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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं के लिए आरक्षण

लोकसभा-विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण के प्रयास बाद क्या न्यायपालिका में भी महिलाओं के लिए आरक्षण की जरुरत है. ऐसा तब सोचने की जरुरत पड़ती है, जब 29 जजों वाले सुप्रीम कोर्ट में एक भी महिला जज नहीं दिखती है. अभी तक सुप्रीम कोर्ट में 03 ही महिला जज पहुँची हैं- फातिमा बीबी, सुजाता मनोहर और रुमा पाल. और मुख्य न्यायधीश बनने का सौभाग्य तो किसी को नहीं मिला है. क्या वाकई भारत में नारी इतनी पिछड़ी हैं. आज देश की राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष से लेकर सबसे बड़ी प्रान्त की मुख्यमंत्री तक महिला हैं, फिर आजादी के 6 दशक बीत जाने के बाद भी कोई महिला सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायधीश पद पर क्यों नहीं पहुँची. अव्वल तो मात्र 03 महिलाएं ही यहाँ जज बनीं, यानि औसतन 20 साल में एक महिला. फिर न्यायपालिका में आरक्षण क्यों नहीं होना चाहिए?

सुनने में आ रहा है, जब पिछली बार एक महिला जज की वरिष्ठता की अनदेखी कर एक अन्य को प्रोन्नति देकर जज बनाया गया तो राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी ने भी यह सलाह दी थी की किसी महिला को जज क्यों नहीं बनाया जा रहा है. ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. फ़िलहाल झारखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश ज्ञान सुधा मिश्रा जी सबसे वरिष्ठ हैं, और आशा की जानी चाहिए की शीघ्र ही उनके रूप में सुप्रीम कोर्ट को चौथी महिला जज मिलेगी. पर सवाल अभी भी वहीँ कायम है कि यह सब स्थिति देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं को आरक्षण क्यों न दिया जाय ??
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