आपका समर्थन, हमारी शक्ति
रविवार, 31 जनवरी 2010
अब किताब को पढ़कर भी सुनायेगी कलम
यह कलम मात्र किसी किताब पर रखने मात्र से नहीं बोलती बल्कि दुनिया भर में इसके लिए खासतौर से एमपीआर रेडी बुक्स लॉन्च की जा रही हैं। एमपीआर फॉर्मेट में किताब को लॉन्च करना बेहद आसान है क्योंकि उसकी सिर्फ ऑडियो फाइल बनानी पड़ती है। इसमें किताब की ऑडियो फाइल बना ली जाती है और किताब पर दो-आयामी (2डी) कोड लगा दिया जाता है। ऑडियो फाइल को कलम में लोड करने के बाद जैसे ही इसे किताब पर लगे लोड के आगे लाते हैं, कलम एक्टिव हो जाता है और शब्दों को पहचान कर बोलने लगता है। इस बोलने वाले कलम में एक इनबिल्ट स्पीकर, कैमरा और दो जीबी का मेमरी कार्ड है। जिस किताब को आप इस कलम की मदद से पढ़ना चाहते हैं, उसे पब्लिशर की साइट से कलम में डाउनलोड करना होगा। डाउनलोड का सिस्टम ऐसा है कि एक कोड की मदद से आप इसे कलम में लोड कर सकते हैं। मेमोरी अगर फुल हो जाए तो फ़िलहाल आपको पुरानी किताब डिलीट करनी होगी। आशा की जानी चाहिए की जल्द ही ज्यादा मेमोरी वाले मॉडल भी लाए जाएंगे।
इस अद्भुत कलम के कई फायदे भी हैं। विदेशी भाषा सीखने वालों के लिए यह बेहद प्रभावी चीज साबित हो सकती है क्योंकि आपके सामने स्पेलिंग होती है,उसका अर्थ होता है लेकिन उसे कैसे बोलें,यह समझ नहीं आता। बोलने वाला कलम इस काम को आसान बना सकता है। इसके अलावा, गरीब इलाकों में बच्चों के लिए यह कलम कामयाब टीचर का रोल भी निभा सकता है। डिस्लेक्सिया की मुश्किल को भी बोलने वाले कलम की मदद से कम किया जा सकता है। नेत्रहीनों के लिए तो यह वरदान ही साबित होगा। फ़िलहाल यह पेन 7000 रुपये का है लेकिन गांवों, गरीब इलाकों और नेत्रहीनों के लिए इसे सस्ते में पेश करने के लिए एनजीओ और सरकारी एजेंसियों से मदद ली जा सकती है।
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
शनिवार, 16 जनवरी 2010
रानी लक्ष्मीबाई के झाँसी किले में एक दिन
(पतिदेव कृष्ण कुमार जी और पुत्री अक्षिता के साथ)
पिछले दिनों झाँसी जाने का मौका मिला, वही झाँसी जो रानी लक्ष्मीबाई के चलते मशहूर है. एक लम्बे समय से झाँसी का किला देखने की इच्छा थी, कि किस तरह उस मर्दानी ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाते, सारी घटनाएँ मानो जीवंत होकर आँखों के सामने छाने लगतीं. कुछ दृश्य आप लोगों के साथ बाँट रही हूँ, अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत करियेगा-
(कड़क बिजली तोप पर सवार पुत्री अक्षिता)
(इसी स्थान से रानी लक्ष्मीबाई ने किले से अपने घोड़े पर बैठकर छलांग लगाई थी.)
(इस शिव-मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई नित्य पूजा करती थीं)
(पुरोहित की वेदी के पास रखा रानी लक्ष्मीबाई का चित्र)
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
धूप खिलेगी
धूप खिलेगी
हँसकर फूलों सी
कोहरा छँट जायेगा।
जल पंछी
डूबकर नहायेंगे
मौसम फिर बजरे पर गायेगा।
हाथों में हाथ लिए
मन में
विश्वास लिए चलना है,
जहाँ-जहाँ पर
उजास गायब है
बन करके दीप सगुन जलना है,
फिर हममें
से कोई सूरज बन
नई किरन नई सुबह लायेगा।
जीवन के
बासन्ती पन्नों पर
एक कलम चुपके से डोलेगी,
जो कुछ भी
अनकहा रहा अब तक
मन की उन परतें को खोलेगी,
गलबहियों के दिन
फिर याद करो
मन को एहसास गुदगुदायेगा।
टहनी पर
एक ही गुलाब खिला
इससे तुम आरती उतारना,
एक फूल
मुझको भी मान प्रिये!
