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रविवार, 28 फ़रवरी 2010

बरसाने की लट्ठमार होली

होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुक्ल नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है।
 
इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। सखागण मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं।
 
 बरसाने की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं।
 
इसी प्रकार बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ के विशिष्ट श्रृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आनन्द लेते हैं।
 
- कृष्ण कुमार यादव

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

बच्चों के उत्पात से उद्भव हुआ होलिकादहन का

होली व होलिका-दहन को लेकर तमाम मान्यताएं हैं. उनमें सबसे प्रचलित दैत्यराज हिरण्यकश्यप, उसके विष्णुभक्त बेटे प्रहलाद और उसकी बहन होलिका से जुडी हुई है.पर इससे परे भी एक मान्यता है.
 
भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं, न ही मनुष्यों, न ही हथियारों, न ही सदी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं और अंतत: भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के उत्पात से होगी।
 
धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की 15वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ आरम्भ होती हैं, बच्चे घरों से लकड़ियाँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
 
ऐसा माना जाता है कि होली का पंजाबी स्वरूप ‘धुलैंडी’ धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिकादहन किया जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं।

-कृष्ण कुमार यादव

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' में 'महिला-आरक्षण का झुनझुना' पोस्ट की चर्चा

'शब्द शिखर' और 'नारी' पर 24 फरवरी, 2010 को प्रस्तुत पोस्ट 'फिर से महिला-आरक्षण का झुनझुना' को हिन्दी दैनिक पत्र 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग राग' में 25 फरवरी, 2010 को स्थान दिया गया है.'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' में पहली बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है और समग्र रूप में प्रिंट-मीडिया में 16वीं बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है.. आभार !!

इससे पहले शब्द-शिखर और अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित मेरी पोस्ट की चर्चा अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका,गजरौला टाईम्स, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!

(चित्र साभार : प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा)

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

काला पानी में सरपट दौड़ेगी ट्रेन

अंडमान के लोगों के लिए यह भारत द्वारा किसी मैच के जीतने सरीखा था. कल शाम को पोर्टब्लेयर की सड़कों पर पटाखे फूट रहे थे, कारण जानना चाही तो पता चला कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे बजट में अंडमान में भी ट्रेन चलाने की बात प्रस्तावित की है. यहाँ राजधानी पोर्टब्लेयर और नार्थ अंडमान के सबसे दूर अवस्थित कस्बे डिगलीपुर के मध्य ट्रेन सेवा आरंभ करने के प्रस्ताव की घोषणा की गई है.

कभी काला-पानी के लिए मशहूर अंडमान के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आजादी के बाद से आज तक किसी भी रेल बजट में अंडमान के बारे में लोकसभा में जिक्र नहीं किया गया. यह पहली बार है कि रेल बजट में अंडमान का जिक्र है. फ़िलहाल यह प्रस्ताव है और इसे फलीभूत होने में समय भी लगेगा, पर भारत के सबसे बड़े सरकारी विभाग की इसी बहाने अंडमान में उपस्थिति भी दिखेगी. अन्यथा रेलवे के लिए अभी तक तो अंडमान काला-पानी से शापित ही नजर आता था.

इस ट्रेन सेवा से जहाँ पूरा अंडमान जुड़ जायेगा, वहीँ रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ जायेंगीं. समय की बचत के अलावा किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा और वे अपने उत्पादों को राजधानी पोर्टब्लेयर के बाजारों में आसानी से ला सकेंगें. इसके अभाव में यहाँ सब्जियां बहुत महगीं हैं, इससे उनकी कीमतें भी नियंत्रित हो जायेंगीं. चूँकि ममता बनर्जी पडोसी राज्य पश्चिम बंगाल की हैं, सो वे स्वयं अंडमान का दौरा आसानी से कर सकती हैं.

कभी काला-पानी के लिए कुख्यात अंडमान में ट्रेन सेवा मीडिया के लिए भी महत्वपूर्ण खबर बनी. तमाम राष्ट्रीय चैनल बाकायदा इसे हाईलाइट करके दिखा रहे थे. फ़िलहाल अंडमान के लोग खुश हैं और उनके साथ ही किसान, व्यवसायी, अधिकारी और पर्यटक भी खुश हैं...पर डर इस बात का भी है की यह सिर्फ घोषणा तक ही न रह जाय. अन्यथा रेलवे विभाग के लिए अंडमान काला-पानी ही बनकर रह जायेगा, जहाँ आज तक उन्होंने कदम ही नहीं रखा !!

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

फिर से महिला-आरक्षण का झुनझुना

एक बार फिर से महिला आरक्षण विधेयक को उसके मूल स्वरूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल को भेज दिया गया है। गाहे-बगाहे हर साल देश की आधी आबादी के साथ यह नौटंकी चलती है और नतीजा सिफ़र. इस देश में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष व मुख्यमंत्री पदों पर महिला आसीन हो चुकी हैं, पर एक अदद आरक्षण के लिए अभी भी महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक माहौल नहीं बन पाया है.

यद्यपि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद में अपने अभिभाषण में कहा है कि सरकार महिला आरक्षण बिल को जल्दी से जल्दी संसद से पारित कराने के लिए प्रतिबद्ध है। पर दुर्भाग्यवश इस प्रतिबद्धता के पीछे कोई राजनैतिक इच्छा-शक्ति नहीं दिखती है.

महिला आरक्षण बिल वाकई एक मजाक बन चुका है, जिस पर हर साल हंगामा होता है. कोई तर्क देगा कि महिलाएं इतनी शक्तिवान हो चुकी हैं कि अब उन्हें आरक्षण की जरुरत नहीं, कोई पर- कटियों से डरता है, कोई आरक्षण में भी आरक्षण चाहता है, कोई इसे वैसाखी बताकर ख़ारिज करना चाहता है तो किसी की नज़र में यह नेताओं की घरवालियों व बहू-बेटियों को बढ़ाने की चाल है. बस इन्हीं सब के चलते राजनीतिक दलों में इस मसले पर आम राय नहीं बन पाने के कारण पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से यह बिल संसद की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। पर कोई यह बता पाने की जुर्रत नहीं कर पाता है कि वास्तव में यह बिल मंजूर क्यों नहीं हो रहा है.

