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सोमवार, 24 मई 2010

प्रगतिशील सोच के अन्तर्विरोधों के बीच कविता

कविता आत्मा का मौलिक व विशिष्ट संगीत है, जो मानव में संस्कार रोपती हैै। एक ऐसा संस्कार जो सभी को प्रदत्त है पर जरूरत है उसके खोजे जाने, महसूस करने और गढ़ने की। यही कारण है कि सम्वेदनाओं का प्रस्फुटन होते ही कविता स्वतः फूट पड़ती है। जब मानव हृदय में विचार कौंधते हैं तो सृजन की सतत् प्रक्र्र्र्र्र्र्र्रिया स्वतः आरंभ हो जाती है। अमूर्त विचार वक्त की लय के साथ धीरे धीरे रागात्मक शब्दों में ढलने लगते हैं। इसी के साथ कवि और उसके शब्द दोनांे निखरते चले जाते है,ं ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूता नारी। एक असहनीय पीड़ा के बाद मातृत्व की जो चरमानन्द अनुभूति होती है, वैसी ही आनंदानुभूूति कवि को काव्य-सृजन के पश्चात होती है।


कविता मात्र यथार्थ का अर्थगर्भित रूपक नहीं है वरन् वस्तुगत सच्चाईयों का अन्तर्संबंध भी है। कविता अपने भीतर एक और बड़ी लेकिन समानांतर दुनिया को समाये हुये है। कविता के शब्द मात्र शब्द भर नहीं हैं वरन् मनुष्य के अतीत, वर्तमान व भविष्य की अनेक आकांक्षाओं को अपने में समेटे हुऐ हैं। कविता सामाजिक व सांस्कृतिक जड़ता से लड़ने की शक्ति देती है। यही कारण है कि कविता के लिए विचारों की स्वतंत्रता और उन्मुक्त अभिव्यक्ति आवश्यक है। वस्तुतः कविता का मुख्य धर्म ही मानवीय परिस्थितियों, उसके परिवेश, उसके सरोकारोें और सुख-दुख से जुड़ाव है। ऐसे में कविता की बनावट और मिजाज लोकतांत्रिक है। वह अपनी बात कहती है पर दूसरों को उसे मानने के लिए बाध्य नहीं करती। दूसरे शब्दों में कहें तो कविता मांग और आपूर्ति के सांस्कृतिक दायित्व के विपरीत अपने होने में ही अपनी सार्थकता समझती है।


कविता सिर्फ कवि की नहीं होती बल्कि पाठकों और श्रोताओं की भी होती है। वह चरमानंद की ऐसी सहज अनुभूति है जो जीवन के दुर्गम रास्तों पर भी साथ नहीं छोड़ती। आधुनिक परिवेश में प्रगतिशील सोच के अन्तर्विरोधों के बीच कविता निरा कला कर्म या बौद्विक कवायद भर नहीं है वरन् इसमें स्वाभाविक प्रेरणाओं के साथ अपेक्षित वैविध्य और विस्तार भी है। आपाधापी भरी इस जिन्दगी में कविता सृजन पथ पर आक्सीजन का कार्य करती है। तभी तो कवि सामान्य सी दिखने वाली वस्तुओं को कवि-कौशल से कविता में रूपान्तरित कर लोगों को चकित कर देता है और लोग बार-बार उसे नई अर्थ छवियों से उद्घाटित करते रहते हैं। कविता नव निर्माण और विध्वंस दोनों को प्रतिबिंबित करती है। कविता है तभी तो शब्दों का लावण्य है, अर्थ की चमक है, प्रकृति का साहचर्य है, प्रेम की पृष्ठभूमि में सम्बन्धों की उष्मा है। कविता चीजेां को देखने की दृष्टि भी है और बोध भी।

आज की कविता रचनाकार के साथ-साथ पाठक और श्रेाताओं को भी अभिव्यक्त करने में सहायता देने वाली है। पाठक और श्रोता ही किसी कविता और उसके कृतिकार की असली कसौटी हैं। जो कविता पाठकों और श्रोताओं से सीधा सम्वाद नहीं स्थापित कर पाती, मात्र बौद्धिक आधार पर टिकी होती है उसका कोई अर्थ नहीं। आलोचकों की मानें तो कवि अपनी आवाज के परदे के पीछे कुछ इस तरह छुप जाता है कि लगे, वह सबकी नहीं भी, तो कईयों की आवाज के परदों के पीछे से तो बोलता सुनाई ही पड़ता है। ऐसे में कवि सम्मेलनों की महत्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि इसमें कवि और श्रोता एक दूसरे से सीधे रूबरू होते हैं।

