोटी बातें सुकून देती हैं. हम फिर से बचपन में लौटना चाहते हैं. पर क्या करें बड़े होने के आदी जो हो गए हैं. पर शरीर बड़ा होने से क्या हुआ, मन तो अभी भी मानो बचपन की दहलीज पर है. हम बातें जरुर बड़ी-बड़ी करते हैं, पर कई बार हमारी बातों में भी बचपना झलकता है. तो इंतजार किस बात का, आइये एक बार फिर से बचपन के ख्यालों में खो जाते हैं और महसूस करते हैं अपने उस बीते बचपन को...!!

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..और हाँ ऐसी ही खुशियों को सहेजने के लिए ब्लागोत्सव -2010 भी आरंभ हो चुका है, जरुर जाइएगा वहाँ पर. वहाँ पर कला दीर्घा में आज हमारी प्यारी बिटिया रानी अक्षिता(पाखी) की अभिव्यक्ति भी देखिएगा और अपनी टिप्पणियों से अवगत कराइयेगा !!

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

हिन्दू धर्म से विमुख डा0 अम्बेडकर (जयंती पर विशेष)

डा0 अम्बेडकर दूरदृष्टा और विचारों से क्रांतिकारी थे तथा सभी धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन पश्चात वे बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख हुए। एक ऐसा धर्म जो मानव को मानव के रूप में देखता था, किसी जाति के खाँचे में नहीं। एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित था न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अंधविश्वास पर। अम्बेडकर बौद्ध धर्म के ‘आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और दलितों व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे।

1935 में नासिक जिले के भेवले में आयोजित महार सम्मेलन में ही अम्बेडकर ने घोषणा कर दी थी कि- ‘‘आप लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं धर्म परिवर्तन करने जा रहा हूँ। मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, क्योंकि यह मेरे वश में नहीं था लेकिन मैं हिन्दू धर्म में मरना नहीं चाहता। इस धर्म से खराब दुनिया में कोई धर्म नहीं है इसलिए इसे त्याग दो। सभी धर्मों में लोग अच्छी तरह रहते हैं पर इस धर्म में अछूत समाज से बाहर हैं। स्वतंत्रता और समानता प्राप्त करने का एक रास्ता है धर्म परिवर्तन। यह सम्मेलन पूरे देश को बतायेगा कि महार जाति के लोग धर्म परिवर्तन के लिये तैयार हैं। महार को चाहिए कि हिन्दू त्यौहारों को मनाना बन्द करें, देवी देवताओं की पूजा बन्द करें, मंदिर में भी न जायें और जहाँ सम्मान न हो उस धर्म को सदा के लिए छोड़ दें।’’

अम्बेडकर की इस घोषणा पश्चात ईसाई मिशनरियों ने उन्हें अपनी ओर खींचने की भरपूर कोशिश की और इस्लाम अपनाने के लिये भी उनके पास प्रस्ताव आये। कहा जाता है कि हैदराबाद के निजाम ने तो इस्लाम धर्म अपनाने के लिये उन्हें ब्लैंक चेक तक भेजा था पर अम्बेडकर ने उसे वापस कर दिया।

वस्तुतः अम्बेडकर एक ऐसा धर्म चाहते थे, जिसकी जड़ें भारत में हों। अन्ततः 24 मई 1956 को बुद्ध की 2500 वीं जयन्ती पर अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने की घोषणा कर दी और अक्टूबर 1956 में दशहरा के दिन नागपुर में हजारों शिष्यों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे भगवान बुद्ध के एक उपदेश का हवाला भी दिया- ‘‘हे भिक्षुओं! आप लोग कई देशों और जातियों से आये हुए हैं। आपके देश-प्रदेश में अनेक नदियाँ बहती हैं और उनका पृथक अस्तित्व दिखाई देता है। जब ये सागर में मिलती हैं, तब अपने पृथक अस्तित्व को खो बैठती हैं और समुद्र में समा जाती हैं। बौद्ध संघ भी समुद्र की ही भांति है। इस संघ में सभी एक हैं और सभी बराबर हैं। समुद्र में गंगा या यमुना के मिल जाने पर उसके पानी को अलग पहचानना कठिन है। इसी प्रकार आप लोगों के बौद्ध संघ में आने पर सभी एक हैं, सभी समान हैं।’’

बौद्ध धर्म ग्रहण करने के कुछ ही दिनों पश्चात 6 दिसम्बर 1956 को डा0 अम्बेडकर ने नश्वर शरीर को त्याग दिया पर ‘आत्मदीपोभव’ की तर्ज पर समाज के शोषित, दलित व अछूतों के लिये विचारों की एक पुंज छोड़ गए। उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा था कि- ‘‘डा0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया। वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरूद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।’’

(कल 14 अप्रैल को डा0 अम्बेडकर जी की जयंती है..शत-शत नमन)

रविवार, 11 अप्रैल 2010

आजादी के आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं कस्तूरबा गाँधी (जयंती पर)

कहते हैं हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है. एक तरफ वह घर की जिम्मेदारियां उठाकर पुरुष को छोटी-छोटी बातों से सेफ करती है, वहीँ वह एक निष्पक्ष सलाहकार के साथ-साथ हर गतिविधि को संबल देती है. महात्मा गाँधी के नाम से भला कौन अपरिचित होगा. उनकी जयंती से लेकर पुण्यतिथि तक बड़े धूम धाम से मनाई जाती है, पर जिस महिला ने उन्हें जीवन भर संबल दिया, उन्हें कोई नहीं याद करता. तो आज बात करते हैं गाँधी जी की धर्म पत्नी कस्तूरबा गाँधी की, जिनकी आज जयंती है.

गुजरात में 11 अप्रैल, 1869 को जन्मीं कस्तूरबा का 14 साल की आयु में ही मोहनदास करमचंद गाँधी जी के साथ बाल विवाह हो गया था. वे आयु में गांधी जी से 6 मास बड़ी थीं. वास्तव में 7 साल की अवस्था में 6 साल के मोहनदास के साथ उनकी सगाई कर दी गई और 13 साल की आयु में उन दोनों का विवाह हो गया। जिस उम्र में बच्चे शरारतें करते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं, उस उम्र में कस्तूरबा ने पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन आरंभ कर दिया. वह गाँधी जी के धार्मिक एवं देशसेवा के महाव्रतों में सदैव उनके साथ रहीं। यही उनके सारे जीवन का सार है। गाँधी जी के अनेक उपवासों में बा प्राय: उनके साथ रहीं और उनकी जिम्मेदारियों का निर्वाह करती रहीं। आजादी की जंग में जब भी गाँधी जी गिरफ्तार हुए, सारा दारोमदार कस्तूरबा बा के कन्धों पर ही पड़ा. यदि इतने सब के बीच गाँधी जी स्वस्थ रहे और नियमित दिनचर्या का पालन करते रहे तो इसके पीछे कस्तूरबा बा थीं, जो उनकी हर छोटी-छोटी बात का ध्यान रखतीं और हर तकलीफ अपने ऊपर लेतीं. तभी तो गाँधी जी ने कस्तूरबा बा को अपनी माँ समान बताया था, जो उनका बच्चों जैसा ख्याल रखतीं.

विवाह के बाद कस्तूरबा और मोहनदास 1888 ई. तक लगभग साथ-साथ ही रहे किंतु गाँधी जी के इंग्लैंड प्रवास के बाद से लगभग अगले 12 वर्ष तक दोनों प्राय: अलग-अलग से रहे। इंग्लैंड प्रवास से लौटने के बाद शीघ्र ही गाँधी जी को अफ्रीका चला जाना पड़ा। जब 1896 में वे भारत आए तब कस्तूरबा बा को अपने साथ ले गए। तब से बा गाँधी जी के पद का अनुगमन करती रहीं। उन्होंने उनकी तरह ही अपने जीवन को सादा बना लिया था। 1904-1911 तक वह डरबन स्थित गाँधी जी के फिनिक्स आश्रम में काफी सक्रिय रहीं.