महिला-आरक्षण को एक ऐसा झुनझुना बना दिया गया है जिससे हर राजनैतिक दल व सत्ताधारी पार्टी खेलती जरुर है, पर उसे कोई सम्मानित स्थान नहीं देना चाहती. फ़िलहाल इंतजार इस बिल के पास होने का....!!!

-आकांक्षा यादव

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

जीवन एक पुष्प समान

यह जीवन एक पुष्प समान है. आप अपने हृदय के पटों को जितना खोलेंगें अर्थात अपनी विचारधारा को जितना विकसित करेंगें, वह समाज को उतना ज्यादा सुवासित करेगी !!

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

'शब्द-शिखर' के बहाने 'अमर उजाला' में अंडमान के आम

'शब्द शिखर' पर 18 फरवरी, 2010 को प्रस्तुत पोस्ट अंडमान में आम की बहार को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'अमर उजाला' ने 19 फरवरी, 2010 को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'ब्लॉग कोना' में स्थान दिया! 'अमर उजाला' के ब्लॉग कोना में नौवीं बार 'शब्द-शिखर' की चर्चा हुई है. फ़िलहाल अंडमान आने के बाद पहली बार किसी पत्र-पत्रिका ने इस ब्लॉग की चर्चा की है, सुखद अनुभूति होती है. यहाँ पर अधिकतर पत्र-पत्रिकाएं नहीं मिलती हैं, पर स्नेही-जन फोन कर सूचनाएं जरुर देते रहते हैं...आप सभी का पुन: आभार !!

इससे पहले शब्द-शिखर ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाओं की चर्चा अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका,गजरौला टाईम्स, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

अंडमान में आम की बहार

आम का फल विश्वप्रसिद्ध स्वादिष्ट फल है। इसे फलों का राजा कहा गया हैं। वेदों में आम को विलास का प्रतीक कहा गया है। इसका रसदार फल विटामिन ए, सी तथा डी का एक समृद्ध स्रोत है। कवि कालीदास ने इसकी प्रशंसा में गीत लिखे हैं। अलेक्‍सेंडर ने इसका स्‍वाद चखा है और साथ ही चीनी धर्म यात्री व्‍हेनसांग ने भी। मुग़ल सम्राट अकबर ने तो दरभंगा में आम के एक लाख पौधे लगाए और उस बाग़ को आज भी लाखी बाग़ के नाम से जाना जाता है। कालांतर में तमाम कविताओं में इसका ज़िक्र हुआ और कलाकारों ने बखूबी इसे अपने कैनवास पर उतारा। अपने देश में गर्मियों के आरंभ से ही आम पकने का इंतज़ार होने लगता है।

भारतीय प्रायद्वीप में आम की कृषि हजारों वर्षों से हो रही है। यह ४-५ ईसा पूर्व पूर्वी एशिया में पहुँचा। १० वीं शताब्दी तक यह पूर्वी अफ्रीका पहुँच चुका था। उसके बाद आम ब्राजील,वेस्टइंडीज और मैक्सिको पहुँचा क्योंकि वहाँ की जलवायु में यह अच्छी तरह उग सकता था। १४वीं शताब्दी में मुस्लिम यात्री इब्नबतूता ने इसकी सोमालिया में मिलने की पुष्टि की है। तमिलनाडु के कृष्णगिरि के आम बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं और दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

जब हम लखनऊ में थे तो अक्सर आम के इस शौक में मलिहाबाद जाते थे. उत्तर भारत में गौरजीत, बाम्बेग्रीन, दशहरी, लंगड़ा, चौसा एवं लखनऊ सफेदा प्रजातियाँ तो खूब उगायी जाती हैं।देखा जाय तो आम की किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फज़ली, बम्बई ग्रीन, बम्बई, अलफ़ॉन्ज़ो, बैंगन पल्ली, हिम सागर, केशर, किशन भोग, मलगोवा, नीलम, सुर्वन रेखा,वनराज, जरदालू प्रसिद्द हैं। अब तो तमाम नई किस्में- मल्लिका, आम्रपाली, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल तथा दशहरी-51 इत्यादि भी दिखने लगी हैं.

आम को तो वैज्ञानिकों ने ब्रेस्ट कैंसर से बचाव में दूसरे फलों के मुकाबले भी ज्यादा फायदेमंद माना है। वस्तुत: आम में ब्लूबेरी (नीबदरी), अंगूर, अनार जैसे दूसरे फलों से कम एंटीऑक्सिडेंट होने के कारण यह शरीर में एंटी कैंसर एक्टिविटीज को बढाता है। इसलिए कैंसर से बचने के लिए आम को रेग्यूलर डाइट में शामिल करना फायदेमंद है।पर यहाँ चर्चा अंडमान के आमों की...!!

आम खाना किसे नहीं अच्छा लगता, और वो भी मौसम से पहले. फ़िलहाल यहाँ अंडमान में तो हमारे लिए यही स्थिति है. अपने उत्तर-प्रदेश में रहते तो आम के लिए जून-जुलाई का इंतजार करते, पर यहाँ तो अभी से फलों के राजा आम की बहार है. पेड़ों पर आम सिर्फ दिखने ही नहीं लगे हैं बल्कि अब तो पककर पीले और लाल भी हो रहे हैं.