कविता लिखने की बजाय कहना सदैव से ज्यादा जटिल रहा है। कविता स्वतःसुखाय तो लिखी जा सकती है पर श्रोताओं के बीच प्रस्तुत करने हेतु कविता में सम्प्रेषणीयता के साथ-साथ सौन्दर्यानुभूति का होना अति आवश्यक है। इसके अभाव में शब्द अपना अर्थ खो बैठते हैं। छन्दमुक्त कविता के नाम पर कवि सम्मेलनों में आज कविता की अपनी रीझ-बूझ की बजाय दुरूहता ज्यादा हावी है और यही कारण है कि श्रोतागण इन कवि सम्मेलनों की तरफ आकर्षित नहीं होते। हाल के दिनो में कविता के शास्त्रीय उपमानों की बजाय यदि हास्य-व्यंग्य आधारित कविताओं की बहुलता कवि सम्मेलनों में बढ़ी है तो इसका एक प्रमुख कारण कविताओं की अनचाही दुरूहता ही है।

विचारधारा से कविता अछूती नहीं रही है। समाज में व्याप्त विभिन्न विचारधाराओं के अनुयायी अपने दृष्टिकोण से काव्य सृजन करते रहे हैं। इसके बावजूद कविता हवा में नहीं होती बल्कि वह अपनी स्वायत्त गरिमा के प्रति एवं लोक की अनुगूँज के प्रति सदैव सचेत रहती है। जीवन की तमाम हलचलंे कविता में प्रतिबिम्बित होती हैं। कविता सपनों को जीवन्त रखती है और भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करती है। वैचारिकता के साथ-साथ कविता का एक भावनात्मक पहलू भी होता है, जो उसको पाठकों और श्रोताओं से जोड़ता है। कवि सम्मेलनों में इन दिनों ऐसी कविताओं की बहार है, जिनमें सिर्फ सपाट बयानबाजी होती है। कवि सम्मेलनों से लोगांे को जोड़ने हेतु जरूरी है कि कविता में अनुभूति और संवेदना का भी मिश्रण हो, इसके अभाव में ये मात्र औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।


एक समय था जब कवि सम्मेलन नवागन्तुकों को प्रोत्साहित करने के सबसे सशक्त माध्यम माने जाते थे और इनके माध्यम से अग्रज और परवर्ती पीढ़ियों के मध्य सृजनधर्मी संवाद का माहौल कायम होता था। आज के तमाम प्रतिष्ठित कवियों का रास्ता कवि सम्मेलनों से होकर ही गुजरा है पर दुर्भाग्यवश आज वे ही इससे कन्नी काटने लगे हैं। नतीजन, इन मंचों पर जो सार्थक बहस होनी चाहिए, उससे नई पीढ़ी अछूती रह जाती है। वय के अनुसार अग्रज व परवर्ती पीढ़ी के कवियों में द्वन्द भी उभरता है, क्योंकि दोनांे के समयकाल और मनःस्थिति में काफी अन्तर होता है। ऐसे में पुराने कवि नये कवियों पर प्रश्नचिन्ह भी लगाते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि हर कवि का अपना स्वर है और हर स्वर की अपनी मादकता। अतः ऐसा कोई नियम न बनाया जाय जिससे कि सभी कवि एक ही सुर में गाने लगें।

आमजन में कविता के प्रति क्रेज बढ़ाने में कवि सम्मेलनों की अहम् भूमिका रही है। एक दौर था जब कविता के रसिये रात-रात भर जगकर कविताओं का मजा लूटते थे और कवि भी श्रोताओं की दाद पाकर प्रफुल्लित होते थे तथा एक के बाद एक अनूठी प्रस्तुतियांँ करते थे। वक्त के साथ कवि सम्मेलनों पर व्यवसायिकता हावी होने लगी और भागदौड़ भरी इस जिन्दगी़ में लोगों के पास भी कवि सम्मेलनों में जाने की फुर्सत नहीं रही। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले कवि और कवि सम्मेलनों में उपस्थिति दर्ज कराने वाले कवियों में अन्तर किया जाने लगा। अर्थ प्रधान युग में कवि हेतु श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट और वाह-वाह नहीं बल्कि पधारने हेतु प्राप्त गिफ्ट और धनराशि महत्वपूर्ण हो गई तो श्रोताओं हेतु कविता की गम्भीरता नहीं बल्कि उसकी सहजता व सम्प्रेषणीयता महत्वपूर्ण हो गई। कवि और श्रोता का सम्बन्ध उपभोक्तावादी दौर में कहीं-न-कहीं ग्राहकोन्मुख हो गया। श्रोता यदि अपने व्यस्त रूटीन में से समय निकालकर कविता सुनने जाता है तो उसका उद्देश्य ज्ञानार्जन नहीं बल्कि मनोरंजन है। एक ऐसा मनोरंजन, जिसके लिए उसे अपने दिलो-दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं पड़े। ऐसे में कवियों को भी श्रोताओं की भावनाओं का ख्याल रखते हुए हल्की-फुल्की कवितायें सुनानी पड़ती हैं। कवि सम्मेलनों का स्वर्णिम अतीत, उनकी महत्ता, कवियों की प्रसिद्धि और कविता के शास्त्रीय उपमान धरे के धरे रह गये हैं, बस रह गया है तो क्षणिक मनोरंजन।
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