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सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

टॉप हिंदी ब्लॉग्स में शामिल हुआ 'शब्द-शिखर'

इंटरनेट पर हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार और ब्लागिंग के माध्यम से देश-विदेश में अपनी रचनाधर्मिता को विस्तृत आयाम देने वाले ब्लॉगर दम्पति राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर  के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा  यादव के ब्लॉग क्रमश: "डाकिया डाक लाया" (http://dakbabu.blogspot.in/) और "शब्द-शिखर" (http://shabdshikhar.blogspot.in/) को  टॉप हिंदी ब्लॉग्स में शामिल किया गया है। वर्ष 2008 से ब्लॉगिंग में सक्रिय एवम  ''दशक के श्रेष्ठ हिंदी ब्लॉगर दम्पति'' और  सार्क देशों के सर्वोच्च ''परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान'' से सम्मानित  दम्पति के दोनों ब्लॉगों को इंडियन टॉप ब्लॉग्स द्वारा 2015-16 के  लिए हाल ही में जारी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ 130 ब्लॉगों की डायरेक्टरी में स्थान दिया गया है। गौरतलब है कि वर्तमान में हिंदी में एक लाख से ज्यादा ब्लॉग संचालित हैं।


डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव  नेपाल, भूटान और श्रीलंका सहित तमाम देशों में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में सम्मानित हो चुके हैं। जर्मनी के बॉन शहर में होने वाले ग्लोबल मीडिया फोरम (2015) के दौरान 'पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड' श्रेणी में  आकांक्षा यादव के ब्लॉग 'शब्द-शिखर'  को हिंदी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में भी सम्मानित किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा वर्ष  2012 में इस दम्पति को  ”न्यू मीडिया एवं ब्लाॅगिंग” में उत्कृष्टता के लिए ''अवध सम्मान'' से भी विभूषित किया जा  चुका  है। सौ से ज्यादा देशों में देखे-पढ़े जाने वाले इनके ब्लॉग 'डाकिया डाक लाया' और 'शब्द-शिखर' पर अब तक 738 और 512 पोस्ट प्रकाशित हैं।


 ब्लॉगिंग के साथ-साथ कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव साहित्य और लेखन में भी सक्रिय हैं।  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ-साथ,  अब तक श्री यादव की 7 पुस्तकें और नारी सम्बन्धी मुद्दों पर प्रखरता से लिखने वालीं आकांक्षा यादव की 3 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। देश-दुनिया में शताधिक सम्मानों से विभूषित यादव दम्पति एक लंबे समय से ब्लॉग और सोशल  मीडिया के माध्यम से हिंदी साहित्य एवं विविध विधाओं में अपनी रचनाधर्मिता को प्रस्फुटित करते हुये अपनी व्यापक पहचान बना चुके हैं।









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Hindi-blog-directory

The 2015-16 edition of the Directory of Best Hindi Blogs has been released on 30th September 2016. It has 130 blogs, listed alphabetically [according to the operative part of the URL]. For more details on compilation etc, you can visit the post announcing the release of the Directory.

30 सितंबर 2016 को जारी हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों की डायरेक्टरी का 2015-16 संस्करण आपके सामने प्रस्तुत है. इसमें 130 ब्लॉग हैं जिन्हें अंग्रेज़ी के अक्षरों के क्रम में लगाया गया है. संकलन आदि के बारे में अधिक जानकारी के लिए डायरेक्टरी विमोचन पर जारी की गई इस पोस्ट पर जाएं.

4yashoda मेरी धरोहर 
aajtak-patrika दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
aarambha आरम्भ 
abchhodobhi अब छोड़ो भी 
akanksha-asha Akanksha 
akhtarkhanakela आपका-अख्तर खान "अकेला" 
amitaag Safarnaamaa... सफ़रनामा... 
anilpusadkar अमीर धरती गरीब लोग 
anitanihalani मन पाए विश्राम जहाँ 
anubhaw अनुभव 
anunad अनुनाद 
apnapanchoo अपना पंचू 
apninazarse अपनी नज़र से 
archanachaoji मेरे मन की 
artharthanshuman Arthaat 
ashaj45 स्वप्नरंजिता 
ashokbajajcg ग्राम चौपाल 
avojha मुक्ताकाश.... 
baatapani बात अपनी 
bal-kishore Bal-Kishore 
bamulahija Bamulahija 
banarahebanaras बना रहे बनारस 
bastarkiabhivyakti बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई झरना... 
batangad बतंगड़ BATANGAD 
bhadas भड़ास blog 
bhartiynari भारतीय नारी 
boletobindas Bole to...Bindaas....बोले तो....बिंदास 
brajkiduniya ब्रज की दुनिया 
burabhala बुरा भला 
chaitanyanagar हंसा जाइ अकेला 
chandkhem हरिहर 
charchamanch चर्चा मंच 
chavannichap chavanni chap (चवन्नी चैप) 
chouthaakhambha चौथा खंबा 
daayari डायरी 
dakbabu डाकिया डाक लाया 
devendra-bechainaatma बेचैन आत्मा 
dillidamamla ऐवें कुछ भी 
doosrapahlu दूसरा पहलू 
drashu ***…….सीधी खरी बात…….*** 
dr-mahesh-parimal संवेदनाओं के पंख 
drparveenchopra मीडिया डाक्टर 
ekla-chalo एकला चलो 
ek-shaam-mere-naam एक शाम मेरे नाम 
firdausdiary Firdaus Diary 
geetkalash गीत कलश 
girijeshrao एक आलसी का चिठ्ठा 
gurugodiyal अंधड़ ! 
gustakh गुस्ताख़ 
gyandarpan ज्ञान दर्पण 
hashiya हाशिया 
hathkadh Hathkadh 
ictipshindi Tips in Hindi [आई. सी. टिप्स हिंदी] 
jagadishwarchaturvedi नया जमाना 
jaikrishnaraitushar छान्दसिक अनुगायन 
jankipul जानकीपुल 
jantakapaksh जनपक्ष 
jindagikeerahen जिंदगी की राहें 
jlsingh jls 
johaisohai जो है सो है 
kabaadkhaana कबाड़खाना 
kajalkumarcartoons Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून 
kavitarawatbpl KAVITA RAWAT 
kpk-vichar मेरे विचार मेरी अनुभूति 
krantiswar क्रांति स्वर 
kuchhalagsa कुछ अलग सा 
kuldeepkikavita man ka manthan. मन का मंथन। 
kumarendra रायटोक्रेट कुमारेन्द्र 
laharein लहरें 
lalitdotcom ललित डॉट कॉम 
laltu आइए हाथ उठाएँ हम भी 
lamhon-ka-safar लम्हों का सफ़र 
lifeteacheseverything मेरी भावनायें... 
likhdala likh dala 
likhoyahanvahan लिखो यहां वहां 
main-samay-hoon समय के साये में 
masharmasehar Sehar 
mykalptaru कल्पतरु 
naisadak कस्‍बा qasba 
navgeetkipathshala नवगीत की पाठशाला 
neerajjaatji मुसाफिर हूँ यारों 
ngoswami नीरज 
omjaijagdeesh वंदे मातरम् 
onkarkedia कविताएँ 
pahleebar पहली बार 
pammisingh Guftugu 
paramjitbali-ps2b ******दिशाएं****** 
parisamvad परवाज़... शब्दों के पंख 
pittpat बर्ग वार्ता - Burgh Vartaa 
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shyamthot श्याम स्मृति.. 
sriramprabhukripa श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो 
sudhinama Sudhinama 
sumitpratapsingh सुमित प्रताप सिंह  
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tsdaral अंतर्मंथन 
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usiag नयी उड़ान + 
vandana-zindagi जिन्दगी 
yehmerajahaan Yeh Mera Jahaan 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