एक वाकया कस्तूरबा बा की जीवटता और संस्कारों का परिचायक है जब दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की दयनीय स्थिति के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 3 महीने कैद की सजा सुनाई गई. वस्तुत: दक्षिण अफ्रीका में 1913 में एक ऐसा कानून पास हुआ जिसके अनुसार ईसाई मत के अनुसार किए गए और विवाह विभाग के अधिकारी के यहाँ दर्ज किए गए विवाह के अतिरिक्त अन्य विवाहों की मान्यता अग्राह्य की गई थी। गाँधी जी ने इस कानून को रद कराने का बहुत प्रयास किया पर जब वे सफल न हुए तब उन्होंने सत्याग्रह करने का निश्चय किया और उसमें सम्मिलित होने के लिये स्त्रियों का भी आह्वान किया। पर इस बात की चर्चा उन्होंने अन्य स्त्रियों से तो की किंतु बा से नहीं की। वे नहीं चाहते थे कि बा उनके कहने से सत्याग्रहियों में जायँ और फिर बाद में कठिनाइयों में पड़कर विषम परिस्थिति उपस्थित करें। जब कस्तूरबा बा ने देखा कि गाँधी जी ने उनसे सत्याग्रह में भाग लेने की कोई चर्चा नहीं की तो बड़ी दु:खी हुई और फिर स्वेच्छया सत्याग्रह में सम्मिलित हुई और तीन अन्य महिलाओं के साथ जेल गर्इं। जेल में जो भोजन मिला वह अखाद्य था अत: उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया। किंतु जब उनके इस अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तो उन्होंने उपवास करना आरंभ कर दिया। अंतत: पाँचवें दिन अधिकारियों को झुकना पड़ा। किंतु जो फल दिए गए वह पूरे भोजन के लिये पर्याप्त न थे। अत: कस्तूरबा बा को तीन महीने जेल में आधे पेट भोजन पर रहना पड़ा। जब वे जेल से छूटीं तो उनका शरीर ढांचा मात्र रह गया था, पर उनके हौसले में कोई कमी नहीं थी.

भारत लौटने के बाद भी वे गाँधी जी के साथ काफी सक्रिय रहीं. चंपारन के सत्याग्रह के समय बा तिहरवा ग्राम में रहकर गाँवों में घूमती और दवा वितरण करती रहीं। उनके इस काम में निलहे गोरों को राजनीति की बू आई। उन्होंने बा की अनुपस्थिति में उनकी झोपड़ी जलवा दी। बा की उस झोपड़ी में बच्चे पढ़ते थे। अपनी यह पाठशाला एक दिन के लिए भी बंद करना उन्हें पसंद न था अत: उन्होंने सारी रात जागकर घास का एक दूसरा झोपड़ा खड़ा किया। इसी प्रकार खेड़ा सत्याग्रह के समय बा स्त्रियों में घूम घूमकर उन्हें उत्साहित करती रहीं।जब 1932 में हरिजनों के प्रश्न को लेकर बापू ने यरवदा जेल में आमरण उपवास आरंभ किया उस समय बा साबरमती जेल में थीं। उस समय वे बहुत बेचैन हो उठीं और उन्हें तभी चैन मिला जब वे यरवदा जेल भेजी गर्इं।

गाँधी जी के अंग्रेजों भारत छोडो आन्दोलन के दौरान 9 अगस्त, 1942 को गाँधी जी के गिरफ्तार हो जाने पर बा ने, शिवाजी पार्क (बंबई) में, जहाँ स्वयं गाँधी जी भाषण देने वाले थे, सभा में भाषण करने का निश्चय किया किंतु पार्क के द्वार पर ही अंग्रेजी सर्कार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. दो दिन बाद वे पूना के आगा खाँ महल में भेज दी गर्इं, जहाँ गाँधी जी पहले से गिरफ्तार कर भेजे चुके थे। उस समय वे अस्वस्थ थीं। 15 अगस्त को जब यकायक गाँधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई ने महाप्रयाण किया तो वे बार बार यही कहती रहीं महादेव क्यों गया; मैं क्यों नहीं? बाद में महादेव देसाई का चितास्थान उनके लिए शंकर-महादेव का मंदिर सा बन गया। वे नित्य वहाँ जाती, समाधि की प्रदक्षिणा कर उसे नमस्कार करतीं। वे उसपर दीप भी जलवातीं। यह उनके लिए सिर्फ दिया नहीं था, बल्कि इसमें वह आने वाली आजादी की लौ भी देख रही थीं. कस्तूरबा बा की दिली तमन्ना देश को आजाद देखने की थी, पर उनका गिरफ्तारी के बाद उनका जो स्वास्थ्य बिगड़ा वह फिर अंतत: उन्हें मौत की तरफ ले गया और 22 फरवरी, 1944 को वे सदा के लिए सो गयीं.

दुर्भाग्यवश कस्तूरबा बा को आज कोई भी याद नहीं करता, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि वे गाँधी जी के पीछे खड़ी नहीं होती तो, आजादी हमसे दूर भी खिसक सकती थी. यदि गाँधी जी राष्ट्र-पिता हैं तो वाकई कस्तूरबा राष्ट्र-माता, जिन्होंने एक साथ अपने पति और देश दोनों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए इसी माटी में अपना नश्वर शरीर त्याग दिया. आज उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन !!

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

'शब्द-शिखर' के एक साथ दो शतक पूरे

आज कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं. इसी उधेड़बुन में डैश बोर्ड पर गई तो मुझे आश्चर्य मिश्रित हैरानी हुई कि शब्द-शिखर पर मैंने 120 पोस्ट का सफ़र पूरा कर लिया है. यह शतक कब बन गया, पता ही नहीं चला. इस बीच चिटठा जगत पर भी शब्द-शिखर का सक्रियता क्रमांक 97 पर पहुँच गया है...तो एक ख़ुशी अपने ब्लॉग पर शतक पोस्ट मारने की व दूसरी ख़ुशी अपने इस चिट्ठे के 100 सक्रिय ब्लॉगों में पहुँचने की.

यह आप लोगों का स्नेह ही है की हम यहाँ तक पहुँचे. आपकी टिप्पणियाँ हमें सदैव प्रेरित करती हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शब्द-शिखर की चर्चा ने भी हमारी हौसला आफजाई की. तो आज की पोस्ट में इसे ही आप लोगों के साथ सेलिब्रेट करते हैं...दोनों ही मामला शतक से ही जुड़ा हुआ है, यानी शब्द-शिखर ने दो शतकों को छुआ है...एक शतक पार करने की और दूसरी शतक में स्थान पाने की.आप लोगों का स्नेह यूँ ही बना रहा तो "शब्द-शिखर" यूँ ही तरक्की के पायदान चढ़ता रहेगा. आप सभी के सहयोग के लिए आभार !!

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

बाल विवाह की भयंकरता समृद्ध राज्यों में भी

आजकल कलर्स चैनल पर चल रहा धारावाहिक 'बालिका वधू' काफी चर्चा में है. पश्चिम बंगाल में तो एक नाबालिग लड़की ने यह कहते हुए शादी से इंकार कर दिया कि बालिका वधु की आनंदी बाल विवाह का विरोध करती है। वस्तुत: बाल विवाह एक ऐसा मुद्दा है, जिसके प्रति हर कोई सचेत है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया के 40 फीसदी बाल विवाह होते हैं । पिछले साल तो भारत और अफ्रीका समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों में बाल विवाह की समस्या को खत्म करने में विदेशी सहायता के लिए अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में एक विधेयक भी पेश किया गया था.वस्तुत: बाल विवाह एक तरह से मानवाधिकार उल्लंघन है. तमाम बालिका वधुएँ गरीबी में रहने, कम वजन के बच्चों को जन्म देने, उम्र से पूर्व प्रसवावस्था में मौत का शिकार होने इत्यादि दुर्गतियों का शिकार हो जाती हैं.