जब हम यहाँ आये थे तो आम के पेड़ों में बौर देखकर बड़ा अपनापन सा लगा था. पहले दाल में आम डालकर इसका स्वाद लिया, अब पर अब तो इन रसीले पीले-पीले आमों को खाने का मजा ही दुगुना हो गया है. वही स्वाद, वही अंदाज़..अजी क्या कहने. यहाँ के लोग बताते हैं कि अंडमान में बारहों महीने आम की फसल होती है और हर तीन माह बाद आम के फल पेड़ों पर दिखने लगते हैं. काश ऐसा ही हो और हम मस्ती से आम खाएं. फ़िलहाल अगले एक-दो सालों तक तो आम के लिए गर्मियों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. वक़्त से पहले आम को प्राकृतिक रूप में खाने के इस उत्साह ने बैठे-बैठे ये पोस्ट भी लिखवा दी. आप भी अंडमान आयें तो छककर आम खाएं और उसके बाद तो नारियल का पानी पियें ही... !!

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

प्रकृति प्रेमियों का स्‍वर्ग : अंडमान-निकोबार

फ़िलहाल अंडमान-निकोबार में हूँ, सो यहाँ की बहुत सी चीजें समझने की कोशिश भी कर रही हूँ. अंडमान निकोबार द्वीप प्रकृति प्रेमियों का स्‍वर्ग और गार्डन ऑफ इडन कहा जाता है। यहां का स्‍वच्‍छ परिवेश, सड़कें, हरियाली और प्रदूषण रहित ताजी हवा सभी प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर अकार्षित करते हैं। यहाँ स्थित कुल 572 दीपों में मात्र 38 पर जन-जीवन है और उनमें भी बमुश्किल आप लगभग 15 दीपों की सैर कर सकते हैं.

8,249 वर्ग कि.मी. में फैले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को पारिस्थितिकी के अनुकूल पर्यटक क्षेत्र के रूप में मान्‍यता दी गई हैं। इन द्वीपों के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7,171 वर्ग किलोमीटर भाग वनों से ढका हुआ है। इन द्वीपों पर लगभग सभी प्रकार के वन जैसे उष्‍णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार वन, उष्‍णकटिबंधीय अर्द्ध सदाबहार वन, आर्द्र पर्णपाती, गिरि शिखर पर होने वाले तथा तटवर्ती और दलदली बन पाए जाते हैं। अंडमान निकोबार में विभिन्‍न प्रकार की लकडियां पाई जाती हैं। सबसे बहुमूल्‍य लकडियां पाडोक तथा गरजन की हैं। ये निकोबार में नहीं मिलतीं। यहाँ उष्‍ण कटिबंधीय सदाबहार वर्षा वन, रजताभ बालू-तट, मैन्‍ग्रोव की घुमावदार पंक्तियां, संकरी खाडियां, पादपों, प्राणियों, प्रवालों आदि की दुर्लभ जातियों से भरपूर समुद्री जीवन पर्यटकों के लिए स्‍वर्ग हैं। इन द्वीपों में 96 वन्‍यजीव अभयारण्‍य, नौ राष्‍ट्रीय पार्क तथा एक जैव संरक्षित क्षेत्र (बायोरिजर्व) हैं।

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की 1912 किमी की लंबी तटरेखा पर मात्स्यिकी के विकास के लिए बहुत संभावना हैं। इसका 6 लाख वर्ग किमी का अनन्‍य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) है जो भारत के कुल अनन्‍य आर्थित क्षेत्र का 30 हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के समुद्र में मछलियों की 1100 से अधिक जातियों की पहचान की गई है जिनमें से अभी लगभग 30 जातियों का ही वाणिज्यिक उपयोग किया जा रहा है। इस द्वीप के वनों में रहने वाले मूल अधिवासी अभी भी शिकार और मछली पकड़ने का कार्य करते हैं। इनकी चार नेग्रीटो जनजातियां हैं, जो हैं ग्रेट अंडमानी, ओंज, जरावा और सेंटीनेलेस जो द्वीप समूहों के अंडमान समूह में पाई जाती हैं तथा दो मंगोली जनजातियां अर्थात निकोबारी और शाम्‍पेन्‍स द्वीप के निकोबार समूह में पाई जाती हैं।

अंडमान द्वीप समूह की मुख्‍य खाद्य फसल धान है और निकोबार द्वीप समूह की मुख्‍य नकदी फ़सलें नारियल तथा सुपारी हैं। यहां के किसान पहाडी जमीन पर भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के फल, जैसे आम, सेपोटा, संतरा, केला, पपीता, अनन्‍नास और कंदमूल आदि उगाते हैं। यहां बहुफसल व्‍यवस्‍था के अंतर्गत मसाले, जैसे - मिर्च, लौंग, जायफल तथा दालचीनी आदि भी उगाए जाते हैं। इन द्वीपों में रबड, रेड आयल, ताड़ तथा काजू आदि भी थोडी-बहुत मात्रा में उगाए जाते हैं।

वाकई प्रकृति का सबसे अधिक कीमती उपहार माना जाने वाला अंडमान और निकोबार द्वीप जीवन भर याद रहने वाला अवकाश अनुभव है। तभी तो कीट्स ने यहाँ के लिए लिखा था कि-''यहाँ का संगमरमरी सफेद तट अपने किनारों पर पाम वृक्षों के साथ अचल खड़ा रहकर समुद्र की ताल पर नृत्‍य करता है। जनजातीय तबलों की ताल पर यहाँ की वीरानी और रंग- बिरंगी मछलियां साफ स्‍वच्‍छ चमकीले पानी में अपने रास्‍ते चलती हैं।''

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

इज़हार-ए-मोहब्बत में थप्पड़

वैलेंटाइन-डे बखूबी बीत गया, यदि आप ऐसा सोचते हैं तो ग़लतफ़हमी दूर कर लें. कल 14 फरवरी जहाँ प्रेम के इजहार का दिन था वहीं आज इसी कड़ी में 'स्लैप-डे' है अर्थात थप्पड़ और चांटे खाने का दिन. यह किसी सेना या बजरंगियों की तरफ से नहीं बल्कि प्रेमिकाओं कि तरफ से होगा. अब इस दिन कितनों को थप्पड़ पड़ते हैं यह देखना भी दिलचस्प होगा। कॉलेज और यूनिवर्सिटी के युवाओं के लिए तो यह दिन बड़ा दुखदायी होगा, सो कई लोगों ने पहले से ही बहाना करके छुट्टियाँ मार ली हैं. पर कुछ प्रेमियों ने हार नहीं मानी है, बल्कि वे गाते हुए बढ़ रहे हैं कि-'जब प्यार किया तो डरना क्या'. वस्तुत: यह प्यार के इजहार के बाद का दिन है, जब यह फैसला होगा कि प्रेमिका ने प्रेमी का प्यार कबूला है या नहीं. यदि ना तो फिर थप्पड़ खाने कि तैयारी और यही है आज का "स्लैप-डे".