पतियाें काे पीटने में तीसरे नंबर पर हैं भारतीय पत्नियाँ ??

अपने देश भारत में घरेलू हिंसा एक व्यापक विमर्श का विषय है। अक्सर ही  हम देखते हैं कि आये दिन कोई न कोई महिला अपने पति की हिंसा का शिकार होती है। घरेलू हिंसा का ग्राफ दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। अक्सर अापने 'पतियों' द्वारा ढाए जाने वाले जुल्मों की दास्तां सुनी हाेगी, लेकिन यूएन द्वारा करवाए गए एक सर्वे में पतियों पर हुए घरेलू हिंसा के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इसके अनुसार पतियों को मारने के लिए पत्नियां बेलन, बेल्ट, जूते व किचन के अन्य सामानों का इस्तेमाल करती हैं।

अांकड़ाें की बात करें तो, मिस्र  में घरेलू हिंसा के तहत सबसे ज्यादा पति पीटे जाते हैं। इस श्रेणी में दूसरा नाम यूनाइटेड किंगडम का है और तीसरे नंबर पर भारत है। भारत का नाम तीसरे स्थान पर आना कई सवाल भी खड़े कर रहा है और संशय भी क्योंकि भारतीय समाज की प्रवृत्ति  प्रायः इसके विपरीत है। खैर, इस बारे में अभी यह जानकारी आनी शेष है कि यह सर्वे किन राज्यों या शहरों में किया गया, किस तबके के लोगों से बात किया गया, पूछी जाने वाली प्रश्नावली क्या थी और किस एजेंसी की मार्फ़त यह सर्वे किया गया ? 

इस रिपोर्ट के अनुसार तलाक लेने वाली महिलाओं में 66 फीसदी महिलाएं वही होती हैं, जो अपने पतियों के साथ खराब व्यवहार करती हैं। पत्नी से पीड़ित पति यह भी एक अजीब संयोग है कि इस सर्वे से संबंधित ख़बरें भी तभी प्रसारित हुईं, जब भारत में करवा चौथ के त्यौहार मनाने की तैयारियाँ चल रही थीं। ख़ैर, असलियत सामने आणि अभी बाकी है।  यह सही है कि  भारत में नारी-सशक्तिकरण की जड़ें धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं, पर इतनी भी नहीं कि इसकी आड़ में पत्नियाँ, पतियों की पिटाई करने लगी हैं। 

खैर, सोशल मीडिया पर यूएन द्वारा करवाया गये इस तथाकथित सर्वे  को लेकर खासा प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। एक यूजर ने लिखा कि इसके पीछे सबसे कड़वा सच है कि समाज पुरुषों के साथ होने वाले जुल्मों के प्रति उदासीन रहता है, आवाज नहीं उठाता। तो एक अन्य यूजर ने लिखा कि एक लंबे समय से पत्नियाँ पतियों के जुल्म सह रही हैं, लेकिन अब पत्नियों ने भी पतियों को सबक सिखाना सीख लिया है।

पर, इस बात को सुनकर अभी भी हैरानी होती है  कि भारत इस हिंसा में तीसरे स्थान पर है !!

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

दाम्पत्य प्रेम का उत्सव है करवा चौथ

करवा चौथ सुहागिनों का एक व्रत मात्र नहीं है, बल्कि दाम्पत्य प्रेम का उत्सव भी है। रिश्तों की डोर को मजबूत रखने का एहसास भी है। चौदहवीं का चाँद की खूबसूरती उपमा अपने यहाँ खूब दी जाती है, पर करवा चौथ के  चाँद की बात ही निराली होती है। इस दिन तो उनकी बड़ी मनुहार होती है और चाँद भी खूब लुका -छिपी खेलता है।  वैसे भी चाँद की शीतलता और मधुरता  का स्वभाव दाम्पत्य प्रेम के लिए जरुरी है। जीवन साथी को चाँद की उपमा दी जाती है और चांदनी को प्रेम की। ऐसे में करवा चौथ के साथ चाँद का तादात्म्य और भी गहरा हो जाता है। 

करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बहुत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।  करवा चौथ के दिन श्री गणेश, मां गौरी और चंद्रमा  का पूजन किया जाता है। पूजन करने के लिए बालू की वेदी बनाकर सभी देवों को स्थापित किया जाता है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाये जाने वाले इस त्यौहार में सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। इस पर्व पर महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाकर, चूड़ी पहन व सोलह श्रृंगार कर अपने पति की पूजा कर व्रत का पारायण करती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4  बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। इस दिन पत्नियाँ निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं और रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्य देने के उपरांत ही अपना व्रत तोड़ती हैं। 