कहा जाता है जो समाज जितना शिक्षित और विकसित होगा, वहाँ इस तरह की घटनाएँ उतनी ही कम होंगीं. पर वास्तव में ऐसा नहीं है. गुजरात व आंध्र प्रदेश जैसे समृद्ध व शिक्षित राज्य बाल विवाह के मामले में देश में सबसे आगे हैं. कुल मामलों में 40 फीसदी मामले इन दोनों प्रदेशों में ही दर्ज हुए हैं. पूरे भारत में वर्ष 2008 में बाल विवाह के 104 मामले आये, जिनमें से 23 गुजरात के व 19 आंध्र प्रदेश के थे. फर्क बस इतना रहा कि 2007 में आंध्र 19 मामलों के साथ प्रथम व गुजरात 14 मामलों के साथ दूसरे नंबर पर था. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2008 में कर्णाटक में 9, बिहार में 8, पश्चिम बंगाल व पंजाब में 6-6, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ में 5-5, केरल, तमिलनाडु व हरियाणा में 4-4, राजस्थान में 3, मध्य प्रदेश व हिमाचल प्रदेश में 2-2 एवं दिल्ली, गोवा, उड़ीसा व असम में 1-1 बाल विवाह के मामले दर्ज हुए. कभी बाल विवाह के मामले में राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और प0 बंगाल जैसे राज्य जाने जाते थे पर आज अपने को वायिब्रेंट व टेक्नोलाजी के अग्रदूत माने जाने वाले राज्यों में यदि इसकी दर बढ़ रही है तो यह चिंताजनक भी है और अफसोसजनक भी.आखिर यह जान बूझकर ऐसे जोड़ों को गर्त में धकेलना ही तो कहा जायेगा. वह भी तब जब भारत सरकार ने नेशनल प्लान फॉर चिल्ड्रेन 2005 में 2010 तक बाल विवाह को पूरी तरह ख़त्म करने का लक्ष्य रखा है ।

आज जहाँ हर कोई कैरियर बनाने में लगा है, वहाँ शादियाँ २५ के बाद ही हो रही हैं, पर यहाँ तो गुजरात व आंध्र जैसे सक्षम व समृद्ध राज्य 21 (लड़का) व 18 (लड़की) कि उम्र से भी पहले विवाह को नहीं रोक पा रहे हैं. ऐसी घटनाएँ एक बार फिर सिद्ध करती हैं कि शिक्षा व समृद्धि के बावजूद कुछ चीजें ऐसी हैं, जो मानवीय प्रवृत्तियों को निर्देशित करती हैं, अन्यथा बाल-विवाह के पक्ष में कोई तर्क देना तो मुश्किल ही होगा.

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं के लिए आरक्षण

लोकसभा-विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण के प्रयास बाद क्या न्यायपालिका में भी महिलाओं के लिए आरक्षण की जरुरत है. ऐसा तब सोचने की जरुरत पड़ती है, जब 29 जजों वाले सुप्रीम कोर्ट में एक भी महिला जज नहीं दिखती है. अभी तक सुप्रीम कोर्ट में 03 ही महिला जज पहुँची हैं- फातिमा बीबी, सुजाता मनोहर और रुमा पाल. और मुख्य न्यायधीश बनने का सौभाग्य तो किसी को नहीं मिला है. क्या वाकई भारत में नारी इतनी पिछड़ी हैं. आज देश की राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष से लेकर सबसे बड़ी प्रान्त की मुख्यमंत्री तक महिला हैं, फिर आजादी के 6 दशक बीत जाने के बाद भी कोई महिला सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायधीश पद पर क्यों नहीं पहुँची. अव्वल तो मात्र 03 महिलाएं ही यहाँ जज बनीं, यानि औसतन 20 साल में एक महिला. फिर न्यायपालिका में आरक्षण क्यों नहीं होना चाहिए?

सुनने में आ रहा है, जब पिछली बार एक महिला जज की वरिष्ठता की अनदेखी कर एक अन्य को प्रोन्नति देकर जज बनाया गया तो राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी ने भी यह सलाह दी थी की किसी महिला को जज क्यों नहीं बनाया जा रहा है. ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. फ़िलहाल झारखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश ज्ञान सुधा मिश्रा जी सबसे वरिष्ठ हैं, और आशा की जानी चाहिए की शीघ्र ही उनके रूप में सुप्रीम कोर्ट को चौथी महिला जज मिलेगी. पर सवाल अभी भी वहीँ कायम है कि यह सब स्थिति देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं को आरक्षण क्यों न दिया जाय ??

बुधवार, 31 मार्च 2010

भूकम्प का पहला अनुभव

भूकम्प का नाम सुना था और खूब पढ़ा भी था, पर कल पहली बार महसूस किया. अंडमान में कल रात्रि 10:27 बजे करीब डेढ़ मिनट भूकंप के झटके महसूस हुए. इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर पोर्टब्लेयर में 6.3 और मायाबंदर में 6.9 आंकी गई. जब भूकंप आया तो उस समय अधिकतर भाग में बिजली नहीं थी और लोग सोने की तैयारी में थे. अचानक हमें महसूस हुआ की बेड, ए. सी. और खिड़कियाँ जोर-जोर से हिल रही हैं, चूँकि ईधर भूत-प्रेत की बातें उतनी प्रचलित नहीं हैं, सो उधर ध्यान ही नहीं गया. फिर लगा कि घर की पेंटिंग हो रही है और पीछे मजदूर सीढ़ी लगाकर छोड़ गए हैं. उसे ही कोई हिला रहा है. उस समय बिटिया पाखी बिस्तर पर खूब कूद रही थीं, सो एक बार यह भी दिमाग में आया कि बेड इसी के चलते हिल रहा है. अगले ही क्षण जब दिमाग में आया कि यह भूकम्प हो सकता है तो हम सब बेड पर एकदम बीचों-बीच में इस तरह बैठ गए कि कोई चीज गिरे भी तो हम लोगों के ऊपर न गिरे. लगभग डेढ़ मिनट तक हम लोग भूकम्प के हिचकोले खाते रहे. शरीर के रोंगटे खड़े हो गए थे. फिर शांत हुआ तो अन्य लोगों से फोन करके कन्फर्म किया कि वाकई ये भूकम्प ही था. क्योंकि यह हम लोगों का पहला भूकम्प-अनुभव था. फ़िलहाल बात आई और गई हो गई और हम लोग सो गए.

रात को साढ़े ग्यारह-बारह के बीच हम लोगों के लैंड-लाइन और मोबाईल फोन बजने आरंभ हुए तो झटके में उठे कि क्या मुसीबत आ गई. पता चला टी.वी. पर न्यूज रोल हो रहा है कि पोर्टब्लेयर में भूकम्प के झटके, जिसकी तीव्रता लगभग 8 है. जिसने भी देखा, वो फोन करके कुशल-क्षेम पूछने लगा. लगभग आधे घंटे यह सिलसिला चला. अभी तक हम जितना नहीं डरे थे, उससे ज्यादा अब डर गए कि पढ़ा था कि वो भूकम्प जिसकी तीव्रता लगभग 8 है, वह खतरनाक होता है. हँसी भी आ रही थी कि हम लोगों ने भूकम्प को कितना नार्मल लिया. हम लोग 5 का अनुमान लगा रहे थे. खैर आज सुबह यहाँ के अख़बारों से भूकम्प की वास्तविक तीव्रता का अहसास हुआ. कई बार मीडिया भी चीजों को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है की लोग डर ही जाएँ. खैर यहाँ तो इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं, पर पहले भूकम्प का अनुभव अभी तक दिलो-दिमाग में कंपित हो रहा है.

रविवार, 28 मार्च 2010

मम्मी मेरी सबसे प्यारी (बाल-गीत)


मम्मी मेरी सबसे प्यारी,
मैं मम्मी की राजदुलारी।
मम्मी प्यार खूब जताती,
अच्छी-अच्छी चीजें लाती।

करती जब मैं खूब धमाल,
तब मम्मी खींचे मेरे कान।
मम्मी से हो जाती गुस्सा,
पहुँच जाती पापा के पास।

पीछे-पीछे तब मम्मी आती,
चाॅकलेट देकर मुझे मनाती।
थपकी देकर लोरी सुनाती,
मम्मी की गोद में मैं सो जाती।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

हैप्पी बर्थडे टू पाखी

आज 25 मार्च को हमारी बिटिया रानी अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिन है. आज पाखी 4 साल की हो जाएँगी. पिछला जन्म-दिन कानपुर में तो इस बार अंडमान में. नौ दिन के नवरात्र-व्रत पश्चात् आज ही मेरा फलाहार-व्रत भी टूट रहा है. सो पाखी का जन्म-दिन जी भर कर इंजॉय करेंगे और हैप्पी बर्थडे टू यू पाखी भी गायेंगे.

