आपका समर्थन, हमारी शक्ति

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

'उल्लास'....नव वर्ष का

नव वर्ष की बेला सामने आकर खड़ी है. न जाने कितने विचार आते हैं, जाते हैं. कुछ खोया तो कुछ पाया. नए साल को लेकर तमाम आकांक्षाएं उभरने लगती हैं, उत्साह मानो दूना हो जाता है, प्रेम की सुनहली किरणें चारों तरफ अपनी रश्मियाँ बिखेरने लगती हैं. ऐसे में याद आती है सुभद्रा कुमारी चौहान की इक कविता- उल्लास. सुभद्रा कुमारी चौहान के नाम से भला कौन अपरिचित होगा. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पर लिखी उनकी अमर रचना ''बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी..." ने उन्हें जग प्रसिद्ध बना दिया. पर आज उनकी कविता उल्लास बार-बार मन में गूंज रही है. आप भी इसका आनंद लें और नव वर्ष का उल्लास के साथ स्वागत करें-

शैशव के सुन्दर प्रभात का
मैंने नव विकास देखा।
यौवन की मादक लाली में
जीवन का हुलास देखा।

जग-झंझा-झकोर में
आशा-लतिका का विलास देखा।
आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का
क्रम-क्रम से प्रकाश देखा

जीवन में न निराशा मुझको
कभी रुलाने को आई।
जग झूठा है यह विरक्ति भी
नहीं सिखाने को आई।

अरिदल की पहिचान कराने
नहीं घृणा आने पाई।
नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी
भीषणता लाने पाई !!
एक टिप्पणी भेजें