भारत देश में वैसे तो चौथ माता जी के कई  मंदिर स्थित है, लेकिन सबसे प्राचीन एवं सबसे अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गाँव में स्थित है । चौथ माता के नाम पर इस गाँव का नाम बरवाड़ा से चौथ का बरवाड़ा पड़ गया । चौथ माता मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी ।

करवा चौथ व्रत से कई  कहानियां जुडी हुई हैं। इनमें से सर्वप्रमुख एक साहूकार के सात बेटों और उनकी एक बहन करवा से जुडी हुई है। इस कहानी के अनुसार सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा कि उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल  है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। ऐसे में वह  व्याकुल होकर तड़प उठती  है। ऐसे में उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कहकर  वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। 

करवा चौथ के व्रत का जिक्र महाभारत में भी मिलता है।  कहते हैं कि  जब पांडव वन-वन भटक रहे थे तो भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को इस दिव्य व्रत के बारे बताया था।  इसी व्रत के प्रताप से द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी उम्र का वरदान पाया था। 

फिल्मों और धारावाहिकों ने करवा चौथ के व्रत को ग्लैमराइज रूप भी दिया है। कुछ ही  सिमित इस त्यौहार को इनके चलते देशव्यापी पहचान मिली है। करवाचौथ को लेकर तमाम बातें भी कही जाती हैं। मसलन, मात्र पत्नी द्वारा ही व्रत क्यों रखा जाये या मात्र व्रत रखने से भला कौन सी उम्र बढ़ती है ? सवाल उठने स्वाभाविक भी हैं और इनके तार्किक जवाब देना  मुश्किल भी है। अपने देश में व्रत और त्यौहारों की दीर्घ परंपरा रही है और यह भी उतना ही सच है कि अधिकतर त्यौहारों और व्रत का जिम्मा महिलाओं का ही होता है।  कुछ लोग इसे पितृ-सत्तात्मक सोच से जोड़कर देखते हैं, तो कुछेक का मानना  है कि पुरुषों में इतना संयम और धैर्य नहीं होता की वे इसे निभा सकें। खैर, तर्क-वितर्कों से परे तमाम परम्पराएँ आज भी समाज को जीवंत रूप देती हैं। आस्था उनका मूल तत्व है।   

वस्तुत : करवा चौथ के व्रत को फायदे-नुकसान या बाध्यता की  बजाय प्यार और समर्पण के नजरिये से देखने की जरूरत है। अपने रिश्तों में संजीदगी भी व्रत का जरुरी हिस्सा होता है। उम्र का बढ़ना या न बढ़ना अपने हाथ में तो नहीं है, लेकिन प्यार की उम्र जरूर बढ़ती है। सिर्फ पत्नियाँ ही नहीं बल्कि अब तो पति भी अपनी-अपनी तरह से प्यार का इज़हार करने में पीछे नहीं रहते। चाहे वो साथ में चाँद का इंतज़ार हो, छुट्टी लेकर पूरा दिन साथ में बिताना हो, उपहार देना हो या साथ में व्रत रखना हो। ऐसे में व्रत को केवल सिद्धांत रूप में देखना नाकाफ़ी होगा। यह व्रत पति-पत्नी में प्यार, सम्मान, विश्वास को मजबूत करते हुए रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है।  करवा चौथ के व्रत और पर्व को समग्रता में देखते हुए अपने वैवाहिक जीवन को और और सुदृढ़ करने की दोतरफ़ा कोशिश जरूर होनी चाहिए।

करवा चौथ का पर्व हर साल आता है और पूरे जोशो खरोश के साथ सेलिब्रेट किया जाता है। करवा चौथ  सिर्फ एक त्यौहार ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सन्देश भी छिपा हुआ है।  आज समाज में जब रिश्तों के मायने बदलते जा रहे हैं, भौतिकता की चकाचौंध में हमारे पर्व और त्यौहार भी उपभोक्तावादी संस्कृति तक सिमट गए हैं, ऐसे में करवा चौथ के मर्म और मूल को समझने की जरूरत है। 

करवा चौथ (करक चतुर्थी) अर्थात भारतीय नारी के समर्पण, शीलता, सहजता, त्याग, महानता एवं पतिपरायणता  को व्यक्त करता एक पर्व। दिन भर स्वयं भूखा प्यासा रहकर रात्रि को जब मांगने का अवसर आया तो अपने पति देव के मंगलमय, सुखमय और दीर्घायु जीवन की ही याचना करना यह नारी का त्याग और समर्पण नहीं  तो और क्या है ?

करवा चौथ का वास्तविक संदेश दिन भर भूखे रहना ही नहीं अपितु यह है नारी अपने पति की प्रसन्नता के लिए, सलामती के लिए इस हद तक जा सकती है कि पूरा दिन भूखी - प्यासी भी रह सकती है। करवा चौथ नारी के लिए एक व्रत है और पुरुष के लिए एक शर्त। शर्त केवल इतनी कि जो नारी आपके लिए इतना कष्ट सहती है उसे कष्ट न दिया जाए। जो नारी आपके लिए समर्पित है उसको और संतप्त न किया जाए। जो नारी प्राणों से बढ़कर आपका सम्मान करती है जीवन भर उसके सम्मान की रक्षा का प्रण आप भी लो। उसे उपहार नहीं आपका प्यार चाहिए !!