..पर चिंता करने कि बात नहीं है, हो सकता है आज प्रेमियों को थप्पड़ मिले, पर उसके बाद प्रेमिका को लगे कि उसने थप्पड़ मरकर अच्छा नहीं किया तो 20 फरवरी का इंतजार कीजिये. इस दिन को किसी को याद करने के लिए ’मिसिंग डे’ मनाया जाता है। हो सकता है थप्पड़ मरने के बाद भी वो आपको मिस कर रही हो.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

पहला प्यार (वेलेंटाइन दिवस पर)




पहली बार
इन आँखों ने महसूस किया
हसरत भरी निगाहों को

ऐसा लगा
जैसे किसी ने देखा हो
इस नाजुक दिल को
प्यार भरी आँखों से

न जाने कितनी
कोमल और अनकही भावनायें
उमड़ने लगीं दिल में

एक अनछुये अहसास के
आगोश में समाते हुए
महसूस किया प्यार को

कितना अनमोल था
वह अहसास
मेरा पहला प्यार !!

(जीवन साथी कृष्ण कुमार जी को समर्पित)

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

सेलुलर जेल में यातना के अमानवीय दृश्य

सेलुलर जेल में अंग्रेजी शासन ने देशभक्त क्रांतिकारियों को प्रताड़ित करने का कोई उपाय न छोड़ा. यातना भरा काम और पूरा न करने पर कठोर दंड दिया जाता था. पशुतुल्य भोजन व्यवस्था, जंग या काई लगे टूटे-फूटे लोहे के बर्तनों में गन्दा भोजन, जिसमें कीड़े-मकोड़े होते, पीने के लिए बस दिन भर दो डिब्बा गन्दा पानी, पेशाब-शौच तक पर बंदिशें कि एक बर्तन से ज्यादा नहीं हो सकती. ऐसे में किन परिस्थितियों में इन देश-भक्त क्रांतिकारियों ने यातनाएं सहकर आजादी की अलख जगाई, वह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
कोल्हू (घानी) जिससे सेलुलर जेल में बंदियों को प्रतिदिन बैल की भाँति घूम-घूम कर 20 पौंड नारियल का तेल निकलना पड़ता था.
इसके अलावा प्रतिदिन 30 पौंड नारियल की जटा कूटने का भी कार्य करना होता.

काम पूरा न होने पर बेंतों की मार पड़ती और टाट का घुटन्ना और बनियान पहनने को दिए जाते, जिससे पूरा बदन रगड़ खाकर और भी चोटिल हो जाता.

काम पूरा न होने पर या अंग्रेजों की जबरदस्ती नाराजगी पर नंगे बदन पर कोड़े बरसाए जाते.

मूल स्थान जहाँ पर नंगे बदन पर कोड़े बरसाए जाते.
फांसी से पहले अंतिम धार्मिक क्रिया का स्थान.

फांसी-घर का दृश्य. जब भी किसी को फांसी दी जाती तो क्रांतिकारी बंदियों में दहशत पैदा करने के लिए तीसरी मंजिल पर बने गुम्बद से घंटा बजाया जाता, जिसकी आवाज़ 8 मील की परिधि तक सुनाई देती थी. भय पैदा करने के लिए क्रांतिकारी बंदियों को फांसी के लिए ले जाते हुए व्यक्ति को और फांसी पर लटकते देखने के लिए विवश किया जाता था. वीर सावरकर को तो जान-बूझकर फांसी-घर के सामने वाले कमरे में ही रखा गया था.फांसी के बाद मृत शरीर को समुद्र में फेंक दिया जाता था.
किंवदन्ती है कि आज भी बलिदानियों की आत्माएं सेलुलर जेल में स्थित पीपल के पेड़ पर निवास करती हैं. पीपल के पेड़ के ठीक सामने ही यह लौ उनकी चिर स्मृति में प्रज्वलित है.

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

क्रान्तिकारियों के बलिदान का साक्षी: सेल्युलर जेल

इन दिनों अंडमान-निकोबार दीप समूह में हूँ. हमारे गेस्ट-हाउस के बगल में ही ऐतिहासिक सेलुलर जेल है तो सामने बंगाल की खाड़ी अपनी लहरों से लोगों को आकर्षित करती है. अंडमान को काला पानी कहा जाता रहा है तो इसके पीछे इस खाड़ी और जेल की ही भूमिका है. अंग्रेजों के दमन का यह एक काला अध्याय था, जिसके बारे में सोचकर अभी भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. कहते हैं कि अंडमान का नाम हनुमान जी के नाम पर पड़ा. पहले भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई इधर से ही करने की सोची पर बाद में यह विचार त्याग दिया. वीर सावरकर और अन्य क्रांतिकारियों को इसी सेलुलर जेल की काल-कोठरियों में कैद रखा गया और यातनाएं दी गईं. सेलुलर जेल अपनी शताब्दी मना चुका है पर इसके प्रांगन में रोज शाम को लाइट-साउंड प्रोग्राम उन दिनों की यादों को ताजा करता है, जब हमारे वीरों ने काला पानी की सजा काटते हुए भी देश-भक्ति का जज्बा नहीं छोड़ा. गन्दगी और सीलन के बीच समुद्री हवाएं और उस पर से अंग्रेजों के दनादन बरसते कोड़े मानव-शरीर को काट डालती थीं. पर इन सबके बीच से ही हमारी आजादी का जज्बा निकला. दूर दिल्ली या मेट्रो शहरों में वातानुकूलित कमरों में बैठकर हम आजादी के नाम पर कितने भी व्याख्यान दे डालें, पर बिना इस क्रांतिकारी धरती के दर्शन और यहाँ रहकर उन क्रांतिवीरों के दर्द को महसूस किये बिना हम आजादी का अर्थ नहीं समझ सकते !!