इस बार की पोस्ट हैप्पी बर्थडे टू यू को लेकर. कई बार उत्सुकता होती है कि आखिर ये प्यारी सी पैरोडी आरम्भ कहां से हुई। आखिरकार हमने इसका राज ढूंढ ही लिया। वस्तुतः ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ की मधुर धुन ‘गुड मार्निंग टू आॅल‘ गीत से ली गयी है, जिसे दो अमेरिकन बहनों पैटी हिल तथा माइल्ड्रेड हिल ने 1993 में बनाया था। ये दोनों बहनें किंडर गार्टन स्कूल की शिक्षिकाएं थीं। इन्होंने ‘गुड मार्निंग टू आॅल‘ गीत की यह धुन इसलिए बनायी ताकि बच्चों को इसे गाने में आसानी हो और मजा आये। फिलहाल दुनिया भर में इस गीत का 18 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। इस गाने की धुन और बोल पहली बार 1912 में लिखित रूप से प्रकाश में आये। इस गाने पर सुम्मी कंपनी चैपल ने इस कंपनी को 15 अमेरिकी मिलियन डाॅलर में खरीद लिया। उस वक्त इस धुन की कीमत करीब 5 अमेरिकी मिलियन डालर थी। गीत की सबसे प्रसिद्ध व भव्य प्रस्तुति मई 1962 में विख्यात हाॅलीवुड अभिनेत्री मारिलियन मोनरोर्ड ने अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ केनेडी को समर्पित की थी। इस गीत को 8 मार्च 1969 को अपालो 9 दल के सदस्यों ने भी गया था। हजारों की संख्या में लोगों ने पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के 81वें जन्मदिवस पर 16 अप्रैल 2008 को इसे व्हाइट हाउस में पेश किया था। 27 जून 2007 को लंदन के हाइड पार्क में सैकड़ों लोगों ने नेल्सन मंडेला के 90वें जन्मदिवस पर भी इसे गाया गया था। अब भी ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ गीत प्रतिवर्ष 2 मिलियन डाॅलर की कमाई कर रहा है। गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड के मुताबिक ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ अंग्रेजी भाषा का सबसे परिचित गीत है।... तो आप भी गाइये- ‘हैप्पी बर्थडे टू पाखी‘।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

गोरों के जाने के बाद भी देश में लूट और स्वार्थ का राज- भगत सिंह

आज 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की पुण्य तिथि है। 23 मार्च 1931 को इन क्रांतिकारियों को आजादी कि कीमत के रूप में फाँसी के फँदे पर लटका दिया गया. भगत सिंह की उम्र तो उस समय तो बहुत कम थी, पर इसके बावजूद उनके विचार बहुत परिपक्व थे. भगत सिंह ने क्रांति के बारे में फैली गलत फहमियों को दूर करते हुए लिखा कि-"क्रांति के लिए रक्त संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही इसमें प्रति हिंसा का कोई स्थान है। यह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रांति से हमारा मतलब है कि अन्याय और शोषण पर टिकी व्यवस्था बदलनी चाहिए। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार तो विचारों की धार पर तेज होती है।" क्रांतिकारी के गुणों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने लिखा है कि किसी क्रांतिवीर के दो अनिवार्य गुण स्वतंत्र विचार और आलोचना हैं। जो आदमी प्रगति के लिए संघर्ष करता है, उसे पुराने विश्वास की एक-एक बात की आलोचना करनी होगी। उस पर अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी। इसी प्रकार विभिन्न धर्मों के बीच सांप्रदायिक हिंसा पर चिंता जताते हुए उन्होंने लिखा कि-"धार्मिक अंधविश्वास तथा कट्टरपंथ हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं। हमें इनसे हर हाल में छुटकारा पाना चाहिए। जो चीज स्वतंत्र विचारों को सहन नहीं कर सकती, उसे नष्ट हो जाना चाहिए। हमें ऐसी बहुत सी चीजों पर जीत पानी है।" लोगों को आपस में लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। भलाई इसी में है कि लोग धर्म, रंग और नस्ल जैसे भेदभाव को मिटाकर एकजुट हों।उन्होंने लिखा है कि भारत के लोगों को इतिहास से सीख लेनी चाहिए। रेड कार्ड (परिचय पत्र) तथा बास्तिल (फ्रांस की कुख्यात जेल), जहां राजनैतिक कैदियों को रखा जाता था भी फ्रांस की क्रांति को कुचलने में सफल नहीं हो पाए, तो भला अंग्रेज क्या कुचल पाएंगे. तभी तो उन्होंने लिखा कि-‘तुझे जिबह करने की खुशी और मुझे मरने का शौक है मेरी भी मर्जी वही जो मेरे सैयाद की है.

स्वाधीनता संग्राम के दौरान देश की आजादी पर छाए अनिश्चितता के बादलों के बीच शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने भविष्य की घटनाओं को पहले से ही भांप लिया था और कह दिया था कि उनकी फांसी के 15 साल बाद अंग्रेज देश छोड़कर चले जाएंगे। लेकिन भगत सिंह ने यह भी कहा था कि गोरों के जाने के बाद भी देश में लूट और स्वार्थ का राज होगा। शहीद-ए-आजम की यह बात बिल्कुल सही साबित हुई। 23 मार्च 1931 को उन्हें फांसी लगी जिसके 15 साल बाद 1946 में ब्रितानिया हुकूमत ने भारत से बोरिया बिस्तर समेटने का मन बना लिया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया। पर आजादी के बाद देश में लूट और स्वार्थ के राज की जो बात भगत सिंह ने कही, उसे हम रोज अपनी आँखों के सामने महसूस करते हैं. देश आजाद हो गया, पर हम आज तक इस आजादी की कीमत नहीं समझ पाए. हमसे बाद में आजाद हुए देश आज तरक्की के कितने पायदान चढ़ चुके हैं, पर हम अभी भी उतनी तेजी से प्रगति नहीं कर पाए. ऐसे में भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ जाती है. मात्र रैली निकालने और फूल चढाने से श्रद्धांजलि नहीं अर्पित होती, बल्कि इसके लिए हमें विचारों में भी परिवर्तन की आवश्यकता है. अन्यथा हर साल बलिदान दिवस आयेगा और अन्य दिनों की तरह बीत जायेगा !!
 
-आकांक्षा यादव

सोमवार, 22 मार्च 2010

'पानी' को 'काला-पानी' होने से बचाएं

अंडमान में आजकल पानी की किल्लत जोरों पर है. चारों तरफ पानी ही पानी, पर पीने को एक बूंद नहीं, यह कहावत यहाँ भली-भांति चरितार्थ होती है. सुनामी के बाद यहाँ मौसम पहले जैसा नहीं रहा, अभी से जबरदस्त गर्मी का असर दिखने लगा है. जहाँ बारिश आम बात होती थी, वहीँ अब तक हमने यहाँ मात्र एक दिन पाँच मिनट की बारिश के दर्शन किये. हर साल मई में बारिश आरंभ हो जाती है, पर इस साल लगता है वो भी जून-जुलाई तक जाएगी. तीन दिन में एक बार पानी की आपूर्ति होती है, सो पानी की महत्ता समझ में आने लगी है. बूंद-बूंद इकटठा कर रखने लगे हैं. पानी के महत्व का अहसास प्यास लगने पर ही होता है। पानी का कोई विकल्प नहीं है। इसकी एक-एक बूंद अमृत है। ऐसी में आज 'विश्व जल दिवस'(22 मार्च) की प्रासंगिकता स्वमेव समझ में आती है. इस बार विश्व जल दिवस की विषय-वस्तु भी पेय जल की गुणवत्ता है.

गौरतलब है कि वर्ष 1992 में पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में स्वच्छ पानी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की बात कही गयी। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 मार्च 1993 को पहला जल दिवस मनाने की घोषणा की, तभी से यह हर वर्ष मनाया जाता है.