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सिंधु और साक्षी के बाद समाज में बेटियाँ



बेटियों को मौका मिले तो वो तारे भी जमीं पर लाने का हौसला रखती हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर कैरियर तक उन्हें जहाँ भी मौका मिला, डॉक्टर-इंजीनियर-आई.ए.एस की परीक्षाओं से लेकर अंतरिक्ष की कल्पना तक...... हर जगह उन्होंने नए मुकाम गढ़े। पर इस सबके बावजूद पितृसत्तात्मक समाज सदैव से बेटियों के साथ दोयम व्यवहार करता रहा है। भ्रूण-हत्या से लेकर धरा पर आने तक हर कदम पर उसकी आवाज़ और जज्बे को कुचलने का प्रयास किया गया। उनकी शारीरिक संरचना को ही उनकी कमजोरी बना दिया गया।  रक्षाबंधन जैसे त्यौहार को भाई द्वारा बहन की रक्षा से जोड़कर, बहनों को और कमजोर बना दिया गया। ऐसे में रियो ओलम्पिक में जब लाव-लश्कर के साथ गई भारतीय टीम को अंतिम समय पर दो बेटियों ने मेडल लाकर उबारा तो एक बार फिर से समाज में बीटा बनाम बेटी की बहस तेज हो गई।  बदलते वक़्त के साथ समाज की दकियानूसी सोच को अब बदलने की जरुरत है। जिस देश में 125 करोड़ लोग मिल कर एक बेटी की इज्जत नहीं बचा पाते, उस देश की दो बेटियों पी. वी. सिंधु और साक्षी मलिक ने रियो ओलम्पिक में 125 करोड़ देशवासियों की इज्जत बचा ली। यह भी संयोग था कि उस दिन रक्षाबंधन का पर्व था। जिस समाज में दहेज़ के नाम पर बहुओं से सोना लाने की आशा की जाती है, वह देश आज बेटियों  से गोल्ड की उम्मीद लगाये है ! इन सबको लेकर प्रिंट मिडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया व वाट्सएप पर नारी-सशक्तिकरण और बेटियों के पक्ष में बड़ी अच्छी-अच्छी बातें सुनने को मिलीं, उनमें से कुछेक यहाँ शेयर कर रही हूँ -

सिंधु, साक्षी तुमने मेडल जीता
देश झूम कर नाचा है
तुमने भ्रूण हत्यारों के
चेहरे पे जड़ा तमाचा है
आज ख़ुशी से नाच रहे 
साक्षी-सिंधु चिल्लाते हो
अपने घर में बेटी जन्मे
फिर क्यों मुँह लटकाते हो?
रियो ओलम्पिक में भारत ने
दो मेडल ही पाया है
और ये दोनों मेडल भी
बेटियों ने ही लाया है
आज इन्हीं बेटियों के आगे
जनमानस नतमस्तक है
आज इन्हीं के कारण ही 
भारत का ऊँचा मस्तक है
आज ख़ुशी से झूम रहे हो
अच्छी बात है झूमो-गाओ
लेकिन घर में बेटी जन्मे 
तब भी इतनी खुशी मनाओ
बेटियाँ कम नहीं किसी से
शक्ति का अवतार हैं
इनको जो सम्मान न दे
उसका जीना धिक्कार है !!

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हुआ कुम्भ खेलों का आधा, हाथ अभी तक खाली थे।
औरों की ही जीत देख हम, पीट रहे क्यों ताली थे।
सवा अरब की भीड़ यहाँ पर, गर्दन नीचे डाले थी।
टूटी फूटी आशा अपनी, मानो भाग्य हवाले थी।
मक्खी तक जो मार न सकते, वे उपदेश सुनाते थे।
जूझ रहे थे उधर खिलाड़ी, लोग मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता था भारत ने, नाम डुबाया खेलों में।
कोई कहता धन मत फूंको, ऐसे किसी झमेलों में।
कोई कहता मात्र घूमने, गए खिलाड़ी देखो तो।
कोई कहता भारत की है, पंचर गाड़ी देखो तो।
बस क्रिकेट के सिवा न जिनको, नाम पता होगा दूजा।
और वर्ष भर करते हैं जो, बस क्रिकेट की ही पूजा।
चार साल के बाद उन्हें फिर नाक कटी सी लगती है।
पदक तालिका देख देख कर, शान घटी सी लगती है।
आज देश की बालाओं ने, ताला जड़ा सवालों पर।
कस के थप्पड़ मार दिया है, उन लोगों के गालों पर।
बता दिया है जब तक बेटी, इस भारत की जिंदा हैं।
यह मत कहना भारत वालो, हम खुद पर शर्मिंदा हैं।
शीश नहीं झुकने हम देंगी, हम भारत की बेटी हैं।
आन बान की खातिर तो हम, अंगारों पर लेटी हैं।
भूल गए यह कैसे रक्षा-बंधन आने वाला है।
बहिनों के मन में पावन, उत्साह जगाने वाला है।
भैया रहें उदास भला फिर, कैसे राखी भाती ये।
पदकों के सूखे में पावस, कैसे भला सुहाती ये।
दो-दो पदकों की यह राखी, बाँधी, देश कलाई पर।
इतना तो अहसान सदा ही, करती बहिना भाई पर।
आज साक्षी के भुजदंडों, ने सबको ललकारा है।
अगर हौसला दिल में है तो, पूरा विश्व हमारा है।
पीवी संधू के तेवर हैं,  जैसे लक्ष्मीबाई हो।
अपनी भाई की खातिर ज्यों, बहिन युद्ध में आई हो।
जिनको अबला कहा वही तो, सबला बन छा जातीं हैं।
अपने मन में ठान लिया वह, पूरा कर दिखलाती हैं !!

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ऋणी रहेगा देश सिंधु, साक्षी, इस राखी के उपहार का
बहनों के सर जिम्मा हैं अब राष्ट्र के विस्तार का
मांस-मीट की ताकत फिर से दूध-दही से हारी हैं
हिन्दुस्तान में  साबित हो गया बेटी बेटों पर भारी हैं
करते रहे गुनाह हम, केवल बेटे के शौक में
कितने मेडल मार दिए, जीते जी ही कोख में
चमक रहीं है बेटियाँ, बन माथे का बिंदु 
बढ़ा रहीं सम्मान देश का, साक्षी और सिंधु !!

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एक बानगी यह भी..... 

Days are really changing fast in India. 
Earlier women used to win beauty contests and men used to be wrestling champions.
Now the roles have reversed. 
Rohit Khandelwal was Mr World 2016
While Sakshi is wrestling champion in 2016 Olympics
Food for thought....
Sindhu won silver !!
Sakshi won bronze !!

इस तरह के विचारों और भावों को सुनना बहुत सुकूनदायी लगता है।  पर, दुर्भाग्यवश इस तरह की बातों का ज्वार बेहद अल्प होता है।  कुछेक समय बाद, फिर से वही पुराना ढर्रा आरम्भ हो जाता है। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसी चीजें नारों तक ही सीमित रह जाती हैं। जरूरत है कि आज के दौर की सच्चाई को स्वीकार किया जाये और बेटियों को सशक्त करके राष्ट्र को भी सशक्त किया जाये !!