जूडे में गूँथकर सँवारना,
जब भी ये फूल,
हवा छू लेगी
सारा आकाश महक जायेगा।
रविवार, 10 जनवरी 2010
मैक्सिको की खोज है चाॅकलेट
चाॅकलेट की खोज 500 ईसा पूर्व मैक्सिको के मूल निवासियों ने की थी। चाॅकलेट को ककाओ (कोको) नामक वृक्ष की सूखी फलियों और बीजों को पीस कर बनाया जाता है। उष्णकटिबंधीय वातावरण में उगने वाले इस वृक्ष के नाम का अर्थ है- ’कड़वा रस’। यह वृक्ष मध्य अमेरिका, ब्राजील, मैक्स्किो, घाना, नाइजीरिया आदि देशों में खूब पाये जाते हैं। एक पूर्ण विकसित वृक्ष 25 फीट तक लम्बा हो जाता है। कोको के बीज देखने में बादाम के आकार के होते हैं। बीजों से न सिर्फ कोको और चाॅकलेट पाउडर प्राप्त होता है बल्कि इनसे कोको बटर भी मिलता है। कोको बटर को टाफियों और दवाइयों में भी इस्तेमाल किया जाता है।
शनिवार, 9 जनवरी 2010
अब छात्र करेंगे ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति लोगों को जागरूक
वस्तुत: आपने देश में कई ऐतिहासिक धरोहर ताजमहल, आगरा किला, लाल किला, फतेहपुर सीकरी, कोर्णाक सूर्य मंदिर, खजुराहो, महाबलीपुरम, थंजाबूर, कुतुबमीनार, हम्पी इत्यादि विश्व-धरोहरों में शामिल हैं। इनको बचाए रखने और बेहतर बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सभी की है। लेकिन बीते कुछ समय से जिस प्रकार टूरिस्ट ऐतिहासिक धरोहरों को विभिन्न तरीकों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उससे यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि आखिर कैसे लोगों को जागरूक किया जाए? इसके लिए बच्चों को शामिल करने के पीछे सीबीएसई की यह मंशा है कि इससे उन्हें न केवल ऐतिहासिक धरोहरों की जानकारी मिलेगी बल्कि उन्हें इन जगहों पर भ्रमण भी करवाया जाएगा, ताकि वे लोगों को सीख दे सकें। इस पहल को पुरातत्व संरक्षण विभाग ने भी मंजूरी दी है. बच्चों में इसके प्रति लगाव पैदा हो इसके लिए इसे सतत समग्र मूल्यांकन का हिस्सा भी बना दिया गया है और बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को उस हिसाब से अंक भी प्रदान किया जाएगा।
रविवार, 3 जनवरी 2010
ट्रेन हादसों का जिम्मेदार कौन ??
नए साल के उल्लास पर शनि महाराज का कोप भरी पड़ा. साल के दूसरे दिन ही शनिवार को उत्तर प्रदेश में तीन ट्रेन-हादसे हुए. कईयों की जान गई व कई घायल हुए. कोई नया साल मनाकर आ रहा था तो कोई किसी समारोह में शामिल होने जा रहा था.पर सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर व्यवस्था में सुधार के लिए रेल मंत्रालय क्या कर रहा है ? मात्र आपने पूर्ववर्ती मंत्री को गलत ठहराने के लिए श्वेत-पत्र जारी होने से तो समस्याएं ख़त्म नहीं हो जायेंगीं. दुनिया बुलेट-ट्रेन दौड़ा रही है में हम अपनी सुपर फास्ट ट्रेन की सुरक्षा तक नहीं कर पा रहे हैं. हर साल लम्बे-लम्बे वादे व नीतियाँ पर नतीजा सिफर. आई आई टी कानपुर ने एक ही ट्रेक पर ट्रेनों के आने से होने वाले हादसों को रोकने के लिए एंटी कोलेजन डिवाइस बनाया वा इसे ट्रेनों में लगाने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को सौंपा था, पर वह भी नौकरशाही के मकड़जाल में उलझकर रह गया. आई आई टी कानपुर ने रेलवे सुरक्षा प्रौद्योगिकी मिशन का प्रथम चरण पूरा कर रेल मंत्रालय को सौंप दिया, पर दूसरे चरण की अनुमति देने का अभी तक मंत्रालय ने मन ही नहीं बनाया. कोहरे में देखने के लिए लेजर आधारित तकनीक भी विकसित करने पर कार्य चल रहा है....पर दुर्भाग्यवश जिन्हें इन चीजों को लागू करना है, वे पूर्ववर्ती की पोल खोलने हेतु श्वेत-पत्र लाने, अपने निर्वाचन क्षेत्रों में परियोजनाएं ले जाने व वोट-बैंक तथा सस्ती लोकप्रियता के मद्देनजर कार्य कर रहे हैं. जब तक हमारे राजनेताओं की इच्छाशक्ति पाँच साल के आगे नहीं सोच पायेगी तब तक यूँ ही नौकरशाही के मकडजाल में उलझकर अच्छी परियोजनाएं फाइलों में बंद होती रहेंगीं तथा हम हाथ पर हाथ धरे रहकर बैठे रहेंगें. अब लाल बहादुर शास्त्री जैसे राजनेता नहीं रहे जिन्होंने ट्रेन-एक्सिडेंट की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पद छोड़ दिया था, बल्कि लोगों की लाशों पर राजनीति करने वाले लोग शीर्ष पर बैठे हैं. यह लोकतंत्र की विडम्बना ही कही जाएगी.