(सेलुलर जेल का निर्माण कार्य 1896 में आरम्भ हुआ तथा 10 साल बाद 10 मार्च 1906 को पूरा हुआ)




(सेलुलर जेल के नाम से प्रसिद्ध इस कारागार में 698 बैरक (सेल) तथा 7 खण्ड थे, जो सात दिशाओं में फैल कर पंखुडीदार फूल की आकृति का एहसास कराते थे। इसके मध्य में बुर्जयुक्त मीनार थी, और हर खण्ड में तीन मंजिलें थीं। इस दृश्य के माध्यम से इसे समझा जा सकता है)





(वीर सावरकर को इसी काल-कोठरी में बंदी रखा गया. यह काल-कोठरी सबसे किनारे और अन्य कोठरियों से ज्यादा सुरक्षित बने गई है. गौरतलब है कि सावरकर जी के एक भाई भी काला-पानी की यहाँ सजा काट रहे थे, पर तीन सालों तक उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता तक नहीं चला. इससे समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने यहाँ क्रांतिकारियों को कितना एकाकी बनाकर रखा था.)









(शेष अगली पोस्ट में...अगली पोस्ट में काला-पानी की सजा पाए क्रांतिकारियों को यातना के दृश्य प्रस्तुत होंगें)

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

हौसलों की उड़ान (बाल-गीत)

 
चिडि़या को न छोटा समझो,
ऊँची उड़ान भरती है।
सुबह से लेकर शाम तक,
यहाँ-वहाँ पर फिरती है।

छोटे पंख हैं तो क्या हुआ,
हौसलों की उड़ान होती है।
नन्हे-नन्हे पंख पसारे,
हिम्मत नहीं वह खोती है।

आओ हम भी उड़ान भरें,
मेहनत सुबह और शाम करें ।
पूरे करें हम सपने सारे,
हो जाएंगे जग से न्यारे।

-आकांक्षा यादव-

रविवार, 31 जनवरी 2010

अब किताब को पढ़कर भी सुनायेगी कलम

यह सुनने में आश्चर्यजनक लगता है, पर है सच. अब एक ऐसे कलम का इजाद हो चुका है, जो आपको किताब पढ़कर भी सुनाएगी. जिस शब्द पर आप उसे रख देंगे, वह उसे बोलकर सुना देगी. टेक्नॉलाजी की दुनिया में इसे ''मल्टीमीडिया प्रिंट रीडर (एमपीआर)'' कहते हैं, जो बोलने वाली कलम की मदद से आपके सामने बोलती किताब ले आती है. इस अनूठे कलम को भारत में प्रगति मैदान में लगने वाले पुस्तक मेले में शनिवार को लॉन्च भी कर दिया गया है. भारत में इस कलम को आदर्श कंपनी द्वारा पेश किया गया है और अभी भारत में मात्र 50 किताबें एमपीआर फॉर्मेट में आई हैं. दुनिया भर में अभी ऐसी महज 500 किताबें ही उपलब्ध हैं, लेकिन यह नया कॉन्सेप्ट है और इनकी तादाद तेजी से बढ़ रही है।

यह कलम मात्र किसी किताब पर रखने मात्र से नहीं बोलती बल्कि दुनिया भर में इसके लिए खासतौर से एमपीआर रेडी बुक्स लॉन्च की जा रही हैं। एमपीआर फॉर्मेट में किताब को लॉन्च करना बेहद आसान है क्योंकि उसकी सिर्फ ऑडियो फाइल बनानी पड़ती है। इसमें किताब की ऑडियो फाइल बना ली जाती है और किताब पर दो-आयामी (2डी) कोड लगा दिया जाता है। ऑडियो फाइल को कलम में लोड करने के बाद जैसे ही इसे किताब पर लगे लोड के आगे लाते हैं, कलम एक्टिव हो जाता है और शब्दों को पहचान कर बोलने लगता है। इस बोलने वाले कलम में एक इनबिल्ट स्पीकर, कैमरा और दो जीबी का मेमरी कार्ड है। जिस किताब को आप इस कलम की मदद से पढ़ना चाहते हैं, उसे पब्लिशर की साइट से कलम में डाउनलोड करना होगा। डाउनलोड का सिस्टम ऐसा है कि एक कोड की मदद से आप इसे कलम में लोड कर सकते हैं। मेमोरी अगर फुल हो जाए तो फ़िलहाल आपको पुरानी किताब डिलीट करनी होगी। आशा की जानी चाहिए की जल्द ही ज्यादा मेमोरी वाले मॉडल भी लाए जाएंगे।

इस अद्भुत कलम के कई फायदे भी हैं। विदेशी भाषा सीखने वालों के लिए यह बेहद प्रभावी चीज साबित हो सकती है क्योंकि आपके सामने स्पेलिंग होती है,उसका अर्थ होता है लेकिन उसे कैसे बोलें,यह समझ नहीं आता। बोलने वाला कलम इस काम को आसान बना सकता है। इसके अलावा, गरीब इलाकों में बच्चों के लिए यह कलम कामयाब टीचर का रोल भी निभा सकता है। डिस्लेक्सिया की मुश्किल को भी बोलने वाले कलम की मदद से कम किया जा सकता है। नेत्रहीनों के लिए तो यह वरदान ही साबित होगा। फ़िलहाल यह पेन 7000 रुपये का है लेकिन गांवों, गरीब इलाकों और नेत्रहीनों के लिए इसे सस्ते में पेश करने के लिए एनजीओ और सरकारी एजेंसियों से मदद ली जा सकती है।

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस की बधाईयाँ

!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाईयाँ !!