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

हमारे घर आँगन आज सावन आया है...




चना ज़ोर गरम और पकौड़े  प्याज़ के ...
चार दिन मे सूखेंगे कपड़े ये आज के ...

आलस और खुमारी बिना किसी काज के ...
टर्राएँगे मेंढक फिर बिना किसी साज़ के ...

बिजली की कटौती का ये मौसम आया है ...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...

भीगे बदन और गरम चाय की प्याली ...
धमकी सी गरजती बदली वो काली ...

नदियों सी उफनती मुहल्ले की नाली ...
नयी सी लगती वो खिड़की की जाली ...

छतरी और थैलियों का मौसम आया है ...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...

निहत्थे से पौधों  पे बूँदो का वार ...
हफ्ते मे आएँगे अब दो-तीन इतवार ...

पानी के मोतियों से लदा वो मकड़ी का तार...
मिट्टी की खुश्बू से सौंधी वो फुहार ...

मोमबत्तियाँ जलाने का मौसम आया है...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...!


सावन में पेड़ों पर पड़ने वाले झूले तो अब गुजरे ज़माने की बातें हो गई। नई पीढ़ी अब झूलों का आनंद या तो घर में लेती है या पार्कों में। 

(चित्र में : बिटिया अपूर्वा झूले का आनंद लेती हुई) 




शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

संघर्षों से भरा रहा महाश्वेता देवी का जीवन

कुछ नाम किसी परिचय के मोहताज़ नहीं होते। उन्हीं में से एक नाम है - मशहूर लेखिका, साहित्यकार,  समाजसेविका और आंदोलनधर्मी और  महाश्‍वेता देवी का।  साहित्‍य अकादमी, ज्ञानपीठ अवार्ड, रेमन मैग्‍सेसे और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित महाश्‍वेता देवी को आदिवासी लोगों के लिए काम करने के लिए भी जाना जाता है। 

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी  1926 को उस समय के पूर्वी  बंगाल (अब बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था। उनके पिता मनीष घटक भी कवि और उपन्यासकार थे। उनकी माँ धारित्री लेखिका और समाजसेविका थीं। तभी तो महाश्वेता देवी को साहित्य और समाज सेवा विरासत में मिली थी। 1944 में महाश्वेता देवी ने कोलकाता (तब कलकत्ता) के आशुतोष कॉलेज से इंटरमीडिएट किया। 1946 में  शांतिनिकेतन से अंग्रेजी में बीए (ऑनर्स) और कोलकाता यूनिवर्सिटी से एमए करने के बाद उन्होंने एक अध्यापक और पत्रकार के रूप में करियर शुरू किया। वे कोलकाता यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की लेक्चरर रहीं। 1984 में उन्होंने यहां से इस्तीफा दे दिया और लेखन में सक्रिय हो गईं।

महाश्वेता देवी की पहली रचना 'झांसी की रानी' थी । उनकी शुरुआती तीन कृतियां स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित थीं। उनकी लघुकथाओं में मीलू के लिए, मास्टर साब, कहानियों में  स्वाहा, रिपोर्टर, वॉन्टेड, उपन्यास में नटी, अग्निगर्भ, झांसी की रानी, हजार चौरासी की मां, मातृछवि, जली थी अग्निशिखा, जकड़न
और आलेख विधा में अमृत संचय, घहराती घटाएं, भारत में बंधुआ मजदूर, ग्राम बांग्ला, जंगल के दावेदार कृतियाँ चर्चित हैं। 

महाश्वेता देवी को दौलत से जरा भी लगाव नहीं था। सम्मान में मिली राशि भी वे समाज सेवा के लिए ही खर्च करतीं। नेल्सन मंडेला के हाथों प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने के बाद इसके साथ मिले पांच लाख रुपए का चेक उन्होंने पुरुलिया आदिवासी समिति को दे दिया था। पश्चिम बंगाल की 'लोधास' और 'शबर' जनजातियों के लिए उन्होंने काफी काम किया। महाश्वेता देवी की नौ में से आठ कहानियां आदिवासियों पर ही लिखी गई हैं। झारखंड (पूर्व में बिहार का हिस्सा रहे) में बंधुआ मजूदरी के खिलाफ आवाज उठाने के लिए वे आदिवासी क्षेत्रों में बार-बार जाती थीं। झारखंड के आदिवासियों की हालत में सुधार दिखा तो उन्होंने पुरुलिया के आदिवासियों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। वहां उन्होंने कई गांवों में कम्युनिटी सेंटर और आदिवासी सेंटर बनाए। गुजरात के गणेश देवी और महाराष्ट्र के लक्ष्मण गायगवाड़ के साथ मिलकर देशभर में घुमंतू जनजाति के लिए DNT-RAG (डिनोटिफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब्स राइट्स एंड एक्शन ग्रुप) बनाया।

महाश्वेता देवी को साहित्य और समाज सेवा के लिए तमाम पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में पद्मश्री, 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1997 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और 2006 में पद्मविभूषण मिला। उनकी कई कृतियों पर फिल्मों का भी निर्माण हुआ। अमिताभ बच्चन और रेखा के साथ 1981 में रिलीज हुई 'सिलसिला' के 17 साल बाद जया बच्चन ने महाश्वेती देवी के उपन्यास 'हजार चौरासी की मां' पर बनी फिल्म  के जरिए ही बॉलीवुड में वापसी की थी। गौरतलब है कि  मार्च 1998 में जारी  हुई इस फिल्म का निर्देशन गोविंद निहलानी ने किया था। इसमें जया बच्चन के अलावा अनुपम खेर और नंदिता दास भी थे।