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
हरिवंशराय बच्चन का नव-वर्ष बधाई पत्र !!
वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।
नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।
नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।
गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!
....यहाँ बच्चन जी द्वारा एक पत्र में अपने हाथ से लिखी पंक्तियों को नव-वर्ष पर अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत कर रही हूँ. यह पत्र मेरे पतिदेव कृष्ण कुमार जी को किसी सज्जन ने भेंट किया था. पत्र पर बच्चन साहब की याद को सहेजने के लिए डाक विभाग द्वारा उन पर जारी डाक-टिकट को भी लगाया गया है.
*****आप सभी को नव-वर्ष-2010 की ढेरों शुभकामनायें*****
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
भारत में नव वर्ष के विभिन्न रूप
नव वर्ष धीरे-धीरे अपने मुकाम की ओर बढ़ रहा है. इसी के साथ उल्लास का पर्व भी आरंभ होता जाता है. कोई डांस-पार्टी इंजॉय करता है तो कोई दिन-दुखियों के साथ नव वर्ष सेलिब्रेट करता है. नव वर्ष के उद्भव की भी अपनी रोचक कहानी है. मानव इतिहास की सबसे पुरानी पर्व परम्पराओं में से एक नववर्ष है। नववर्ष के आरम्भ का स्वागत करने की मानव प्रवृत्ति उस आनन्द की अनुभूति से जुड़ी हुई है जो बारिश की पहली फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागतार्थ पक्षी के प्रथम गान पर या फिर हिम शैल से जन्मी नन्हीं जलधारा की संगीत तरंगों से प्रस्फुटित होती है। भारत के भी विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है । प्रायः ये तिथि मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है । पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से 13 अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिल नव वर्ष भी आता है। तेलगु नव वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नव वर्ष विशु 13 या 14 अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल 15 जनवरी को नव वर्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर नवरेह 19 मार्च को होता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड़ नव वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नव वर्ष दीपावली के दिन होता है। गुजराती नव वर्ष दीपावली के दिन होता है जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नव वर्ष पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नव वर्ष होता है।भारत में विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलगु संवत भी प्रचलित हैं.इनमें हर एक का अपना नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत है। विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। इस दिन गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष मनाया जाता है। वस्तुत: भारत में नववर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है।
रविवार, 27 दिसंबर 2009
इन्दिरा गाँधी की तमन्ना थी कि उनको बेटी मिले
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चाहत थी कि उनकी एक पुत्री भी हो। ज्योति बसु को जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से अभिभाषण के एवज में एक लाख सुपए सम्मान राशि और अन्य खर्च के लिए 1998 में प्रदान किए गए थे। ऐसे ही कुछ अनछुए पहलुओं का खुलासा पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह की हाल ही में प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तक 'योवर्स सिंसीयरली' में किया गया है। पुस्तक में नटवर सिंह के कई नामी हस्तियों के साथ पत्र व्यवहार संकलित हैं। इनमें इंदिरा गांधी, पीएन हक्सर, एचवाई शारदा प्रसाद, विजय लक्ष्मी पंडित, राजीव गाँधी, ईएम फोस्टर, एम गोर्डीमेर और मुल्कराज आनंद के साथ उनके पत्राचार के विवरण शामिल हैं।शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009
अमर उजाला में 'शब्द-शिखर' की चर्चा
'शब्द शिखर' पर 23 दिसंबर 2009 को प्रस्तुत पोस्ट हफ्ते भर बंद रहेंगीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'अमर उजाला' ने 24 दिसंबर 2009 को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'ब्लॉग कोना' में स्थान दिया! 'अमर उजाला' के ब्लॉग कोना में आठवीं बार 'शब्द-शिखर' की चर्चा हुई है...आभार!
इससे पहले इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाओं की चर्चा अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, गजरौला टाईम्स, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार!