शनिवार, 16 जनवरी 2010

रानी लक्ष्मीबाई के झाँसी किले में एक दिन


(पतिदेव कृष्ण कुमार जी और पुत्री अक्षिता के साथ)
पिछले दिनों झाँसी जाने का मौका मिला, वही झाँसी जो रानी लक्ष्मीबाई के चलते मशहूर है. एक लम्बे समय से झाँसी का किला देखने की इच्छा थी, कि किस तरह उस मर्दानी ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाते, सारी घटनाएँ मानो जीवंत होकर आँखों के सामने छाने लगतीं. कुछ दृश्य आप लोगों के साथ बाँट रही हूँ, अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत करियेगा-

(कड़क बिजली तोप पर सवार पुत्री अक्षिता)


(इसी स्थान से रानी लक्ष्मीबाई ने किले से अपने घोड़े पर बैठकर छलांग लगाई थी.)

(इस शिव-मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई नित्य पूजा करती थीं)

(पुरोहित की वेदी के पास रखा रानी लक्ष्मीबाई का चित्र)

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

धूप खिलेगी

जयकृष्ण राय तुषार जी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत के पेशे के साथ-साथ गीत-ग़ज़ल लिखने में भी सिद्धहस्त हैं. इनकी रचनाएँ देश की तमाम चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाती रहती हैं. मूलत: ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने वाले तुषार जी एक अच्छे एडवोकेट व साहित्यकार के साथ-साथ सहृदय व्यक्ति भी हैं. सीधे-सपाट शब्दों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने वाले वाले तुषार जी ने पिछले दिनों एक गीत इस आग्रह के साथ भेजा की इसे "शब्द-शिखर" पर स्थान दिया जाय. इस खूबसूरत गीत को इस ब्लॉग पर आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ, कैसी लगी..कमेन्ट लिखियेगा-

धूप खिलेगी
हँसकर फूलों सी
कोहरा छँट जायेगा।
जल पंछी
डूबकर नहायेंगे
मौसम फिर बजरे पर गायेगा।

हाथों में हाथ लिए
मन में
विश्वास लिए चलना है,
जहाँ-जहाँ पर
उजास गायब है
बन करके दीप सगुन जलना है,
फिर हममें
से कोई सूरज बन
नई किरन नई सुबह लायेगा।

जीवन के
बासन्ती पन्नों पर
एक कलम चुपके से डोलेगी,
जो कुछ भी
अनकहा रहा अब तक
मन की उन परतें को खोलेगी,
गलबहियों के दिन
फिर याद करो
मन को एहसास गुदगुदायेगा।

टहनी पर
एक ही गुलाब खिला
इससे तुम आरती उतारना,
एक फूल
मुझको भी मान प्रिये!
जूडे में गूँथकर सँवारना,
जब भी ये फूल,
हवा छू लेगी
सारा आकाश महक जायेगा।

रविवार, 10 जनवरी 2010

मैक्सिको की खोज है चाॅकलेट

चाॅकलेट भला किसे नहीं प्रिय होता- क्या बूढ़े क्या बच्चे। इसका नाम सुनते ही मुँह में पानी भर आता है। चाॅकलेट शब्द माया भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है- ’खारा पानी’। चाॅकलेट बनाने के लिए बीजों को बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सफाई के बाद इन्हें भून कर पीस लिया जाता है। इसमें कोको बटर और पाउडर अलग-अलग हो जाता है।

चाॅकलेट की खोज 500 ईसा पूर्व मैक्सिको के मूल निवासियों ने की थी। चाॅकलेट को ककाओ (कोको) नामक वृक्ष की सूखी फलियों और बीजों को पीस कर बनाया जाता है। उष्णकटिबंधीय वातावरण में उगने वाले इस वृक्ष के नाम का अर्थ है- ’कड़वा रस’। यह वृक्ष मध्य अमेरिका, ब्राजील, मैक्स्किो, घाना, नाइजीरिया आदि देशों में खूब पाये जाते हैं। एक पूर्ण विकसित वृक्ष 25 फीट तक लम्बा हो जाता है। कोको के बीज देखने में बादाम के आकार के होते हैं। बीजों से न सिर्फ कोको और चाॅकलेट पाउडर प्राप्त होता है बल्कि इनसे कोको बटर भी मिलता है। कोको बटर को टाफियों और दवाइयों में भी इस्तेमाल किया जाता है।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

अब छात्र करेंगे ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति लोगों को जागरूक

अभी अख़बार में एक लाजवाब पहल के बारे में पढ़ी कि सीबीएसई ने देश के ऐतिहासिक धरोहरों और स्मारकों के संरक्षण के उद्देश्य से ''एडाप्ट हेरिटेज डे'' मनाने की योजना बनाई है। एडाप्ट योजना के तहत छात्रों को विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कर उनके संरक्षण का प्रण लेना होगा। धरोहरों के संरक्षणों के प्रण को हर साल 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के दिन प्रदर्शित करना होगा और यहां भ्रमण के आने वाले लोगों को धरोहरों को क्षति न पहुंचाने के लिए जागरूक करना होगा। छात्र इस कार्य को गंभीरता से पूरा करें, इसके लिए इसे सतत समग्र मूल्यांकन प्रणाली में शामिल किया जाएगा और उसके आधार पर अंक भी प्रदान किए जाएंगे।