आंकड़ों पर गौर करें तो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार हर साल हम 1500 घन किमी पानी बर्बाद कर देते है. आज भी हर दिन दुनिया भर के पानी में 20 लाख टन सीवेज, औद्योगिक और कृषि कचरा डाला जाता है. यही कारण है कि दुनिया भर में 2.5 अरब लोग पर्याप्त सफाई के बिना रह रहे हैं. अभी भी इस सभ्य-सुसंस्कृत समाज में दुनिया की आबादी का 18 फीसदी या 1.2 अरब लोगों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है. इन सबका बेहद बुरा असर पूरी मानव जाती पर पद रहा है. जानकर आश्चर्य होगा कि युद्ध सहित सभी तरह की हिंसाओं से मरने वाले लोगों से कहीं ज्यादा लोग हर साल असुरक्षित पानी पीने से मर जाते हैं. 70 देशों के 14 करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश हैं . दुनिया में सालाना होने वाली कुल मौतों में से 3.1 फीसदी पर्याप्त जल साफ-सफाई न होने से होती हैं. असुरक्षित पानी से हर साल डायरिया के चार अरब मामलों में 22 लाख मौतें होती है। भारत में बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण यह बीमारी है। हर साल करीब पांच लाख बच्चे इसका शिकार बनते हैं. जरा सोचिये पानी और साफ-सफाई के अभाव में अफ्रीका को होने वाला आर्थिक नुकसान 28.5 अरब डालर या सकल घरेलू उत्पाद का पांच फीसदी है. भूजल पर आश्रित दुनिया में 24 फीसदी स्तनधारियों और 12 फीसदी पक्षी प्रजातियों की विलुप्ति का खतरा है, जबकि एक तिहाई उभयचरों पर भी यह खतरा बरकरार है.

जल-प्रदूषण और जल कि कमी को दूर करने के लिए आज पूरी दुनिया में यत्न हो रहे है।पेय जल और इसकी साफ-सफाई पर किए जाने वाले निवेश की रिटर्न दर काफी ऊंची है। हर एक रुपये निवेश पर 3 रुपये से 34 रुपये आर्थिक विकास रिटर्न का अनुमान लगाया जाता है. इन परिस्थितियों में विश्व में पानी की गुणवत्ता बनाए रखना मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अति अवश्यकहो गया है। पानी की गुणवत्ता की जिम्मेदारी सरकारों और समुदायों के साथ हमारी निजी तौर पर भी है. लोगों को जल की गुणवत्ता और सेहत के बीच रिश्ते पर जागरूक कर जल की गुणवत्ता सुधारने के लिए हम भी पहल कर सकते हैं। खेती के लिए भूमि कटाव नियंत्रण और पोषक तत्व प्रबंधन योजनाओं वाली तकनीक का प्रयोग करने के साथ-साथ विषैले रसायनों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए. यही नहीं शहरी क्षेत्रों में ज्यादातर हिस्सों में पक्के फर्श होने से पानी जमीन के अंदर न जाकर किसी जल स्त्रोत की तरफ बह जाता है। रास्ते में यह अपने साथ हमारे द्वारा बिखेरे खतरनाक रसायनों, तेल, ग्रीस, कीटनाशकों एवं उर्वरकों जैसे कई प्रदूषक तत्वों को ले जाकर पूरे जलस्त्रोत को प्रदूषित कर देता है। इसलिए इन रसायनों से जलस्त्रोतों को बचाने के लिए पक्के फर्श के विकल्पों का चुनाव करें। संभव हो तो छिद्रित फर्श बनाए जा सकते हैं। स्थानीय पौधे भी लगाए जा सकते हैं.

वाकई जल ही जीवन है. अगर अमृत कहीं है, तो यही है। अत: पेय जल की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए हम-आप अपने स्तर पर भी पहल कर सकते हैं। इसी में हमारा-आपका और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित है. तो इस विश्व जल दिवस से ही ये शुरुआत क्यों न की जाय अन्यथा काला-पानी की कहानी फिर से चरितार्थ हो जाएगी, जहाँ सब ओर पानी तो दिखता है, पर पीने को लोग तरसते हैं !!
 
-आकांक्षा यादव

शनिवार, 20 मार्च 2010

कंक्रीटों के शहर में गौरैया (विश्व गौरैया दिवस पर)

गौरैया भला किसे नहीं भाती. कहते हैं कि लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं। पर यही गौरैया अब खतरे में है. पिछले कई सालों से इसके विलुप्त होने की बात कही जा रही है. कंक्रीटों के शहर में गौरैया कहाँ घर बनाये, उस पर से मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है। हम जिस मोबाइल पर गौरैया की चूं-चूं कलर ट्यून के रूप में सेट करते हैं, उसी मोबाइल की तंरगें इसकी दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ता है. यही नहीं आज की पीढ़ी भी गौरैया को नेट पर ही खंगाल रही है. उसके पास गौरैयाके पीछे दौड़ने के लिए समय भी नहीं है, फिर गौरैया कहाँ जाये..किससे अपना दुखड़ा रोये..यदि इसे आज नहीं सोचा गया तो कल गौरैया वाकई सिर्फ गीतों-किताबों और इन्टरनेट पर ही मिलेगी. इसी चिंता के मद्देनजर इस वर्ष से दुनिया भर में प्रति वर्ष 20 मार्च को ''विश्व गौरैया दिवस'' मनाने का निर्णय लिया गया है. देर से ही सही पर इस ओर कुछ ठोस कदम उठाने की जरुरत है, तभी यह दिवस सार्थक हो सकेगा. इस अवसर पर अपने पतिदेव कृष्ण कुमार यादव जी की एक कविता उनके ब्लॉग शब्द सृजन की ओर से साभार-

चाय की चुस्कियों के बीच
सुबह का अखबार पढ़ रहा था
अचानक
नजरें ठिठक गईं
गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पक्षियों में।

वही गौरैया,
जो हर आँगन में
घोंसला लगाया करती
जिसकी फुदक के साथ
हम बड़े हुये।

क्या हमारे बच्चे
इस प्यारी व नन्हीं-सी चिड़िया को
देखने से वंचित रह जायेंगे!
न जाने कितने ही सवाल
दिमाग में उमड़ने लगे।

बाहर देखा
कंक्रीटों का शहर नजर आया
पेड़ों का नामोनिशां तक नहीं
अब तो लोग घरों में
आँगन भी नहीं बनवाते
एक कमरे के फ्लैट में
चार प्राणी ठुंसे पड़े हैं।

बच्चे प्रकृति को
निहारना तो दूर
हर कुछ इण्टरनेट पर ही
खंगालना चाहते हैं।

आखिर
इन सबके बीच
गौरैया कहाँ से आयेगी?

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

हिन्दी की तलाश जारी है...

एक तरफ हिंदी को बढ़ावा देने की लम्बी-लम्बी बातें, उस पर से भारत सरकार के बजट में हिंदी के मद में जबरदस्त कटौती. केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2010-11 के बजट में हिन्दी के लिए आवंटित राशि में पिछले वर्ष की तुलना में दो करोड़ रुपये की कटौती कर दी है। वित्त वर्ष 2010-11 के आम बजट में राजभाषा के मद में 34.17 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जबकि चालू वित्त वर्ष 2009-10 के बजट में इस खंड में 36.22 करोड़ रुपये दिये गये थे।

लगता है हिंदी के अच्छे दिन नहीं चल रहे हैं. अभी तक हम हिंदी अकादमियों का खुला तमाशा देख रहे थे, जहाँ कभी पदों की लड़ाई है तो कभी सम्मानों की लड़ाई. अब तो सम्मानों को ठुकराना भी चर्चा में आने का बहाना बन गया है. हर कोई बस किसी तरह सरकार में बैठे लोगों की छत्र-छाया चाहता है. इस छत्र-छाया में ही पुस्तकों का विमोचन, अनुदान और सरकारी खरीद से लेकर सम्मानों तक की तिकड़मबाज़ी चलती है. और यदि यह बाज़ी हाथ न लगे तो श्लीलता-अश्लीलता का दौर आरंभ हो जाता है. मकबूल फ़िदा हुसैन साहब का बाज़ार ऐसे लोगों ने ही बढाया. आजकल तो जमाना बस चर्चा में रहने का है, बदनाम हुए तो क्या हुआ-नाम तो हुआ.