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
हफ्ते भर बंद रहेंगीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
इंटरनेट कंपनी याहू के दुनियाभर के कार्यालय क्रिसमस से नव-वर्ष के प्रथम दिन (25 दिसंबर से 1 जनवरी) तक अर्थात एक सप्ताह के लिए बंद रहेंगे। याहू के अलावा एडोब तथा एप्पल जैसी कंपनियों ने भी छुट्टियों के दौरान अपने दफ्तर बंद रखने की घोषणा की है। एडोब और एप्पल के कार्यालय भी 24 दिसंबर से 1जनवरी तक बंद रहेंगे। याहू पूर्व में भी अपने अमेरिकी कर्मचारियों से एक सप्ताह का अवकाश लेने को कह चुकी है पर कंपनी द्वारा दफ्तर बंद रखने का अनिवार्य कदम पहली बार उठाया जा रहा है। इस कदम से कोई गलत सन्देश न जाये, इसके लिए ये आधुनिक कम्पनियाँ, परंपरागत तर्कों का सहारा ले रही हैं. कहा जा रहा है कि परंपरागत रूप से कारोबार की दृष्टि से ठंडे सप्ताह के दौरान दफ्तर बंद रखने से कर्मचारियों को फिर तरोताजा होने का मौका मिलता है और साथ ही इससे कंपनी की परिचालन लागत में कमी आती है। फ़िलहाल याहू के अमेरिकी कर्मचारी इस दौरान अवकाश ले सकते हैं या बिना वेतन की छुट्टियां ले सकते हैं। वहीं अमेरिका के बाहर के कर्मचारियों को इस दौरान स्थानीय कानून के अनुसार भुगतान किया जाएगा। गौरतलब है कि खर्चो में कटौती के उपायों के तहत याहू पहले ही 700 कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी है।....अब देखते जाइये, आगे-आगे होता क्या है. फ़िलहाल हम निश्चिन्त हो सकते हैं, सरकारी मुलाजिम जो ठहरे और वो भी भारत में. चिंता तो वो करें जो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हैं और बड़े-बड़े पैकेज उठाते हैं...पर सरकारी नौकरी में जो निश्चिन्तता है, वो बड़ी कंपनियों में नहीं. हमेशा सर पर तलवार लटकी रहती है कि कब बाज़ार के भाव गिरे और इसी के साथ बड़े-बड़े पैकेज भी औंधे मुँह गिरे. इसे कहते हैं नाम बड़े-दर्शन छोटे.
फ़िलहाल क्रिसमस और नव-वर्ष को सेलिब्रेट करने की तैयारियाँ कीजिये !!!
गुरुवार, 17 दिसंबर 2009
एक आरती के क्रांतिकारी रचयिता...ओम् जग जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे
ओम् जग जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करें....पूजा-आराधना किसी भी देवता की की जा रही हो, ओम जय जगदीश हरे आरती हर अवसर पर गाई जाती है। करीब डेढ़ सौ वर्ष में मंत्र और शास्त्र की तरह लोकप्रिय हो गई इस भावपूर्ण गीत आरती के रचयिता पंडित श्रद्धाराम शर्मा के बारे में कम लोगों को ही पता है। पं0 श्रद्धाराम शर्मा का जन्म 1838 में पंजाब के लुधियाना के पास फुल्लौर में हुआ थां. पिता जयदयालु अच्छे ज्योतिषी और धार्मिक प्रवृत्ति के थे. ऐसे में बालक श्रद्धाराम को बचपन से ही धार्मिक संस्कार विरासत में मिले थे। पंडित श्रद्धाराम शर्मा हिंदी के ही नहीं बल्कि पंजाबी के भी श्रेष्ठ साहित्यकारों में थे, लेकिन उनका मानना था कि हिंदी के माध्यम से इस देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सकती है। उन्होंने अपने साहित्य और व्याख्यानों से सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के खिलाफ जबर्दस्त माहौल बनाया।आज जिस पंजाब में सबसे ज्यादा कन्याओं की भ्रूण-हत्या होती है उसका अहसास पंडित श्रद्धाराम ने सौ साल पहले ही कर लिया था और इस विषय पर उन्होंने ‘भाग्यवती‘ उपन्यास लिखकर समाज को चेता दिया था।32 वर्ष की उम्र में पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने 1870 में ''ओम जय जगदीश'' आरती की रचना की। पं0 श्रद्धाराम की विद्वता और भारतीय धार्मिक विषयों पर उनकी वैज्ञानिक दृष्टि के लोग कायल हो गए थे। जगह-जगह पर उनको धार्मिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था और हजारों की संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। वे लोगों के बीच जब भी जाते अपनी लिखी ओम जय जगदीश की आरती गाकर सुनाते। यही नहीं धार्मिक कथाओं और आख्यानों का उद्धरण देते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ गई।
भारतीय सन्दर्भ में महाभारत का उल्लेख करते हुए वे ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने का संदेश देते थे। पंडित श्रद्धाराम शर्मा की गतिविधियों से तंग आकर 1865 में ब्रिटिश सरकार ने उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। जबकि उनकी लिखी किताबें स्कूलों में पढ़ाई जाती रही। पं0 श्रद्धाराम ने पंजाबी (गुरूमुखी) में ‘सिखों दे राज दी विथिया‘ और पंजाबी बातचीत जैसी किताबें लिखकर मानों क्रांति ही कर दी। अपनी पहली ही किताब से वे पंजाबी साहित्य में प्रतिष्ठित हो गए। इस पुस्तक में सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित ढंग से बताया गया था। अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।एक ईसाई पादरी फादर न्यूअन जो पं0 श्रद्धाराम के विचारों से बेहद प्रभावित थे, के हस्तक्षेप पर अंग्रेज सरकार को कुछ ही दिनों में उनके निष्कासन का आदेश वापस लेना पड़ा। पंडित श्रद्धाराम ने पादरी के कहने पर बाइबिल के कुछ अंशों का गुरूमुखी में अनुवाद भी किया था। पं0 श्रद्धाराम का निधन 1881 में लाहौर में हुआ था। आज हर घर में "जय जगदीश हरे" आरती गई जाती है, यहाँ तक की युवा भी बड़ी तल्लीनता से इसे गाती है, पर अधिकतर को इसके रचयिता का नाम तक पता नहीं.