महाश्वेता देवी का खुद का जीवन भी झंझावतों और संघर्षों से भरा रहा।  की दो शादियाँ हुईं। 1947 में मशहूर रंगकर्मी विजन भट्टाचार्य से उनकी शादी हुई। विजन से शादी के बाद महाश्वेता देवी के परिवार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। दरअसल, विजन कम्युनिस्ट थे और उस समय कम्युनिस्टों को रोजगार मुश्किल से मिलता था। तब 1948 में महाश्वेता देवी ने पदमपुकुर इंस्टीट्यूशन में अध्यापन  करके घर का खर्च चलाया। 1949 में महाश्वेता देवी को केंद्र सरकार के डिप्टी अकाउंटेंट जनरल, पोस्ट एंड टेलिग्राफ ऑफिस में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी मिली, लेकिन पति कम्युनिस्ट थे, इसलिए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद महाश्वेता देवी ने साबुन बेचकर और ट्यूशन पढ़ाकर घर का खर्च चलाया। बाद में 1957 में स्कूल में टीचर की नौकरी लगी।
शादी के 15 साल बाद 1962 में विजन भट्टाचार्य से उनका तलाक हो गया। विजन से उन्हें एक बेटा नवारुण भट्टाचार्य है। असीत गुप्त से दूसरी शादी हुई, लेकिन 1975 में उनसे भी तलाक हो गया।

इसमें कोई शक नहीं कि महाश्वेता देवी का पूरा जीवन ही संघर्षों से भरा रहा।  यही कारण था कि संघर्षों से वे कभी घबराई नहीं और समाज के निचले समाज के लिए सदैव संघर्षरत भी रहीं। 28 जुलाई, 2016  को उन्होंने अंतिम सास ली। अपने ही अंदाज में जीने वालीं महाश्वेता सिर्फ पन्नों पर ही शब्द नहीं उकेरती थीं बल्कि उसे आंदोलन की भावभूमि देने का सत्साहस भी रखती थीं। ऐसे में उनका जाना न सिर्फ साहित्य बल्कि समाज के लिए भी एक गहरी क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे .... विनम्र श्रद्धांजलि !!

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

राजस्थानी पत्रिका 'माणक' में अनूदित हिन्दी कविताएँ



अब हमारी कविताएँ राजस्थानी भाषा में भी। राजस्थानी मासिक पत्रिका ''माणक'' (जुलाई-2016) में प्रकाशित हमारी कुछेक कविताएँ ( मैं अजन्मी, अस्तित्व और एस.एम.एस) जिनका हिंदी से राजस्थानी में अनुवाद जुगल परिहार ने किया है।  आभार !!


 राजस्थानी पत्रिका ''माणक'' (मई 2016) में प्रकाशित पतिदेव कृष्ण कुमार यादव जी की कुछेक कविताएँ, जिन्हें त्रुटिवश हमारे नाम से प्रकाशित कर दिया गया था। जुलाई, 2016 में त्रुटि-सुधार के साथ संपादक ने हमारी कविताएँ प्रकाशित कीं......आभार !!

संपर्क -
माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) :  संपादक - पदम मेहता
माणक प्रकाशन, जालोरी गेट, जोधपुर (राजस्थान) -342003  

शनिवार, 23 जुलाई 2016

क्रन्तिकारी चन्द्रशेखर 'आजाद' और इलाहाबाद से जुड़ी उनकी यादें


भारत की फिजाओं को सदा याद रहूँगा 
आज़ाद था, आज़ाद हूँ, आज़ाद रहूँगा !


आज चन्द्रशेखर 'आजाद' (23 जुलाई, 1906 - 27 फरवरी, 1931) की आज 110 वीं जयंती है। ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अत्यन्त सम्मानित और लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी रहे आज़ाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे महान क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। इलाहाबाद में उनका अंतिम समय गुजरा और यहीं की मिट्टी में उन्होंने अंतिम साँस ली। आज भी कंपनी गार्डेन में लगी उनकी भव्य मूर्ति उनके जीवन को प्रतिबिंबित करती है। वाकई वो अंत तक आज़ाद ही रहे। 

चन्द्रशेखर 'आजाद' की जयंती पर शत-शत नमन !!


अमर शहीद चन्द्र शेखर आजाद की 27 फरवरी, 1931 की अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में पुलिस से हुई मुठभेड़ में प्रयुक्त पिस्तौल जो तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, इलाहाबाद सर जॉन नाट बावर के सौजन्य से प्राप्त हुई थी। इसे इलाहाबाद संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। 

!! स्वतंत्रता संग्राम के क्रन्तिकारी नायक चन्द्रशेखर आज़ाद जी की 110वीं जयंती पर उन्हें शत-शत नमन !!


शनिवार, 16 जुलाई 2016

नेपाल की पहली महिला मुख्‍य न्‍यायाधीश बनीं सुशीला कार्की

भारत में सर्वोच्च न्यायालय के शीर्ष पद पर भले ही कोई महिला अब तक नहीं पहुँची हो, पर पड़ोसी देश नेपाल में भारत के ही बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से राजनीति शास्त्र में मास्‍टर डिग्री लेने वाली सुशीला कार्की मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन हुई हैं । पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में विद्या देवी भंडारी और पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष ओनसारी घरती के बाद शीर्ष पद पर किसी महिला की यह तीसरी नियुक्ति है। इसी के साथ नेपाल में राष्ट्रपति, संसद की स्पीकर और सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, इन तीनों महत्वपूर्ण पद पर महिलाएं आसीन हैं, जो कि नारी-सशक्तिकरण के लिहाज से भी ऐतिहासिक पल है।

नेपाल की न्यायपालिका के 64 साल के इतिहास में पहली बार किसी महिला ने मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला है। 64 वर्षीय सुशीला कार्की ने 11 जुलाई, 2016 को देश के 25वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली। कार्की के नाम की सिफारिश 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री केपी ओली की अध्यक्षता वाली संवैधानिक परिषद ने की थी। कार्की को राष्ट्रपति ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। वह पिछले तीन महीने से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर काम कर रही थीं। विशेष संसदीय समिति ने 10 जुलाई, 2016  को उनके नाम पर मुहर लगाई। नेपाल में किसी संवैधानिक पद पर नियुक्ति के लिए इस समिति की मंजूरी जरूरी होती है। कार्की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता के लिए जानी जाती हैं।