साहित्य कभी समाज को रास्ता दिखाती थी, पर अब तो खुद ही यह इतने गुटों में बँट चुकी है कि हर कोई इसे निगलने के दावे करने लगा है. साहित्यकार लोग राजनीति की राह पर चलने को तैयार हैं, बशर्ते कुलपति, राज्यसभा या अन्य कोई पद उन्हें मिल जाय. कभी निराला जी ने पंडित नेहरु को तवज्जो नहीं दी थी, पर आज भला किस साहित्यकार में इतना दम है. हर कोई अपने को प्रेमचंद, निराला की विरासत का संवाहक मन बैठा है, पर फुसफुसे बम से ज्यादा दम किसी में नहीं. तथाकथित बड़े साहित्यकार एक-दूसरे की आलोचना करके एक-दूसरे को चर्चा में लाते रहते हैं. दिखावा तो ऐसा होता है मानो वैचारिक बहस चल रही हो, पर उछाड़ -पछाड़ से ज्यादा यह कुछ नहीं होना. दिन भर एक दूसरे की आलोचना कर प्रायोजित रूप में एक-दूसरे को चर्चा में लाने वाले हमारे मूर्धन्य साहित्यकार शाम को गलबहियाँ डाले एक-दूसरे के साथ प्याले छलका रहे होते हैं.

हर पत्रिका के अपने लेखक हैं, तो हर साहित्यकार का अपना गैंग, जो एक-दूसरे पर वैचारिक (?) हमले के काम आते हैं.अभी एक मित्र ने बताया कि एक प्रतिष्ठित पत्रिका में अपनी रचना प्रकाशित करवाने के लिए किस तरह उन्होंने अपने एक रिश्तेदार साहित्यकार से पैरवी कराई. पिछले दिनों कहीं पढ़ा था कि हिंदी के एक ठेकेदार दावा करते हैं कि वह कोई भी सम्मान आपकी झोली में डाल सकते हैं, बशर्ते पूरी पुरस्कार राशि आप उन्हें ससम्मान सौंप दे. बढ़िया है, किसी को नाम चाहिए, किसी को पैसा, किसी को पद तो किसी को चर्चा. हिंदी अकादमियां घुमाने-फिराने का साधन बन रही हैं या पद और पुरस्कार की आड में बन्दर-बाँट का. पर इन सबके बीच हिन्दी या साहित्य कहीं नहीं है. हिन्दी की तलाश अभी जारी है, यदि आपको दिखे तो अवश्य बताईयेगा !!

-आकांक्षा यादव

मंगलवार, 16 मार्च 2010

नव संवत्सर से जुडी हैं कई महत्वपूर्ण घटनाएँ

भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। भारत में नव वर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है। असम में नववर्ष बीहू के रुप में मनाया जाता है, केरल में पूरम विशु के रुप में, तमिलनाडु में पुत्थंाडु के रुप में, आन्ध्र प्रदेश में उगादी के रुप में, महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा के रुप में तो बांग्ला नववर्ष का शुभारंभ वैशाख की प्रथम तिथि से होता है।

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लगभग सभी जगह नववर्ष मार्च या अप्रैल माह अर्थात चैत्र या बैसाख के महीनों में मनाये जाते हैं। पंजाब में नव वर्ष बैशाखी नाम से 13 अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलेण्डर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिल नव वर्ष भी आता है। तेलगू नव वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्र प्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग$आदि का अपभ्रंश) के रूप मंे मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नव वर्ष विशु 13 या 14 अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल 15 जनवरी को नव वर्ष के रुप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेण्डर नवरेह 19 मार्च को आरम्भ होता है। महाराष्ट्र में गुडी पड़वा के रुप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड़ नव वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुडी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरुविजा नव वर्ष के रुप में मनाया जाता है। मारवाड़ी और गुजराती नव वर्ष दीपावली के दिन होता है, जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नव वर्ष पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नव वर्ष होता है। वस्तुतः भारत वर्ष में वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब मेघमालाओं की विदाई होती है और तालाब व नदियाँ जल से लबालब भर उठते हैं तब ग्रामीणों और किसानों में उम्मीद और उल्लास तरंगित हो उठता है। फिर सारा देश उत्सवों की फुलवारी पर नववर्ष की बाट देखता है। इसके अलावा भारत में विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलगु संवत भी प्रचलित हैं, इनमें हर एक का अपना नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत हैं। विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था।

भारतीय नव वर्ष नव संवत्सर का आरंभ आज हो रहा है. ऐसी मान्यता है कि जगत की सृष्टि की घड़ी (समय) यही है। इस दिन भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना हुई तथा युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारंभ हुआ।

‘चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि।
शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।।‘

अर्थात ब्रह्मा पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के प्रथम दिन, प्रथम सूर्योदय होने पर की। इस तथ्य की पुष्टि सुप्रसिद्ध भास्कराचार्य रचित ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि‘ से भी होती है, जिसके श्लोक में उल्लेख है कि लंका नगर में सूर्योदय के क्षण के साथ ही, चैत्र मास, शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस से मास, वर्ष तथा युग आरंभ हुए। अतः नव वर्ष का प्रारंभ इसी दिन से होता है, और इस समय से ही नए विक्रम संवत्सर का भी आरंभ होता है, जब सूर्य भूमध्य रेखा को पार कर उत्तरायण होते हैं। इस समय से ऋतु परिवर्तन होनी शुरू हो जाती है। वातावरण समशीतोष्ण होने लगता है। ठंडक के कारण जो जड़-चेतन सभी सुप्तावस्था में पड़े होते हैं, वे सब जाग उठते हैं, गतिमान हो जाते हैं। पत्तियों, पुष्पों को नई ऊर्जा मिलती है। समस्त पेड़-पौधे, पल्लव रंग-विरंगे फूलों के साथ खिल उठते हैं। ऋतुओं के एक पूरे चक्र को संवत्सर कहते हैं। इस वर्ष नया विक्रम संवत 2067, मार्च 16, 2010 को प्रारंभ हो रहा है।

संवत्सर, सृष्टि के प्रारंभ होने के दिवस के अतिरिक्त, अन्य पावन तिथियों, गौरवपूर्ण राष्ट्रीय, सांस्कृतिक घटनाओं के साथ भी जुड़ा है। रामचन्द्र का राज्यारोहण, धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म, आर्य समाज की स्थापना तथा चैत्र नवरात्र का प्रारंभ आदि जयंतियां इस दिन से संलग्न हैं। इसी दिन से मां दुर्गा की उपासना, आराधना, पूजा भी प्रारंभ होती है। यह वह दिन है, जब भगवान राम ने रावण को संहार कर, जन-जन की दैहिक-दैविक-भौतिक, सभी प्रकार के तापों से मुक्त कर, आदर्श रामराज्य की स्थापना की। सम्राट विक्रमादित्य ने अपने अभूतपूर्व पराक्रम द्वारा शकों को पराजित कर, उन्हें भगाया, और इस दिन उनका गौरवशाली राज्याभिषेक किया गया।

आप सभी को भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2067 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. आप सभी के लिए यह नववर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी हो, नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो !!

-आकांक्षा यादव

रविवार, 14 मार्च 2010

सम्पूर्ण आहार के रूप में केला

नवरात्र का त्यौहार मंगलवार से आरंभ हो रहा है. विशेषकर नारियों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण समय होता है. घर-आफिस की जिम्मेदारियों के साथ व्रत-पालन वाकई एक दुष्कर कार्य होता है. पर व्रत कोई भी हो, फलों का अपना महत्त्व है. फलों में भी केला का विशेष महत्त्व है. केले की महिमा सा भला कौन अपरिचित होगा.केला विश्व का सबसे अहम फल माना जाता है। यह हर जगह आसानी से उपलब्ध रहता है। यहाँ अंडमान में तो केला बहुतायत में आसानी से मिलने वाला फल है.विश्व में प्रति एकड़ सबसे अधिक फल देने वाली केले की फसल रहती है। इसे एक संपूर्ण आहार माना जाता है.अगर आप दुबले हैं और मोटा होना चाहते हैं तो प्रतिदिन रोज जमकर केले खांए। इसमें प्रचुर मात्रा में फैट मिलता है। केले में शरीर को लाभ पहुंचाने के और भी कई गुण हैं इसमें प्रोटीन 13 प्रतिशत, चर्बी 2 प्रतिशत, खनिज पदार्थ 7 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 36.4 प्रतिशत, कैल्शियम 1 प्रतिशत, फासफोरस 5 प्रतिशत, लोहा 4 प्रतिशत पाया जाता है।

सर्वप्रथम केले का पौधा दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडोनेशिया के जंगलों से मिला था और संभवतः पपुआ न्यूगिनी में इन्हें सबसे पहले उपजाया गया था. 16वीं शताब्दी में स्पेन के लोग इसे अमेरिका ले गए वहां इसकी खूब खेती की जाने लगी। अब इसकी खेती अमेरिका, मलाया, ब्राजील, कोलंबिया, थाईलैण्ड, इंडोचीन और भारत में होती है।

केला जहां एक संपूर्ण आहार है वहीं इसके औषधीय गुण भी कम नहीं हैं। केला स्वादिष्ट, शीतल तथा स्वास्थ्यवर्धक फल है। एक सौ ग्राम केले से अनुमानतः 153 कैलोरी शक्ति मिलती है। आयुर्वेद में बताया गया है कि पका केला ठंडा, रूचिकर, पुष्टिकारक, शरीर पर मांस बढ़ाने वाला, रक्त-विहार नाशक, पथरी, रक्तपित्त दूर करने वाला प्रदर तथा नेत्ररोग मिटाने वाला होता है। केला कच्चे और पके दोनों तरह से इस्तेमाल में आता है। मंदाग्नि, गुर्दे के रोगों ग्रंथि रोग, गठिया आदि रोगों के लिए लाभकारी साबित होता है। अम्लहीन होने के कारैष्टिक अल्सर के रागियों को सरलता से पच जाता है। केला आंत की कमियों को समूल समाप्त करता हे। दस्त और पेचिश में पके हुए केले का प्रयोग बहुत गुणकारी है। मधुमेह के रोगियों के लिए भी केला हानिकारक नहीं होता है। कमजोर पाचन शक्ति वाले मरीज के लिए केला वरदान है। वजन बढ़ाने के इच्छुक लोगों के लिए केला सर्वोत्तम भोजन है। केला खूब पका हुआ ही खाना चाहिए। कच्चे केले में 20-25% स्टार्च मिलता है, जो आसानी से सुपाच्य शर्करा में बदलता है। कच्चे केले को तलकर भी खाया जात है और इससे स्वादिष्ट मिठाइयां भी बनती हैं। दक्षिण भारत में कच्चे केले के टुकड़े काटकर सुखकर पीसकर पाउडर बना लेते हैं। केले का यह पाउडर दूध के साथ देने से बच्चों के विकास में सहायक रहता है।

केले में लोहा होने के कारण यह एनीमिया के रोगी में खून की वृद्धि करता है। अगर किसी को खाज व गंजापन की बराबर शिकायत है तो केले के गूदे में नीबू का रस मिलाकर लगाने से लाभ होता है। दस्तों की स्थिति अधिक बनने पर दही के साथ पका केला खाना लाभदायक है। केला पेट के लिए इतना अधिक लाभदायक साबित हुआ है कि आंत के रोगों को बिना आपरेशन ठीक कर सकता है। पेचिश में केले को दही में मथ कर थोड़ा सा जीरा व काला नमक मिलाकर खाना उचित रहता है। कुत्ते के काटने की जगह पर केले के बीच को पीसकर लगाने से लाभ रहता है। केले के सेवन से आंतों में विजातीय द्रव्यों की सड़न क्रिया नहीं होती है। जलने पर केले के पत्तों का रस लगाने से फफोले नहीं पड़ते। केला खने से बच्चों व कमजोर व्यक्तियों की पाचन शक्ति ठीक रहती है। भूख ज्यादा लगती है। केला उच्च रक्त चाप को रोकने में सार्थक और हृदय रोगों में उपयोगी है। अपच में केले की सब्जी बनाकर खाएं। केले में पेक्टिन नामक पदार्थ होता है, जो मल को मुलायम और साफ करके पेट से बाहर निकालने में सहायक हैं। एक केला, एक कप नारियल का पानी व एक चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से पीलिया, टायफाइड, खसरा में लाभप्रद रहता है। केले में सिरोटीन नामक क्षरीय रसायन मिलता है जोकि खून की क्षरीयता को बढ़ाता है तथा अमाशय की अम्लता को कम करता है।
 
-आकांक्षा यादव

बुधवार, 10 मार्च 2010

धर्म का लबादा ओढ़े ये मानवता के भक्षक

 
कानपुर भले ही छूट गया हो, पर अभी भी वहाँ की ख़बरें देख-पढ़ लेती हूँ. चार साल से ज्यादा का रिश्ता इतनी जल्दी छोड़ भी तो नहीं पाती. कानपुर भले ही कभी उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी रहा हो, पर आज का कानपुर अपराध के लिए कुख्यात है, वो भी मूलत: महिलाओं के सम्बन्ध में. यहाँ पोर्टब्लेयर में जब लोगों को बेरोकटोक भारी गहने पहने देखती हूँ तो कानपुर का वो मंजर याद आता है जहाँ रोज गले से चेन की छिनैती, महिलाओं से छेड़-छाड़ आम बात है. कभी गौर करें तो कानपुर से सबसे ज्यादा अख़बार प्रकाशित होते हैं और स्थानीय ख़बरों में ऐसी ही समाचारों की भरमार रहती है.

अभी एक खबर पर निगाह गई कि कानपुर में लड्डू खिलाने के बहाने घर से ले जाकर एक पुजारी के बेटे ने सात साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और बाद में उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। पुजारी का यह बेटा कुछ दिनों से पिता के बीमार होने के कारण पूजा-पाठ का काम खुद ही कर रहा था। और इसी दौरान उसने यह कु-कृत्य किया.
 
पता नहीं ऐसे लोग किस विकृत मानसिकता में पले-बढे होते हैं, जो कभी ढोंगी बाबा का रूप धारण करते हैं तो कभी पुजारी का. उन्होंने आवरण कितना भी बढ़िया ओढ़ रखा हो, पर मानसिकता कुत्सित ही होती है. मंदिर में बैठे पुजारी से लेकर बड़े-बड़े धर्माचार्य तक सब लम्बे-लम्बे उपदेश देते हैं, पर खुद के ऊपर इनका कोई संयम नहीं होता. ऐसे लोग समाज के नाम पर कोढ़ ही कहे जायेंगें. सात साल की बच्ची से बलात्कार..सोचकर ही दिल दहल जाता है.
 
अभी कुछ दिनों पहले कोलकाता एयरपोर्ट पर थी, तो पता चला कि 7-8 साल की बच्ची के साथ वहाँ के एक स्टाफ ने छेड़खानी की, जिसके चलते वहाँ सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. अपने चारों तरफ देखें तो ऐसी घटनाएँ रोज घटती हैं, जिनसे मानवता शर्मसार होती है. पर धर्म के पहरुये ही जब मानवता के भक्षक बन जाएँ तो क्या कहा जाय...?
 
-आकांक्षा यादव

सोमवार, 8 मार्च 2010

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस का शतक

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरूआत 1900 के आरंभ में हुई थी। वर्ष 1908 में न्यूयार्क की एक कपड़ा मिल में काम करने वाली करीब 15 हजार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट का अधिकार देने के लिए प्रदर्शन किया था। इसी क्रम में 1909 में अमेरिका की ही सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार ''नेशनल वुमन-डे'' मनाया था।

वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया और 1911 में पहली बार 19 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। इसे सशक्तिकरण का रूप देने हेतु ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैलियों में हिस्सा लिया.

बाद में वर्ष 1913 में महिला दिवस की तारीख 8 मार्च कर दी गई। तब से हर 8 मार्च को विश्व भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है.

***अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ***

रविवार, 7 मार्च 2010

नारी को निर्णय की शक्ति दें (महिला-दिवस पर विशेष)

महिला-दिवस सुनकर बड़ा अजीब लगता है. क्या हर दिन सिर्फ पुरुषों का है, महिलाओं का नहीं ? पर हर दिन कुछ कहता है, सो इस महिला दिवस के मानाने की भी अपनी कहानी है. कभी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई से आरंभ हुआ यह दिवस बहुत दूर तक चला आया है, पर इक सवाल सदैव उठता है कि क्या महिलाएं आज हर क्षेत्र में बखूबी निर्णय ले रही हैं.
 
मात्र कुर्सियों पर नारी को बिठाने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें शक्ति व अधिकार चाहिए ताकि वे स्व-विवेक से निर्णय ले सकें. आज नारी राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है, यहाँ तक कि आज महिला आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में नित नई नजीर स्थापित कर रही हैं। यही नहीं शमशान में जाकर आग देने से लेकर पुरोहिती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं. रुढियों को धता बताकर महिलाएं हर क्षेत्र में परचम फैलाना चाहती हैं.

पर इन सबके बावजूद आज भी समाज में बेटी के पैदा होने पर नाक-भौंह सिकोड़ी जाती है, कुछ ही माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं...आखिर क्यों ? क्या सिर्फ उसे यह अहसास करने के लिए कि वह नारी है. वही नारी जिसे अबला से लेकर ताड़ना का अधिकारी तक बताया गया है. सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई, द्रौपदी की इज्जत को सरेआम तार-तार किया गया तो आधुनिक समाज में ऐसी घटनाएँ रोज घटित होती हैं. तो क्या बेटी के रूप में जन्म लेना ही अपराध है. मुझे लगता है कि जब तक समाज इस दोगले चरित्र से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक नारी की स्वतंत्रता अधूरी है.
 
सही मायने में महिला दिवस की सार्थकता तभी पूरी होगी जब महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, वैचारिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ दहेज के लोभ में नारी को सरेआम जिन्दा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नज़रिए को समझा जाएगा और क्रियान्वित भी किया जायेगा. समय गवाह है कि एक महिला के लोकसभा स्पीकर बनाने पर ही लोकसभा भवन में महिलाओं के लिए पृथक प्रसाधन कक्ष बन पाया. इससे बड़ा उदारहण क्या हो सकता है. जरुरत समाज में वह जज्बा पैदा करने का है जहाँ सिर उठा कर हर महिला अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं लड़का के रूप में पैदा होती !!
 
!!! अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनायें !!!
 
-आकांक्षा यादव

शनिवार, 6 मार्च 2010

ये हाईप्रोफाइल युवतियां ??

कई बार कुछ ख़बरें मन को झकझोरती हैं, ग्लानि पैदा करती हैं. ऐसी ही इक खबर पर नज़र गई कि सैक्स रैकेट के आरोप में ढोंगी बाबा राजीव रंजन द्विवेदी के साथ पकड़ी गई छह हाईप्रोफाइल युवतियों को लेकर दुनिया चाहे कुछ भी सोच रही हो, लेकिन उनको इसका मलाल नहीं है। किसी तरह पैसा कमाना और मौजमस्ती ही उनका लक्ष्य है। इसके लिए ही वह इस धंधे में हैं। मामले के जांच अधिकारी द्वारा युवतियों से पूछे गए सवालों के जवाब से इसकी पुष्टि हुई।

पुलिस के मुताबिक ये युवतियां काफी अच्छे घराने की हैं। इनमें एक पश्चिम बंगाल, एक पंजाब, एक अंबाला व तीन दिल्ली की है। चार लड़कियां एयर होस्टेस हैं। इनमें एक की तनख्वाह एक लाख 30 हजार रुपये मासिक है। वह दिल्ली के पॉश इलाके में 25 हजार रुपये किराये पर घर लेकर रहती है। सभी युवतियां फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है। पुलिस को दिए बयान में युवतियों ने बताया है कि अपनी मर्जी से वह इस धंधे में आई है। पूछताछ में इन युवतियों में गजब का आत्मविश्वास दिखाई दिया। कुछ युवतियों ने बड़ी बेबाकी से बताया कि वह बचपन से शराब पीती है। पुलिस के सवालों से तंग आकर युवतियों ने कहा-'यह बताइए कि हमें जमानत कब मिलेगी।'

गुरुवार, 4 मार्च 2010

बोआ सीनियर के निधन के साथ 65,000 साल पुरानी भाषा विलुप्त

सुनकर अजीब लगता है, पर यह सच है. हाल ही में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तकरीबन 65000 साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा हमेशा के लिए विलुप्त हो गई । वस्तुत: कुछ दिन पहले अंडमान में रहने वाले बो कबीले की आखिरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर के निधन के साथ ही इस आदिवासी समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बो भाषा भी लुप्त हो गई। ग्रेट अंडमान में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस अंतिम सदस्य ने 2004 की विनाशकारी सुनामी में अपने घर-बार को खो दिया था और सरकार द्वारा बनाए गए कांक्रीट के शेल्टर में स्ट्रैट द्वीप पर गुजर-बसर कर रही थी। 'बो' भाषा के बारे में भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि यह भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक समय से इस समुदाय द्वारा उपयोग में लाई जा रही थी।

अंडमान में रहने वाले आदिवासियों को मुख्यतः चार भागों में बाँटा जा सकता है-द ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंग और सेंटिनीलीस। लगभग 10 भाषाई समूहों में बँटे ग्रेट अंडमान के मूल निवासियों की जनसंख्या 1858 में द्वीप पर ब्रिटिश कॉलोनी बनने तक 5500 से भी ज्यादा थी, पर इनमें से बहुत से मारे गए या 'बाहरी' दुनिया के लोगों द्वारा लाई गई संक्रमित बीमारियों का शिकार बन गए। वर्तमान में ग्रेटर अंडमान में केवल 52 मूल निवासी लोग बचे हैं, जिनके भविष्य पर भी अब संशय बना है। दरअसल, ये भाषाएँ शहरीकरण के चलते दूर-दराज के इलाकों में अंग्रेजी और हिंदी के बढ़ते प्रभाव के कारण हाशिए पर जा रही हैं।

गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र की पहली ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स इंडीजीनस पीपुल्स’ रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि दुनियाभर में छह से सात हजार तक भाषाएँ बोली जाती हैं, इनमें से बहुत सी भाषाओं पर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से अधिकतर भाषाएँ बहुत कम लोग बोलते हैं, जबकि बहुत थोड़ी सी भाषाएँ बहुत सारे लोगों द्वारा बोली जाती हैं। सभी मौजूदा भाषाओं में से लगभग 90 फीसदी अगले 100 सालों में लुप्त हो सकती हैं, क्योंकि दुनिया की लगभग 97 फीसदी आबादी इनमें से सिर्फ चार फीसदी भाषाएँ बोलती हैं। यूनेस्को द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का खतरा बढ़ता ही जा रहा है और इन्हें बचाने की आपात स्तर पर कोशिशें करना होंगी।

वस्तुत: यह सिर्फ किसी भाषा के खत्म होने का ही सवाल नहीं है, बल्कि इसी के साथ उस समुदाय के नष्ट होने का अहसास भी होता है। इस तरफ सभी देशों को ध्यान देने की जरुरत है, अन्यथा हम अपनी विरसत को यूँ ही खोते रहेंगे !!

-आकांक्षा यादव

मंगलवार, 2 मार्च 2010

जहां मुट्ठी में

अक्सर हम लोग चर्चा में कहते हैं कि इस दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं है. यदि व्यक्ति चाहे तो धरती क्या असमान भी मुट्ठी में समां सकता है. भले ही यह बात प्रतीकात्मक हो, पर इस चित्र को देखकर तो यही लगता है मानो जहां मुट्ठी में समा गया हो !!

सोमवार, 1 मार्च 2010

होली पर्व की शुभकामनायें


रंग-बिरंगी होली आई !
खुशियों का खजाना लाई !!

*** होली पर्व की ढेरों शुभकामनायें. सभी द्वेष भूलकर आज के दिन हम सभी एक हों ***