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
पाँच वर्षों का यह सुखद सफर !!

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
'बाल साहित्य समीक्षा' का आकांक्षा यादव विशेषांक
बच्चों के समग्र विकास में बाल साहित्य की सदैव से प्रमुख भूमिका रही है। बाल साहित्य बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। बाल साहित्य बच्चों की एक भरी-पूरी, जीती-जागती दुनिया की समर्थ प्रस्तुति और बालमन की सूक्ष्म संवेदना की अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि बाल साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण व विषय की गम्भीरता के साथ-साथ रोचकता व मनोरंजकता का भी ध्यान रखना होता है। समकालीन बाल साहित्य केवल बच्चों पर ही केन्द्रित नहीं है अपितु उनकी सोच में आये परिवर्तन को भी बखूबी रेखाकित करता है। सोहन लाल द्विवेदी जी ने अपनी कविता ‘बड़ों का संग’ में बाल प्रवृत्ति पर लिखा है कि-''खेलोगे तुम अगर फूल से तो सुगंध फैलाओगे।/खेलोगे तुम अगर धूल से तो गन्दे हो जाओगे/कौवे से यदि साथ करोगे, तो बोलोगे कडुए बोल/कोयल से यदि साथ करोगे, तो दोगे तुम मिश्री घोल/जैसा भी रंग रंगना चाहो, घोलो वैसा ही ले रंग/अगर बडे़ तुम बनना चाहो, तो फिर रहो बड़ों के संग।'' आकांक्षा जी बाल साहित्य में भी उतनी ही सक्रिय हैं, जितनी अन्य विधाओं में। बाल साहित्य बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्य, आचार-विचार और व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने में अपनी भूमिका निभाता आया है। बाल साहित्यकार के रूप में आकांक्षा जी की दृष्टि कितनी व्यापक है, इसका अंदाजा उनकी कविताओं में देखने को मिलता है। इसी के मद्देनजर कानपुर से डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित-प्रकाशित ’बाल साहित्य समीक्षा’ ने नवम्बर 2009 अंक आकांक्षा यादव जी पर विशेषांक रूप में केन्द्रित किया है। 30 पृष्ठों की बाल साहित्य को समर्पित इस मासिक पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर बाल साहित्य की आशा को दृष्टांकित करता आकांक्षा यादव जी का सुन्दर चित्र सुशोभित है। इस विशेषांक में आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर कुल 9 रचनाएं संकलित हैं।
’’सांस्कृतिक टाइम्स’’ की विद्वान सम्पादिका निशा वर्मा ने ’’संवेदना के धरातल पर विस्तृत होती रचनाधर्मिता’’ के तहत आकांक्षा जी के जीवन और उनकी रचनाधर्मिता पर विस्तृत प्रकाश डाला है तो उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुडे दुर्गाचरण मिश्र ने आकांक्षा जी के जीवन को काव्य पंक्तियों में बखूबी गूंथा है। प्रसि़द्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु जी ने आकांक्षा जी के बाल रचना संसार को शब्दों में भरा है तो बाल-मन को विस्तार देती आकांक्षा यादव की कविताओं पर चर्चित समालोचक गोवर्धन यादव जी ने भी कलम चलाई है। डा0 कामना सिंह, आकांक्षा यादव की बाल कविताओं में जीवन-निर्माण का संदेश देखती हैं तो कविवर जवाहर लाल ’जलज’ उनकी कविताओं में प्रेरक तत्वों को परिलक्षित करते हैं।
वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 शकुन्तला कालरा, आकांक्षा जी की रचनाओं में बच्चों और उनके आस-पास की भाव सम्पदा को चित्रित करती हैं, वहीं चर्चित साहित्यकार प्रो0 उषा यादव भी आकांक्षा यादव के उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य के लिए अशेष शुभकामनाएं देती हैं। राष्ट्भाषा प्रचार समिति-उ0प्र0 के संयोजक डा0 बद्री नारायण तिवारी, आकांक्षा यादव के बाल साहित्य पर चर्चा के साथ दूर-दर्शनी संस्कृति से परे बाल साहित्य को समृद्ध करने पर जोर देते हैं, जो कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बेहद प्रासंगिक भी है। साहित्य साधना में सक्रिय सर्जिका आकांक्षा यादव के बहुआयामी व्यक्तित्व को युवा लेखिका डा0 सुनीता यदुवंशी बखूबी रेखांकित करती हैं। बचपन और बचपन की मनोदशा पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत आकांक्षा जी का आलेख ’’खो रहा है बचपन’’ बेहद प्रभावी व समयानुकूल है।
आकांक्षा जी बाल साहित्य में नवोदित रचनाकार हैं, पर उनका सशक्त लेखन भविष्य के प्रति आश्वस्त करता हैं। तभी तो अपने संपादकीय में डा0 राष्ट्रबन्धु लिखते हैं-’’बाल साहित्य की आशा के रूप में आकांक्षा यादव का स्वागत कीजिए, उन जैसी प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का रास्ता दीजिए। फूलों की यही नियति है।’’ निश्चिततः ’बाल साहित्य समीक्षा’ द्वारा आकांक्षा यादव पर जारी यह विशेषांक बेहतरीन रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक साथ स्थापित व नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन देना डाॅ0 राष्ट्रबन्धु जी का विलक्षण गुण हैं और इसके लिए डा0 राष्ट्रबन्धु जी साधुवाद के पात्र हैं।
समीक्ष्य पत्रिका-बाल साहित्य समीक्षा (मा0) सम्पादक-डा0 राष्ट्रबन्धु,, मूल्य 15 रू0, पता-109/309, रामकृष्ण नगर, कानपुर-208012
समीक्षक- जवाहर लाल ‘जलज‘, ‘जलज निकुंज‘ शंकर नगर, बांदा (उ0प्र0)
सोमवार, 16 नवंबर 2009
राजस्थान पत्रिका में 'शब्द-शिखर' की चर्चा
''शब्द शिखर'' पर 7 नवम्बर 2009 को प्रस्तुत बाल-कविता 'करें सबका सम्मान' को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'राजस्थान पत्रिका', जयपुर संस्करण के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग चंक' में 13 नवम्बर 2009 को स्थान दिया गया है. यह जानकारी 'प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा' द्वारा प्राप्त हुई. इससे पहले इस ब्लॉग पर व अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित आकांक्षा यादव की रचनाओं की चर्चा अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, गजरौला टाईम्स, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार!
रविवार, 15 नवंबर 2009
अमर उजाला में 'शब्द-शिखर' ब्लॉग की चर्चा
''शब्द शिखर'' पर 13 नवम्बर 2009 को बाल दिवस पर प्रस्तुत विशेष लेख "खो रहा है बचपन" को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'अमर उजाला' ने "बच्चे कुम्ह्लायेंगें, तो राष्ट्र क्या खिलेगा" शीर्षक से 14 नवम्बर 2009 को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'ब्लॉग कोना' में स्थान दिया! 'अमर उजाला' के ब्लॉग कोना में सातवीं बार शब्द-शिखर की चर्चा हुई है...आभार!
शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
खो रहा है बचपन (बाल-दिवस पर विशेष)
रविवार, 8 नवंबर 2009
करें सबका सम्मान (बाल-कविता)
कभी न हम हिम्मत हारें
आगे ही नित् बढ़ते जायें
अपने प्राण देशहित वारें।
हरदम रखें हौसला बुलंद
देश की हम बनें तकदीर
हमको कोई कम न समझे
बदल सकते हम तस्वीर।
नफरत और द्वेष मिटाकर
प्रेम-सौहार्द्र का करें मान
ऊँच-नीच का भेद मिटाकर
करें हम सबका सम्मान।
सोमवार, 26 अक्टूबर 2009
चाँद पे निकला पानी
नानी सुनाए कहानी,
कितनी अद्भुत बानी।
लेकर बैठी तकली,
चाँद पे बुढ़िया रानी।
चाँद पे निकला पानी,
सुनकर हुई हैरानी।
बड़ी होकर जाऊँगी,
चाँद पे पीने पानी।
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
प्रकृति और मानव के बीच तादात्म्य स्थापित करता छठ-पर्व
भारतीय संस्कृति में त्यौहार सिर्फ औपचारिक अनुष्ठान मात्रभर नहीं हैं, बल्कि जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। त्यौहार जहाँ मानवीय जीवन में उमंग लाते हैं वहीं पर्यावरण संबंधी तमाम मुद्दों के प्रति भी किसी न किसी रूप में जागरूक करते हैं। सूर्य देवता के प्रकाश से सारा विश्व ऊर्जावान है और इनकी पूजा जनमानस को भी क्रियाशील, उर्जावान और जीवंत बनाती है।
भारतीय संस्कृति में दीपावली के बाद कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला छठ पर्व मूलतः भगवान सूर्य को समर्पित है। माना जाता है कि अमावस्या के छठवें दिन ही अग्नि-सोम का समान भाव से मिलन हुआ तथा सूर्य की सातों प्रमुख किरणें संजीवनी वर्षाने लगी। इसी कारण इस दिन प्रातः आकाश में सूर्य रश्मियों से बनने वाली शक्ति प्रतिमा उपासना के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
वस्तुतः शक्ति उपासना में षष्ठी कात्यायिनी का स्वरूप है जिसकी पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है। छठ के पावन पर्व पर सौभाग्य, सुख-समृद्धि व पुत्रों की सलामती के लिए प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है। आदित्य हृदय स्तोत्र से स्तुति करते हैं, जिसमें बताया गया है कि ये ही भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण हैं तथा पितर आदि भी ये ही हैं। वैसे भी सूर्य समूचे सौर्यमण्डल के अधिष्ठाता हैं और पृथ्वी पर ऊर्जा व जीवन के स्रोत कहा जाता है कि सूर्य की साधना वाले इस पर्व में लोग अपनी चेतना को जागृत करते हैं और सूर्य से एकाकार होने की अनुभूति प्राप्त कर आनंदित होते है।
भारतीय संस्कृति में समाहित पर्व अन्ततः प्रकृति और मानव के बीच तादाद्म्य स्थापित करते हैं। जब छठ पर्व पर महिलाएँ गाती हैं- कौने कोखी लिहले जनम हे सूरज देव या मांगी ला हम वरदान हे गंगा मईया....... तो प्रकृति से लगाव खुलकर सामने आता है। इस दौरान लोक सहकार और मेल का जो अद्भुत नजारा देखने को मिलता है, वह पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी कल्याणकारी भावना के तहत आगे बढ़ाता है।
उदयमान सूर्य को नमन करने वाले संपूर्ण धरा में भारत ही एकमात्र देश है जहाँ अस्तांचलगामी भगवान् भास्कर को भी पूर्ण कृतज्ञतापूर्वक अर्घ्य समर्पित करने की परंपरा है। जीवन भर दिन भर अपने तेज़ से सम्पूर्ण पृथ्वी को दीप्त करने के पश्चात् जब भगवान भास्कर निस्तेज होकर पश्चिम दिशा की ओर प्रवर्तित होते हैं, तब उन्हें प्रकृति तत्वों सहित प्रणाम करना हमारे संस्कारों में निहित कृतज्ञता के अनुपम दर्शन का साक्षात् उदाहरण है।
दुनिया कहती है - जिसका उदय होता है, उसका अस्त होना तय है।
पर छठ महापर्व सिखाता है कि प्रकृति के सान्निध्य में, आस्था, परिवार और एकता जब साथ हों,
तो अस्त होता सूरज भी केवल उदय की तैयारी करता है।
छठ महापर्व हमें याद दिलाता है कि हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत है -
जब डूबते सूरज को भी श्रद्धा से नमन किया जाए,
तो जीवन की हर कठिनाई भी नई रोशनी का मार्ग बना देती है।
यह पर्व केवल उपवास नहीं,
बल्कि संयम, समर्पण और सकारात्मकता की वह शक्ति है
जो हमें सिखाती है -
कि जिसका “अस्त” होता है, उसका “उदय” होना निश्चित है।
यह अनायास ही नहीं है कि छठ के दौरान बनने वाले प्रसाद हेतु मशीनों का प्रयोग वर्जित है और प्रसाद बनाने हेतु आम की सूखी लकड़ियों को जलावन रूप में प्रयोग किया जाता है, न कि कोयला या गैस का चूल्हा। वस्तुतः छठ पर्व सूर्य की ऊर्जा की महत्ता के साथ-साथ जल और जीवन के संवेदनशील रिश्ते को भी संजोता है।
एक ऐसी पूजा