7 जून 1952 को बिराटनगर के पास एक गांव में जन्मीं कार्की की पहचान भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करने वाली और बिना किसी दबाव के फैसला सुनाने वाले जज के तौर पर रही है। कार्की अपने पिता की सात संतानों में सबसे बड़ी हैं। इनका सम्बन्ध किसान परिवार से है। उनका भारत से भी गहरा नाता रहा है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से सन 1975 में राजनीति शास्त्र में मास्‍टर डिग्री लेने वाली सुशीला कार्की ने वर्ष 1978 में त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल से विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्ययन के दौरान ही  नेपाली कांग्रेस के प्रसिद्ध युवा नेता दुर्गा प्रसाद सुवेदी से मिलने के पश्चात इनका विवाह दुर्गा प्रसाद सुवेदी से हुआ। प्रारम्भ में कार्की ने शिक्षण कार्य किया। 1979 में यह वकालत पेशे में आईं। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश नियुक्ति होने पहले कार्की सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठतम् न्यायाधीश थीं। 22 जनवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट की अस्थायी जज बनीं और 18 नवंबर 2010 को स्थायी जज बन गईं। 

- आकांक्षा यादव : Akanksha Yadav @ शब्द-शिखर : http://shabdshikhar.blogspot.in/

शुक्रवार, 24 जून 2016

नारी सशक्तिकरण की ओर एक कदम और : देश की पहली महिला फाइटर पायलट बनीं मोहना-भावना-अवनी, उड़ाएंगीं सुखोई और तेजस जैसे लड़ाकू विमान

अब जंग के मैदान में महिलाएं भी तेज रफ्तार से उड़ते लड़ाकू विमानों में कलाबाजियां करेंगी। जमीन से हजारों फीट ऊपर लड़ाकू विमानों की तेज रफ्तार और आवाज के बीच जल्द ही नजर आएगी नारी शक्ति। जल्द ही सुखोई और तेजस जैसे फाइटर प्लेन उड़ाती दिखेंगी हमारे देश की तीन जांबाज लड़कियां। जी हां, भारतीय वायुसेना के इतिहास में 18 जून, 2016  का दिन बेहद अहम है। इस दिन पहली बार तीन महिला अधिकारी वायुसेना में भारत की पहली महिला लड़ाकू पायलट के तौर पर शामिल की गईं। ये फाइटर पायलट हैं भावना कांथ (बिहार), अवनि चतुर्वेदी (मध्यप्रदेश) और मोहना सिंह (राजस्थान)।

तीनों  महिला अधिकारियों का चयन लड़ाकू विमान उड़ाने वाली नभयोद्धाओं की टीम के लिए हुअा है  जहां अब तक केवल पुरुषों का एकाधिकार था। महिलाएं वायुसेना में अब तक केवल ट्रांसपोर्ट विमान और हेलीकॉप्टर ही उड़ाती रहीं हैं। मगर अब देश को तीन पहली वुमन फाइटर पायलट मिल जाएंगी।  ये तीन महिला पायलट सुखोई और तेजस जैसे लड़ाकू विमानों को उड़ाती नजर आएंगी। इन तीनों पायलटों ने ट्रेनिंग का पहला चरण पूरा कर लिया है और कमीशंड होने के बाद कर्नाटक के बीदर में एडवांस ट्रेनिंग शुरू होगी। गौरतलब है कि  पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान में 3 साल पहले यानि 2013 में महिला फाइटर पायलटों को शामिल किया गया था।

मध्यप्रदेश की हैं अवनी
अवनी चतुर्वेदी मूल रूप से मध्यप्रदेश के रीवा की रहने वाली हैं। उनके पिता एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं। अवनी बताती है कि इस वजह से उसने आर्मी की लाइफ को करीब से देखा है। फाइटर पायलट बनने का मौका मिला तो परिवार से काफी सपोर्ट मिला। उन्होंने हर कदम पर उसे प्रोत्साहित किया।

राजस्थान से आती हैं मोहना
राजस्थान के झुंझुनूं जिले की मोहना सिंह ने दिल्ली के एयरफोर्स स्कूल से अध्ययन करने वाली मोहना सिंह के पिता भी भारतीय वायुसेना में हैं। भावना ने एमएस कॉलेज बेंगलुरु से बीई इलेक्ट्रिल और अवनी चतुर्वेदी ने राजस्थान के टॉक जिले में वनस्थली विद्यापीठ से कंप्यूटर साइंस की डिग्री हासिल की है। अवनी चतुर्वेदी, भावना कांथ और मोहना सिंह ने मार्च में ही लड़ाकू विमान उड़ाने की योग्यता हासिल कर ली थी। इसके बाद उन्हें युद्धक विमान उड़ाने का गहन प्रशिक्षण दिया गया। 

बिहार के साधारण परिवार से हैं भावना
बिहार के दरभंगा ज़िले के घनश्यामपुर प्रखंड के बाऊर गांव की निवासी भावना कांत बेहद साधारण परिवार से निकल कर आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंची हैं। उनके दादा एक इलेक्ट्रिशियन, तो पिता मैकेनिक रहे हैं। भावना ने डीएवी स्कूल, बरौनी रिफ़ाइनरी, बेगूसराय से वर्ष 2009 में दसवीं की परीक्षा पास की थी। उन्होंने बीएमएस बेंगलुरू से वर्ष 2014 में बीटेक किया। पिछले साल उन्हें भारतीय वायु सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत शामिल किया गया था। 


ये तीनों महिलाएं रचने जा रहीं इतिहास
यह पहला मौका होगा, जब भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान की कॉकपिट में कोई महिला बैठेगी। इंडियन एयरफोर्स में फिलहाल 94 महिला पायलट हैं, लेकिन ये पायलट सुखोई, मिराज, जगुआर और मिग जैसे फाइटर जेट्स नहीं उड़ाती हैं। वायुसेना में लगभग 1500 महिलाएं हैं, जो अलग-अलग विभागों में काम कर रही हैं। 1991 से ही महिलाएं हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट उड़ा रही हैं, लेकिन फाइटर प्लेन से उन्हें दूर रखा जाता था।

भारतीय सेना में पहली बार किसी महिला को मिलिट्री नर्सिंग सर्विस के लिए वर्ष 1927 में शामिल किया गया था। वर्ष 1992 में तत्कालीन सरकार की मंजूरी के बाद सेना के तीनों अंगों में महिला अधिकारियों को शामिल किया जाने लगा। 

18 जून को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर हैदराबाद स्थित भारतीय वायुसेना अकादमी की पासिंग आउट परेड की जब सलामी लेने पहुंचें तो  इसी मौके पर तीन महिला पायलटों, भावना कांथा, अवनि चतुर्वेदी और मोहना सिंह को वायु सेना की लड़ाकू पायलट शाखा में विधिवत रूप से कमिशन हासिल हो गया । ये तीनों महिला अधिकारी पिछले एक साल से इस अकादमी में लड़ाकू पायलट के दूसरे चरण का प्रशिक्षण ले रही हैं। इनकी 6 महीने की ट्रेनिंग पिलेट्स ट्रेनर पर हुई और 6 महीने की ट्रेनिंग किरन ट्रेनर पर हुई। 55 घंटे पिलेट्स पर उड़ान भरने बाद 87 घंटे किरन ट्रेनर पर इन्होंने ट्रेनिंग ली। वायु सेना में कमीशन के बाद अब इन महिला पायलटों को बीदर में एक साल की एडवांस ट्रेनिंग एडवांस हॉक पर दी जायेगी और जून 2017 से ये लडाकू विमान उड़ाना  शुरू कर देंगी। पिछले एक साल से हैदराबाद में इनकी ट्रेनिंग सुबह 4 बजे से शुरू होकर रात 10 बजे तक चलती थी।

भारतीय वायुसेना में महिलाओं के विमान उड़ाना शुरू करने के करीब दो दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद अब वो लम्हा आया है जब वो लड़ाकू विमानों के जरिए आसमान में दुश्मनों को अपनी ताकत दिखाएंगी। 1991 में पहली बार महिला पायलटों ने हेलिकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट विमान उड़ाना शुरू किया। 2012 में 2 वुमन फ्लाइट लेफ्टिनेंट अलका शुक्ला और एमपी शुमाथि ने लड़ाकू हेलिकॉप्टर्स के लिए ट्रेनिंग पूरी की। पिछले साल एअरफोर्स डे यानी 8 अक्टूबर 2015 के दिन वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल अरूप राहा ने महिलाओं के लिए लड़ाकू पायलट स्ट्रीम भी खोलने का ऐलान किया।

भारतीय सेनाओं में अपनी जगह बनाने के लिए देश की आधी आबादी ने लंबी लड़ाई लड़ी है और कदम दर कदम सफलता के साथ हर मोर्चे पर अपना लोहा मनवाया है। फरवरी 2016 में राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं के सुप्रीम कमांडर प्रणब मुखर्जी ने संसद में ऐलान किया था कि भारतीय सेनाओं में महिलाएं आगे चलकर सभी कॉम्बैट रोल्स निभाएंगीं। अब तीन महिला लड़ाकू पायलटों को कमीशन मिलने के बाद वो दिन दूर नहीं जब महिलाएं रणक्षेत्र में भी दुश्मन के छक्के छुड़ाने के लिए हर मोर्चे पर डटी नजर आएंगी।
-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

रविवार, 22 मई 2016

बोर्ड परीक्षाओं से लेकर आईएएस तक बेटियाँ ही टॉपर


बोर्ड परीक्षाओं से लेकर आईएएस तक बेटियाँ ही टॉप कर रही हैं। 
राजनीति में भी ममता बनर्जी और जयललिता पर लोगों ने फिर से विश्वास जताया है।
 फिर भी सबसे ज्यादा निशाने पर बेटियाँ/ नारियाँ ही होती हैं।  
......आखिर क्यों ??



रविवार, 15 मई 2016

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस : : पारिवारिक मूल्यों को सहेजने की जरूरत

परिवार की महत्ता से कोई भी इंकार नहीं कर सकता। रिश्तों के ताने-बाने और उनसे उत्पन्न मधुरता, स्नेह और प्यार का सम्बल ही परिवार का आधार है। परिवार एकल हो या संयुक्त, पर रिश्तों की ठोस बुनियाद ही उन्हें ताजगी प्रदान करती है। आजकल रिश्तों को लेकर मातृ दिवस, पिता दिवस और भी कई दिवस मनाये जाते हैं, पर आज 15 मई को इन सबको एकीकार करता हुआ ''अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस'' मनाया जाता है। परिवार का साथ व्यक्ति को सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी मजबूत रखता है। परिवार के सदस्य ही व्यक्ति को सही-गलत जैसी चीजों के बारे में समझाते हैं।

उपभोक्तावाद एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या के इस दौर में जहाँ कुछ लोग अपने को एकाकी समझकर तनाव, डिप्रेशन और कभी-कभी तो आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं, वहीँ कुछ लोग अपने काम को इतनी प्राथमिकता देने लगते हैं कि परिवार के महत्व को ही पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में वे ना तो अपने माता-पिता को समय दे पाते हैं और ना ही अपने वैवाहिक जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सक्षम होते हैं।

ऐसे में एक तरफ जहाँ परिवार के लोगों की वैयक्तिक जरूरतों के साथ सामूहिकता का तादात्मय परिवार को एक साथ रखने के लिए बेहद जरूरी है, वहीँ परिवार और काम के बीच का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के लिए उसका परिवार बहुत महत्वपूर्ण होता है। व्यक्ति के जीवन को स्थिर और खुशहाल बनाए रखने में उसका परिवार बेहद अहम भूमिका निभाता है।

सो, आप सभी लोग अपने परिवार के साथ विशेष रूप से आज का दिन इंजॉय करें और wish you all a very-very Happy International Family day !!

-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

रविवार, 8 मई 2016

मदर्स डे पर बाल-गीत : मम्मी मेरी सबसे प्यारी




मम्मी मेरी सबसे प्यारी,
मैं मम्मी की राजदुलारी।
मम्मी मुझसे प्यार जताती,
अच्छी-अच्छी चीजें लाती।

करती जब भी मैं मनमानी,
मम्मी याद दिलाती नानी।
फिर मम्मी करती है प्यार,        
मेरा भी गुस्सा बेकार।

पीछे-पीछे मम्मी आती,
चाॅकलेट दे मुझे मनाती।
थपकी देकर लोरी गाती,
निंदिया प्यारी मुझको आती।


माँ होने का एहसास दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास है। सिर्फ एक दिन ही क्यों, यह तो हर पल जीने वाला एहसास है !! Proud to be mother of two lovely daughters.