वस्तुत: आपने देश में कई ऐतिहासिक धरोहर ताजमहल, आगरा किला, लाल किला, फतेहपुर सीकरी, कोर्णाक सूर्य मंदिर, खजुराहो, महाबलीपुरम, थंजाबूर, कुतुबमीनार, हम्पी इत्यादि विश्व-धरोहरों में शामिल हैं। इनको बचाए रखने और बेहतर बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सभी की है। लेकिन बीते कुछ समय से जिस प्रकार टूरिस्ट ऐतिहासिक धरोहरों को विभिन्न तरीकों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उससे यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि आखिर कैसे लोगों को जागरूक किया जाए? इसके लिए बच्चों को शामिल करने के पीछे सीबीएसई की यह मंशा है कि इससे उन्हें न केवल ऐतिहासिक धरोहरों की जानकारी मिलेगी बल्कि उन्हें इन जगहों पर भ्रमण भी करवाया जाएगा, ताकि वे लोगों को सीख दे सकें। इस पहल को पुरातत्व संरक्षण विभाग ने भी मंजूरी दी है. बच्चों में इसके प्रति लगाव पैदा हो इसके लिए इसे सतत समग्र मूल्यांकन का हिस्सा भी बना दिया गया है और बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को उस हिसाब से अंक भी प्रदान किया जाएगा।

रविवार, 3 जनवरी 2010

ट्रेन हादसों का जिम्मेदार कौन ??

नए साल के उल्लास पर शनि महाराज का कोप भरी पड़ा. साल के दूसरे दिन ही शनिवार को उत्तर प्रदेश में तीन ट्रेन-हादसे हुए. कईयों की जान गई व कई घायल हुए. कोई नया साल मनाकर आ रहा था तो कोई किसी समारोह में शामिल होने जा रहा था.पर सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर व्यवस्था में सुधार के लिए रेल मंत्रालय क्या कर रहा है ? मात्र आपने पूर्ववर्ती मंत्री को गलत ठहराने के लिए श्वेत-पत्र जारी होने से तो समस्याएं ख़त्म नहीं हो जायेंगीं. दुनिया बुलेट-ट्रेन दौड़ा रही है में हम अपनी सुपर फास्ट ट्रेन की सुरक्षा तक नहीं कर पा रहे हैं. हर साल लम्बे-लम्बे वादे व नीतियाँ पर नतीजा सिफर. आई आई टी कानपुर ने एक ही ट्रेक पर ट्रेनों के आने से होने वाले हादसों को रोकने के लिए एंटी कोलेजन डिवाइस बनाया वा इसे ट्रेनों में लगाने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को सौंपा था, पर वह भी नौकरशाही के मकड़जाल में उलझकर रह गया. आई आई टी कानपुर ने रेलवे सुरक्षा प्रौद्योगिकी मिशन का प्रथम चरण पूरा कर रेल मंत्रालय को सौंप दिया, पर दूसरे चरण की अनुमति देने का अभी तक मंत्रालय ने मन ही नहीं बनाया. कोहरे में देखने के लिए लेजर आधारित तकनीक भी विकसित करने पर कार्य चल रहा है.

...पर दुर्भाग्यवश जिन्हें इन चीजों को लागू करना है, वे पूर्ववर्ती की पोल खोलने हेतु श्वेत-पत्र लाने, अपने निर्वाचन क्षेत्रों में परियोजनाएं ले जाने व वोट-बैंक तथा सस्ती लोकप्रियता के मद्देनजर कार्य कर रहे हैं. जब तक हमारे राजनेताओं की इच्छाशक्ति पाँच साल के आगे नहीं सोच पायेगी तब तक यूँ ही नौकरशाही के मकडजाल में उलझकर अच्छी परियोजनाएं फाइलों में बंद होती रहेंगीं तथा हम हाथ पर हाथ धरे रहकर बैठे रहेंगें. अब लाल बहादुर शास्त्री जैसे राजनेता नहीं रहे जिन्होंने ट्रेन-एक्सिडेंट की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पद छोड़ दिया था, बल्कि लोगों की लाशों पर राजनीति करने वाले लोग शीर्ष पर बैठे हैं. यह लोकतंत्र की विडम्बना ही कही जाएगी.

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

हरिवंशराय बच्चन का नव-वर्ष बधाई पत्र !!

नव-वर्ष पर साहित्यकारों ने बहुत कुछ लिखा है. कविवर हरिवंशराय बच्चन की पंक्तियाँ भला किसे नहीं याद होंगीं-

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।

नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।



गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

....यहाँ बच्चन जी द्वारा एक पत्र में अपने हाथ से लिखी पंक्तियों को नव-वर्ष पर अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत कर रही हूँ. यह पत्र मेरे पतिदेव कृष्ण कुमार जी को किसी सज्जन ने भेंट किया था. पत्र पर बच्चन साहब की याद को सहेजने के लिए डाक विभाग द्वारा उन पर जारी डाक-टिकट को भी लगाया गया है.
*****आप सभी को नव-वर्ष-2010 की ढेरों शुभकामनायें*****

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

भारत में नव वर्ष के विभिन्न रूप

नव वर्ष धीरे-धीरे अपने मुकाम की ओर बढ़ रहा है. इसी के साथ उल्लास का पर्व भी आरंभ होता जाता है. कोई डांस-पार्टी इंजॉय करता है तो कोई दिन-दुखियों के साथ नव वर्ष सेलिब्रेट करता है. नव वर्ष के उद्भव की भी अपनी रोचक कहानी है. मानव इतिहास की सबसे पुरानी पर्व परम्पराओं में से एक नववर्ष है। नववर्ष के आरम्भ का स्वागत करने की मानव प्रवृत्ति उस आनन्द की अनुभूति से जुड़ी हुई है जो बारिश की पहली फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागतार्थ पक्षी के प्रथम गान पर या फिर हिम शैल से जन्मी नन्हीं जलधारा की संगीत तरंगों से प्रस्फुटित होती है।

इतिहास के गर्त में झांकें तो प्राचीन बेबिलोनियन लोग अनुमानतः 4000 वर्ष पूर्व से ही नववर्ष मनाते रहे हैं। लेकिन उस समय नववर्ष का ये त्यौहार 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि भी मानी जाती थी । रोम के तानाशाह जूलियस सीज़र ने ईसा पूर्व 45वें साल में जब जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार 1 जनवरी को नववर्ष का उत्सव मनाया गया। ऐसा करने के लिए जूलियस सीजर को पिछला साल, यानि, ईसापूर्व 46 इस्वी को 445 दिनों का करना पड़ा था।

