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शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

बड़े-बुजुर्गों के बारे में आत्मीयता से सोचें..

आजकल हर दिन किसी न किसी को समर्पित हो गया है. कई लोग इसका विरोध भी करते हैं, पर इसका सकारात्मक पहलू यह है कि आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में एक पल ठहरकर हम उस भावना पर विचार करें, जिस भावना से ये दिवस आरंभ हुए हैं. ..आज अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस है. संयुक्त परिवार जैसे-जैसे टूटते गए, बुजुर्गों की स्थिति भी दयनीय होती गई. हम यह भूल गए कि इनके बिना हमारे जीवन का कोई आधार नहीं है. दैनिक ट्रिब्यून अख़बार में प्रकाशित शब्द गौरतलब हैं- '' वृद्धजन सम्पूर्ण समाज के लिए अतीत के प्रतीक, अनुभवों के भंडार तथा सभी की श्रद्धा के पात्र हैं। समाज में यदि उपयुक्त सम्मान मिले और उनके अनुभवों का लाभ उठाया जाए तो वे हमारी प्रगति में विशेष भागीदारी भी कर सकते हैं। इसलिए बुजुर्गों की बढ़ती संख्या हमारे लिए चिंतनीय नहीं है। चिंता केवल इस बात की होनी चाहिए कि वे स्वस्थ, सुखी और सदैव सक्रिय रहें।''


यहाँ भीष्म साहनी की कहानी 'चीफ की दावत' याद आती है, जहाँ बेटे ने अपने बास को घर बुलाने से पहले बूढी माँ को कैद ही कर दिया. पर जाते-जाते बास माँ से टकरा ही गया और वो भावनात्मक पल...! आज कहीं वृद्धाश्रम खुल रहे हैं तो कहीं घर में बुजुर्गों की जिंदगी जलालत का शिकार हो रही है. बड़े शहरों में अक्सर ऐसी घटनाएँ सुनने को मिलती हैं, जहाँ बुजुर्ग घर में अकेले रहते हैं और चोरी-हत्या इत्यादि के शिकार होते हैं. इन परिस्थितियों में बुजुर्ग अपने आपको उपेक्षित महसूस न करें, यह समाज की जवाबदारी है। भारत देश की बात करें तो हमारे यहाँ 1991 में 60 वर्ष से अधिक आयु के 5 करोड़ 60 लाख व्यक्ति थे। जो 2007 में बढ़कर 8 करोड़ 40 लाख हो गये। देश में सबसे अधिक बुजुर्ग केरल में हैं, जहाँ कुल जनसंख्या में 11 प्रतिशत बुजुर्ग हैं, जबकि सम्पूर्ण देश में यह औसत लगभग 8 प्रतिशत है।

जरुरत है कि हम अपने बड़े-बुजुर्गों के बारे में गहराई और आत्मीयता से सोचें और हमारे बुजुर्ग भी अपने को रचनात्मक कार्यों में लगायें, तभी मानवता का हित होगा.
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