जिसमें कोई पुजारी नहीं होता
जिसमें देवता प्रत्यक्ष हैं
जिसमें डूबते सूर्य को भी पूजते हैं
जिसमें व्रती जाति समुदाय से परे होता है
जिसमें लोकगीत गाये जाते हैं
पकवान घर में ही बनाये जाते हैं
जिसमें घाट पर कोई ऊँच-नीच नहीं है
जिसका प्रसाद अमीर-गरीब सब श्रद्धा से ग्रहण करते हैं
ऐसे सामाजिक सौहार्द, सद्भाव, शांति-समृद्धि और सादगी का महापर्व है ये छठ।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
दीवाली में क्यों होती है लक्ष्मी-गणेश की पूजा
दीपावली को दीपों का पर्व कहा जाता है और इस दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि दीपावली मूलतः यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते। दीपावली पर रंग-बिरंगी आतिशबाजी, लजीज पकवान एवं मनोरंजन के जो विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं। सभ्यता के विकास के साथ यह त्यौहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मी जी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। गणेश जी को दीपावली पूजा में मंचासीन करने में शैव-सम्प्रदाय का काफी योगदान है। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेश जी को प्रतिष्ठित किया। यदि तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन् ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अतः कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा। दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णु जी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया हैै। ऐसा नहीं है कि दीपावली का सम्बन्ध सिर्फ हिन्दुओं से ही रहा है वरन् दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति के चलते जैन समाज दीपावली को निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है तो सिक्खों के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर की स्थापना एवं गुरू हरगोविंद सिंह की रिहाई दीपावली के दिन होने के कारण इसका महत्व सिक्खों के लिए भी बढ़ जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को आज ही के दिन माँ काली ने दर्शन दिए थे, अतः इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है। यह महत्वपूर्ण है कि दशहरा-दीपावली के दौरान पूर्वी भारत के क्षेत्रों में जहाँ देवी के रौद्र रूपों को पूजा जाता है, वहीं उत्तरी व दक्षिण भारत में देवी के सौम्य रूपों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा माँ की पूजा की जाती है।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009
प्रसन्नता भरे रंगों की अभिव्यक्ति है रंगोली
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009
‘इंगेजमेंट रिंग‘ की जगह ‘इंगेजमेंट बैण्ड‘
सगाई की अंगूठी हर कोई सहेज कर रखता है। आखिर इससे एक अनूठे बंधन की शुरूआत जो होती है। वक्त के साथ अब इंगेजमेंट रिंग की जगह इंगेजमेंट बैण्ड सगाई की शान बना हुआ है। सोबर और स्मार्ट लुक की वजह से युवाओं के बीच ये बैण्ड काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। दिलचस्प तथ्य तो यह है कि इनका लुक आम अंगूठियों की तरह तड़क-भड़क वाला नहीं होता है। हालांकि अभी भी तमाम युवा इंगेजमेंट बैण्ड में पीले सोने का बेस ही पसंद कर रहे हैं पर तमाम लोगों को व्हाइट गोल्ड का बेस भा रहा है। इंगेजमेंट बैण्ड में सबसे बेहतरीन लुक प्लैटिनम का आता है। लेकिन यह हर किसी के खर्च के अंतर्गत आता भी नहीं। व्हाइट गोल्ड से बने इंगेजमेंट बैण्ड थोड़ा सस्ते में ही मिल जाते हैं। रीमिक्स के इस दौर में पीले सोने के साथ व्हाइट गोल्ड, व्हाइट गोल्ड पर रोडियम पालिश और व्हाइट गोल्ड के साथ कापर गोल्ड का मिश्रण भी फैशन में है। इनमें डायमण्ड का इस्तेमाल भी काफी पसंद किया जा रहा है। खूबसूरत आकार में दिखने वाले इन इंगेजमेंट बैण्ड में ऊपर से चैड़े और नीचे से पतले आकार वाले ‘ब्राड-टु-नैरो‘ और ‘नैरो-टु-ब्राड‘ बैण्ड का खूब चलन है।‘ लोरल पैटर्न वाले पतले बैण्ड भी लोगों की पसंद है। इनके निचले हिस्से में सोने का जालीदार फ्लोरल वर्क होता है और ऊपर डायमण्ड का जड़ाऊ लोरल पैटर्न मौजूद होता है। ये आम आदमी के लिए 7,000 रूपये से लेकर रईसो के लिए 40 लाख रूपए तक के मूल्य में आते हैं।
तो उन महानुभावों के लिए खुशखबरी है जो इंगेजमेंट रिंग की जगह कुछ नया प्रयोग देखना चाहते हैं और अपने को फैशन की इस रीमिक्स दुनिया के साथ कदमताल करते देखना चाहते हैं।
--आकांक्षा यादव