आज विभिन्न विश्व संस्कृतियाँ नववर्ष अपनी-अपनी कैलेण्डर प्रणाली के अनुसार मनाती हैं। हिब्रू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे । इस सात दिन के संधान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगेरियन कैलेंडर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है। इसी तरह इस्लामिक कैलेंडर का नया साल मुहर्रम होता है। इस्लामी कैलेंडर एक पूर्णतया चन्द्र आधारित कैलेंडर है जिसके कारण इसके बारह मासों का चक्र 33 वर्षों में सौर कैलेंडर को एक बार घूम लेता है । इसके कारण नव वर्ष प्रचलित ग्रेगरी कैलेंडर में अलग-अलग महीनों में पड़ता है। चीनी कैलेंडर के अनुसार प्रथम मास का प्रथम चन्द्र दिवस नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है । यह प्रायः 21 जनवरी से 21 फरवरी के बीच पड़ता है।

***भारत में नव वर्ष के विभिन्न रूप***

भारत के भी विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है । प्रायः ये तिथि मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है । पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से 13 अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिल नव वर्ष भी आता है। तेलगु नव वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नव वर्ष विशु 13 या 14 अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल 15 जनवरी को नव वर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर नवरेह 19 मार्च को होता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड़ नव वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नव वर्ष दीपावली के दिन होता है। गुजराती नव वर्ष दीपावली के दिन होता है जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नव वर्ष पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नव वर्ष होता है।भारत में विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलगु संवत भी प्रचलित हैं.इनमें हर एक का अपना नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत है। विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। इस दिन गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष मनाया जाता है। वस्तुत: भारत में नववर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है।
 
-आकांक्षा यादव

रविवार, 27 दिसंबर 2009

इन्दिरा गाँधी की तमन्ना थी कि उनको बेटी मिले

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चाहत थी कि उनकी एक पुत्री भी हो। ज्योति बसु को जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से अभिभाषण के एवज में एक लाख सुपए सम्मान राशि और अन्य खर्च के लिए 1998 में प्रदान किए गए थे। ऐसे ही कुछ अनछुए पहलुओं का खुलासा पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह की हाल ही में प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तक 'योवर्स सिंसीयरली' में किया गया है। पुस्तक में नटवर सिंह के कई नामी हस्तियों के साथ पत्र व्यवहार संकलित हैं। इनमें इंदिरा गांधी, पीएन हक्सर, एचवाई शारदा प्रसाद, विजय लक्ष्मी पंडित, राजीव गाँधी, ईएम फोस्टर, एम गोर्डीमेर और मुल्कराज आनंद के साथ उनके पत्राचार के विवरण शामिल हैं।

पुस्तक में नटवर सिंह ने कई महत्वपूर्ण और अनछुई जानकारियों का खुलासा किया है। जैसे कि एक पत्र में इंदिरा गांधी ने उन्हें लिख था कि 'चीन क्या सोचता या कहता है, यह महत्वपूर्ण नही है, महत्वपूर्ण यह है कि क्या करता है ? इस दृष्टि से वह उम्मीद के अनुरूप अभी भी है।

1975 में गुजरात विधानसभा भंग करने की मांग पर पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की मांग से क्षुब्ध होकर इंदिरा गाँधी ने नटवर सिंह को कए पत्र लिखा था। उस समय वे लंदन में वे उप उच्चायुक्त थे। इस पत्र में लिखा था, 'हमने मोरारजी की मांग अंशत: मान ली है.. कि कितनी मूर्खतापूर्ण बात थी इस तरह का अनशन और हमें उनकी मांग मानना.. तब भी हम काफी कठिन स्थिति में थे। मोरारजी के देहान्त के बाद के परिदृश्य के बारे में सोचकर चिंतित थे। मैं इस बात से काफी स्तब्ध थी कि कुछ (विपक्षी दल) लोगों के दावे के अनुसार उनके देहान्त के बाद विपक्ष की एकता की राह साफ हो जाएगी।'

आंध्र प्रदेश में तेलंगाना की मांग के चन्द्रशेखर राव के हाल के अनशन के अवसर पर इंदिरा गांध के पत्र का स्मरण होता है। पत्राचार में इंदिरा गांधी के मजाकिया व्यक्तित्व की झलक जनवरी, 1970 में उनके पत्र से मिलती है जब नटवर सिंह रीढ़ की हड्डी में स्लिप डिस्क से परेशान थे। इंदिरा गाँधी ने उन्हें लिखा था कि केपीएस मेनन जब ऐसी ही स्थिति में थे तो अजन्ता की गुफा के चित्रों की मुद्रा में वे कैसे कलात्मक ढंग से खड़े होते थे। नटवर सिंह की पुत्री हुई तो उन्हें बधाई देते हुए इंदिरा गाँधी ने पत्र में लिखा था कि उनकी तमन्ना थी कि उन्हें भी एक लड़की होती। भाकपा नेता हीरेन मुखर्जी का एक पत्र इस संकलन में है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि क्या यह सच है ज्योति बसु ने जवाहरलाल नेहरू ट्रस्ट से लेक्चर देने के लिए एक लाख रुपए और अन्य खर्च लिए थे।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

अमर उजाला में 'शब्द-शिखर' की चर्चा


'शब्द शिखर' पर 23 दिसंबर 2009 को प्रस्तुत पोस्ट हफ्ते भर बंद रहेंगीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'अमर उजाला' ने 24 दिसंबर 2009 को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'ब्लॉग कोना' में स्थान दिया! 'अमर उजाला' के ब्लॉग कोना में आठवीं बार 'शब्द-शिखर' की चर्चा हुई है...आभार!

इससे पहले इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाओं की चर्चा अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, गजरौला टाईम्स, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार!